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शुक्रवार, 7 अक्तूबर 2016

dr. hira lal ray

लेख-
रायबहादुर हीरा लाल राय की काव्य प्रतिभा और दमोह दीपक 
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
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सनातन सलिला नर्मदा के तट पर साधकों की  परंपरा चिर काल से अंकुरित, पुष्पित और पल्लवित होती रही है। साधना भूमि नर्मदा के तट पर महादेव, उमा, जमदग्नि, परशुराम, अगस्त्य, विश्वामित्र , दत्तात्रेय, जाबालि, नरहरिदास, महर्षि महेश योगी, आचार्य रजनीश 'ओशो', पदमश्री रामकिंकर उपाध्याय आदि ने विश्वव्यापी ख्याति अर्जित की है। प्रशासनिक और सामाजिक क्षेत्र में जिन नरनहरों ने इस क्षेत्र की कीर्ति पताका फहराई उनमें रायबहादुर हीरालाल राय अग्रगण्य हैं। डॉ. राय की ख्याति मुख्यत: प्रशासक तथा पुरातत्वविद के रूप में है किन्तु शिक्षा तथा साहित्य के विकास में भी उनहोंने महती भूमिका  का निर्वहन किया है।  काव्य संस्कार उन्हें विरासत में प्राप्त हुआ था। ग्राम सूपा (महोबा उ.प्र) से बिलहरी (ऐतिहासिक पुष्पावती) नगरी में आकर बसे कालूराम के पुत्र रूप में जन्में नारायण दास मुड़वारा में जा बसे। वे अपने समय के प्रसिद्ध रामायणी थे। रामचरित मानस का सुमधुर स्वर में पाठ तथा विद्वतापूर्ण व्याख्या करने में उनका दूर-दूर तक सानी न था।  हैहय वंशी क्षत्रिय होने पर भी उन्हें सामान्यत: ब्राम्हणों को प्राप्त पदवी 'पाठक' प्राप्त थी। नारायणदास के पुत्र मनबोधराम में मानस की व्याख्या हेतु आवश्यक पांडित्य न होने पर भी अगाध रूचि थी।  अत:, वे अपने हाथ से लिखकर मानस की प्रतियाँ तैयार कर दान किया करते थे। 'पुस्तक दान महादान' उनके जीवन का मूलमन्त्र बन गया था। अल्प शिक्षित होने पर भी उन्हें सुख-समृद्धि और सन्तोष की कमी न थी।  कई सन्तानों के अल्प जीवी होने के पश्चात् प्राप्त अंतिम पुत्र को जीवनरक्षा हेतु ईश्वरार्पण कर उन्होंने उनका नाम भी ईश्वरदास ही रखा। ईश्वर ने अपने दास को दीर्घजीवी भी किया। एकमात्र संतान ईश्वरदास (संवत १९०४-१९६९) का लाड-प्यार खूब मिला फलत: वे प्राथमिक से अधिक शिक्षा न पा सके। इसकी कसक उन्होंने अपने २ पुत्रों हीरालाल और गोकुलप्रसाद को उच्च शिक्षित कर मिटाई। हीरालाल जी (जन्म आश्विन शुक्ल चतुर्थी संवत १९२४ विक्रम तदनुसार १ अक्टूबर सन १८६७ ई.)   ने प्रथम काव्य-सुमन अट्ठाइस मात्रिक यौगिक जातीय छंद में लिखा पद अपनी माता-पिता को ही समर्पित किया- 

सुमिरि जस मन न समाय हुलास 
शुभ श्री कमला मातु हमारी, पितु श्री ईश्वरदास।। 
कटनी तट सोहै अति सुंदर, मुड़वारा रह वास। 
दोउन को दोऊ कर जोरे, प्रणमत दोई दास ।। १ 

