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मंगलवार, 20 सितंबर 2016

sansmaran

संस्मरण- 

लिखन बैठि जाकी सबिहि.............

डॉ. निशा तिवारी 
*
गत पैतींस -चालीस वर्षो से अपनी मॉ का चित्र बनाने का प्रयास कर रही हॅू। कल्पनाओं की रेखाओं को तो मैं कैनवास पर उकेर लेती हॅू किन्तु रंग? कभी हताशा, कभी पीड़ा, कभी धैर्य, कभी सहनशीलता, कभी रूदन, कभी हास्य, कभी सौन्दर्य ये अनेकानेक रंग मिलकर गड्ड-मड्ड होने लगते हैं और मेरे अन्दर की बालिका खीझकर सभी रंगों को कैनवास पर फैला देती है और चित्र बनाने की अक्षमता पर बिसूरती रहती है। 

ऐसा ही चित्र रीतिकाल के रससिद्ध कवि बिहारी की नायिका के अप्रतिम सौन्दर्य को अनेक चतुर चित्रकर गर्व के साथ उकेरने चले थे किन्तु उस सौन्दर्य को चित्र में बॉध नही पाये और उनका चित्रकार होने का गर्व चकनाचूर हो गया-चित्र नही बन सका।

लिखन बैठि जाकी सबिहि, गहि-गहि गरब गरूर।

भये ने केते जगत के, चतुर चितेरे कूर।।१ 

बिहारी ने चित्र न बन सकने का कोई कारण नहीं बताया शायद इसलिए कि ‘‘जिस काम में कितने ही चतुर चित्रकार बेवकूफ साबित हो चुके है, उसका कारण, शब्द चित्र द्वारा प्रकट करना भी कुछ वैसी ही बात होती। कारण कोई बहुत गूढ़ है। कितने ही चित्रकारों के बेवकूफ बनने में कारण भी कितने ही हो सकते हैं, उन सबके उल्लेख की गुंजाइश छोटे से दोहे में कहॉ?२ 

मेरे शब्द-चित्र न बन सकने का कारण बहुत सीधा और सरल है। सन् १९६४ में जब मैं एम.ए.में पढ़ती थी तब मेरी माँ ने मुझसे स्वतः के जीवन-संघर्षो पर उपन्यास लिखने की इच्छा प्रकट की थी। उस समय मैं उपन्यास पढ़ती थी लिखना तो बहुत दूर की बात थी। धीरे-धीरे अपने जीवन-चक्रों में व्यस्त हो गई। विवाह, प्राध्यापकीय-कार्य, पारिवारिक दायित्वों में इतनी उलझ गई कि लिखना जैसे मेरी अक्षमता ही सिद्ध हुई। १९९९ में मेरी मॉ दिवंगत हो गई और उनके जीवन संघर्षो की गाथा मेरी स्मृतियों में कौंधती रही। उनके जीवन में हास्य-उत्साह-प्रसन्नता के पल कम थे किन्तु उन्होंने अपनी घनीभूत पीड़ा पर प्रसन्नता का आवरण डाल रखा था। उनकी पीड़ा, उनके संघर्ष मेरे अन्तः मन को मथते रहते थे और मैंने आज उनका शब्द चित्र बनाने का संकल्प ले ही लिया। मेरे शब्द चित्रों को चाहे रेखा चित्र कहा जाये चाहे जीवनी या संस्मरण-चाहे मेरी मॉ की ओर से आत्मकथा लेकिन उपन्यास तो ये कदापि नही है। कुछ कथात्मक अंश होने के कारण वे लघु कहानी की विधा का भी स्पर्श कर सकते हैं।

१९७५ के आस-पास उत्तर आधुनिक विमर्शो का सिलसिला चल पड़ा था। फ्रांसुआ क्योतार ने उत्तर आधुनिक विचार-सरणि में महावृत्तान्तों के अन्त की बात कही थी। महावृत्तान्तों की समाप्ति पर उपजे शून्य में लघु-लघु वृत्तान्त लिखे जाने लगे थे। इधर मिशेल फूको और रोला बार्थ द्वारा लेखक की मृत्यु की घोषणा की जा चुकी थी। तभी आत्मकथाओं का उदय हुआ। अभय कुमार दुबे के अनुसार ‘‘आत्मकथा का मजा यह है कि वह उपन्यास कहे जाने के लिए स्वतंत्र न होकर भी अन्ततः एक उपन्यास ही है जिसके पृष्ठों पर रचनाकार के पात्रों की नहीं बल्कि उसकी इयत्ता (सेल्फ) का आविष्कार घटित होता है।३ 

