दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
स्तम्भ / लेबल
शनिवार, 5 सितम्बर 2009
गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'
संजीव 'सलिल'
हम मन ही मन प्रश्न वनों में दहते हैं.
व्यथा-कथाएँ नहीं किसी से कहते हैं.
दिखें जर्जरित पर झंझा-तूफानों में.
बल दें जीवन-मूल्य न हिलते-ढहते हैं.
जो मिलता वह पहने यहाँ मुखौटा है.
सच जानें, अनजान बने हम सहते हैं.
मन पर पत्थर रख चुप हमने ज़हर पिए.
ममता पाकर 'सलिल'-धार बन बहते हैं.
दिल को जिसने बना लिया घर बिन पूछे
'सलिल' उसी के दिल में घर कर रहते हैं.
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम
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शुक्रवार, 15 मई 2009
ग़ज़ल: मनु बेतखल्लुस, दिल्ली
हस्रतों की उनके आगे यूँ नुमाईश हो गई
लब न हिल पाये निगाहों से गुजारिश हो गई
उम्र भर चाहा किए तुझको खुदा से भी सिवा
यूँ नहीं दिल में मेरे तेरी रिहाइश हो गई
अब कहीं जाना बुतों की आशनाई कहर है
जब किसी अहले-वफ़ा की आजमाइश हो गई
घर टपकता है मेरा, सो लौट जाएगा अबर
हम भरम पाले हुए थे और बारिश हो गई
जब तलक वो गौर फरमाते मेरी तहरीर पर
तब तलक मेरे रकीबों की सिफारिश हो गई
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मंगलवार, 28 अप्रैल 2009
ग़ज़ल सलिला: मनु बतखल्लुस
जुनूने-गिरिया का ऐसा असर भी, मुझ पे होता है
कि जब तकिया नहीं मिलता, तो दिल कागज़ पे रोता है
अबस आवारगी का लुत्फ़ भी, क्या खूब है यारों,
मगर जो ढूँढते हैं, वो सुकूं बस घर पे होता है
तू बुत है, या खुदा है, क्या बला है, कुछ इशारा दे,
हमेशा क्यूँ मेरा सिजदा, तेरी चौखट पे होता है
अजब अंदाज़ हैं कुदरत, तेरी नेमत-नवाजी के
कोई पानी में बह जाता, कोई बंजर पे रोता है
दखल इतना भी, तेरा न मेरा उसकी खुदाई में
कि दिल कुछ चाहता है, और कुछ इस दिल पे होता है
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शनिवार, 25 अप्रैल 2009
अश'आर : दोस्त -सलिल
दुश्मनी में न फिर कसर छोडी.
ए 'सलिल'! दिल को कर मजबूत ले.
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए.
शिकवा न दुश्मनों से मुझको रहा 'सलिल'.
हैरत है दोस्तों ने ही प्यार से मारा..
संबंधों के अनुबंधों में प्रतिबंधों की.
दम टूटी, जब मिला दोस्त सच्चा कोई भी..
जिस्म दो इक जां रहे जो.
दोस्त उनको जानिए.
दोस्त ने दोस्त से न कुछ चाहा.
हुई चाहत तो दोस्ती न रही.
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मंगलवार, 21 अप्रैल 2009
चंद अशआर : सलिल
इन्तिज़ार
कोशिशें मंजिलों की राह तकें।
मंजिलों ने न इन्तिज़ार किया।
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बूढा बरगद कर रहा है इन्तिज़ार।
गाँव का पनघट न क्यों होता जवां?
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जो मजा इन्तिजार में पाया।
वस्ल में हाय वो मजा न मिला।
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मिलन के पल तो लगे, बाप के घर बेटी से।
जवां बेवा सी घड़ी, इन्तिज़ार सी है 'सलिल'।
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इन्तिज़ार दिल से करोगे अगर पता होता।
छोड़कर शर्म-ओ-हया मैं ही मिल गयी होती।
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009
एक शेर
इन्तिज़ार दिल से करोगे जो पता होता.
छोड़कर शर्मो-हया मैं ही मिल गयी होती.
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बृहस्पतिवार, 16 अप्रैल 2009
एक शे'र : दोस्त -आचार्य संजीव 'सलिल'
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए॥
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