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बुधवार, 19 अक्तूबर 2016

समीक्षा

पुस्तक सलिला –

‘चुप्पियाँ फिर गुनगुनाईं’ गीत की, नवगीत की

आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’

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[पुस्तक विवरण – चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं, यतीन्द्रनाथ राही, गीत-नवगीत संग्रह, प्रथम संस्करण २०१६, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी, पेपरबैक, पृष्ठ १४३, मूल्य २५०/-, ऋचा प्रकाशन१०६ शुभम, ७ बी. डी. ए. मार्केट, शिवाजी नगर भोपाल १६, दूरभाष ०७५५ ४२४३४४५, गीतकार सम्पर्क – ए ५४ रजत विहार, होशंगाबाद मार्ग भोपाल २६, चलभाष ९४२५०१६१४० ]

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समय के साथ कदम-दर-कदम चलते गीत-नवगीत की बाँह थामकर अठखेलियाँ करने का सुख पाने और लुटाने के अभ्यस्त श्रेष्ठ-ज्येष्ठ गीत-नवगीतकार श्री यतीन्द्रनाथ ‘राही’ की बारहवीं कृति और दूसरा गीत-नवगीत संग्रह 'चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं 'रस-गंगा में अवगाहन करने के इच्छुक गीत-प्रेमियों को बाँधकर रखने में समर्थ है. ९० वर्ष की आयु में भी युवकोचित उत्साह और उल्लास की अक्षय पूँजी लिए, जीवट के धनी राही जी गीत रचते नहीं गीतों को जीते हैं.

चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं राही जी की ५१ सरस. सार्थक, सामयिक गीति रचनाओं का पठनीय संग्रह है. नवगीत को सामाजिक विडम्बना, विद्रूपता, दीनता, बिखराव और टकराव का पर्याय माननेवाले संकीर्ण पक्षधरों के विपरीत राही जी नवगीत को सद्भाव, सहिष्णुता, सौहार्द्र, सहयोग और नवजागरण का वाहक मानते हैं. वे सगर्व घोषणा करते हैं-

‘जब तलक हैं / हम /

तुम्हारे पन्थ को / ज्योतित करेंगे...

पंख हैं कमजोर / तो क्या

हौसलों में दम बहुत है

सूर्य के हम वंशधर हैं

क्या करेगा तम बहुत है

पत्थरों को फोड़कर

हमने रचे हैं / पन्थ अपने

राही जी ने उन सबसे बहुत अधिक दुनिया देखी है जो संपन्नता से जीते हुए विपन्नता का रोना रोते रहते हैं अथवा पूँजीपति होते हुए भी बुर्जुआवाद की दुहाई देते हैं. कृति के शीर्षक गीत ‘चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं’ में युगीन तमस में नवाशा के दीपक जलाने का आव्हान करते हुए वे चुप्पियों की गुनगुनाहट सुन पाते हैं-

कान बहके खिड़कियों पर
चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं

झील के उस पार से / उड़कर पखेरू

खुशबुओं की कुछ नयी / सौगात लेकर आ रहे हैं

‘ हम पसीने से लकीरें भाग्य की / धोते रहे हैं’ , ‘कलम में ताकत बहुत है / बदल डालेंगे समय को’ के संकल्प को जीता नवगीतकार पलायनपंथियों से लौट आने का आव्हान करता है- ‘बहुत भटके / कमल लोचन / लौट आओ गाँव अपने... गाँव अपना ही / सरग है ’ क्या धरा है उस नगर में? / रह नहीं पाते जहाँ / बेटा-बहू भी एक घर में /काठ के हैं लोग / सुख-दुःख / कौन, किसके बाँटता है? / भीड़ का रेला सड़क पर / आदमी को हाँकता है... ‘

