स्तम्भ / लेबल

-acharya sanjiv 'salil' (238) -Acharya Sanjiv Verma 'Salil' (195) अंग्रेजी (1) अलंकार (4) अवधी (4) आयुर्वेद (3) आरोग्य आशा (1) कला (1) कविता (32) कहावत (1) कायस्थ (1) काव्यानुवाद (4) कुण्डलिनी (1) क्षणिका (1) गणेश (1) ग़ज़ल (13) गीत (57) गीति काव्य (1) गीतिका (14) घनाक्षरी (2) घरेलू नुस्खे (3) चिंतन (3) चित्रगुप्त (5) चौपाई (1) छत्तीसगढ़ी (1) जनक छंद (2) डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' (1) तसलीस (उर्दू त्रिपदी) अज़ीज़ अहमद अंसारी (1) दुर्गा (3) देश (2) दोहा (65) नर्मदा (9) नर्मदाष्टक (1) नव विधा (1) नवगीत (41) नारी विमर्श (1) निमाड़ी (1) नियाज़ (1) नज़्म: संजीव 'सलिल' (1) परिचर्चा: चिट्ठाकारी और टिप्पणी-लेखन (1) पुरातत्व (1) पुस्तक समीक्षा (1) प्रकृति (1) प्राकृतिक चिकित्सा (2) प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' (1) बाल साहित्य (1) बुंदेली (1) भक्ति काव्य (1) भजन (15) भवन (1) भारत (7) भोजपुरी (5) महादेवी वर्मा (1) मालवी (1) मुक्तक (6) मुक्तिका (80) मृदुल कीर्ति (4) राम (7) राष्ट्र वंदना (1) लघु कथा (3) लघुकथा (13) लेख: हिन्दी का हित चिंतन (1) विवाह गीत (3) विश्व काव्य सलिला : भागवत प्रसाद मिश्रा 'नियाज' ' (1) शब्द सलिला: लखपति -अजित वडनेरकर (1) शान्ति देवी वर्मा (1) श्यामलाल उपाध्याय (1) श्यामानन्द 'सरस्वती' (1) श्री कृष्ण (1) संजीव 'सलिल' (235) संस्मरण (1) समाचार (1) साधना (1) सूक्ति सलिला: शेक्सपिअर (1) सूक्ति-सलिला:प्रो. बी. पी. मिश्र 'नियाज़' / सलिल (1) सोरठा (1) स्वर्गीय शान्ति देवी वर्मा (1) स्वास्थ्य: घरेलू नुस्खे (1) हरिगीतिका (1) हाइकु (6) हास्य (6) हिंदी (6) हिन्दी काव्यानुवाद (1) हिन्दी ग़ज़ल (1) हिन्दी छंद (1) (1) ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥ (2)
दोहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
दोहा लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 23 मई 2012

दोहा सलिला: सूर्य घूमता केंद्र पर... --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला
सूर्य घूमता केंद्र पर...
संजीव 'सलिल'
*

*
सूर्य घूमता केंद्र पर, होता निकट न दूर.
चंचल धरती नाचती, ज्यों सुर-पुर में हूर..
*
सन्नाटा छाया यहाँ, सब मुर्दों से मौन.
रवि सोचे चुप ही रहूँ, सत्य सुनेगा कौन..
*
सूर्य कृष्ण दो गोपियाँ, ऊषा-संध्या नाम.
एक कराती काम औ', दूजी दे आराम.

*
छाया-पीछे दौड़ता, सूरज सके न थाम.
यह आया तो वह गयी, हुआ विधाता वाम.
*
मन सूरज का मोहता, है वसुधा का रूप.
याचक बनकर घूमता, नित त्रिभुवन का भूप..

*
आता खाली हाथ है, जाता खाली हाथ.
दिन भर बाँटे उजाला, रवि न झुकाए माथ..
*
देख मनुज की हरकतें, सूरज करता क्रोध.
कब त्यागेगा स्वार्थ यह?, कब जागेगा बोध.

*
पाप मनुज के बढ़ाते, जब धरती का ताप.
रवि बरसाता अश्रु तब, वर्षा कहते आप..

*
आठ-आठ गृह अश्व बन, घूमें चारों ओर.
रथपति कसकर थामता, संबंधों की डोर..
*
रश्मि गोपियाँ अनगिनत, हर पल रचती रास.
सूर्य न जाने किस तरह, रहता हर के पास..
*
नेह नर्मदा में नहा, दिनकर जाता झूम.
स्नेह-सलिल का पान कर, थकन न हो मालूम..
*
सूरज दिनपति बन गया, लगा नहीं प्रतिबन्ध.
नर का नर से यों हुआ, चिरकालिक अनुबंध..
*
भास्कर भास्वर हो 'सलिल', पुजा जगत में खूब.
भोग पुजारी खा गये, गया त्रस्त हो डूब..
*
उदय-अस्त दोनों समय, लोग लगाते भीड़.
शेष समय खाली रहे, क्यों सूरज का नीड़..
*
रमा रहा मन रमा में, किसको याद रमेश.
बलिहारी है समय की, दिया जलायें दिनेश..
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

रविवार, 20 मई 2012

दोहा सलिला: --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
संजीव 'सलिल'
*