मुरवारा एंग्लो वर्नाक्यूलर मिडिल स्कूल में अपनी बाल-प्रतिभा से शिक्षकों और निरीक्षकों को चकित करनेवाले हीरालाल ने सन १८८१ में माध्यमिक, १८८३ में एंट्रेंस, तथा १८८८ में बी.ए. शिक्षा प्राप्त कर गवर्नमेंट कॉलिजिएट हाई स्कूल में अध्यापक पदार्थ विज्ञान के रूप में अपने व्यक्तित्व का विकास आरम्भ किया। इस काल तक हीरालाल राय का काव्य-प्रेम काव्य पढ़ने, समझने और रसानंद लेने तक सीमित था।  १७ जनवरी सन १८९१ को सागर जिले में डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स नियुक्त होने पर उन्होंने ग्राम्यांचलों में शिक्षा के प्रसार हेतु अपने काव्य-प्रेम को औजार की तरह प्रयोग किया। उन्होंने स्कूल-कांफ्रेंसों में, शिक्षकों हेतु विषय-चयन में तथा विद्यार्थियों के लिए पाठ्य सामग्री के सृजन में कविताओं का प्रचुरता से प्रयोग किया। आपके संबोधनों में काव्यात्मक उद्धरणों का यथास्थान-यथोचित प्रयोग होता था। इससे वे सामान्य जनों हेतु सहज ग्राह्य हो जाते थे। विषय सामग्री को शुष्क तथा नीरस होने से बचाने के लिए प्रयुक्त काव्यांश सहज स्मरणीय भी होते थे। फलत:, शिक्षक और विद्यार्थी दोनों की जुबान पर पाठ्य सामग्री का काव्य रूप सहज ही चढ़ जाता था। 

अशिक्षित व अल्प शिक्षित जन विशेषकर कन्याएँ तथा महिलाएँ जिन्हें पढ़ाने का चलन कम था, सुन कर शिक्षा सामग्री स्मरण कर पातीं तथा समझ कर अन्यों को बता पातीं। सरस पाठ्य सामग्री ने शिक्षा प्रति सामान्य जान के मन में आकर्षण उत्पन्न किया और डिप्टी इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स को निर्धारित से पर्याप्त अधिक संख्या में विद्यालय आरम्भ करने और विद्यालयों में अपेक्षा से अधिक विद्यार्थी भर्ती कराने में सफलता मिली।  डॉ. राय ने काव्यात्मक सामग्री का सम्यक प्रयोग कर कन्या विद्यालयों की स्थापना तथा कन्या छात्राओं के प्रवेश में भी आशातीत सफलता पायी। यहाँ तक की इन छात्राओं में से अनेक काव्य-रचना कर्म में भी प्रवीण हुईं। इन परिणामों से काव्य-सामग्री की उपादेयता व प्रासंगिकता के प्रीति सशंकित रहनेवाले महानुभावों को तो सबक मिला ही, अरबी-फ़ारसी मिश्रित हिंदी का प्रचलन कम हुआ और आधुनिक हिंदी को जड़ें जमने में सहायता मिली। 

सागर की असाधारण सफलता देखकर सरकार ने हीरालाल जी को सन १८९६ में एजेंसी इंस्पेक्टर ऑफ़ स्कूल्स के पद पर रायपुर छत्तीसगढ़ पदस्थ किया। यहाँ कुछ क्षेत्र में उड़िया तथ अन्य आदिवासी भाषाएँ चलन में थीं। आपका भाषा तथा काव्य से लगाव इतना प्रगाढ़ था की अपने एक उड़िया स्कूल का निरीक्षण करने के पूर्व एक रात में उड़िया भाषा सीखी तथा कवितायें कण्ठस्थ कर लीं ताकि निरीक्षण के समय सुनकर जाँच सकें। आ व १८९९ के अकालों व १९०१ की जनगणना के कार्यों में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी को समर्पण भाव से निभाकर उच्चाधिकारियों से प्रशस्ति पाने के आबाद हीरालाल जी को सुपरिंटेंडेंट इथिनॉग्राफी (मनुष्य विज्ञानं) तथा गजेटियर तैयार करने का दायित्व सौंपा गया। आपने पुरातात्विक सामग्री शिलालेखों को तलाशा और पढ़ाजिनमें से अनेक काव्य में थे। सन १९११ - १२ में आपने मध्यप्रांत और बरार के शिला और ताम्र लेखों की वर्णनात्मक सूची' तैयार कर ख्याति पाई। इसके समानातर आपने भाषाओँ पर भी काम किया और १८ भाषाएँ (हिंदी, बुन्देली, बघेली, संस्कृत, अंग्रेजी, उर्दू, छत्तीसगढ़ी, उड़िया, मुड़िया, मारिया, कोरकू, गोंडी, परजा, हल्बी, गड़वा, कोलमी, नहली,  निमाड़ी) सीखीं। 

दमोह जिले का गजेटियर तैयार करते समय आपने पुरातत्व और प्रशासन जैसे शुष्क और नीरस विषयों की सामग्री प्रस्तुत करते समय स्वरचित दोहे तथा अन्य काव्य रचनाओं का प्रचुरता से प्रयोग किया।  डॉ. राय ने सन १९१७ में प्रकाशित 'दमोह-दीपक' का श्री गणेश और समापन ही नहीं अधिकांश अध्यायों (वर्तिकाओं) का आरम्भ भी संस्कृत ग्रन्थों की परम्परानुसार दोहा छंद से किया है। प्रथम वर्तिका के आदि में अर्ध सम मात्रिक द्विपदीय पयोधर दोहा (१२ गुरु, २४ लघु) छंद से है जिसमें १३-११ पर यति का विधान है -

बरसत को कूरा जमो, घर भीतर अँधियार। 
आलस तज अब देखिए, लै दीपक उजियार।।    - मुखपृष्ठ 

प्रथम वर्तिका के आरंभ में दमोह जिले की सीमा-वर्णन चौबीस मात्रिक नर दोहे (गुरु, १८ लघु) में होना डॉ. राय के काव्य-रचना-कौशल का परिचायक है- 

पीठ ऊँटिया पूरबै, उत्तर बघमुख मूँछ। 
पच्छिम को पग शूकरी, दक्खिन बाड़ी पूँछ।।   -- पृष्ठ १ 

द्वितीय वर्तिका के आरम्भ में दमोह का इतिहास तीस मात्रिक छंद में है जिसमें १५-१५ पर यति तथा चरणान्त में गुरु-लघु का विधान है -

आदि गुप्त कलचुरि पड़िहार।  चंदेला गोहिल्ल निहार।। 
तुगलक खिलजी गोंड मुगल्ल।  बुंदेला मरहट्ठा दल्ल।।  
डेढ़ सहस बरसें किय भोग। तब फिरंगि  को आयो योग ।।   -- पृष्ठ ४ 

ऐतिहासिक जानकारियों के साथ यत्र-तत्र संस्कृत, उर्दू, बुन्देली के विविध ग्रन्थों से दिए गए पद्य-उद्धरण डॉ. राय के विषाद अध्ययन तथा गहन समझ का प्रमाण हैं। तृतीय वर्तिका के आरंभ में दमोह निवासी जातियों का परिचय देता नर दोहा दमोह जिले में दस जातियों की बहुलता बताता है -

चमरा, लोधी, गोंड़ अरु, कुर्मी, विप्र, अहीर। 
काछी, ढीमर, बानिया, ठाकुर- दस की भीर।।  -- पृष्ठ ३१

चतुर्थ वर्तिका में दमोह जिले की कृषि, जंगल, तथा वन्य प्राणियों की जानकारी देने के लिए भी डॉ. राय ने पुनः एक पयोधर दोहा रचा है- 

अर्ध माँहि कृषि, अर्ध में, है जंगल विस्तार। 
नाहर, तिंदुवा, रीछ जहँ, मृग सँग करत विहार।।    -- पृष्ठ ४१ 

उद्योग-धंधे और व्यापार किसी स्थान और जन-जीवन की समृद्धि तथा विकास की रीढ़ की हड्डी होते हैं। दमोह-दीपक की पंचम वर्तिका में डॉ. राय बत्तीस मात्रिक चौपाई छंद जिसमें १६-१६ पर यति है, का प्रयोग कर इन जानकारी का संकेत करते हैं -

लाख अढ़ाइक नर अरु नारी। पालत जिव कर खेती-बारी।
लाखक करके उद्यम नाना। दौड़-धूप कर पावत खाना ।।    -- पृष्ठ ४७ 

आपद-विपदा जीवन का अभिन्न अंग हैं। षष्ठ वर्तिका में दमोहवासियों द्वारा झेली गयी प्रमुख विपदाओं का उल्लेख गयन्द दोहा (१३ गुरु, २२ लघु) छंद में है -

चार विपत व्यापी अधिक, ई दमोह के लोग। 
ठग, भुमियावट, काल अरु, प्राणघातकी रोग।।      -- पृष्ठ ५३

शासन-प्रशासन की गतिविधियों पर केंद्रित सप्तम वर्तिका का शुभारम्भ डॉ. राय ने चौबीस मात्रिक सोरठा (११- १३ पर यति) छंद से किया है -

फौजदारि  अरु माल, दीवानी सह तीन हैं। 
शासन अंग विशाल, आज काल के समय में।।     -- पृष्ठ ६५ 

बत्तीस मात्रिक चौपाई छंद (१६-१६ पर यति) में अष्टम वर्तिका का आरंभ कर डॉ. राय दमोह जिले के प्रमुख कस्बों का उल्लेख करते हैं -

