चिंतन कण :
अंतिम सत्य
मृदुल कीर्ति
जगत को सत मूरख कब जाने .
दर-दर फिरत कटोरा ले के, मांगत नेह के दाने,
बिनु बदले उपकारी साईं, ताहि नहीं पहिचाने.
आपुनि-आपुनि कहत अघायो, वे सब अब बेगाने.
निज करमन की बाँध गठरिया, घर चल अब दीवाने.
रैन बसेरा, जगत घनेरा, डेरा को घर जाने.
जब बिनु पंख , हंस उड़ जावे, अपने साईं ठिकाने.
पात-पात में लिखा संदेशा , केवल पढ़ही सयाने.
आज बसन्ती, काल पतझरी, अगले पल वीराने.
बहुत जनम धरि जनम अनेका, जनम-जनम भटकाने.
मानुष तन धरि, ज्ञान सहारे, अपनों घर पहिचाने.
विनत
मृदुल
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
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शनिवार, 26 सितम्बर 2009
चिंतन कण : अंतिम सत्य -मृदुल कीर्ति
प्रस्तुतकर्ता Posted by :
sanjiv verma
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