हिन्दी हो जग-वाणी यदि, हम मिलकर करें प्रयास
 एक साथ मिल कलम चलायें, मन में लिये हुलास
सत-शिव-सुंदर शब्द-शब्द हो, सत-चित-आनंद अक्षर-
ऊर्जस्वित मन-प्राण कर, 'सलिल' जग में करें उजास
*
: जय हिंद : जय भारत : जय भारती : वंदे मातरम :

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Diwali Dohe: Sanjiv 'Salil', Voice sangya tandon

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सोमवार, 21 जनवरी 2013

गजल: मनोहर चौबे 'आकाश'

गजल:
मनोहर चौबे 'आकाश'
*
कैसे उनको  अपना मानें, हैं जिनके विश्वास अलग।
आँखें आँसू अलग-अलग हैं, पीडायें संत्रास अलग।।

उनके आँगन बारिश लेकिन, हैं अपने आँगन सूखे।
अलग-अलग हैं सावन-बादल, हैं उनके मधुमास अलग।।

भोगी है हमने भी मुश्किल, भूख गरीबी बरबादी ।
लेकिन किये जा रहे हमसे, उनके प्रगति विकास अलग।।

हो चाहे अपराध एक ही, अलग सजा हमको उनको
हैं क्या थाना पुलिस अदालत, होते कारावास अलग।।

हम बलिपशु का भाग्य लिए हैं, वे खांडा जल्लादों का।
होते उनके त्योहारों के, सारे ही अंदाज़ अलग।।  

है हमको चुल्लू भर पानी, पर उनका पूरा सागर।
आखिर कौन बता सकता है, क्यों है उनकी प्यास अलग?

हमको रोते उनको भोजन, हम जीते हैं वे रहते।
उन्हें मिले वरदान समय के, हमें मिले अभिशाप अलग।।

कैसे बतलाएं हम कितना, है पीड़ादायक अनुभव।
होते उन जैसे लोगों के, क्यों धरती ''आकाश'' अलग।।

***

बुधवार, 19 दिसम्बर 2012

गजल ये रात लगती लुटी लुटी सी मैत्रेयी अनुरूपा


गजल 

ये रात लगती लुटी लुटी सी 
मैत्रेयी अनुरूपा
*
ये चांदनी के उदास गेसू
ये रोशनी कुछ बुझी बुझी सी
ये
लड़खड़ाती खमोशियां हैं
ये रात लगती लुटी लुटी सी
 
जो
बाद मुद्दत के तेरे लब पे
है आई मंजूरियत मगर क्यों
मुझे है लगता कही है तुमने
बस इक इबारत रटी रटी सी
 
वो
इत्र भीगे रुमाल से भी
हसीन मुझको लगी है नेमत
जो तुमने लब से छुआ के फ़ैकी
वो एक धज्जी कटी फ़टी सी
 
ये
पेच नजरों मे बस गये हैं
उसी का शायद असर है ऐसा
जो सामने है मुजस्समे सी
वो शै भी लगती बँटी बँटी सी
______________________
maitreyee anuroopa <maitreyi_anuroopa@yahoo.com>
_____________._,_.___

सोमवार, 19 नवम्बर 2012

गजल: - कुँअर बेचैन

गजल:



- कुँअर बेचैन
बहर:
बह्रे मुजारे मुसम्मन् अखरब मक्फूफ महजूफ 

मफ्ऊलु
फायलातु
मफाईलु
फायलुन्
221
2121
1221
212

चोटों पे चोट देते ही जाने का शुक्रिया
पत्थर को बुत की शक्ल में लाने का शुक्रिया

जागा रहा तो मैंने नए काम कर लिए
ऐ नींद आज तेरे न आने का शुक्रिया

सूखा पुराना जख्म नए को जगह मिली
स्वागत नए का और पुराने का शुक्रिया


आती न तुम तो क्यों मैं बनाता ये सीढ़ियाँ
दीवारों, मेरी राह में आने का शुक्रिया


आँसू-सा माँ की गोद में आकर सिमट गया
नजरों से अपनी मुझको गिराने का शुक्रिया


अब यह हुआ कि दुनिया ही लगती है मुझको घर
यूँ मेरे घर में आग लगाने का शुक्रिया
 

गम मिलते हैं तो और निखरती है शायरी
यह बात है तो सारे जमाने का शुक्रिया


अब मुझको आ गए हैं मनाने के सब हुनर
यूँ मुझसे `कुँअर' रूठ के जाने का शुक्रिया


*******
इस बहर में ये अश’आर निम्नवत रूप से फिट होंगे। इसमें बहुत सी जगहों पर मात्राएँ गिराकर पढ़ना पड़ेगा।

चोटों पे \ चोट देते \ ही जाने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

पत्थर को \ बुत की शक्ल \ में लाने का \ शुक्रिया

२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

जागा र \ हा तो मैंने \ नए काम \ कर लिए
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
ऐ नींद \ आज तेरे \ न आने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

सूखा पु \ राना जख्म \ नए को ज \ गह मिली
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
स्वागत \ नए का और \ पुराने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

आती न \ तुम तो क्यों मैं \ बनाता ये \ सीढ़ियाँ
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
दीवारों, \ मेरी राह \ में आने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

आँसू-सा \ माँ की गोद में \ आकर सि \ मट गया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
नजरों से \ अपनी मुझको \ गिराने का \ शुक्रिया२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

अब यह हु \ आ कि दुनिया \ ही लगती है \ मुझको घर
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
यूँ मेरे \ घर में आग \ लगाने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
गम मिलते \ हैं तो और \ निखरती है \ शायरी
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
यह बात \ है तो सारे \ जमाने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
अब मुझको \ आ गए हैं \ मनाने के \ सब हुनर
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२
यूँ मुझसे \ `कुँअर' रूठ \ के जाने का \ शुक्रिया
२२१ \ २१२१ \ १२२१ \ २१२

एक जगह बहर गड़बड़ हो रही है। ‘कुँअर’ पर, इसको २१ बाँधा गया है जबकि १२ बाँधना चाहिए था।

मात्रा गिराने के नियम देखने हेतु निम्नवत लिंक देख सकते हैं-
http://openbooksonline.com/group/gazal_ki_bateyn/forum/topics/5170231:Topic:288813

अश’आर लिखने के पहले बहर निश्चित की जा सकती है जैसा कि तरही मुशायरों में होता है और लिखने के बाद शब्दों का हेर फेर करके उसको बहर में लाया भी जा सकता है। इन दोनों ही तरीकों का मिलाजुला प्रयोग किया जाता है।
______________________________________

रविवार, 15 जुलाई 2012

गजल: बारिश --मदन मोहन शर्मा







*
या तो अवधूतों की बारिश
या फिर मजबूतों की बारिश.

जिंदा लाशों की बस्ती में 
अब जैसे भूतों की  बारिश.
चंद सवालों की रिमझिम सी 
फिर  चप्पल-जूतों की बारिश.

उजले मुंह काले कर देगी 
काली करतूतों की बारिश.

सबके द्वार कहाँ होती है 
अपने बल-बूतों की बारिश.
*
Madan Mohan Sharma  madanmohanarvind@gmail.com

सोमवार, 5 अप्रैल 2010

खबरदार कविता: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है --सलिल

खबरदार कविता:
खबर: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है.
दोहा गजल:
संजीव 'सलिल'
कदम-कदम घुस रहा है, कर सरहद को पार.
हर हद को छिप-तोड़कर, करे पीठ पर वार..
*
करे प्यार से घात वह, हमें घात से प्यार.
बजा रहे हैं गाल हम, वह साधे हथियार..
*
बेहयाई से हम कहें, अब रुक भी जा यार.
घुस-घुस घर में मरता, वह हमको हर बार..
*
संसद में मतभेद क्यों?, हों यदि एक विचार.
कड़े कदम ले सके तब, भारत की सरकार.
*
असरकार सरकार क्यों?, हुई न अब तक यार.
करता है कमजोर जो, 'सलिल' वही गद्दार..
*
अफसरशाही राह का, रोड़ा- क्यों दरकार?
क्यों सेना में सियासत, रोके है हथियार..
*
दें जवाब हम ईंट का, पत्थर से हर बार.
तभी देश बच पायेगा, चेते अब सरकार..
*
मानवता के नाम पर, रंग जाते अखबार.
आतंकी मजबूत हों, थाम जाते हथियार..
*

सोमवार, 17 अगस्त 2009

भोजपुरी गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'

भोजपुरी गीतिका :

आचार्य संजीव 'सलिल'

पल मा तोला, पल मा मासा इहो साँच बा.