बस इसी ‘सेल्फ’ की जो अभिव्यक्ति मेरी मॉ करना चाहती थीं, अभिव्यक्ति-कौशल के अभाव में मेरे माध्मय से पूर्ण करना चाहती थीं। ऐसा ‘सेल्फ’ जो प्रामाणिक था, यथार्थ था।

इस शब्द चित्र-लेखन का एक विशिष्ट पहलू भी है। उत्तर आधुनिक चिन्तन के दो महत्वपूर्ण संस्करण ‘नारी-विमर्श’ और दलित विमर्श हैं। इनका लेखन हाशियाकृत लोगों का लेखन था- ‘सबाल्टर्न’ की श्रेणी का लेखन। इनके लेखन को सार्व भौमिकता का खिताब नहीं मिल सकता था। क्योंकि इनका लेखन स्थानिकता तक सीमित था। इनकी समीक्षा पुराने शास्त्रीय औजारों से नहीं की जा सकती थी। इनकी समीक्षा के लिए नयी पद्धतियाँ आवश्यक थीं।

स्थानिकता के घेरे में बन्द होने के बाद भी मेरी माँ का शब्द-चित्र नारी सशक्तिकरण का अद्भुत दृष्टांत है। मेरी माँ के जीवन -काल में न तो कोई ‘नारीवादी संगठन’ था और न किसी ‘नारीवाद’ की धूम थी फिर भी उनके व्यक्तित्व में प्राचीन भारतीय आदर्श नारी चरित्रों का अद्भुत संश्लेषण था। किसी ‘नारी-मुक्ति-मोर्चा संगठन’ से भी वे परिचित नही थी। 

मेरी माँ की कथा को मैंने उनके द्वारा बताये गये संस्मरणों से जाना और उसके कुछ भागों की प्रत्यक्षदर्शी भी बनी। मेरी माँ बनने से पहले वे पत्नी थीं और उसके पहले वे बेटी थीं। कात्यायनी की ‘चम्पा’ की भाँति मेरी माँ कमला भी सात भाइयों (चचेरे-फुफेरे) के बीच सयानी, बहुत बड़े मैथिल ब्राम्हण जमीदार परिवार में मण्डला (म.प्र.) में पैदा हुईं। सबकी लाड़ली किन्तु डेढ़ वर्ष की उम्र में माँ का साया छिन गया। पिता ने दूसरा विवाह किया और विमाता के मोह पाश में बँधे रहे। माँ का प्यार उन्हें अपनी आजी से मिला। मातृहीनता उनके दुर्भाग्य का पहला पाठ था। अपने पिता के परिवार में ‘चम्पा’ की तरह न तो वे ओखली में कूटी गई, न कूड़े में फेंकी गईं किन्तु विवाह होते ही उनके दुर्भाग्य का दूसरा पाठ प्रारंभ हुआ।