राही जी! सम-सामयिक परिस्थितियों की न तो अनदेखी करते हैं, न उनमें अतिरेकी दोष देखते हैं, वे पारिस्थितिक जटिलता के सन्नाटे को नवगीतीय कलरवों से तोड़ते हुए नव सृजन के गीत गाते हैं – ‘धूप / कोहरे से लिपटकर / सो रही है, चुप रहो / कुनकुने रोमांच तन में / बो रही है, चुप रहो / झुरमुटों में / चहकते उल्लास / आतुर हैं सुनो’. उत्सवधर्मी भारतीय जनमानस का प्रतिनिधित्व करते ये नवगीत ‘बाँसुरी बजने लगी / है शाम / ठहरो बात कर लें’....‘टिमटिमाता एक दीपक / आज की सौगात कर लें’ कहते हुए समस्या का समाधान किसी और से या कहीं बाहर से नहीं चाहते अपितु अपने अंदर खोजने का पथ दिखाते हैं. गत पाँच दशकों से नवगीत को मर्सिया बना देने के बौद्धिक षड्यंत्र को बेनकाब करते हुए राही जी कहते हैं – ‘हम जिंदगी से / आज तो कुछ रू-ब-रू हो लें..... दहकते इन पलाशों ने / लगा दी आग सी देखो.... झनकती झाँझरों / मंजीर-कंगन के / रहस खोलें.... उतारो! / फेंक दो / ओढ़े हुए सन्यास के चीवर / करेंगे क्या भला / इस हाल में / सौ साल तक जीकर?.... उठाई पलक / सूखे प्राण में / कुछ प्राण तो ढोलें‘

स्वतंत्रता के पश्चात् सत्ता पर पूंजीवादियों और शिक्षा-संस्थानों पर साम्यवादियों के कब्जे ने सत्य और शुभ की ओर से आँखें फेरकर असत्य और अशुभ की चीख-पुकारकर आम लोगों को आपस में लड़ाकर स्वार्थ साधने का जो खेल खेला है उसे समझकर और उसकी काट बूझकर राही जी परामर्श देते हैं- ‘गुलमुहरों की / घमछैयों में / बैठो! बात करें’ नवगीत के नाम पर वर्गसंघर्ष के बीज बोनेवालों का प्रतिकार करते हुए राही जी असफलता को नकारते नहीं, स्वीकारते हैं- ‘हो गए / सारे निरर्थक / यत्न थे जो बाँधने के / टूट पैमाने गए सब / दूरियों को नापने के.... दर्द की नदिया सदानीरा / मिले ढहते किनारे / हम समय से बहुत हारे’ किन्तु वे असफलता से पारस्परिक द्वेष नहीं सहकार की राह निकलते देखते और दिखाते हैं. निराशा में आशा का संचार करते राही जी के नवगीत पाँच दशकीय दिशा-भ्रम को तोड़ते हुए सर्वथा विपरीत रचनात्मक दिशा का संकेत करते हैं- 'शाम गहराने लगी है / काम की बातें करेंगे / रात काली है / न सहमो / गगन की दीपावली है / जुगनुओं ने खोल दी लो / ज्योति की ग्रंथावली है / झींगुरों के ध्वनन में / यह / पाठ मानस का अखंडित / हो गयी साकार / स्वर की / साधना-आभा विमंडित / यंत्र-ध्वनि से दूर / कुछ / विश्राम को बातें करेंगे’.

