दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
स्तम्भ / लेबल
बुधवार, 22 जुलाई 2009
तेवरी, मुक्तिका, गीतिका या गजल
आचार्य संजीव 'सलिल'
आते देखा खुदी को जब खुदा ही जाता रहा.
गयी दौलत पास से क्या, दोस्त ही जाता रहा.
दर्दे-दिल का ज़िक्र क्यों हो?, बात हो बेबात क्यों?
जब ये सोचा बात का सब मजा ही जाता रहा.
ठोकरें हैं राह का सच, पूछ लो पैरों से तुम.
मिली सफरी तो सफर का स्वाद ही जाता रहा.
चाँद को जब तक न देखा चाँदनी की चाह की.
शमा से मिल शलभ का अरमान ही जाता रहा
'सलिल' ने मझधार में कश्ती को तैराया सदा.
किनारों पर डूबकर सम्मान ही जाता रहा..
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009
ग़ज़ल
- 'सलिल जी'
चल पड़े अपने कदम तो,मंजिलें भी पायेंगे.
कंठ-स्वर हो साज़ कोई, गीत अपने गायेंगे.
मुश्किलों से दोस्ती है, संकटों से प्यार है.
'सलिल' बनकर नर्मदा हम, सत्य-शिव दुहारायेंगे.
स्नेह की हर लहर हर-हर, कर निनादित हो रही.
चल तनिक अवगाह लें, फिर सूर्य बनकर छायेंगे.
दोस्तों की दुश्मनी की 'सलिल' क्यों चिंता करें.
दुश्मनों की दोस्ती पाकर मरे- जी जायेंगे.
चुनें किसको, तजें किसको, सब निकम्मे एक से.
मिली सत्ता तो ज़मीं से, दूर हो गर्रायेंगे.
दिल मिले न मिलें लेकिन हाथ तो मिलते रहें.
क्या पता कब ह्रदय भी हों एक, फिर मुस्कायेंगे.
स्नेह-सलिला में नहाना, 'सलिल' का मजहब धरम.
सफल हो श्रम साधना, हम गगन पर लहरायेंगे.
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मंगलवार, 14 अप्रैल 2009
मुक्तिका: सो जाइए -- संजीव 'सलिल'
सो जाइए
संजीव 'सलिल'
*
'सलिल' को दे दर्द अपने, चैन से सो जाइए।
नर्मदा है नेह की, फसलें यहाँ बो जाइए।
चंद्रमा में चांदनी भी और धब्बे-दाग भी।
चन्दनी अनुभूतियों से पीर सब धो जाइए।
होश में जब तक रहे, मैं-तुम न हम हो पाए थे।
भुला दुनिया मस्त हो, मस्ती में खुद खो जाइए।
खुदा बनने था चला, इंसां न बन पाया 'सलिल'।
खुदाया अब आप ही, इंसान बन दिखलाइए।
एक उँगली उठाता है जब भी गैरों पर 'सलिल'
तीन उँगली चीखती हैं, खुद सुधर कर आइए।
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बुधवार, 1 अप्रैल 2009
गीतिका कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर
वर्ना बेहतर यही कि चुप रहिये.
प्यार से जिन्दगी संवरती है.
व्यर्थ विद्वेष में नहीं दहिये.

माना अब तो नहीं जरा फुर्सत.
गाहे-बगाहे पे मिलते रहिये.
हम तो हर रोज धूप सहते हैं.
आप भी धूप याँ कभी सहिये.
गीत गायें बड़ों के हर्ज़ नहीं.
बांह गिरतों की भी कभी गहिये.
सब जगह दुप धुल शोर भरा.
रहने जाऊं कहाँ ये अब कहिये.
फूल को खिलने के लिए ऐ दोस्त!
धूप ज्यादा नहीं पे कुछ चाहिए.
जिंदगी जीने का सही यह ढंग.
उससे मत लड़िये, उसमें ही बहिये.
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ग़ज़ल -- रसूल अहमद 'सागर'
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता.
मेरी ममता के महलों को किया खंडहर विद्वेषों ने.
यहाँ थी प्रेम की बस्ती कभी ऐसा नहीं लगता.
भुलाये हमने सब आदर्श सीता-राम-लक्ष्मण के
हमारा आचरण रघुवंश के घर का नहीं लगता.
मिलन के नाम पर त्यौहार और उत्सव नहीं होते.
सभी धर्मों के सम्मलेन का अब मेला नहीं लगता.
कि जिनकी एक-इक रग में भरा है ज़हर नफरत का.
उन्हीं लोगों को अमृत प्रेम का मीठा नहीं लगता.
दिया विश्वास ने धोखा भरोसा घात कर बैठा.
हमारा खून भी 'सागर' हमें अपना नहीं लगता.
छंद: सुघोष (कोकिल- मूल अश्त्पदीय)
सूत्र: तगन गन गन - चार आवृत्ति
बहर; हजज सालिम मुसम्मन सालिम
अरकान: मफाईलुन - चार बार
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| आपका मत your openion |
मंगलवार, 24 मार्च 2009
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव।
मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव।
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव।
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव।
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव।
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
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| आपका मत your openion |
शुक्रवार, 20 मार्च 2009
तुम
आचार्य संजीव 'सलिल'
सारी रात जगाते हो तुम।
नज़र न फिर भी आते हो तुम.