माँ के बड़े भाई बनारस हिन्दू यूनिर्वसिटी में उच्च शिक्षा के लिये गये थे। वहीं मेरे पिताजी उत्तर प्रदेश के जिला बस्ती, बाँसी तहसील, ग्राम आमा माफी से स्नातक कक्षा में पढ़ने के लिए आए थे। मेरे दादा जी की अटठाईस गाँव की जमींदारी थी। गुरू घराना था। घर क्या हवेली थी। घर में हाथी बँधता था। आजा की मृत्यु उस समय हो गई थी जब मेरी आजी तीस वर्ष की थीं और मेरे बाबूजी एक माह के थे। बाबूजी के चार भाई और तीन बहनें थीं। बाबूजी सबसे छोटे चौथे भाई थे। युवा होने पर जमींदारी की ठसक थीं- एक ओर तो भाई लोग चेलाहीं करने जाते थे और दूसरी और घुड़सवारी कर किसानों से लगान वसूली करने। इधर मेरी माँ पन्द्रह वर्ष की हो चली थीं। बाबूजी उच्च कुलीन मैथिल ब्राम्हण परिवार के थे। मामाजी जयदेव झा बहुत सुन्दर थे और मेरी माँ उनकी कार्बन कॉपी। मामाजी की मध्यस्थता से माँ-बाबूजी १९३६ में विवाह-बन्धन में बंध गये। माँ का गौना सोलह वर्ष की उम्र में किया गया। माँ के माता-पिता तो उदासीन थे पर कक्काजी ने विदा के समय आशीर्वाद दिया-‘‘कमला तुम्हे सोने में सुहागा दिया है। एक तो दामाद बहुत अमीर और दूसरे ग्रेजुएट।’’ परन्तु माँ को नहीं ज्ञात था। कि अमीरी और उनकी डिग्री उनके अहंकार को और अधिक घनीभूत करती थीं। 

एक पन्द्रह वर्षीया मातृहीना किशोरी के मन में पतिगृह से जिस प्रेम की अपेक्षा थी वह प्रकारान्तरित रूप में उन्हें मिली। पिताजी का परिवार एक पितृसत्तात्मक रूढ़िवादी परिवार था। बाबूजी के रक्त में जमींदार की क्रूरता प्रवाहित होती थी। अम्मा से उत्कट प्रेम ने बाबूजी के मन में एक उन्माद का रूप धारण कर लिया था। और यह उन्माद पत्नी पर एकाधिकार पाने की लालसा में एक सन्देही प्रवृत्ति को भी जन्म दे रहा था। आठ-दस गाँवों के बीच मात्र बाबूजी ही अंग्रेजी पढ़े लिखे स्नातक थे। तब तार इत्यादि अंग्रेजी में ही भेजे जाते थे। अतः, अन्य गाँवों के लोग दूर दूर से उनसे तार पढवाने और उसका अर्थ जानने के लिए उनके पास आते थे। शिक्षा मनुष्य को विनम्र बनाती है किन्तु बाबूजी की शिक्षा मानो उनके स्वाभिमान की सीमा को तोड़कर उन्हें निरंतर अहंकारी बनाती जा रही थी। जमींदार की क्रूरता, अहंकार और सन्देही प्रकृति क्रमशः अत्याचार में पर्यवसित होने लगी। 

इस बीच १९३८ में मेरी बड़ी बहिन सुनीता, बड़े भाई राजेन्द्र (मन्नू) का १९४२ में और मेरा १९४४ में जन्म हो चुका था। गाँव में न तो कोई स्कूल था और न चिकित्सालय। दीदी का लिवर बढ़ने और भैया को सूखा-रोग की शिकायत हुई तथा वे दोनों चिकित्सा के अभाव में मौत के मुँह से निकलकर आये थे। अम्मा के भतीजे-भतीजियाँ उनके पीहर मण्डला म.प्र. में स्कूल जाने लगे थे। माँ बाबूजी से जब दीदी और भैया को पढ़ाने-लिखाने की बात करतीं तो सदा यहीं उत्तर मिलता- ‘‘मन्नू को जिला बस्ती में रखकर लॉ करवाएंगें। लड़कियों को पढ़ने की क्या आवश्यकता? उनका अच्छे अमीर उच्च कुलीन घराने में विवाह कर देगें।’’यदि माँ जिद करती तो उन्हें प्रताड़ित किया जाता। प्रताड़ना का एक कारण बाबूजी की संदेही प्रवृत्ति भी थी। किसी रिश्तेदार या हरवाह पुरूषों से बात-चीत करने पर उन्हें दण्ड स्वरूप मार झेलनी पड़ती। मेरी तो स्मृति में वह दृश्य आज भी जीवित है जब बाबूजी की मार से उनकी चूड़ियां टूट गईं थी और उनके हाथ से टप-टप खून बह रहा था। इन सब अत्याचारों के बीच मात्र आजी की सहानुभूति अम्मा के साथ थी। उनका रूढ़िवादी मन भी बाबूजी के अत्याचारों से द्रवित हो जाता था। अत्याचार जब सहनशीलता को चुनौती दे रहे थे तब एक बार वे रात्रि के अंधकार में आत्म हत्या करने के उद्देश्य से हवेली के बाहर के कुएॅं की जगत पर पैर लटकाकर बैठी थीं। जीवन और मृत्यु का द्वन्द्व उनके मन में चल रहा था। तभी संयोग से आजी लालटेन लेकर वहाँ उन्हें खोजती हुई पहुॅच गईं समझाया- ‘‘अपने बच्चों को देखों तुम्हें अपने लिए नहीं अपनी सन्तानों के लिए जीना है। कायरता छोड़ो और घर के अन्दर चलो।’’ 

स्त्री की मातृत्व शक्ति अन्य सभी संबंधों में उच्चतम है इसी शक्ति की प्रेरणा से उन्होंने आत्म-हत्या का विचार सदा के लिए त्याग दिया। उस समय तक सही माने में माँ को जीने की कला नहीं आती थी। स्त्री-पुरूष में वैचारिक और भावनात्मक संतुलन न होने से ही ऐसी विषम स्थितियां निर्मित होती है। महादेवी वर्मा के अनुसार ‘‘हमारे समाज में अपने स्वार्थ के कारण पुरूष मनुष्यता का कलंक है और स्त्री अपनी अज्ञानमय निस्पन्द सहिष्णुता के कारण पाषाण सी उपेक्षणीय .......।’’४ 

धीरे-धीरे माँ निस्पन्द सहिष्णुता से उबर चलीं। उन्होंने आतंरिक शक्ति संचित की और अपनी असहायता, निरीहता, दुर्बलता, हीनता को त्याग कर मूक, विनम्र क्रांति की भूमिका निर्मित करने लगीं। सर्वप्रथम उन्होंने नानाजी को पत्र लिखकर अपनी व्यथा बतलाई तथा इस कूपमण्डूकता से निकालने का आग्रह किया। उनका प्राथमिक लक्ष्य था- बच्चों को शिक्षित करना। यह बात सन् १९४८ की है। मैं उस समय चार वर्ष की थी। नाना जी ने माँ के आग्रह को अस्वीकार कर उसी रूढ़िवादिता का परिचय दिया-’’ बेटी की अरथी ही ससुराल से वापिस आती है।’’ माँ ने हिम्मत नहीं हारी और पुनः अपने फुफेरे वकील भाई को पत्र लिखकर बहिन का ऋण उतारने हेतु निवेदन किया। आश्चर्य होता है कि मूक पशु की भॉंति अत्याचार सहने वाली स्त्री के मन में अत्याचार के विरूद्ध मौन विद्रोह का साहस उत्पन्न हुआ। इस संदर्भ में महादेवी वर्मा का ‘सुभद्रा कुमारी चौहान’ के संस्मरण में सुभद्रा कुमारी चौहान का ही कथन बड़ा सटीक प्रतीत होता है- ‘‘परम्परा का पालन ही जब स्त्री का परम कर्त्तव्य समझा जाता था तब वे (सुभद्रा कुमारी चौहान) उसे तोड़ने की भूमिका
बाँधती हैं, चिर प्रचलित रूढ़ियों और चिर-संचित विश्वासों को आघात पहॅुचाने वाली हलचलों को हम देखना सुनना नहीं चाहते। हम ऐसी हलचलों को अधर्म समझकर उनके प्रति आँख मीच लेना उचित समझते हैं, किन्तु ऐसा करने से काम नहीं चलता। वह हलचल और क्रांति हमें बरबस झकझोरती है और बिना होश में लाये नहीं छोड़ती।’’५ 

मामाजी को आमा माफी से हम सबों को ले जाने के लिए बुलाना क्रांति अथवा हलचल का प्रथम स्फुरण था। इसे पलायन नहीं कहा जा सकता क्योंकि अत्याचारों से घबराकर भागना उनका उद्देश्य नहीं था वरन् अपने बच्चों को शिक्षित करना ही एक अप्रत्यक्ष और प्राथमिक कर्तव्य वे समझती थीं। मामाजी आ गए किन्तु बाबूजी के चंगुल से हम सबको निकालकर ले जाना अत्यंत दुष्कर कार्य था। सास-बहू की प्रतिद्वन्द्विता जगत् प्रसिद्ध है किन्तु हमारी आजी का नारीत्व जाग उठा और उन्होंने उपाय सुझाया-‘‘जब यदुनंदन बाबू फारिग होने खेत पर जायेगें तब तुम लोग निकल जाना। आमा की सीमा पर भरत पहलवान (हरवाह) डंडा लिए खड़ा रहेगा और उन्हें रोककर रखेगा।’’ ऐसा ही हुआ। भरत पहलवान के डंडे से डरकर बाबूजी वापिस घर आ गए और हम सबको मामाजी मंडला की ओर ले चले।

मंडला में नानाजी का बहुत बड़ा मकान था। तब संयुक्त परिवार हुआ करते थे। अम्मा की विमाता यानी हमारी सौतेली नानी हमें देखकर बहुत अप्रसन्न हुईं- ‘‘आ गई छाती पर मूंग दलने। ऐसे कभी कोई विवाहिता बेटी अपना घर-द्वार छोड़ती है भला?’’ माँ बहुत स्वाभिमानी थीं। पितृ गृह में बोझ बनकर नहीं रहना चाहती थी। शिक्षा के नाम पर चौथी कक्षा उत्तीर्ण थीं सो सातवीं की परीक्षा उत्तीर्ण करने हेतु अध्ययन में जुट गईं। मामा वगैरः बहुत पढ़े लिखे थे।  अतः, माँ को सातवीं उत्तीर्ण करने में कोई कठिनाई नही हुई। यथा समय यथोचित कक्षा में हम तीनों भाई बहिनों को स्कूल में प्रवेश दिया गया। आजीविका के लिए अम्मा स्कूल- शिक्षिका बनना चाहती थीं। नानाजी ने इसका प्रबल विरोध किया क्योंकि बेटी के नौकरी करने से उनकी प्रतिष्ठा को बट्टा लग सकता था। नानाजी के इष्ट मित्रों के समझाने पर अन्ततः उन्होंने स्वीकृति दे दी और अम्मा नगर पालिका स्कूल में रू. ४९.०० मासिक वेतन पर शिक्षिका नियुक्त हुईं। वह भी गर्मी की दो माह की छुट्टियों में उन्हें अवैतनिक कर दिया जाता था। इससे मुक्ति पाने के लिए उन्होंने जबलपुर (म.प्र.) में दो वर्ष की नार्मल टेंनिंग ली। पश्चात् मंडला की शासकीय शाला में उनकी नियुक्ति हो गई। आर्थिक निर्भरता आ जाने से अम्मा की विमाता भी सारी कटुता भूलकर सामान्य हो गईं।

हमारे बाबूजी का उत्कट प्यार उन्हें हमारे समीप खींच लाता था किन्तु अब वैसी क्रूरता भी उनमें शेष नहीं रह गई थी। यों भी अम्मा को मामाजी लोगों का संरक्षण प्राप्त था। अतः, वे मारपीट तो क्या गाली-गलौच का भी दुस्साहस नही कर सकते थे। जब भी एकान्त मिलता वे गॉंव लौट जाने का अनुनय-विनय करते किन्तु माँ में न जाने कैसी आत्म शक्ति जाग्रत हो गई थी कि अपनी सन्तानों की शिक्षा और अपनी आर्थिक स्वतंत्रता से परे जाकर गॉव की समृद्धि से कभी साक्षात न कर पाईं। एक बार अन्ध कूप से निकलकर उसमें पुनः गिर जाना उन्हें कदापि स्वीकार नहीं था।