राही जी के नवगीत शैल्पिक दृष्टि से ‘कम में अधिक’ कह पाने में समर्थ हैं. शब्द-सामर्थ्य की बानगी हर गीत में अंतर्निहित है. पाषाण, कंटकों, व्यवधान, शब्दायन, दीर्घा, पृष्ठायण, स्वप्नदर्शी, दिग्भ्रांत, संपोषक, परिवेषण, त्राहिमाम, उद्भ्रांत, श्लथ, संवरण जैसे संस्कृत निष्ठ शब्दों के साथ भरम, मुँड़गेरी, परेवा, टेवा, हिरनिया, हिया, डगर, उजारे, हेरते, भांड, सुआ, बिजुरी, मुँड़ेरी आदि देशज शब्द गलबहियाँ डाले हुए उर्दू के आवाज़, सफ़र, फौलाद, दस्तक, निजामों, हालात, कलम, ज़माने, अखबार, शक्ल, कागज़ी आदि शब्दों के साथ बतियाते हुए मिलते हैं. इससे इन नवगीतों की भाषा सीधे मन को छूती है. सोने में सुहागा हैं वे शब्द युग्म जो भाषा को मुहावरेदार मिठास देते हैं- साँझ-सकारे, मदिर-मंथर, लय-विलय, फाग-बिरहा, सुख-दुःख, वृक्ष-लताएँ, नद-निर्झर, झूठ-सच, आगे-पीछे, अच्छे-बुरे, गली-गाँव, लेना-देना आदि. राही जी ने तीन शब्दों के युग्मों का भी बखूबी प्रयोग किया है- रूप-रस-रंग, फूल-फल-पल्लव, कुएँ-बावली-ताल, ताल-पोखरे-नदियाँ, रजा-रंक-फकीर आदि. इनमें से कुछ राही जी की अपनी ईजाद हैं. भावाभिव्यक्ति के लिए राही जी अंग्रेजी शब्दों के मुहताज नहीं हैं किन्तु अपवाद स्वरूप अंग्रेजी के एक शब्द-युग्म ‘टॉवर-बंगले’ तथा उर्दू शब्द-युग्म‘शक्ल-सीरत’ का अनूठा प्रयोगकर चौंकाते हैं. इससे स्पष्ट है कि वे भाषिक संकीर्णता के नहीं किन्तु शुद्धता के पक्षधर हैं.

राही जी की एक विशेषता शब्दों को सामान्य से हटकर नए रूपों में इस तरह प्रयोग करना है कि वे मूल की तरह न केवल सहज अपितु अधिक सारगर्भित प्रतीत होते हैं. रश्मिल, उट्ठी, बरगदिया, हरषो, मसमसाया, हवनगंधी, रणित आदि ऐसे ही कुछ प्रयोग हैं. जाने-अनजाने वचन संबंधी काव्य-दोष कहीं कहीं आ गया है. इसका कारण बहुवचन में कही हिंदी व्याकरण के अनुसार (कंटकों, निजामों, कदमों आदि) तथा कहीं उर्दू व्याकरण के अनुसार (हालात आदि) शब्द-रूप का प्रयोग करना है. इसी तरह तारीख / तारीखों के स्थान पर तवारीख और तवारीखों का प्रयोग है. हो सकता है ये शब्द-रूप लय साधने में सहायक हों किंतु राही जी जैसे समर्थ कवि से अनजाने में ही ऐसी त्रुटि ही सकती है. ‘रेत की सीपियाँ बीन लें’ या ‘रेत पर सीपियाँ बीन लें’ विचारणीय हो सकता है? कृति में परजय ५४ (पराजय), प्रारव्धों ६३ (प्रारब्धों), आत्मश्लाधा ६५ (आत्म श्लाघा), लेबा ६६ (लेवा) आदि टंकण त्रुटियाँ स्वादिष्ट खीर में कंकर की तरह खटकती हैं. पृष्ठ ८८ के पहले और बाद में अक्षरों के आकार में भी अंतर है.

अपने नवगीत संग्रह ‘काल है संक्रांति का’ में मैंने ‘सूर्य’ के रूपक के माध्यम से कई बातें कही है. राही जी ने ‘बादल’ को माध्यम बनाकर विविध भावों को अभिव्यक्त किया है- ‘नेह-भीगे / पवनवाही / मेघ नभ में छा रहे हैं (पृष्ठ १५), ये घिरे घन / तमस गहरा / बिजलियों की कौंध (पृष्ठ ३३), झरे अंगारे/ अगन लगी है / बरसो! मेघा बरसो (पृष्ठ ६६), घटाएँ / घिर रही हैं / फिर सुहाने मेघ आये हैं (पृष्ठ ६९), चले आओ / गगन घिरने लगे / बरसात के बादल तथा पलक से रात भर / झरते रहे / बरसात के बादल (पृष्ठ ७८), हमें तो / प्यास ही धरते रहे / बरसात के बादल (पृष्ठ ७९), हमें उपहास ही भरते रहे / बरसात के बादल (पृष्ठ ८०), आकाश झुकाए फिरते हैं / थोथे आश्वासन के बादल (पृष्ठ ११९), नील नभ को / बादलों ने / ढक लिया है इस तरह से / दूर तक छत पर कहीं से / चाँद का दर्शन नहीं है (पृष्ठ १२०) आदि.