कोस-कोस प' बदल भासा इहो साँच बा..

राजा-परजा दूनो क हो गइल मुसीबत.

राजनीति कटहर के लासा इहो साँच बा..

जनगण के सेवा में लागल, बिरल काम बा.

अपना ला दस-बीस-पचासा, इहो साँच बा..

धँसल स्वार्थ मा साँसों के गाडी के पहिया.

सटते बनी गइल फुल्हों कांसा, इहो साँच बा..

सोन्ह गंध माटी के, महतारी के गोदी.

मुर्दों में दउरा दे सांसा, इहो साँच बा..

सून सपाट भयल पनघट, पौरा-चौबारा.

पौ बारा है नगर-सहर के, इहो साँच बा..

हे भासा-बोली के एकइ राम-कहानी.

जड़ जमीन मां जमा हरी है इहो साँच बा..

कुरसी के जय-जय ना कइल 'सलिल' एही से

असफलता के मिलल उंचासा, इहो साँच बा..

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बुधवार, 22 जुलाई 2009

तेवरी, मुक्तिका, गीतिका या गजल

गीतिका

आचार्य संजीव 'सलिल'

आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा.
गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा.

दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों?
जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा.

ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम.
मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा.

चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की.
शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा

'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा.
किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा..

बृहस्पतिवार, 9 जुलाई 2009

गजल मनु बेतखल्लुस

क्या अपने हाथ से निकली नज़र नहीं आती ?
ये नस्ल, कुछ तुझे बदली नज़र नहीं आती ?

किसी भी फूल पे तितली नज़र नहीं आती
हवा चमन की क्या बदली नज़र नहीं आती ?

ख्याल जलते हैं सेहरा की तपती रेतों पर
वो तेरी ज़ुल्फ़ की बदली नज़र नहीं आती

हज़ारों ख्वाब लिपटते हैं निगाहों से मगर
ये तबियत है कि बहली नज़र नहीं आती

न रात, रात के जैसी सियाह दिखती है
सहर भी, सहर सी उजली नज़र नहीं आती

हमारी हार सियासत की मेहरबानी सही
ये तेरी जीत भी, असली नज़र नहीं आती

कहाँ गए वो, निशाने को नाज़ था जिनपे
कि अब तो आँख क्या, मछली नज़र नहीं आती

न जाने गुजरी हो क्या, उस जवां भिखारिन पर
कई दिनों से वो पगली, नज़र नहीं आती


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शनिवार, 13 जून 2009

श्री प्राण शर्मा को जन्म दिन की बधाई

प्राण बिन निष्प्राण सी लगती गजल.

प्राण पा सम्प्राण हो सजती गजल.


बहर में कह रहे बातें अनकही-

अलंकारों से सजी रुचती गजल.


गुजारिश है दिन-ब-दिन रहिये जवां

और कहिये रोज ही महती गजल.


जन्मदिन की शत बधाई लीजिये.

दीजिये बिन कुछ कहे कहती गजल.


'सलिल' शैदा आपके फन पर हुआ-

नर्मदा की लहर सी बहती गजल.



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शनिवार, 6 जून 2009

गजल : कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर

गजल :
कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर

सबका अपना नसीब होता है।
कौन किसका हबीब होता है?

आपको गुल नसीब होते हैं
पर हमें तो सलीब होता है।

कैसे इंसानों की ये बस्ती है,
दोस्त ही यां रकीब होता है।

जो मिटा देता मर्तबा अपना
वो ही उसके करीब होता है।

जिसका मशरफ है माँगते रहना
इंसां वो ही गरीब होता है।

सब ही दौलत कमाने आये हैं।
अब न कोई तबीब होता है.

सीख ले अपने पैरों पे चलना
कौन किसका जरीब होता है।

प्यार जिसने कभी नहीं जाना।
इंसां वो बदनसीब होता है.

