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सोमवार, 17 मई 2010

दोहा का रंग : छत्तीसगढ़ी के संग ---संजीव वर्मा 'सलिल'

दोहा का रंग : छत्तीसगढ़ी के संग

संजीव वर्मा 'सलिल'
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महतारी छत्तिसगढ़ी, बार-बार परनाम.
माथ नबावों तोरला, बनहीं बिगरे काम..
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बंधे रथे सुर-ताल से, छत्तिसगढ़िया गीत.
किसिम-किसिम पढ़तच बनत, गारी होरी मीत..
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कब परधाबौं अरघ दे, सुरज देंव ल गाँव.
अँधियारी मिल दूर कर, छा ले छप्पर छाँव..
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सुख-सुविधा के लोभ बर, कस्बा-कस्बा जात.
डउका-डउकी बाँट-खुट, दू-दू दाने खात..
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खुल्ली आँखी निहारत, हन पीरा-संताप.
भोगत हन बदलाव चुप, आँचर बर मुँह ढांप..
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कस्बा-कस्बा जात हे, लोकाचार निहार.
टुटका-टोना-बैगई,  झांग-पाग उतार..
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शोषण अउर अकाल बर, गिरवी भे घर-घाट.
खेत-खार खाता लीहस, निगल- सेठ के ठाठ..
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हमर देस के गाँव मा, सुनहा सुरज बिहान.
अरघ देहे बद अंजुरी, रीती- रोय किसान..
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जिनगानी के समंदर, गाँव-गँवई के रीत.                      
जिनगी गुजरत हे 'सलिल', कुरिय-कुंदरा मीत..
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महतारी भुइयाँ असल, बंदत हौं दिन-रात.
दाई! पइयां परत हौं, मूँड़ा पर धर हात..
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जाँघर टोरत सेठ बर, चिथरा झूलत भेस.
मुटियारी माथा पटक, चेलिक रथे बिदेस..
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बाँग देही कुकराकस, जिनगी बन के छंद.
कुररी कस रोही 'सलिल', 'मावस दूबर चंद..
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छेंका-बांधा बहुरिया, सारी-लुगरा संग.
अंतस मं किलकत-खिलत, हँसत- गाँव के रंग..
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गुनगुनात-गावत-सुनत, अइसन हे दिन-रात.
दोहा जिनगी के चलन, जुरे-जुरे से गात..
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर