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बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

गले मिले दोहा-यमक भोग लगा प्रभु को प्रथम --संजीव 'सलिल

गले मिले दोहा-यमक
भोग लगा प्रभु को प्रथम
संजीव 'सलिल
*
भोग लगा प्रभु को प्रथम, फिर करना सुख-भोग.
हरि को अर्पण किये बिन बनता भोग कुरोग..
*
कहें दूर-दर्शन किये, दर्शन बहुत समीप.
चाहा था मोती मिले, पाई खाली सीप..
*
जी! जी! कर जीजा करें, जीजी का दिल शांत.
जी, जा जी- वर दे रहीं, जीजी कोमल कांत..
*
वाहन बिना न तय किया, सफ़र किसी ने मीत.
वाह न की जिसने- भरी, आह गँवाई प्रीत..
*
बटन न सोहे काज बिन, हो जाता निर्व्याज.
नीति- कर्म कर फल मिले, मत कर काज अकाज.
*
मन भर खा भरता नहीं, मन- पर्याप्त छटाक.
बरसों काम रुका रहा, पल में हुआ फटाक..
*
बाटी-भरता से नहीं, मन भरता भरतार.
पेट फूलता बाद में, याद आये करतार..
*
संज्ञा के बदले हुए, सर्वनाम उपयोग.                                                                                                            सर्व नाम हरि के 'सलिल', है सुंदर संयोग..

उसका रण वह ही लड़े, किस कारण रह मौन.
साथ न देते शेष क्यों, बतलायेगा कौन??
*
ताज महल में सो रही, बिना ताज मुमताज.
शिव-मंदिर को मकबरा, बना दिया बेकाज.                                                    .
*
योग कर रहे सेठ जी, योग न कर कर जोड़.
जोड़ सकें सबसे अधिक, खुद से खुद कर होड़..
*******

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मंगलवार, 6 सितम्बर 2011

विशेष आलेख: स्वाति नक्षत्र और साहित्यिक मान्यताएँ --- संजीव 'सलिल'

विशेष आलेख:                                                                          
स्वाति नक्षत्र और साहित्यिक मान्यताएँ
--संजीव 'सलिल'
*

स्वाति संबंधी मेरी अल्प जानकारी निम्न है:


स्वाति शुभ नक्षत्र है. यह राशि चक्र के २७ नक्षत्रों अश्विनी, भरणी, कृत्तिका, रोहिणी, मृगशिरा, आर्द्रा, पुनर्वसु, पुष्य, अश्लेशा, मघा, पूर्व फाल्गुनी, उत्तर फाल्गुनी, हस्त, चित्रा, स्वाति, विशाखा, अनुराधा, ज्येष्ठ, मूला, पूर्व आषाढ़ा, उत्तर आषाढ़ा, श्रवण, धनिष्ठा, शतभिषा, पूर्व भाद्रपद, उत्तर भाद्रपद व रेवती में १५ वाँ नक्षत्र है. यह वायु से नियंत्रित होता है.

समान्तर कोष भाग २, पृष्ठ ५०५, क्र. ९२४.७  के अनुसार स्वाति का पर्याय तलवार भी है.

वृहत हिंदी कोष संपादक कालिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय व मुकुन्दी लाल श्रीवास्तव के अनुसार सूर्य की एक पत्नि का नाम स्वाति है.                                                                      

साहित्यिक मान्यताओं और जन-श्रुतियों के अनुसार स्वाति नक्षत्र में होने वाले जल वृष्टि की चाह में चातक 'पिऊ कहाँ' की टेर लगाता है तथा स्वाति नक्षत्र में गिरा जल पीकर चातक तृप्त होता है. यही जल सीप-गर्भ में जने पर मोती, वंश-वृक्ष (बांस) की जड़ में जाने पर वंशलोचन (आयुर्वेदिक औषधि), कदली-पत्र के समपार में कपूर तथा सर्प-मुख में गरल बनता है. 

स्वाति से संबंधित अन्य शब्द और उनके अर्थ : स्वातिकारी = कृषि देवी, स्वातिगिरि = एक नागकन्या, स्वाति पंथ / पथ = आकाशगंगा, स्वातिबिंदु = स्वाति नक्षत्र में गिरि जल की बूँद, स्वातिमुख = एक समाधि, एक किन्नर, स्वातिमुखा = एक नागकन्या, स्वातियोग = आषाढ़ के शुक्ल पक्ष में स्वाति नक्षत्र का चन्द्रमा के साथ योग, स्वातिसुत / सुवन = मुक्ता, मोती. 

हिंदी ज्योतिष के अनुसार;                                                               
स्वाति नक्षत्र का स्वरूप मोती के समान है (Swati nakshtra looks like a pearl)। इसे शुभ नक्षत्रों में गिना जाता है। इस नक्षत्र के विषय में मान्यता है कि, इस नक्षत्र के दौरान जब वर्षा की बूंदें मोती के मुख में पड़ती है तब सच्चा मोती बनता है, बांस में इसकी बूंदे पड़े तो बंसलोचन और केले में पड़े में कर्पूर बन जाता है। यानी देखा जाय तो यह नक्षत्र गुणों को बढ़ाने वाला व्यक्तित्व में निखार लाने वाला होता है। इस नक्षत्र के विषय में यह भी कहा जाता है कि जो व्यक्ति इस नक्षत्र में पैदा लेते हैं वे मोती के समान उज्जवल होते हैं ( Native of swati nakshatra are shining like a pearl)।
                                                                                 
स्वाति नक्षत्र राहु का दूसरा नक्षत्र है (Swati is the second nakshatra of Rahu)। यह नक्षत्रमंडल में उपस्थित 27 नक्षत्रों में 15 वां है (Swati nakshtra is fifteenth Nakshatra of constellation) । इसकी राशि तुला होती है। इन सभी के प्रभाव के कारण इस नक्षत्र में जन्म लेने वाले व्यक्ति में सात्विक और तामसी गुणों का समावेश होता है (Native of swati nakshatra are combination of passion and Morality)। ये अध्यात्म में गहरी आस्था रखते हैं। आपका जन्म स्वाति नक्षत्र में हुआ है तो आप परिश्रमी होंगे और अपने परिश्रम के बल पर सफलता हासिल करने का ज़ज्बा रखते होंगे।

आप राहु के प्रभाव के कारण कुटनीतिज्ञ बुद्धि के होते है, राजनीति में आपकी बुद्धि खूब चलती हैं, राजनीतिक दांव पेंच और चालों को आप अच्छी तरह समझते हैं यही कारण है कि आप सदैव सतर्क और चौकन्ने रहते हैं। आप राजनीति में प्रत्यक्ष रूप से हों अथवा नहीं परंतु अपका व्यवहार आपको राजनैतिक व्यक्तित्व प्रदान करता है। आप अपना काम निकालना खूब जानते हैं। आप परिश्रम के साथ चतुराई का भी इस्तेमाल बखूबी करना जानते हैं। आप इस नक्षत्र के जातक हैं और सक्रिय राजनीति में हैं तो इस बात की संभावना प्रबल है कि आप सत्ता सुख प्राप्त करेंगे (If native of Swati nakshatra play an active role in politics, they get great position and success there) ।

सामाजिक तौर पर देखा जाए तो लोगों के साथ आपके बहुत ही अच्छे सम्बन्ध होते हैं क्योंकि आपका स्वभाव अच्छा होता है। आपके स्वभाव की अच्छाई एवं रिश्तों में ईमानदारी के कारण लोग आपके प्रति विश्वास रखते हैं। आपके हृदय में दूसरों के प्रति सहानुभूति और दया की भावना रहती है। लोगों के प्रति अच्छी भावना होने के कारण आपको जनता का सहयोग प्राप्त होता है और आपकी छवि उज्जवल रहती है।

आप स्वतंत्र विचारधारा के व्यक्ति होते हैं अत: आप दबाव में रहकर काम करने में विश्वास नहीं रखते हैं। आप जो भी कार्य करना चाहते है उसमें पूर्ण स्वतंत्रता चाहते हैं। नौकरी, व्यवसाय एवं आजीविका की दृष्टि से इनकी स्थिति काफी अच्छी रहती है। आप चाहे नौकरी करें अथवा व्यवसाय दोनों ही में कामयाबी हासिल करते हैं। आप काफी महत्वाकांक्षी होते हैं और सदैव ऊँचाईयों पर पहुंचने की आकांक्षा रखते हैं।                

आर्थिक मामलों में भी स्वाति नक्षत्र के जातक भाग्यशाली होते हैं, अपनी बुद्धि और चतुराई से काफी मात्रा में धन सम्पत्ति प्राप्त करते हैं (Native of Swati Nakshatra are lucky, they earn lots of money from their gumption and cunningness)। स्वाति नक्षत्र में पैदा होने वाले व्यक्ति पारिवारिक दायित्व को निभाना बहुत अच्छी तरह से जानते हैं। अपने परिवार के प्रति काफी लगाव व प्रेम रखते हैं। आप सुख सुविधाओं से परिपूर्ण जीवन का आनन्द लेते हें। आपके व्यक्तित्व की एक बड़ी विशेषता यह होती है कि आप अपने प्रतिद्वंद्वी को सदा पराजित करते हैं और विजयी होते हैं।

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शुक्रवार, 2 सितम्बर 2011

मुक्तिका : मेहरबानी हो रही है... संजीव 'सलिल'

मुक्तिका :

मेहरबानी हो रही है...
संजीव 'सलिल'
*
मेहरबानी हो रही है मेहरबान की.
हम मर गए तो फ़िक्र हुई उन्हें जान की..

अफवाह जो उडी उसी को मानते हैं सच.
खुद लेते नहीं खबर कभी अपने कान की..

चाहते हैं घर में रहे प्यार-मुहब्बत.
नफरत बना रहे हैं नींव निज मकान की..

खेती करोगे तो न घर में सो सकोगे तुम.
कुछ फ़िक्र करो अब मियाँ अपने मचान की..

मंदिर, मठों, मस्जिद में कहाँ पाओगे उसे?
उसको न रास आती है सोहबत दुकान की..

बादल जो गरजते हैं बरसते नहीं सलिल.
ज्यों शायरी जबां है किसी बेजुबान की..

******************

दोहा सलिला: यमक का रंग दोहा के संग- ..... नहीं द्वार का काम -- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
यमक का रंग दोहा के संग-
.....नहीं द्वार का काम
संजीव 'सलिल'
*
मन मथुरा तन द्वारका, नहीं द्वार का काम.
प्राणों पर छा गये है, मेरे प्रिय घनश्याम..
*
बजे राज-वंशी कहे, जन-वंशी हैं कौन?
मिटे राजवंशी- अमिट, जनवंशी हैं मौन..
*
'सज ना' सजना ने कहा, कहे: 'सजाना' प्रीत.
दे सकता वह सजा ना, यही प्रीत की रीत..
*
'साजन! साज न लाये हो, कैसे दोगे संग?'
'संग-दिल है संगदिल नहीं, खूब जमेगा रंग'..
*
रास खिंची घोड़ी उमग, लगी दिखने रास.
दर्शक ताली पीटते, खेल आ रहा रास..
*
'किसना! किस ना लौकियाँ, सकूँ दही में डाल.
 जीरा हींग बघार से, आता स्वाद कमाल'..
*
भोला भोला ही 'सलिल', करते बम-बम नाद.
फोड़ रहे जो बम उन्हें, कर भी दें बर्बाद..
*
अर्ज़ किया 'आदाब' पर, वे समझे आ दाब.
वे लपके मैं भागकर, बचता फिर जनाब..
*
शब्द निशब्द अशब्द हो, हो जाते जब मौन.
मन से मन तक 'सबद' तब, कह जाता है कौन??
*
*
 

बृहस्पतिवार, 1 सितम्बर 2011

मुक्तिका: ये शायरी जबां है .... --- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
ये शायरी जबां है ....
संजीव 'सलिल'
*
ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की.
ज्यों महकती क्यारी हो किसी बागबान की..

आकाश की औकात क्या जो नाप ले कभी.
पाई खुशी परिंदे ने पहली उड़ान की..

हमको न देखा देखकर तुमने तो क्या हुआ?
दिल ले गया निशानी प्यार के निशान की..

जौहर किया या भेज दी राखी अतीत ने.
हर बार रही बात सिर्फ आन-बान की.

उससे छिपा न कुछ भी रहा कह रहे सभी.
किसने कभी करतूत कहो खुद बयान की..

रहमो-करम का आपके सौ बार शुक्रिया.
पीछे पड़े हैं आप, करूँ फ़िक्र जान की..

हम जानते हैं और कोई कुछ न जानता.
यह बात है केवल 'सलिल' वहमो-गुमान की..

शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

लघुकथा: सफलता संजीव 'सलिल'

लघुकथा:                                                                                             
सफलता 
संजीव 'सलिल'
*
गुरु छात्रों को नीति शिक्षा दे रहे थे- 

- ' एकता में ताकत होती है. सबको एक साथ हिल-मिलकर रहना चाहिए- तभी सफलता मिलती है.' 

