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बुधवार, 22 जुलाई 2009

तेवरी, मुक्तिका, गीतिका या गजल

गीतिका

आचार्य संजीव 'सलिल'

आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा.
गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा.

दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों?
जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा.

ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम.
मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा.

चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की.
शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा

'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा.
किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा..

सोमवार, 4 मई 2009

गीत: पारस मिश्र, शहडोल

गीत

पारस मिश्र, शहडोल

रात बीती जा रही है,

चाँद ढलता जा रहा है।

देखता हूँ जिंदगी का

राज खुलता जा रहा है॥

कब छुड़ा पाये भ्रमर की

फूल पर कटु शूल गुंजन?

कब किसी की बात सुनता,

रूप पर रीझा हुआ मन?

कब शलभ ने दीप पर जल,

अनल की परवाह की है?

प्यार में किसने कहाँ कब

जिंदगी की चाह की है?

किंतु फिर भी जिंदगी में,

प्यार पलता जा रहा है।

देखता हूँ जिंदगी का

राज खुलता जा रहा है॥

प्यार के सब काम गुप‍चुप

ही किये जाते रहे हैं।

शाप खुलकर, दान छिपकर

ही दिये जाते रहे हैं॥

हलाहल कुहराम कर दे,

शोर मदिरा पर भले हो।

पर सुधा के जाम तो,

छिपकर पिये जाते रहे हैं॥

होंठ खुलते जा रहे हैं,

जाम ढलता जा रहा है।

देखता हूँ जिंदगी का

राज खुलता जा रहा है॥

सोचता हूँ मौत से पहले ,

तुम्हीं से प्यार कर लूँ।

पार जाने से प्रथम,

मझधार पर एतबार कर लूँ॥

जानता है दीप, यदि है

ज्योति शाश्वत, चिर जलन तो

माँग में सिंदूर के बदले

न क्यों अंगार भर लूँ?

नेह चढ़ता जा रहा है,

दीप जलता जा रहा है।

देखता हूँ जिंदगी का

राज खुलता जा रहा है॥

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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

शिव भजन -सतीश चन्द्र वर्मा, भोपाल

नमामि शंकर
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

बदन में भस्मी, गले में विषधर.
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

जटा से गंगा की धारा निकली.
विराजे मस्तक पे चाँद टिकली.
सदा विचरते बने दिगंबर,
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

तुम्हारे मंदिर में नित्य आऊँ.
तुम्हारी महिमा के गीत गाऊँ.
चढ़ाऊँ चंदन तुम्हें मैं घिसकर,
नमामि शंकर,नमामि शंकर...

तुम्हीं हमारे हो एक स्वामी.
कहाँ हो आओ, हे विश्वगामी!
हरो हमारी व्यथा को आकर,
नमामि शंकर,नमामि शंकर...
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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर