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बुधवार, 24 अगस्त 2016

vyangya lekh

व्यंग्य लेख
अफसर, नेता और ओलंपिक 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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                               ओलंपिक दुनिया का सबसे बड़ा खेल कुंभ होता है। सामान्यत:, अफसरों और नेताओं की भूमिका गौड़ और खिलाडियों और कोचों की भूमिका प्रधान होना चाहिए। अन्य देशों में ऐसा होता भी है पर इंडिया में बात कुछ और है। यहाँ अफसरों और नेताओं के बिना कौआ भी पर नहीं मार सकता। अधिक से अधिक अफसर सरकारी अर्थात जनगण के पैसों पर विदेश यात्रा कर सैर-सपाट और मौज-मस्ती कर सकें इसलिए ज्यादा से ज्यादा खिलाड़ी और कोच चुने जाने चाहिए। मतलब यह कि खेल-खिलाडी साधन और अफसर-नेताओं की मौज साध्य और एकमेव अंतिम लक्ष्य होता है। खिलाडी ऑलंपिक स्तर के न भी हों तो कोच और अफसर फर्जी आँकड़ों से उन्हें ओलंपिक स्तर का बता देंगे, उनकी सुविधाओं के नाम भर राशि का प्रावधान कर बंदरबाँट कर लेंगे।

                               हमारी 'वसुधैव कुटुम्बकम' की मान्यता तभी पूरी होती है जब अफसर पूरी वसुधा पर सैर-सपाटा कर अपने कुटुंब के लिए खरीदी कर सकें, 'विश्वैक नीड़ं' का सिद्धांत तभी पूर्णता पाता है जब विश्व के हर देश को अपना नीड़ मानकर अफसर सुरा-सुंदरी पा सके। अपने दोनों लक्ष्यों की पूर्ति जरूरी होती है, साथ में गये खिलाड़ी उछल-कूद कर लें, चित्र खिंचा लें, दूरदर्शन और अखबार उनके चित्र और चटपटी ख़बरें परोस कर पेट पाल लें तो कोई हर्ज़ नहीं। रह गयी जनता जनार्दन तो पेट भरने से ही फुरसत नहीं है, जिन निकम्मों का समय नहीं काटता वे खिलाड़ियों पर छपी मनगढ़ंत खबरें चटखारे ले-लेकर पढ़ने और 'बाप न मारे मेंढकी बेटा तीरंदाज' का मुहावरा सच  करने में ज़िन्दगी सार्थक कर लेते हैं। धन और भूमि की आसुरी हवस को जी रहे धन्नासेठ और अभिनेता काली कमाई  को सफेद करने के उपाय खेल संघों के प्रमुख और प्रतियोगिताएं के प्रायोजक बनकर निकाल ही लेते हैं। यदि आप असहमत हों तो आप ही कहें कि इन सुयोग्य अफसरों और कोचों के मार्गदर्शन में जिला, प्रदेश और राष्ट्रीय स्तर श्रेष्ठ प्रदर्शन और ओलंपिक मानकों से बेहतर प्रदर्शन कर चुके खेलवीर वह भी एक-दो नहीं सैंकड़ों  ओलंपिक में अपना प्रदर्शन दुहरा क्यों नहीं पाते?

                               खेल हमारा राष्ट्रीय उद्योग और कुटीर व्यवसाय दोनों है। संसद में बैठे खिलाडियों की कलाबाजी, मतदाताओं से किये वायदों को जुमलीबाजी, प्रवेश परीक्षाओं में फर्जीवाड़े, नौकरी देने से पेशी बढ़वाने तक में लेन-देन, धर्म के नाम पर आम आदमी के शोषण, त्याग और वैराग की महिमा बखानते आश्रमों, कौम की भलाई के ठेकेदार बनते मदरसों, खातूनों की फोकर में दुबले होकर मौलिक अधिकारों से वंचित कर तीन तलाकों के ताबूत में दफनाते धर्माचार्यों की प्रतियोगिता हो तो स्वर्ण, रजत और कांस्य तीनों ही पदक भारत की झोली में आना सुनिश्चित है।  

                               कोई खिलाड़ी ओलंपिक तक जाकर सर्वश्रेष्ठ न दे यह नहीं माना जा सकता। इसका एक ही अर्थ है कि अफसर अपनी विदेश यात्रा की योजना बनाकर खिलाडियों के फर्जी आँकड़े तैयार करते हैं जिसमें इन्डियन अफसरशाही को महारत हासिल है।  ऐसा करने से सबका लाभ है, अफसर, नेता, कोच और खिलाड़ी सबका कद बढ़ जाता है, घटता है केवल देश का कद। बिके हुई खबरिया चैनल किसी बात को बढ़ा-चढ़ा कर दिखाते हैं ताकि उनकी टी आर पी बढ़े, विज्ञापन अधिक मिलें और कमाई हो। इस सारे उपक्रम में आहत होती हैं जनभावनाएँ, जिससे किसी को कोई मतलब नहीं है।    

                               रियो से लौटकर रिले रेस खिलाडी लाख कहें कि उन्हें पूरी दौड़ के दौरान कोई पेय नहीं दिया गया, वे किसी तरह दौड़ पूरी कर अचेत हो गईं। यह सच सारी दुनिया ने देखा लेकिन बेशर्म अफसरशाही आँखों देखे को भी झुठला रही है। यह तय है कि सच सामने लानेवाली खिलाड़ी अगली बार नहीं चुनी जाएगी। कोच अपना मुँह बंद रखेगा ताकि  अगली बार भी उसे ही रखा जाए। केर-बेर के संग का इससे बेहतर उदाहरण और कहाँ मिलेगा? अफसरों को भेजा इसलिए जाता है कि वे नियम-कायदे जानकर खिलाडियों को बता दें, आवश्यक व्यवस्थाएँ यथा समय कर दें ताकि कोच और खिलाडी सर्वश्रेष्ठ दे सकें पर इण्डिया की अफसरशाही आज भी खुद को खुदमुख्तार और शेष सब को गुलाम समझती है। अफसर खिलाडियों के सहायक हों तो उनकी बिरादरी में हेठी हो जाएगी। इसलिए, जाओ, खाओ, घूमो, फिरो, खरीदी करो और घरवाली को खुश रखो ताकि वह अन्य अफसरों की बीबियों पर रौब गांठ सके। 

                               रियो ओलंपिक में 'कोढ़ में खाज' खेल मंत्री जी ने कर दिया। एक राजनेता को ओलंपिक में क्यों जाना चाहिए? क्या अन्य देशों के मंत्री आते है? यदि नहीं, तो इंडियन मंत्री का वहाँ जाना, नियम तोडना, चेतावनी मिलना और बेशर्मी से खुद को सही बताना किसी और देश में नहीं हो सकता। व्यवस्था भंग कर खुद को गौरवान्वित अनुभव करने की दयनीय मानसिकता देश और खिलाड़ियों को नीचा दिखाती है पर मोटी चमड़ी के मंत्री को इस सबसे क्या मतलब?  

                               रियो ओलंपिक के मामले में प्रधानमंत्री जी को भी धोखे में रख गया। पहली बार किसी प्रधानमंत्री ने खिलाडियों का हौसला बढ़ाने के लिये उनसे खुद पहल कर भेंट की। यदि उन्हें बताया जाता कि इनमें से किसी के पदक जीतने की संभावना नहीं है तो शायद वे ऐसा नहीं करते किन्तु अफसरों और पत्रकारों ने ऐसा माहौल बनाया मानो भारत के खलाड़ी अब तक के सबसे अधिक पदक जीतनेवाले हैं। झूठ का महल कब तक टिकता? सारे इक्के एक-एक कर धराशायी होते रहे। 

                               अफसरों और कर्मचारियों की कारगुजारी सामने आई मल्ल नरसिह यादव के मामले में। दो ही बातें हो सकती हैं। या तो नरसिंह ने खुद प्रतिबंधित दवाई ली या वह षड्यन्त्र का शिकार हुआ। दोनों स्थितियों में व्यवस्थापकों की जिम्मेदारी कम नहीं होती किन्तु 'ढाक के तीन पात' किसी के विरुद्ध कोई कदम नहीं उठाया गया और देश शर्मसार हुआ। 

                               असाधारण लगन, परिश्रम और समर्पण का परिचय देते हुए सिंधु, साक्षी और दीपा ने देश की लाज बचाई। उनकी तैयारी में कोई योगदान न करने वाले नेताओं में होड़ लग गयी है पुरस्कार देने की। पुरस्कार देना है तो अपने निजी धन से दें, जनता के धन से क्यों? पिछले ओलंपिक के बाद भी यही नुमाइश लगायी गयी थी। बाद में पता चला कई घोषणावीरों ने खिलाड़ियों को घोषित पुरस्कार दिए ही नहीं। अत्यधिक धनवर्षा, विज्ञापन और प्रचार के चक्कर में गत ओलंपिक के सफल खिलाडी अपना पूर्व स्तर भी बनाये नहीं रख सके और चारों खाने चित हो गए।  बैडमिंटन खिलाडी का घुटना चोटिल था तो उन्हें भेजा ही क्यों गया? वे अच्छा प्रदर्शन तो नहीं ही कर सकीं लंबी शल्यक्रिया के लिये विवश भी हो गयीं। 

                               होना यह चाहिये कि अच्छा प्रदर्शन करनेवाले खिलाडी अगली बार और अच्छा प्रदर्शन कर सकें इसके लिए उन्हें खेल सुविधाएँ अधिक दी जानी चाहिए। भूखण्ड, धनराशि और फ़्लैट देने से खेल नहीं सुधरता। हमारा शासन-प्रशासन परिणामोन्मुखी नहीं है। उसे आत्मप्रचार, आत्मश्लाघा और व्यक्तिगत हित खेल से अधिक प्यारे हैं। आशा तो नहीं है किन्तु यदि पूर्ण स्थिति पर विचार कर राष्ट्रीय खेल-नीति बनाई जाए जिसमें अफसरों और नेताओं की भूमिका शून्य हो। हर खेल के श्रेष्ठ कोच और खिलाड़ी चार सालों तक प्रचार से दूर रहकर सिर्फ और सिर्फ अभ्यास करें तो अगले ओलंपिक में तस्वीर भिन्न नज़र आएगी।  हमारे खिलाड़ियों में प्रतिभा और कोचों में योग्यता है पर गुड़-गोबर एक करने में निपुण अफसरशाही और नेताओं को जब तक खेलों से बाहर नहीं किया जायेगा तब तक खेलों में कुछ बेहतर होने की उम्मीद आकाश कुसुम तोड़ने के समान ही है। मिशनरी भावना रहित खेल मिशन क्या-क्या गुल (खिलायेगा) यह देखने और ताली बजने के लिए दोल को दीवार की तरह मजबूत बना लीजिये क्योंकि रोटी मिले न मिले पदक की आस में निवाले छिनने का खेल कहलाने की माहिर नौकरशाही और नेतागिरी की पाँचों अँगुलियाँ घी और सिर कढ़ाई में रहना सुनिश्चित है।  

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