= ' नहीं गुरु जी! यह तो बीती बात है, अब ऐसा नहीं होता. इतिहास बताता है कि सत्ता के लिए आपस में लड़ने वाले जितने अधिक नेता जिस दल में होते हैं' उसके सत्ता पाने के अवसर उतने ज्यादा होते हैं. समाजवादियों के लिये सत्ता अपने सुख या स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं जनसेवा का माध्यम थी. वे एक साथ मिलकर चले, धीरे-धीरे नष्ट हो गये. क्रांतिकारी भी एक साथ सुख-दुःख सहने की कसमें खाते थे. अंतत: वे भी समाप्त हो गये. जिन मौकापरस्तों ने एकता की फ़िक्र छोड़कर अपने हित को सर्वोपरि रखा, वे आज़ादी के बाद से आज तक येन-केन-प्रकारेण कुर्सी पर काबिज हैं.' -होनहार छात्र बोला. 

- गुरु जी चुप!

*****

रविवार, 24 मई 2009

लघुकथा: आचार्य संजीव 'सलिल'

Friday, May 22, 2009

गुरु दक्षिणा




रचनाकार परिचय:-



आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा, बी. ई., एम.आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नाम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० संस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २० वीं शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, वागविदान्वर सम्मान आदि। म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक रह चुके सलिल जी वर्तमान में लोक निर्माण विभाग मध्य प्रदेश की परिक्षेत्रीय अनुसन्धान प्रयोगशाला में सहायक शोध अधिकारी के रूप में कार्यरत हैं।


">लघुकथा : गुरु दक्षिणा

एकलव्य का अद्वितीय धनुर्विद्या अभ्यास देखकर गुरुवार द्रोणाचार्य चकराए कि अर्जुन को पीछे छोड़कर यह श्रेष्ठ न हो जाए। उन्होंने गुरु दक्षिणा के बहाने एकलव्य का बाएँ हाथ का अंगूठा मांग लिया और यह सोचकर प्रसन्न हो गए कि काम बन गया। प्रगट में आशीष देते हुए बोले- 'धन्य हो वत्स! तुम्हारा यश युगों-युगों तक इस पृथ्वी पर अमर रहेगा।'



'आपकी कृपा है गुरुवर!' एकलव्य ने बाएँ हाथ का अंगूठा गुरु दक्षिणा में देकर विकलांग होने का प्रमाणपत्र बनवाया और छात्रवृत्ति का जुगाड़ कर लिया। छात्रवृत्ति के रुपयों से प्लास्टिक सर्जरी कराकर अंगूठा जुड़वाया और द्रोणाचार्य एवं अर्जुन को ठेंगा बताते हुए 'अंगूठा' चुनाव चिन्ह लेकर चुनाव समर में कूद पड़ा।



तब
से उसके वंशज आदिवासी द्रोणाचार्य से शिक्षा न लेकर अंगूठा लगाने लगे।


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रविवार, 17 मई 2009

काव्य किरण: भोजपुरी दोहे, -सलिल

: भोजपुरी दोहे :

आचार्य संजीव 'सलिल'

कइसन होखो कहानी, नहीं साँच को आँच.
कंकर संकर सम पूजहिं, ठोकर खाइल कांच..


कतने घाटल के पियल, पानी- बुझल न प्यास.
नेह नरमदा घाट चल, रहल न बाकी आस..


गुन अवगुन कम- अधिक बा, ऊँच न कोइ नीच.
मिहनत श्रम शतदल कमल, मोह-वासना कीच..
नेह-प्रेम पैदा कइल, सहज-सरल बेवहार.
साँझा सुख-दुःख बँट गइल, हर दिन बा तिवहार..

खूबी-खामी से बनल, जिनगी के पिहचान.
धूप-छाँव सम छनिक बा, मान अउर अपमान..


सहरन में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास..


फुनवा के आगे पड़ल, चीठी के रंग फीक.
सायर सिंह सपूत तो, चलल तोड़ हर लीक..


बेर-बेर छटनी क द स, हरदम लूट-खसोट.
दुर्गत भयल मजूर के, लगल चोट पर चोट..


दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरल उडान..


*******************

बृहस्पतिवार, 16 अप्रैल 2009

एक शे'र : दोस्त -आचार्य संजीव 'सलिल'

ऐ 'सलिल' तू दिल को अब मजबूत कर ले।

आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए॥

बुधवार, 15 अप्रैल 2009

नर्मदाष्टक ॥मणिप्रवाल मूल व हिंदी काव्यानुवाद॥, आचार्य संजीव 'सलिल'