ज़ाहिर ठौर ज़िले बिच नाना। तिनको अब कछु सुनहु बखाना। 
वर्णाक्षर के क्रम अनुसारा।  कहब कथा कछु कर विस्तारा।।         -- पृष्ठ ७१ 

डॉ. राय ने दमोह दीपक का समापन बल (११ दूर, २६ लघु) दोहा छंद में किया है। 

दम में निशितम देख के, अष्टवार्तिक दीप।
लेस सिरावत ताहि अब, समुझि प्रभात समीप।।

दमोह-दीपककार ने विषयवस्तु के अनुरूप काव्य पंक्तियों का प्रणयन कर जहाँ अपनी रचना-सामर्थ्य का परिचय दिया है वहीं पूर्ववर्ती तथा समकालिक कवियों की उपयुक्त काव्यपंक्तियों का उदारतापूर्वक उपयोग कर विषय को प्रभावी ढंग से प्रस्तुत किया है। अन्य कवियों की कृतियों / रचनाओं से उद्धरण लेते समय उनके नामों का उल्लेख करने की सजगता और सौजन्यता डॉ. राय ने प्रदर्शित की है तथापि कहीं-कहीं अपवाद हैं जो सम्बंधित रचना के रचनाकार की जानकारी न मिल पाने के कारण हो सकती है।  

द्वितीय वर्तिका  के अंतर्गत जटाशंकर से प्राप्त लगभग १४ वीं सदी के राजस्थानी भाषा के लेख  सारांश  डॉ.राय ने प्रस्तुत किया है- 

जो चित्तोड़ह जुझि (ज्झि) अउ, जिण ढिली (ल्ली) दलु जित्त। 
सो सुपसंसहि रभहकइ हरिसराअ तिअ सुत्त।।                    - कच्छप दोहा (८ गुरु, ३२ लघु)
खेदिअ गुज (ज्ज) र गौदहइ, कीय अधि (धी) अं मार। 
विजयसिंह किट संमलहु, पौरिस  कह संसार।।                  - कच्छप दोहा (८ गुरु, ३२ लघु)

बटियागढ़ से प्राप्त संवत १३८५ (सन १३२८) के शिलालेख में तुगलकवंशीय महमूद संबंधी संस्कृत लेख के साथ डॉ. राय ने उसका हिंदी अनुवाद भी प्रस्तुत किया है -

अस्ति कलियुगे राजा शकेंद्रो वसुधाधिप:।
योगिनीपुरमास्थाय यो भुंक्ते सकलां महीम।।
सर्वसागरपर्यन्तं वशीचक्रे नराधिपान। 
महमूद सुरत्राणों नाम्ना शूरोभिनन्दतु।।           - पृष्ठ १३   

कलियुग में पृथ्वी का मालिक शकेंद्र (मुसलमान राजा) है जो योगिनीपुर (दिल्ली) में रहकर तमाम पृथ्वी का भोग करता है और जिसने समुद्र पर्यन्त सब राजाओं को अपने वश भवन कर लिया है। उस शूरवीर दुल्तान महमूद का कल्याण हो। 

इसी वर्तिका में आगे बुंदेला छत्रसाल का वर्णन करते हे डॉ. राय ने महाकवि भूषण लिखित पंक्तियाँ उद्धृत की हैं- 

चाक चक चमूके  अचाक चक चहूँ ओर, 
चाक की फिरत धाक चम्पत के लाल की। 
भूषण भनत पादसाही मारि जेर किन्ही, 
काऊ उमराव ना करेरी करवाल की।।........           - पृष्ठ २४  

सन १८५४ के तीसरे भीषण अकाल के वर्णन के बाद डॉ. राय ने गढ़ोला निवासी कवि भावसिंह लोधी रचित ४ पृष्ठीय कविता ज्यों की त्यों दी है जिसमें इस विपद एक दारुण वर्णन है।  कुछ पंक्तियाँ देखें- 

अगहन बरसे पूस में, भरी परै तुसार। 
माहु  दिनन में, गिरूआ करे पसार।।
गेहूं पिसी गवोटे आई।  तब गिरूआ ने दइ पियराई।।
रचे पतउआ डाँड़ी लाल, पेड़ो रच गयो बच गई बाल।। .......    पृष्ठ ५५ -५८  

अंतिम वर्तिका में बाँसा कलाँ की जानकारी में लाल कवि कृत 'छत्रप्रकाश' से लंबा वर्णन प्रस्तुत किया गया है। कुछ पंक्तियों का आनंद लें -

दांगी केशोराइ तहां कौ। ज़ाहिर जोर मवासी बांकौ ।।
बाँचि बरात डारि उहि दीनी। तुरतै तमकि तेग कर लीन्हीं।।
फिरी बरात बुंदेला जानी। तब बाँसा पर फ़ौज पलानी ।।
ठिल्यौ बुँदेला बम्ब दै, बांसा घेरयो जाइ ।।
त्योंही सन्मुख रन पिल्यो, दांगी बड़ी बलाइ।।  ......    पृष्ठ ९४-९५  

मोहना के लगभग ७०० वर्ष पुराने ध्वस्त प्रायः शिव मन्दिर की सुंदर मूर्तियों संबंधी लोक-प्रचलित काव्य-पंक्तियों का आनंद लें- 

गणपति आठौ मातर:, ब्रम्हा शंभु रमेश। 
नवगह तिनके बीच में, बाजू भैरव वेष।। 
गंगा-जमुना देहरी, कीरतिमुख तल मांहिं। 
मुहनामठ चौखट लिखे, इतने देव दिखाहिं।।  

डॉ. राय रचित कोई स्वतन्त्र काव्य ग्रन्थ अथवा काव्य रचनाएँ न होने से उनके कवि होने में यह शंका हो सकती है  अथवा यह प्रश्न किया जा सकता है कि दमोह दीपक में प्रयोग की गयी अन्य कवियों की पंक्तियों की तरह शेष पंक्तियाँ भी  डॉ. राय रचित न हों।  इस शंका का निराकरण सहज ही हो सकता है। दृष्टव्य है कि अपवाद छोड़कर डॉ. राय ने अन्य कवियों की पंक्तियों का  उनका  कृति का नाम देने की सजगता  बरती है। अन्य कवियों के रचनाएँ किसी प्रसंग में उपयुक्त होने पर ही ली गयी हैं। कृति की रूपरेखा निर्धारण कर लिखी जाती समय अध्यायों की विषयवस्तु किसी अन्य को ज्ञात नहीं हो सकती, अत: किसी अन्य द्वारा अध्याय की परिचयात्मक पंक्तियाँ लिखी जाना संभव नहीं हो सकता। यदि लेखक ने विषयवस्तु की जानकारी देकर पंक्तियाँ लिखई होतीं तो वह रचनाकार के नाम का यथास्थान उल्लेख अवश्य करता। एक अन्य प्रमाण उद्धरणों की भाषा भी है। डॉ. राय द्वारा रचित पंक्तियों की भाषा उनके जीवनकाल में प्रचलित आधिनिक हिंदी का आरम्भिक रूप है और यह उनकी सभी पंक्तियों में एक सी है जबकि अन्य कवियों की पंक्तियों की भाषा डॉ. राय रचित पंक्तियों से सर्वथा भिन्न देशज या संस्कृतनिष्ठ या उर्दू मिश्रित है। डॉ. राय रचित स्वतंत्र काव्य कृति न होने का करण उनकी अतिशय व्यस्तता, बीमारी तथा प्रशासनिक दायित्व ही हो सकता है। 

डॉ. राय रचित काव्य पंक्तियों  से उनकी छंदशास्त्र संबंधी सामर्थ्य में किंचित भी सन्देह नहीं रहता। डॉ. राय ने दोहा, चौपाई और सोरठा छंदों का प्रयोग किया है। छंद-विधान ( संख्या, चरण संख्या, मात्रा संख्या, गति-यति, तुकांत नियम, लय, विराम चिन्ह आदि), भाषा शैली, सम्यक बिम्ब और प्रतीक आदि यह बताते हैं की डॉ. राय कुशल प्रशासक तथा ख्यात पुरातत्वविद होने के साथ-साथ कुशल तथा समर्थ कवि भी हैं. उनकी समस्त रचनाओं को एकत्र कर स्वतंत्र कृति प्रकाशित की जा सके तो डॉ.  राय के व्यक्तित्व के अनछुए पहलू को सामने  सच्ची श्रद्धांजलि दी जा सकेगी। 
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सहायक ग्रन्थ- 
१. हैहय क्षत्री मित्र, हीरालाल अंक, जनवरी-फरवरी १९३६ में प्रकाशित लेख। 
२. दमोह-दीपक, - राह बहादुर हीरालाल राय, १९१७। 
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संपर्क- समन्वयम 
२०४ विजय अपार्टमेंट, सुभद्रा वार्ड,
नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१ 
salil.sanjiv@gmail.com 
९४२५१८३२४४ / ०७६१ २४१११३१ 
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