माँ अपने स्वाभिमान और स्वतंत्र व्यक्तित्व-रक्षा तथा अस्मिता की खातिर अलग किराये के मकान में रहने लगीं। उस समय उनका वेतन मात्र अस्सी रूपये था। चूंकि बाबूजी जमीन-जायदाद का मोह छोड़कर हमारे साथ रहने लगे थे.  अतः, उसकी देखरेख बड़का दादा (सबसे बडे़ ताऊ) करने लगे थे। आवयकता पड़ने पर हमारी फीस-पुस्तकें तथा वर्ष भर के अनाज-संग्रहण के लिए वे आर्थिक सहायता कर देते थे। हमारी बड़ी दीदी सुनीता को आत्म-निर्भर बनाने की दृष्टि से मैटिंक उत्तीर्ण करने के उपरांत मांटेसरी की टेंनिंग दिला दी गई थी। बडे़ भैया राजेन्द्र किशोर हो गए थे।  उनके शारीरिक बल के सामने बाबूजी किसी भी प्रकार के अत्याचार की हिमाकत नहीं कर सकते थे। यहॉ पर भी बाबूजी का गॉव ले जाने का अनुरोध पूरा नहीं हुआ।

मई १९५८ में मेरे छोटे भाई अरविंद का जन्म हुआ। आर्थिक अभावों और संघर्षो का उसे कोई भान नहीं था। उसके बडे़ होने तक हम तीनों भाई-बहिन नौकरी करने लगे थे। अरविन्द की उच्च शिक्षा में कोई कठिनाई नहीं हुई। मैं महाविद्यालय में व्याख्याता हो चुकी थी और मेरा विवाह भी हो चुका था। अरविंद की उच्च शिक्षा हेतु आर्थिक सहायता के लिए मेरे ससुराल वालों ने विशेषतः मेरे पति डॉ. पवन कुमार तिवारी ने प्रोत्साहित किया। पश्चात् पी.एच.डी. फार्मेसी के लिए उसे फैलोशिप भी मिली।

इधर १९६० में मध्यप्रदेश के मण्डला जिले के एक गॉंव में मैथिल ब्राम्हण परिवार के एक शिक्षक कमलाकांत झा से दीदी का विवाह निश्चित हो गया। विवाह के लिए रूपये तो थे नहीं अतः अम्मा ने अपने हिस्से की सम्पत्ति से उनका विवाह सम्पन्न करने के लिए बड़का दादा (पीताम्बर नाथ) को पत्र लिखा। उन्होंने स्वीकृति तो दे दी किन्तु इस शर्त के साथ कि विवाह आमा-माफी से ही करेगें। अम्मा चिन्ता में पड़ गईं कि वहॉ से वापिस कैसे आएंगी? अगर नहीं आने दिया गया तो भविष्य क्या होगा। उन्होंने बड़का दादा से वापिस भेजने का वचन मॉंगा और उन्होंने वचन दे भी दिया। ग्रीष्मकालीन अवकाश में दीदी का विवाह सम्पन्न हो गया। बाबूजी की तो जैसे रीढ़ की हड्डी ही टूट गई थी। हमारे साथ गॉंव गए और विवाह सम्पन्न होने पर हमारे साथ ही मण्डला वापिस आ गए।

माँ सादगी की प्रतिमूर्ति थी और भारतीय संस्कृति की संवाहक। वेशभूषा पारंपरिक यू.पी.और म.प्र. की। व्यक्तिगत पीड़ा और दुःख मानों उनकी हास्यमय और विनोदी प्रकृति में परिवर्तित हो गये थे। परिस्थितियॉं कभी-कभी मनुष्य को ईर्ष्यालु और परपीड़क बना देती है। परन्तु माँ के साथ ऐसा नही था। सदैव प्रसन्न रहना और सबको हॅसाना। दूसरों को हॅसाना उनके दुःख का उदात्तीकरण था। इस संदर्भ में मुझे प्रसाद की कामायनी की पंक्तियॉं स्मरण आती है-

औरों को हॅंसते देखों, मनु, हॅसों और सुख पाओं।

अपने सुख को विस्तृत कर, औरों को सुखी बनाओं।७ 

१९७० में बाबूजी की मृत्यु के पश्चात् उन्होंने जैसे बाबूजी के प्रेम को राम की प्रेमल भक्ति में उदात्तीकृत कर लिया। प्रेमल भक्ति व्यंजक का प्रयोग मैंने विशेष कारण से किया है। राम मर्यादा पुरूषोत्तम है एक पत्नीव्रती। राम की तुलना में कृष्ण प्रेमल है- असंख्य रानियॉं हैं और अनगिनत गोपिकाओं के प्रियतम। माँ सभी देवी-देवताओं को पूजती थीं- पारिवारिक परंपरागत सभी धर्म-कर्म का निर्वाह करती थीं किन्तु उनके प्रियतम तो राम ही थे।

माँ ने घर और बाहर के बीच अद्भुत सामंजस्य रखा था। उन जैसी नारियों के लिए ही जैसे महादेवी वर्मा ने लिखा है- ‘‘यह अब तक प्रत्यक्ष हो चुका है कि वह (स्त्री) अपनी कोमल भावनाओं को जीवित रखकर भी कठिन से कठिन उत्तरदायित्व का निर्वाह कर सकती है और दुर्वह से दुर्वह कर्तव्य का पालन कर सकती है और दुर्गम से दुर्गम कर्म-क्षेत्र में ठहर सकती है।’’७ 

माँ परम्परागत भारतीय संस्कृति की उपासिका थी। परिधान और रहन-सहन पुराने थे किन्तु उनके विचार अत्यंत आधुनिक थे। उस समय मंडला में एक घटना घटी थी। हमारे मैथिल समाज की कन्या के साथ बिहार के एक परिवार ने छल किया था। स्वयं को अमेरिका में व्यवसायी बताकर विवाह किया जबकि उसका कोई वजूद नहीं था। लडकी एक मास ससुराल में रहकर लौट आई।  ऐसी छली गई लड़की से भी मेरे भैया राजेन्द्र का विवाह करने के लिए माँ तैयार हो गईं थी। ऐसा सम्बन्ध करने के लिए लड़की वालों से पहल भी उन्होंने की थी। बात चाहे आगे नहीं बन पाई किन्तु माँ की आधुनिक सोच पर तो गर्व करना ही होगा।

एक अन्य मार्मिक प्रसंग को मैं कभी विस्मृत नहीं कर सकती। सन् १९९८ की बात है। मेरे बडे़ भैया राजेन्द्र की मधुमेह के कारण दोनों किडनियॉं खराब हो चुकी थीं। वे जबलपुर के एक अस्पताल में डायलिसिस के लिए एडमिट थे। मेरी भाभी भी शासकीय स्कूल में शिक्षिका थीं। ऋण लेकर डायलिसिस करा रही थीं। माँ गंभीर गठिया रोग से ग्रस्त थीं। माँ ने भाभी से कहा ‘‘बहू अपने बच्चों का मुँह मत पोछो। राजेन्द्र कभी ठीक नहीं होगें’’। भाभी इसके बाद भी इलाज में कमी नहीं कर रही थीं किन्तु भैया ने ही आगे डायलिसिस कराने से इंकार कर दिया और घर लौटने के लिए जिद करने लगे।  अतः, मंडला के ही अस्पताल में उन्हें भरती किया गया। एक माह बाद २३ जनवरी १९९८ को उनका देहावसान हो गया। इस प्रसंग का उल्लेख इसलिए आवश्यक था कि माँ का सन्तान-प्रेम व्यावहारिक धरातल पर कमजोर पड़ गया और भैया के पुत्रों तथा भाभी का भविष्य अधिक सबल हो गया था। भैया की मृत्यु का उन्हें इतना गहरा आघात लगा कि ठीक एक वर्ष बाद १९९९ में उनका स्वर्गवास हो गया। ऐसे न जाने कितने प्रसंग है जिन्होंने मेरी दृष्टि में उन्हें भगवान से भी ऊँचा दर्जा दिया है। उनका कोई स्मारक तो नहीं बन सकता था किन्तु मेरे हृदय के स्मारक में उनकी स्मृति अमिट रूप से विद्यमान है। नारी सशक्तिकरण का ऐसा दृष्टांत अत्यंत विरल है।

यों अनगिनत माताएँ और नारियाँ होंगी जिन्होंने अपने त्याग, बलिदान, क्रांति द्वारा नारी सशक्तिकरण का परिचय दिया होगा। ऐसी जानकारियाँ हमें मीडिया से भी मिलती हैं। ये जानकारियाँ भी हमें विचलित और आन्दोलित करती हैं परन्तु मेरी माँ से मेरा जो शारीरिक-मानसिक-भावनात्मक जुड़ाव था- क्षण-क्षण यथार्थ को प्रतिच्छायित करता, माँ के ‘सेल्फ’ को प्रतिबिम्बित करता-यह तो अन्य के साथ नहीं हो सकता न? मैंने पाठ को विशिष्ट के माध्यम से सामान्यीकृत, वैयक्तिक के माध्यम से समाजीकृत करने का प्रयास किया है।

यह पूर्व में ही कहा जा चुका है कि अपने पाठ के लिए मैंने किसी विशेष विधा का चयन नही किया है। यदि उत्तर आधुनिक पाठ की बात करें तो कहा जा सकता है कि मैंने विधाओं का विखण्डन किया है। मेरी लेखनी मेरी ऊंगली पकड़कर जहॉ-जहॉ ले गई मैं वहॉ-वहॉ गतिशील होती रही। भावनाओं को विधा की लगाम से नियंत्रित नही किया जा सकता। मैं अपने लेखन के समर्थन में प्रतिष्ठित रचनाकार व सामाजिक कायर्कर्ता सुधा अरोड़ा से सुपरिचित पत्रकार निर्मला डोसी की बातचीत के अंश का उल्लेख करना चाहती हॅू- ‘‘पिछले साल उनकी (सुधा अरोड़ा की) एक अलग तरह की किताब आई थीं। उसमें आलेख, कहानियॉं, वक्तत्व, कविताओं के टुकडे़ तथा कहानियों पर छोटी-छोटी टिप्पणियॉं हैं अर्थात् लेखन की अनेक विधाओं को एक साथ सॅजोकर उन्होंने पुस्तक के नाम को सार्थक स्वरूप दिया है। ‘एक औरत की नोटबुक’-यही नाम है उनकी नई किताब का। अपनी डायरी या नोट बुक में जब कोई लिखता है तो उसके सामने विधा की कोई पूर्व योजना नही रहती। जैसा मन हुआ, विषय हुआ, भाव उपजे और शब्दों का रूप धरकर कलम की नोक पर आ बैठे। उन्हें विशेष सजाने-सॅवारने में सहज प्रवाह अवरूद्ध हो सकता है, लिहाजा अपने सद्यः प्रसूत निर्दोष स्वरूप में वे अधिक प्रभावी व प्रामाणिक प्रतीत होते हैं।’’८ 

मेरे पाठ के अनेक विखंडनात्मक पाठ हो सकते हैं। उनका सदैव स्वागत रहेगा।

संदर्भः-

१. बिहारी सतसई- दोहा क्रमांक-५३४ 

२. बिहारी सतसईः तुलनात्मक अध्ययन पभसिंह शर्मा पंचम संस्करण-पृष्ठ-७७ 

३. तद्भव-अंक 16, जुलाई 07- पृष्ठ 34- नारीवाद की हिन्दी कथा लेख-अभय कुमार दुबे

४. श्रृंखला की कड़ियाँ-महादेवी वर्मा-सप्तम संस्करण पृष्ठ-१५९ 

५. पथ के साथी-महादेवी वर्मा-स्व सुभद्रा कुमारी चौहान संस्मरण क्रमांक-दो-पृष्ठ-६०-तृतीय संस्करण-संवत् २०२३ वि.

६. कामायनी- कर्म सर्ग-जयशंकर प्रसाद-पृष्ठ-१४० चतुर्दश आवृत्ति-सं. २०२५ वि.

७. श्रृंखला की कड़ियाँ-महादेवी वर्मा- पृष्ठ ६४, पृष्ठ ५ 

८. प्रकाशन समाचार-वर्ष ६४ अंक ८ अगस्त २०१६- पृष्ठ-९ राजकमल प्रकाशन समूह

पता

डॉ. निशा तिवारी

६५०, नेपियर टाउन,

भॅवरताल पानी की टंकी के सामने,

जबलपुर -४८२००१ 

मो. ९४२५३८६२३४  

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