नर्मदाष्टक ॥मणिप्रवाल मूलपाठ॥ .............................................॥नर्मदाष्टक ॥मणिप्रवाल हिंदी काव्यानुवाद॥
.....................................................................................................................................संजीव वर्मा "सलिल"
देवासुरा सुपावनी नमामि सिद्धिदायिनी, .......................................सुर असुरों को पावन करतीं सिद्धिदायिनी,
त्रिपूरदैत्यभेदिनी विशाल तीर्थमेदिनी । ........................................त्रिपुर दैत्य को भेद विहँसतीं तीर्थमेदिनी।
शिवासनी शिवाकला किलोललोल चापला, ................................शिवासनी शिवकला किलोलित चपल चंचला,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।१।। ...............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥१॥

विशाल पद्मलोचनी समस्त दोषमोचनी, ...................................नवल कमल से नयन, पाप हर हर लेतीं तुम,
गजेंद्रचालगामिनी विदीप्त तेजदामिनी ।। ..............................गज सी चाल, दीप्ति विद्युत सी, हरती भय तम।
कृपाकरी सुखाकरी अपार पारसुंदरी, .........................................रूप अनूप, अनिन्द्य, सुखद, नित कृपा करें माँ‍
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।२।। ..............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥२॥

तपोनिधी तपस्विनी स्वयोगयुक्तमाचरी, .......................................सतत साधनारत तपस्विनी तपोनिधी तुम,
तपःकला तपोबला तपस्विनी शुभामला । ..........................योगलीन तपकला शक्तियुत शुभ हर विधि तुम।
सुरासनी सुखासनी कुताप पापमोचनी, ..............................................पाप ताप हर, सुख देते तट, बसें सर्वदा,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।३।। ..............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥३॥

कलौमलापहारिणी नमामि ब्रम्हचारिणी, .....................................ब्रम्हचारिणी! कलियुग का मल ताप मिटातीं,
सुरेंद्र शेषजीवनी अनादि सिद्धिधकरिणी । ..................................सिद्धिधारिणी! जग की सुख संपदा बढ़ातीं ।
सुहासिनी असंगिनी जरायुमृत्युभंजिनी, ......................................मनहर हँसी काल का भय हर, आयु दे बढ़ा,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।४।। .............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥४॥

मुनींद्र ‍वृंद सेवितं स्वरूपवन्हि सन्निभं, ....................................अग्निरूप हे! सेवा करते ऋषि, मुनि, सज्जन,
न तेज दाहकारकं समस्त तापहारकं । .......................................तेज जलाता नहीं, ताप हर लेता मज्जन ।
अनंत ‍पुण्य पावनी, सदैव शंभु भावनी, ....................................शिव को अतिशय प्रिय हो पुण्यदायिनी मैया,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।५।। .............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥५॥

षडंगयोग खेचरी विभूति चंद्रशेखरी, .........................................षडंग योग, खेचर विभूति, शशि शेखर शोभित,
निजात्म बोध रूपिणी, फणीन्द्रहारभूषिणी । .............................आत्मबोध, नागेंद्रमाल युत मातु विभूषित ।
जटाकिरीटमंडनी समस्त पाप खंडनी, .......................................जटामुकुट मण्डित देतीं तुम पाप सब मिटा,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।६।। ..............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥६॥

भवाब्धि कर्णधारके!, भजामि मातु तारिके! ......................................कर्णधार! दो तार, भजें हम माता तुमको,
सुखड्गभेदछेदके! दिगंतरालभेदके! ...........................................दिग्दिगंत को भेद, अमित सुख दे दो हमको ।
कनिष्टबुद्धिछेदिनी विशाल बुद्धिवर्धिनी, .......................................बुद्धि संकुचित मिटा, विशाल बुद्धि दे दो माँ!,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।७।। .............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥७॥

समष्टि अण्ड खण्डनी पताल सप्त भैदिनी, ......................................भेदे हैं पाताल सात सब अण्ड खण्ड कर,
चतुर्दिशा सुवासिनी, पवित्र पुण्यदायिनी । ........................................पुण्यदायिनी! चतुर्दिशा में ही सुगंधकर ।
धरा मरा स्वधारिणी समस्त लोकतारिणी, ...........................................सर्वलोक दो तार करो धारण वसुंधरा,
तरंग रंग सर्वदा नमामि देवि नर्मदा ।।८।। ..............................भक्तिभाव में लीन सर्वदा, नमन नर्मदा ॥८॥

॥साभारःनर्मदा कल्पवल्ली, ॐकारानंद गिरि॥ संपर्कः दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.काम, ९४२५१८३२४४
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शे'र आचार्य संजीव 'सलिल'

शे'र

आचार्य संजीव 'सलिल'

दोस्त जब मेहरबां हुए हम पर।

दुश्मनों की न फिर ज़ुरूरत थी.


नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर