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रविवार, 18 मार्च 2012

अवधी हाइकु सलिला: --संजीव 'सलिल'

अवधी हाइकु सलिला:  

संजीव 'सलिल'

*
*
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*

रविवार, 12 फरवरी 2012

सामयिक अवधी कविता: अबकी चुनाव हम लड़ि जाबै --ॐ प्रकाश तिवारी

सामयिक अवधी कविता

अबकी चुनाव हम लड़ि जाबै

ॐ प्रकाश तिवारी 
*
तुम्हरै सपोर्ट चाही ददुआ
अबकी चुनाव हम लड़ि जाबै । 

कीन्हेंन बहुतेरे कै प्रचार,
जय बोलेन सबकी धुआँधार,
दुइ पूड़ी के अहसान तले
सगरौ दिन कीन्हेंन हम बेगार । 
जब तलक नाँहिं परि गवा वोट
नेकुना से घिसि डारिन दुआर,
अब जीति गए तो ई ससुरै
चीन्हत नाँहीं चेहरा हमार । 

अबकी इनहिन सबके खिलाफ
हम टिकस की खातिर अड़ि जाबै । 
तुम्हरै सपोर्ट चाही ------------

छपुवाउब बड़े-बड़े पर्चा,
करबै पुरहर खर्चा-बर्चा,
ददुआ तनिकौ कमजोर परब
तौ माँगब तुमहूँ से कर्जा । 
चहुँ दिशि होई हमरी चर्चा,
पउबै हम नेता कै दर्जा,
लोगै हमका द्याखै खातिर
करिहैं दस काम्यौं कै हर्जा ।

अबकी दिल्ली दरबार मा हम
अपनिउ एक चौकी धरि द्याबै । 
तुम्हरै सपोर्ट चाही ----------

मूंठा राखब आपन निसान,
पटकब बिपक्ष कै पकरि कान,
करवाय लेब कप्चरिंग बूथ,
बँटवाय देब सतुआ-पिसान । 
अबहीं तक छोलेन घाँस बहुत,
अब राजनीति में भै रुझान,
तौ जीति के ददुआ दम लेबै,
मन ही मन मा हम लिहन ठान । 

धोबी का वोट मिलै खातिर
गदहौ के पाँयन परि जाबै । 
तुम्हरै सपोर्ट चाही ---------

जब पहिर के निकरब संसद मां
हम उज्जर कुर्ता खादी कै,
चेहरा जाए झुराय ददुआ,
नेतन की कुल आबादी कै । 
अबकिन चुनाव मा नापि लिअब
जलवा इन सब की आँधी कै,
एक दिन मा लै लेबै हिसाब 
हम भारत की बरबादी कै । 

संसद मां प्रश्न उठावै कै
हम एक्कौ पैसा न ल्याबै । 
तुम्हरै सपोर्ट चाही ---------

है याक अर्ज तुम सब जन से,
अबकी बिजयी करिहौ मूठा,
जैसन जीतब ददुआ तुमका
दिलवैबै शक्कर कै कोटा । 
आलू-पियाज अफरात रहे,
ना परै देब तनिकौ टोटा,
तुम सबका सैंक्सन करवइबै
जहता कै थरिया औ लोटा । 

विश्वास करौ हम संसद में
एक टका दलाली न खाबै ।
तुम्हरै सपोर्ट चाही ------

- ओमप्रकाश तिवारी

रविवार, 16 जनवरी 2011

अवधी हाइकु सलिला: संजीव वर्मा 'सलिल'

अवधी हाइकु सलिला:  

संजीव वर्मा 'सलिल'

*
*
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*

बृहस्पतिवार, 1 जुलाई 2010

कहे कहावत अनकही : -१

लेख:
कहे कहावत अनकही : -१  सलिल











कहावतें हिन्दी की जान हैं. कम से कम शब्दों में अधिक से अधिक या बिना कटुता के गूढ़ को सरलता से अभिव्यक्त करने में कहावत का सानी नहीं. इस शीर्षक के अंतर्गत विश्व की विविध भाषाओँ-बोलियों की कहावतें अर्थ तथा प्रयोग सहित प्रस्तुत की जायेंगी. आप का सहयोग आमंत्रित है:

१. हिम्मत न हारना  =  निराश न होना.
हारिए न हिम्मत, बिसारिए न राम.
जेहि विधि रखे राम. ताहि विधि रहियो..
सौ बारअसफल होने पर भी य्हम्मत नहीं हारना चाहिए.

२. मिट्टी में मिल जाना = नष्ट हो जाना.
मत घमंड कर, माटी का तन, माटी में मिल जाना है.
भष्टाचार कर धन-संपत्ति जोड़नेवाला भूल जाता है कि आखिर में उसे भी माटी में मिल जाना है. 

प्रेषक - राणा प्रताप सिंह 
३. कहावत:-:
जहां जाये दूला रानी
उहाँ पड़े पाथर पानी
मूल भाषा:-
अवधी
अर्थ/प्रयोग:-
यह कहावत ऐसे व्यक्ति के लिए प्रयोग की जाती है जिसके जाते ही कोई कार्य बिगड़ने लगता है.

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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर