दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
स्तम्भ / लेबल
शनिवार, 5 सितम्बर 2009
गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'
संजीव 'सलिल'
हम मन ही मन प्रश्न वनों में दहते हैं.
व्यथा-कथाएँ नहीं किसी से कहते हैं.
दिखें जर्जरित पर झंझा-तूफानों में.
बल दें जीवन-मूल्य न हिलते-ढहते हैं.
जो मिलता वह पहने यहाँ मुखौटा है.
सच जानें, अनजान बने हम सहते हैं.
मन पर पत्थर रख चुप हमने ज़हर पिए.
ममता पाकर 'सलिल'-धार बन बहते हैं.
दिल को जिसने बना लिया घर बिन पूछे
'सलिल' उसी के दिल में घर कर रहते हैं.
***************************
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
| आपका मत your openion |
बृहस्पतिवार, 3 सितम्बर 2009
गीतिका: संजीव 'सलिल'
श्वास-श्वास आनंद बना तू॥
सूर्य प्रखर बन जल जाएगा,
पगले! शीतल चंद बना तू॥
कृष्ण बाद में पैदा होंगे,
पहले जसुदा-नन्द बना तू॥
खुलना अपनों में, गैरों में
ख़ुद को दुर्गम बंद बना तू॥
'सलिल' ठग रहे हैं अपने ही,
मन को मूरख मंद बना तू॥
********************
| आपका मत your openion |
रविवार, 30 अगस्त 2009
गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
*
आदमी ही भला मेरा गर करेंगे.
बदी करने से तारे भी डरेंगे.
बिना मतलब मदद कर दे किसी की
दुआ के फूल तुझ पर तब झरेंगे.
कलम थामे, न जो कहते हकीकत
समय से पहले ही बेबस मरेंगे.
नरमदा नेह की जो नहाते हैं
बिना तारे किसी के खुद तरेंगे.
न रुकते जो 'सलिल' सम सतत बहते
सुनिश्चित मानिये वे जय वरेंगे.
*********************************
| आपका मत your openion |
सोमवार, 17 अगस्त 2009
भोजपुरी गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'
आचार्य संजीव 'सलिल'
पल मा तोला, पल मा मासा इहो साँच बा.
कोस-कोस प' बदल भासा इहो साँच बा..
राजा-परजा दूनो क हो गइल मुसीबत.
राजनीति कटहर के लासा इहो साँच बा..
जनगण के सेवा में लागल, बिरल काम बा.
अपना ला दस-बीस-पचासा, इहो साँच बा..
धँसल स्वार्थ मा साँसों के गाडी के पहिया.
सटते बनी गइल फुल्हों कांसा, इहो साँच बा..
सोन्ह गंध माटी के, महतारी के गोदी.
मुर्दों में दउरा दे सांसा, इहो साँच बा..
सून सपाट भयल पनघट, पौरा-चौबारा.
पौ बारा है नगर-सहर के, इहो साँच बा..
हे भासा-बोली के एकइ राम-कहानी.
जड़ जमीन मां जमा हरी है इहो साँच बा..
कुरसी के जय-जय ना कइल 'सलिल' एही से
असफलता के मिलल उंचासा, इहो साँच बा..
**************************
| आपका मत your openion |
बुधवार, 22 जुलाई 2009
तेवरी, मुक्तिका, गीतिका या गजल
आचार्य संजीव 'सलिल'
आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा.
गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा.
दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों?
जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा.
ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम.
मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा.
चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की.
शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा
'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा.
किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा..
| आपका मत your openion |
रविवार, 28 जून 2009
तीन गीतिकाएं : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
तुमने कब चाहा दिल दरके?
हुए दिवाने जब दिल-दर के।
जिन पर हमने किया भरोसा
वे निकले सौदाई जर के..
राज अक्ल का नहीं यहाँ पर
ताज हुए हैं आशिक सर के।
नाम न चाहें काम करें चुप
वे ही जिंदा रहते मर के।
परवाजों को कौन नापता?
मुन्सिफ हैं सौदाई पर के।
चाँद सी सूरत घूँघट बादल
तृप्ति मिले जब आँचल सरके।
'सलिल' दर्द सह लेता हँसकर
सहन न होते अँसुआ ढरके।
********************************
गीतिका-२
आदमी ही भला मेरा गर करेंगे।
बदी करने से तारे भी डरेंगे.
बिना मतलब मदद कर दे किसी की
दुआ के फूल तुझ पर तब झरेंगे.
कलम थामे, न जो कहते हकीक़त
समय से पहले ही बेबस मरेंगे।
नरमदा नेह की जो नहाते हैं
बिना तारे किसी के ख़ुद तरेंगे।
न रुकते जो 'सलिल' सम सतत बहते
सुनिश्चित मानिये वे जय वरेंगे।
*********************************
(अभिनव प्रयोग)
दोहा गीतिका
तुमको मालूम ही नहीं शोलों की तासीर।
तुम क्या जानो ख़्वाब की कैसे हो ताबीर?
बहरे मिलकर सुन रहे गूँगों की तकरीर
बिलख रही जम्हूरियत, सिसक रही है पीर।
दहशतगर्दों की हुई है जबसे तक्सीर
वतनपरस्ती हो गयी ख़तरनाक तक़्सीर
फेंक द्रौपदी ख़ुद रही फाड़-फाड़ निज चीर
भीष्म द्रोण कूर कृष्ण संग, घूरें पांडव वीर।
हिम्मत मत हारें- करें, सब मिलकर तदबीर
प्यार-मुहब्बत ही रहे मज़हब की तफ़सीर।
सपनों को साकार कर, धरकर मन में धीर।
हर बाधा-संकट बने, पानी की प्राचीर।
हिंद और हिंदी करे दुनिया को तन्वीर।
बेहतर से बेहतर बने इन्सां की तस्वीर।
हाय!सियासत रह गयी, सिर्फ़ स्वार्थ-तज़्वीर।
खिदमत भूली, कर रही बातों की तब्ज़ीर।
तरस रहा मन 'सलिल' दे वक़्त एक तब्शीर।
शब्दों के आगे झुके, जालिम की शमशीर।
***********************************
| आपका मत your openion |
शनिवार, 13 जून 2009
श्री प्राण शर्मा को जन्म दिन की बधाई
प्राण पा सम्प्राण हो सजती गजल.
बहर में कह रहे बातें अनकही-
अलंकारों से सजी रुचती गजल.
गुजारिश है दिन-ब-दिन रहिये जवां
और कहिये रोज ही महती गजल.
जन्मदिन की शत बधाई लीजिये.
दीजिये बिन कुछ कहे कहती गजल.
'सलिल' शैदा आपके फन पर हुआ-
नर्मदा की लहर सी बहती गजल.
*************************
| आपका मत your openion |
सोमवार, 20 अप्रैल 2009
गीतिका
| आपका मत your openion |
शनिवार, 18 अप्रैल 2009
ग़ज़ल
- 'सलिल जी'
चल पड़े अपने कदम तो,मंजिलें भी पायेंगे.
कंठ-स्वर हो साज़ कोई, गीत अपने गायेंगे.
मुश्किलों से दोस्ती है, संकटों से प्यार है.
'सलिल' बनकर नर्मदा हम, सत्य-शिव दुहारायेंगे.
स्नेह की हर लहर हर-हर, कर निनादित हो रही.
चल तनिक अवगाह लें, फिर सूर्य बनकर छायेंगे.
दोस्तों की दुश्मनी की 'सलिल' क्यों चिंता करें.
दुश्मनों की दोस्ती पाकर मरे- जी जायेंगे.
चुनें किसको, तजें किसको, सब निकम्मे एक से.
मिली सत्ता तो ज़मीं से, दूर हो गर्रायेंगे.
दिल मिले न मिलें लेकिन हाथ तो मिलते रहें.
क्या पता कब ह्रदय भी हों एक, फिर मुस्कायेंगे.
स्नेह-सलिला में नहाना, 'सलिल' का मजहब धरम.
सफल हो श्रम साधना, हम गगन पर लहरायेंगे.
| आपका मत your openion |
बुधवार, 1 अप्रैल 2009
गीतिका कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर
वर्ना बेहतर यही कि चुप रहिये.
प्यार से जिन्दगी संवरती है.
व्यर्थ विद्वेष में नहीं दहिये.

माना अब तो नहीं जरा फुर्सत.
गाहे-बगाहे पे मिलते रहिये.
हम तो हर रोज धूप सहते हैं.
आप भी धूप याँ कभी सहिये.
गीत गायें बड़ों के हर्ज़ नहीं.
बांह गिरतों की भी कभी गहिये.
सब जगह दुप धुल शोर भरा.
रहने जाऊं कहाँ ये अब कहिये.
फूल को खिलने के लिए ऐ दोस्त!
धूप ज्यादा नहीं पे कुछ चाहिए.
जिंदगी जीने का सही यह ढंग.
उससे मत लड़िये, उसमें ही बहिये.
