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शनिवार, 19 नवंबर 2016

काव्य वार्ता
नाम से, काम से प्यार कीजै सदा 
प्यार बिन जिंदगी-बंदगी कब हुई?        -संजीव्  
*
बन्दगी कब हुई प्यार बिन जिंदगी 
दिल्लगी बन गई आज दिल की लगी 
रंग तितली के जब रँग गयीं बेटियाँ 
जा छुपी शर्म से आड़ में सादगी            -मिथलेश 
*
छोड़ घर मंडियों में गयी सादगी 
भेड़िये मिल गए तो सिसकने लगी 
याद कर शक्ति निज जब लगी जूझने 
भीड़ तब दुम दबाकर खिसकने लगी    -संजीव्

एक दोहा 
शब्दसुमन को गूंथिए, ले भावों की डोर 
गीत माल तब ही बने, जब जुड़ जाएँ छोर
*
एक कुण्डलिनी 
मन मनमानी करे यदि, कस संकल्प नकेल 
मन को वश में कीजिए, खेल-खिलाएँ खेल 
खेल-खिलाएँ खेल, मेल बेमेल न करिए 
व्यर्थ न भरिए तेल, वर्तिका पहले धरिए 
तभी जलेगा दीप, भरेगा तम भी पानी
कसी नकेल न अगर, करेगा मन मनमानी

*
एक पद-
अभी न दिन उठने के आये 
चार लोग जुट पायें देनें कंधा तब उठना है 
तब तक शब्द-सुमन शारद-पग में नित ही धरना है 
मिले प्रेरणा करूँ कल्पना ज्योति तिमिर सब हर ले 
मन मिथिलेश कभी हो पाए, सिया सुता बन वर ले
कांता हो कैकेयी सरीखी रण में प्राण बचाए
अपयश सहकर भी माया से मुक्त प्राण करवाए
श्वास-श्वास जय शब्द ब्रम्ह की हिंदी में गुंजाये
अभी न दिन उठने के आये

*
दो दोहे 
उसके हुए मुरीद हम, जिसको हमसे आस 
प्यास प्यास से तृप्त हो, करे रास संग रास

मन बिन मन उन्मन हुआ, मन से मन को चैन 
मन में बस कर हो गया, मनबसिया बेचैन
*

दोहा-मुक्तक 
मुक्तक 
मन पर वश किसका चला ?
किसका मन है मौन?
परवश होकर भी नहीं 
परवश कही कौन?
*
संयम मन को वश करे,
जड़ का मन है मौन
परवश होकर भी नहीं
वश में पर के भौन
*

मुक्तिका 
*
पहले कहते हैं आभार 
फिर भारी कह रहे उतार 
*
सबसे आगे हुए खड़े 
कहते दिखती नहीं कतार 
*
फट-फट कार चलाती वे 
जो खुद को कहतीं बेकार 
*
सर पर कार न धरते क्यों 
जो कहते खुद को सरकार? 
*
असरदार से शिकवा क्यों?
अ सरदार है गर सरदार 
*
छोड़ न पाते हैं घर-द्वार
कहते जाना है हरि-द्वार 
*
'मिथ' का 'लेश' नहीं पाया 
थे मिथलेश प्रगट साकार 
***

मुक्तिका 
*
पहले कहते हैं आभार 
फिर भारी कह रहे उतार 
*
सबसे आगे हुए खड़े 
कहते दिखती नहीं कतार 
*
फट-फट कार चलाती वे 
जो खुद को कहतीं बेकार 
*
सर पर कार न धरते क्यों 
जो कहते खुद को सरकार? 
*
असरदार से शिकवा क्यों?
अ सरदार है गर सरदार 
*
छोड़ न पाते हैं घर-द्वार
कहते जाना है हरि-द्वार 
*
'मिथ' का 'लेश' नहीं पाया 
जब मिथलेश हुई साकार 
***

मुक्तिका
*
जीने से मत डरना तुम
जीते जी मत मरना तुम
*
मन की पीड़ा कह-कहकर
पीर नहीं कम करना तुम
*
कदम-कदम चल-गिर-उठकर
मंजिल अपनी वरना तुम
*
श्रम-गंगा में नहा-नहा
तार जगत को तरना तुम
*
फूल-फलो जब-जब, तब-तब
बिन भूले नित झरना तुम

***

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