थक कर आँखें बंद करुँ तो-
सपनों में मिल जाते हो तुम.
पहले मुझ से आँख चुराते,
फिर क्यों आँख मिलाते हो तुम?
रूठ मौन हो कभी छिप रहे,
कभी गीत नव गाते हो तुम
'सलिल' बांह में कभी लजाते,
कभी दूर हो जाते हो तुम.
नटवर नटनागर छलिया से,
नचते नाच नचाते हो तुम
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| आपका मत your openion |
डॉ. महेंद्र अग्रवाल, शिवपुरी
मुसीबत पीठ पर कोई लदी वो मुस्कुराता है
उठाकर सर खडी हो त्रासदी वो मुस्कुराता है
विरासत में मिली है शानो-शौकत राजवंशी है
कभी करवट बदलती है सदी वो मुस्कुराता है
महाजन गाँव से आकर शहर में और लापरवाह
उफनती है वहाँ जब भी नदी वो मुस्कुराता है
हमारे बीच का, हमने चुना सरदार अपना ही
कबीले में खिली जब भी बदी वो मुस्कुराता है
शहर जलता रहा फिर भी मगन वो बाँसुरी में था
मुसीबत में अगर हो द्रौपदी वो मुस्कुराता है
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| आपका मत your openion |
बृहस्पतिवार, 15 जनवरी 2009
तेवरी ही तेवरी आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल', संपादक नर्मदा
mailto:salil.sanjiv@gmail.com
sanjivsalil.blogspot.com
sanjivsalil.blog.in.com
१.
ताज़ा-ताज़ा दिल के घाव।
सस्ता हुआ नमक का भाव.
मंझधारों-भंवरों को पार
किया किनारे डूबी नाव.
सौ चूहे खाने के बाद
सत्य-अहिंसा का है चाव.
ताक़तवर के चूम कदम
निर्बल को दिखलाया ताव.
ठण्ड भगाई नेता ने
जला झोपडी, बना अलाव.
डाकू तस्कर चोर खड़े
मतदाता क्या करे चुनाव?
नेता रावण, जन सीता
कैसे होगा सलिल निभाव?
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२.
दिल ने हरदम चाहे फूल।
पर दिमाग ने बोए शूल.
मेहनतकश को कहें ग़लत
अफसर काम न करते भूल.
बहुत दोगली है दुनिया
नहीं सुहाते इसे उसूल.
तू मत नाहक पैर पटक
सिर पर बैठे उडकर धूल.
बना तीन के तेरह लें,
चाहा, डुबा दिया धन मूल.
मंझधारों में विमल 'सलिल'
गंदा करते तुम जा कूल.
धरती पर रख पैर जमा
'सलिल' न दिवा स्वप्न में झूल.
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३.
खर्चे अधिक, आय है कम
दिल रोता, आँखें हैं नम.
पाला शौक तमाखू का
बना मौत का फंदा यम्.
जो करता जग उजियारा
उसी दीप के नीचे तम.
सीमाओं की फ़िक्र नहीं
ठोंक रहे संसद में खम.
जब पाया तो खुश न हुए,
खोया तो करते क्यों गम?
टन-टन रुचे न मन्दिर की
कोठे की रुचती छम-छम।
वीर भोग्या वसुंधरा
'सलिल' रखो हाथों में दम।
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४.
मार हथौडा तोड़ो मूरत।
बदलेगी तब ही यह सूरत.
जिसे रहनुमा माना हमने
करी देश की उसने दुर्गत।
आरक्षित हैं कौए-बगुले
कोयल-राजहंस हैं रुखसत।
तिया सती पर हम रसिया हों
मन में है क्यों कुत्सित चाहत?
खो शहरों की चकाचौंध में
किया गाँव का बेडा गारत.
क्षणजीवी सुख मोह रहा है
रुचे न शाश्वत दिव्य विरासत.
चलभाषों का चलन अनूठा
'सलिल' न कासिद और नहीं ख़त.
*******
५.
सागर ऊंचा पर्वत गहरा
अंधा न्याय, प्रशासन बहरा.
खुली छूट आतंकवाद को
संत-आश्रमों पर है पहरा.
पौरुष निस्संतान मर रहा
वंश बढाता रक्षित महरा.
भ्रष्ट सियासत देश बेचती
राष्ट्रभक्ति का झंडा लहरा.
शक्ति पूजते, जला शक्ति को
सूखी नदियाँ,रोता सहरा.
राजमार्ग ने वन-गिरि निगले
घन विनाश का नभ में घहरा.
चुल्लू भर सागर में तूफां
सागर का जल ठहरा-ठहरा.
जनसेवक ने जनसेवा का
'सलिल' नहीं क्यों पढ़ा ककहरा?
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| आपका मत your openion |