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गुरुवार, 13 अक्तूबर 2016

hindigazal / muktika

​हिंदी ग़ज़ल - 

बहर --- २२-२२  २२-२२  २२२१  १२२२ 
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है वह ही सारी दुनिया में, किसको गैर कहूँ बोलो?
औरों के क्यों दोष दिखाऊँ?, मन बोले 'खुद को तोलो' 
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​खोया-पाया, पाया-खोया, कर्म-कथानक अपना है 
क्यों चंदा के दाग दिखाते?, मन के दाग प्रथम धो लो 
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जो बोया है काटोगे भी, चाहो या मत चाहो रे!
तम में, गम में, सम जी पाओ, पीड़ा में कुछ सुख घोलो 
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जो होना है वह होगा ही, जग को सत्य नहीं भाता
छोडो भी दुनिया की चिंता,  गाँठें निज मन की खोलो 
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राजभवन-शमशान न देखो, पल-पल याद करो उसको 
आग लगे बस्ती में चाहे, तुम हो मगन 'सलिल' डोलो 
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