गीतों-गज़लों से जिसको प्यार नहीं
वो न सच्चा अदीब होता है.
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009

ग़ज़ल

- 'सलिल जी'

चल पड़े अपने कदम तो,मंजिलें भी पायेंगे.
कंठ-स्वर हो साज़ कोई, गीत अपने गायेंगे.
मुश्किलों से दोस्ती है, संकटों से प्यार है.
'सलिल' बनकर नर्मदा हम, सत्य-शिव दुहारायेंगे.
स्नेह की हर लहर हर-हर, कर निनादित हो रही.
चल तनिक अवगाह लें, फिर सूर्य बनकर छायेंगे.
दोस्तों की दुश्मनी की 'सलिल' क्यों चिंता करें.
दुश्मनों की दोस्ती पाकर मरे- जी जायेंगे.
चुनें किसको, तजें किसको, सब निकम्मे एक से.
मिली सत्ता तो ज़मीं से, दूर हो गर्रायेंगे.
दिल मिले न मिलें लेकिन हाथ तो मिलते रहें.
क्या पता कब ह्रदय भी हों एक, फिर मुस्कायेंगे.
स्नेह-सलिला में नहाना, 'सलिल' का मजहब धरम.
सफल हो श्रम साधना, हम गगन पर लहरायेंगे.

बुधवार, 1 अप्रैल 2009

गीतिका कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर

बात कहने की हो तभी कहिये.
वर्ना बेहतर यही कि चुप रहिये.

प्यार से जिन्दगी संवरती है.
व्यर्थ विद्वेष में नहीं दहिये.

माना अब तो नहीं जरा फुर्सत.
गाहे-बगाहे पे मिलते रहिये.

हम तो हर रोज धूप सहते हैं.
आप भी धूप याँ कभी सहिये.

गीत गायें बड़ों के हर्ज़ नहीं.
बांह गिरतों की भी कभी गहिये.

सब जगह दुप धुल शोर भरा.
रहने जाऊं कहाँ ये अब कहिये.

फूल को खिलने के लिए ऐ दोस्त!
धूप ज्यादा नहीं पे कुछ चाहिए.

जिंदगी जीने का सही यह ढंग.
उससे मत लड़िये, उसमें ही बहिये.

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बृहस्पतिवार, 26 मार्च 2009

कुण्डली : हार न मानो --संजीव 'सलिल'

प्यारी बिटिया! यही है दुनिया का दस्तूर।
हर दीपक के तले है, अँधियारा भरपूर।
अँधियारा भरपूर मगर उजियारे की जय।
बाद अमावस के फिर सूरज ऊगे निर्भय।
हार न मानो, लडो, कहे चाचा की चिठिया।
जय पा अत्याचार मिटाओ, प्यारी बिटिया।

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लोकतंत्र में लोक ही, होता जिम्मेवार।
वही बनाता देश की भली-बुरी सरकार।
छोटे-छोटे स्वार्थ हित, जब तोडे कानून।
तभी समझ लो कर रहा, आजादी का खून।
भारत माँ को पूजकर, हुआ न पूरा फ़र्ज़।
प्रकृति माँ को स्वच्छ रख, तब उतरे कुछ क़र्ज़।

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ग़ज़ल

तू न होकर भी यहीं है मुझको सच समझा गई ।
ओ मेरी माँ! बनके बेटी, फिर से जीने आ गई ।।

रात भर तम् से लड़ा, जब टूटने को दम हुई।
दिए के बुझने से पहले, धूप आकर छा गई ।।

नींव के पत्थर का जब, उपहास कलशों ने किया।
ज़मीं काँपी असलियत सबको समझ में आ गई ।।

सिंह-कुल-कुलवंत कवि कविता करे तो जग कहे।
दिल पे बीती आ जुबां पर ज़माने पर छा गई

बनाती कंकर को शंकर नित निनादित नर्मदा।
ज्यों की त्यों धर दे चदरिया 'सलिल' को सिखला गई ।।

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दोहे

जो सबको हितकर वही, होता है साहित्य।
कालजयी होता अमर, जैसे हो आदित्य.

सबको हितकर सीख दे, कविता पाठक धन्य।
बडभागी हैं कलम-कवि, कविता सत्य अनन्य।

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