स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

गुरुवार, 29 सितंबर 2016

navgeet

नवगीत 
*
'सौ सुनार की' भेंट तुम्हारी  
'एक लुहार की' भेंट हमारी 
*
'जैसे को तैसा'
लो यार!
नगद रहे, 
क्यों रखें उधार?
एक वार से 
बंटाढार। 
अब रिश्तों में 
करो सुधार।  
नफरत छोड़ो, 
लो-दो प्यार। 
हार रहे बिन खेले पारी 
करे न राख एक चिंगारी  
*
'गधा शेर की
पाकर  खाल। 
भूल गया खुद 
अपनी चाल। 
ढेंचू-ढेंचू 
रेंक निहाल। 
पड़े लट्ठ 
तो हुआ निढाल। 
कसम खाई 
दे छोड़ बवाल। 
अपनी गलती तुरत सुधारी 
तभी बची जां, दहशतधारी  
*
'तीस मार खां'
हो तुम माना। 
लेकिन तुमने 
हमें न जाना।   
गर्दभ सुर में 
गाते गाना। 
हमें सुहाता 
ढोल बजाना। 
नहीं मिलेगा 
कहीं ठिकाना। 
बन सकती जो बात बिगारी 
जान बचे, आ शरण हमारी 
*
३०-९-२०१६

कोई टिप्पणी नहीं: