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सोमवार, 8 अगस्त 2016

muktak

मुक्तक सलिला 
*
मधु रहे गोपाल बरसा वेणु वादन कर युगों से 
हम बधिर सुन ही न पाते, घिरे हैं छलिया ठगों से 
कहाँ नटनागर मिलेगा,पूछते रणछोड़ से क्यों?
बढ़ चलें सब भूल तो ही पा सकें नन्हें पगों से 
***

रंज ना कर मुक्ति की चर्चा न होती बंधनों में 
कभी खुशियों ने जगह पाई तनिक क्या क्रन्दनों में? 
जो जिए हैं सृजन में सच्चाई के निज स्वर मिलाने 
'सलिल' मिलती है जगह उनको न किंचित वंदनों में 
***

मुक्तक 
ऊँचाइयाँ छूता रहा मन, पैर धरती पर जमा 
नभ नापकर गर्वित हुआ, बन मेघ खुद में था रमा 
होकर विनीता धरा ने टेरा, बरस रेवा हुआ-
हो 'सलिल' धारा बह चला, पा लक्ष्य सागर चुप थमा
***

मुक्तक 
नेह तुम्हारा बन गया जीवन का आधार
धन्य हुआ जब कर लिया तुमने अंगीकार 
पिसे हिना सम नित्य हम रंग चढ़ा है खूब 
एक-दूसरे को हुए श्वासों का श्रृंगार 
***

मुक्तक 
नेह तुम्हारा बन गया जीवन का आधार
धन्य हुआ जब कर लिया तुमने अंगीकार 
पिसे हिना सम नित्य हम रंग चढ़ा है खूब 
एक-दूसरे को हुए श्वासों का श्रृंगार 
***

मुक्तक-
रहे निश्चय साथ, अंतिम श्वास तक 
पीर की सीमा सुसंयमित हास तक 
विरह के पल युगों सम लगते मगर-
मिलन के युग पल हुए परिहास कर 
***

मुक्तक -
मन न नादां है जिसे समझाएँ कुछ, जानता है सब, मगर अनजान बन। 
चाहता है दर्द को आनंद कर, जीत पाये कभी तो इंसान बन।।
और ये दुनिया उसे ही ठग रही, भोग दिखला आप खा जाती 'सलिल'
हाथ जोड़े चाहता तन मौन हो, मन रहे निष्प्राण बस भगवन बन।। 
***

बन के अपना पराया तुमने किया 
हमने चुप हो ज़हर का घूँट पिया 
हों जो तूफ़ान हार जाओगे-
जलेंगे दिल में तेरे बन के दिया

***
मुक्तक-
प्यार कण-कण से करे तो पुण्य है 
मोह को पल-पल तजे तो पुण्य है। 
संतुलन आचार और विचार का-
साधना ही कल्पना-नैपुण्य है।। 
***

मुक्तक-
हाथ में दे हाथ जो वह सत्य है 
माथ ऊँचा करे जो सद्कृत्य है 
जो न अपने साथ उसमें भरमकर 
ईश्वर को दोष दें, अपकृत्य है

***
ढोंग करता जो उसे ठुकराइये
याद भी मन में न उसकी लाइये 
कल्पना भी कीजिए मत स्वप्न में-
मोह में उसके न मन भरमाइये

***
कुछ न कहता मौन लेकिन बोलता 
राज खुद ही राज पल-पल खोलता 
आदमी की सभ्यता है मात्र यह 
बात हो न्याय पहले तोलता

***
मुक्तक-
प्यार देता जिंदगी, कब मारता
प्यार जीत तभी जब सुख वारता 
जीतता है प्यार जीवन-युद्ध में 
तभी जब-जब दिखे जग को हारता

***
फूल-फूल पर तितली बैठी, किसी एक की कब हो पाई?
यह जग दोष न उसको देता, भँवरे को कहता हरजाई। 
रीत प्रीत की अजब-अनोखी, पाप-पुण्य ना सही-गलत कुछ 
'सलिल' सम्हालो अपने मन को, टूटे हो न सके भरपाई।।

***
जो जैसा है, वह वैसा ही रहे चाहना यह कैसी है?
परिवर्तन बिन हो विकास ही मन्द भावना यह कैसी है?
जब जो चाहें,वह मिल जाए तो फिर श्रम का अर्थ न होगा-
राह न जिसकी उसको चाहें-पाएँ कामना यह कैसी है?

***
सत्य कहने में करें हम शर्म क्यों?
समझ कर भी न समझें मर्म क्यों?
आप मुझसे श्रेष्ठ हैं, मैं जानता -
धर्म से कमतर कहे जग कर्म क्यों??

***
प्यार का तो अर्थ ही सुख त्याग है 
मोह होता व्यर्थ, जो दुःख-भाग है 
काम ना हो तो सदा शुभ कामना-
साध्य सबसे सात्विक अनुराग है

***


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