*************************
| आपका मत your openion |
ग़ज़ल -- रसूल अहमद 'सागर'
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता.
मेरी ममता के महलों को किया खंडहर विद्वेषों ने.
यहाँ थी प्रेम की बस्ती कभी ऐसा नहीं लगता.
भुलाये हमने सब आदर्श सीता-राम-लक्ष्मण के
हमारा आचरण रघुवंश के घर का नहीं लगता.
मिलन के नाम पर त्यौहार और उत्सव नहीं होते.
सभी धर्मों के सम्मलेन का अब मेला नहीं लगता.
कि जिनकी एक-इक रग में भरा है ज़हर नफरत का.
उन्हीं लोगों को अमृत प्रेम का मीठा नहीं लगता.
दिया विश्वास ने धोखा भरोसा घात कर बैठा.
हमारा खून भी 'सागर' हमें अपना नहीं लगता.
छंद: सुघोष (कोकिल- मूल अश्त्पदीय)
सूत्र: तगन गन गन - चार आवृत्ति
बहर; हजज सालिम मुसम्मन सालिम
अरकान: मफाईलुन - चार बार
********************
| आपका मत your openion |
मंगलवार, 24 मार्च 2009
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव।
मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव।
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव।
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव।
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव।
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
*******
| आपका मत your openion |
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
तुम
आचार्य संजीव 'सलिल'
सारी रात जगाते हो तुम।
नज़र न फिर भी आते हो तुम.
थक कर आँखें बंद करुँ तो-
सपनों में मिल जाते हो तुम.
पहले मुझ से आँख चुराते,
फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?
रूठ मौन हो कभी छिप रहे,
कभी गीत नव गाते हो तुम
'सलिल' बांह में कभी लजाते,
कभी दूर हो जाते हो तुम.
नटवर नटनागर छलिया से,
नचते नाच नचाते हो तुम
****************************
| आपका मत your openion |
बृहस्पतिवार, 15 जनवरी 2009
तेवरी ही तेवरी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संपादक नर्मदा
mailto:salil.sanjiv@gmail.com
sanjivsalil.blogspot.com
sanjivsalil.blog.in.com
१.
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव.
मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव.
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव.
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव.
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव.
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
*******
२.
दिल ने हरदम चाहे फूल।
पर दिमाग ने बोए शूल.
मेहनतकश को कहें ग़लत
अफसर काम न करते भूल.
बहुत दोगली है दुनिया
नहीं सुहाते इसे उसूल.
तू मत नाहक पैर पटक
सिर पर बैठे उडकर धूल.
बना तीन के तेरह लें,
चाहा, डुबा दिया धन मूल.
मंझधारों में विमल 'सलिल'
गंदा करते तुम जा कूल.
धरती पर रख पैर जमा
'सलिल' न दिवा स्वप्न में झूल.
*******
३.
खर्चे अधिक, आय है कम
दिल रोता, आँखें हैं नम.
पाला शौक तमाखू का
बना मौत का फंदा यम्.
जो करता जग उजियारा
उसी दीप के नीचे तम.
सीमाओं की फ़िक्र नहीं
ठोंक रहे संसद में खम.
जब पाया तो खुश न हुए,
खोया तो करते क्यों गम?
टन-टन रुचे न मन्दिर की
कोठे की रुचती छम-छम।
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम।
******************
४.
मार हथौडा तोड़ो मूरत।
बदलेगी तब ही यह सूरत.
जिसे रहनुमा माना हमने
करी देश की उसने दुर्गत।
आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत।
तिया सती पर हम रसिया हों
मन में है क्यों कुत्सित चाहत?
खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेडा गारत.
क्षणजीवी सुख मोह रहा है
रुचे न शाश्वत दिव्य विरासत.
चलभाषों का चलन अनूठा
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त.
*******
५.
सागर ऊंचा पर्वत गहरा
अंधा न्याय, प्रशासन बहरा.
खुली छूट आतंकवाद को
संत-आश्रमों पर है पहरा.
पौरुष निस्संतान मर रहा
वंश बढाता रक्षित महरा.
भ्रष्ट सियासत देश बेचती
राष्ट्रभक्ति का झंडा लहरा.
शक्ति पूजते, जला शक्ति को
सूखी नदियाँ,रोता सहरा.
राजमार्ग ने वन-गिरि निगले
घन विनाश का नभ में घहरा.
चुल्लू भर सागर में तूफां
सागर का जल ठहरा-ठहरा.
जनसेवक ने जनसेवा का
'सलिल' नहीं क्यों पढ़ा ककहरा?
*******
| आपका मत your openion |