दोलिता संवेदनाएँ, बातों के बताशे, नीलकंठी भाग्य, सौध-शिखर, सगुन के सांतिये, सांस की डोली, गुलमुहरों की घमछैयाँ, घंटियों से रणित साँझें, रसवंतिनी धरती जैसी मौलिक अभिव्यक्तियाँ पाठक-मन को भाव-विभोर करती हैं.

इन नवगीतों में अन्त्यानुप्रास अलंकार की निर्दोष और मौलिक अभिव्यक्तियाँ सर्वत्र दर्शनीय हैं जिनसे नवोदित नवगीतकार बहुत कुछ सीख सकते हैं. झरनों के कल-कल-छल स्वर, गए कहाँ-कितने थक आदि में छेकानुप्रास अलंकार, हिल गयी साधना से सँवारी जड़ें, न जाने कह रही क्या-क्या आदि में वृत्यानुप्रास अलंकार, यंत्र-शोरों की कहानी, बरगदों के भी जरठ तन में आदि में श्रुत्यनुप्रास अलंकार, गाते गीत बजाते वंशी कितने ऐसे-वैसे में अन्त्यानुप्रास अलंकार तथा दर्द की नदिया सदानीरा में लाटानुप्रास अलंकार दृष्टव्य है.

हवन हो गए आहुति-आहुति (वेंणसगाई अलंकार), सुबह रेलें उगल जातीं / भीड़ के रेले सड़क पर, पर तुम्हारे प्राण को हे प्राण! मैं भाता रहूँगा (यमक अलंकार), चुप्पियाँ फिर गुनगुनायीं (विरोधाभास अलंकार), यह / जूड़े का फूल तुम्हारा / गिरा दिया था / जो अनजाने / या फिर जान-बूझकर ही था कौन तुम्हारे मन की जाने (संदेह अलंकार), माटी का कण-कण बहका है (पुनरुक्ति प्रकाश अलंकार) आदि ने नवगीतों की सुषमा में चार चाँद लगाये हैं.

राही जी के नवगीतों में ग्राम्यांचलों के प्रति आकर्षण और शहरों के प्रति विकर्षण धूप-छाँव की तरह सम्बद्ध है. छायावादोत्तरी भाषा शैली और प्रसाद गुण संपन्नता ने इन्हें मिठास से सजाया है. राही जी आत्मानुभूति और आत्म-विश्वास के कवि हैं. वे ‘बदला समय / हवाएँ बदली / हम जैसे के तैसे’ कहकर विपरीत परिस्थितियों में भी अडिग रहते हैं. जब तलक हैं हम / तुम्हारे पन्थ को / ज्योतित करेंगे, नफरतों की आग में / इतना तपे / कुंदन हुए हैं, नक्षत्रों पर / कीर्ति-कथाएँ / लिखने को / उल्लास मच गए. खुशबुओं की कुछ नयी / सौगात लेकर आ रहे हैं, आदि पंक्तियों में अपने आत्मविश्वास की अभिव्यक्ति करते हैं. उनके अनुसार इन नवगीतों में ‘अभिव्यक्ति को फिर से एक नया आकाश मिला जिसमें विचरती कुछ अतीत की व्यष्टिपरक सुधियों की मोहक सरस मोरपंखी भ्रांतियाँ हैं तो आगत की सुकुमार रंगीन तितलियों के बीच स्थाई रूप से वर्तमान की खुरदरी धरती पर छटपटाती दम तोडती अच्छे दिन की प्यासी मछलियाँ भी हैं.’

राही जी के इन नवगीतों का जितना रसास्वादन किया जाए, प्यास उतनी ही अधिक बढ़ती जाती है. उम्र के नौवें दशक के पार हो रहे राही जी से अगले नवगीत संग्रह में शतक की अपेक्षा करना अनुचित न होगा. नवगीत के सचिन तेंदुलकर राही जी का हर नवगीत चौए-छक्के की तरह करतल ध्वनि करने को विवश कर देता है, यही उनकी सफलता है .
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आचार्य संजीव वर्मा ‘सलिल’, २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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