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बुधवार, 2 नवंबर 2016

doha

दोहा सलिला 
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आशा जिसके साथ हो, होता वही अशोक 
स्वर्ग-सदृश सुख भोगता, स्वर्ग बने भू लोक
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तिमिर अमावस का हरे, शुक्ल करे रह मौन 
दीप वंद्य है जगत में, कहें दूसरा कौन?
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श्याम अमावस शुक्ल हो, थाम कांति का हाथ 
प्रतिबिंबित ज्योतित सलिल', नमन  झुकाकर माथ 
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खुशहाली बिटिया शुभा, फैलाती मांगल्य 
बेटा जीवन-दीप का, होता है सांकल्य
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दीप-वर्तिका इंदिरा, पल में हरती शोक
सकल जगत उजियार कर, स्वर्ग करे भूलोक
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दीप-लता ने हर लिया, जग का तिमिर तमाम
उषा-दीप्ति पा हँस पड़ी, दीवाली की शाम
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अनिल अनल भू नभ सलिल, पंचत्त्वमय सृष्टि
तिमिर हरे बन दीप यदि, ईश करें शुभ-वृष्टि
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राँगोली मन-कामना, बाती शुभ संकल्प 
चित्रा प्रभु की प्रकृति / कोई नहीं विकल्प
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दीप जले साहित्य का, दमके ज्योति प्रचंड 
'सलिल' पहुँच जा गहमरी, भुज भर भेंट अखंड
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जय-जय कर राजीव की, 'सलिल' हुआ है धन्य 
स्नेह-भेंट के पलों की, स्मृति सुखद अनन्य
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प्रभु दयालु हों तो मिले, श्री वास्तव में बंधु 
सलिल-बिंदु भी बन सके, पल में सुख का सिंधु
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शक-सेना को जीत ले, जिसका दृढ़ विश्वास 
उसकी आभा अपरिमित, जग में भरे उजास
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खुद से आँख मिला सके, जो वह है रणवीर 
तम को आँख दिखा सके, हो दीपक सम धीर
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यथातथ्य बतला सके, संजय जैसी दृष्टि 
कर सच को स्वीकार-बढ़, तब हो सुख की वृष्टि
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शशि तम हर उजियार दे, भू को रहकर मौन 
कर्मव्रती ऐसा कहाँ, अन्य बताये कौन?
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अमन-चैन रख सलामत, निभा रहे कुछ फर्ज़  
शेष तोड़ते हैं नियम, लाइलाज यह मर्ज़
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लागू कर पायें नियम, भेदभाव बिन मित्र! 
तब यह निश्चय मानिए, बदल सकेगा चित्र
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हो परेड की तरह ही, अनुशासित अभ्यास 
काव्य पंक्तियाँ कलम से, उतर करें तब हास
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दूरभाष चलभाष हो, या सम्मुख संवाद 
भाष सुभाष सदा करे, स्नेह-जगत आबाद
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मंजु मूर्ति श्री लक्ष्मी, महिमावान गणेश 
सदा सदय हों नित मिले, कीर्ति -समृद्धि अशेष
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बहिना का आशीष ही, भाई की तकदीर 
शुभाशीष पा बहिन का, भाई होता वीर
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दीप-आभा से प्रकाशित, निशा ऊषा सम हुलस
हँस पड़ी यह देख द्वेषित, नभ-घटा रोई झुलस 

श्री वास्तव में इंद्र सम, गहें बहादुर मीत 
गुण पूजन की बढ़ सके, मित्र! जगत में रीत
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