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शनिवार, 30 जुलाई 2016

navgeet

एक रचना  
*
मेघ न बरसे 
बरस रही हैं 
आहत जनगण-मन की चाहत। 
नहीं सुन रहीं 
गूँगी-बहरी 
सरकारें, क्या देंगी राहत?
*
जनप्रतिनिधि ही 
जन-हित की 
नीलामी करते, शर्म न आती। 
सत्ता खातिर 
शकुनि-सुयोधन 
की चालें ही मन को भातीं। 
द्रोणाचार्य 
बेचते शिक्षा 
व्यापम के सिरमौर बने हैं। 
नाम नहीं 
लिख पाते टॉपर
मेघ विपद के बहुत घने हैं। 
कदम-कदम पर 
शिक्षालय ही 
रेप कर रहे हैं शिक्षा का। 
रावण के रथ
बैठ सियासत 
राम-लखन पर ढाती आफत।
*
लोकतन्त्र की 
डुबा झोपड़ी
लोभतन्त्र नभ से जा देखे। 
शोकतंत्र निज 
बहुमत क्रय कर 
भोगतंत्र की जय-जय लेखे। 
कोकतंत्र नित 
जीता शैशव 
आश्रम रथ्यागार बन गए। 
जन है दुखी 
व्यथित है गण 
बेमजा प्रजा को शासन शामत।  
*
हँसिया  
गर्दन लगा काटने,  
हाथी ने बगिया रौंदी रे!
चक्र गला 
जनता का काटे, 
पंजे ने कबरें खोदी रे!
लालटेन से 
जली झुपड़िया 
कमल चुभाता पल-पल काँटे। 
सेठ-हितू हैं 
अफसर नेता 
अँधा न्याय ढा रहा आफत। 
*

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