*
प्राची से होती प्रगट, खोल कक्ष का द्वार.
अलस्सुबह ऊषा पुलक, गुपचुप झाँक-निहार..
*
पौ फटती सासू धरा, देती गरज गुहार.
'अब लौं सो रईं बहुरिया, अँगना झाड़-बुहार'.
*
सूरज भैया डोलते, भौजी-रूप निहार.
धरती माँ ना देख ले, सिर लटकी तलवार..
*
दादी हवा खंखारती, बोली- 'मैं बलिहार.
छुटकू चंदा पीलिया-ग्रस्त लगा इस बार..
*
कोयल ननदी कूकती, आयी किये सिंगार.
'भौजी चइया चाहिए, भजिये तल दो चार'..
*
आसमान दादा घुसे, घर में करी पुकार.
'ला बिटिया! दे जा तनक, किते धरो अखबार'..
*
चश्मा मोटे काँच का,  अँखियाँ पलक उघार.
चढ़ा कान पर घूरता, बनकर थानेदार..
*
'कै की मोंडी कौन से, करती नैना चार'.
धोबिन भौजी लायीं हैं, खबर मसालेदार..
*
ठन्डे पानी से नहा, बैठे प्रभु लाचार.
भोग दिखा, खा भक्त खुद, लेता रोज डकार..
*
दिया पड़ोसन ने दिया, अँगना में जब बार.
अपने घर का अँधेरा, गहराया तब यार..
*
'सलिल' स्नेह हो तो मने, कुटिया में त्यौहार.
द्वेष-डाह हो तो महल, लगता कारगर..
**
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in



बुधवार, 16 मई 2012

गीत: दुनिया का व्यापार... संजीव 'सलिल

दोहा गीत:
दुनिया का व्यापार...
संजीव 'सलिल
*


*
मौन मौलश्री देखता,
दुनिया का व्यापार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*

'तत-त्वं-असि' समझा-दिखा,
दर्पण में प्रतिबिम्ब.
सच मानो हैं एक ही,
पंछी-कोटर-डिंब.

श्वास-श्वास लो इस तरह
हो जीवन श्रृंगार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*


'सत-शिव-सुंदर' है वही,
जो 'सत-चित-आनंद'.
ध्वनि-अक्षर के मिलन से,
गुंजित हैं लय-छंद.

आस-आस मधुमास हो.
पल-पल हो त्यौहार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*


खोया-पाया समय की,
चक्की के दो पाट.
काया-छाया में उलझ,
खड़ी हो गयी खाट.

त्रास बदल दे हास में,
मीठे वचन उचार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*


गर्मी बरखा शीत दें,
जीवन को सन्देश.
परिवर्तन स्वीकार ले,
खुशियाँ मिलें अनेक.

ख़ास मान ले आम को,
पा ले खुशी अपार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*


बीज एक पत्ते कई,
कोई नहीं विवाद.
भू जो पोषक तत्व दे,
सब लेते मिल स्वाद.

पास-दूर, खिल-झर रहे,
'सलिल' बिना तकरार.
बनो मौन साधक सुने.
जग जिसके उद्गार...
*
टीप: जबलपुर स्थित मौलश्री वृक्ष और उसकी छाँव में सिद्धि प्राप्त  साधक ओशो. आजकल प्रतिदिन प्रातः भ्रमण यहीं करता हूँ।
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in



मंगलवार, 15 मई 2012

दोहा गीत: नन्हें पर... संजीव 'सलिल'

दोहा गीत:
नन्हें पर...
संजीव 'सलिल'
*

*
नन्हें पर र्हौसला है,
तेरा विहग विशाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
रवि किरणें टेरें तुझें, खोल देखकर आँख.
कर दे आलस दूर- उठ, लग न जाए फिर आँख..

बाधा से टकरा पुलक, घूर मिलाकर आँख.
संकट-कंटक दूर हों, आप मिलाकर आँख..

कर प्रयास ऊँचा रहे,
तेरा मस्तक-भाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
भाग्य देव को मना ले, मिला आँख से आँख.
प्रियतम को प्रिय- डाल दे, जो आँखों में आँख..

पग-पग बढ़ सपने अगिन, रहे बसाये आँख.
तौल परों को- विफल हो, डबडबाये ना आँख..

श्रम-गंगा में स्नान कर,
मत प्रयास को टाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*
सपने सच कर मुस्कुरा, भर-भर आये आँख.
गिर-उठ-बढ़ स्वागत करे, नगमे गाये आँख..

अपनी नजर उतर ले राई-नौंन ले आँख.
खुद को सब पर वार दे, जग उजार दे आँख..

हो विनम्र पा सफलता,
कर कुछ 'सलिल' कमाल.
भर उड़ान नभ हो सके,
तुझको निरख निहाल..
*



Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in



रविवार, 13 मई 2012

दोहा सलिला: माँ ममता का गाँव है... --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
माँ ममता का गाँव है...
  
संजीव 'सलिल'
*
माँ ममता का गाँव है, शुभाशीष की छाँव.
कैसी भी सन्तान हो, माँ-चरणों में ठाँव..
*
नारी भाषा भू नदी, प्रकृति- जननि हैं पाँच.
माता का ऋण कोई सुत, चुका न सकता साँच..
*
माता हँसकर पालती,  अपने पुत्र अनेक.
क्यों पुत्रों को भार सम. लगती माता एक..
*
रात-रात हँस जागती, सन्तति ले-ले नींद.
माँ बाहर- अन्दर रहें, आज बीन्दणी-बींद..
*
माँ-सन्तान अनेक हैं, सन्तति को माँ एक.
माँ सेवा से हो 'सलिल', जागृत बुद्धि-विवेक..
*
माँ के चरणों में बसे, सारे तीर्थस्थान.
माँ की महिमा देव भी, सकते नहीं बखान..
*
नारी हो या भगवती, मानव या भगवान.
माँ की नजरों में सभी, संतति एक समान..
*
आस श्वास-प्रश्वास है, तम में प्रखर उजास.
माँ अधरों का हास है, मरुथल में मधुमास..
*
माँ बिन संतति का नहीं, हो सकता अस्तित्व.
जान-बूझ बिसरा रही, क्यों संतति यह तत्व..
*
माँ का द्रग-जल है 'सलिल', पानी की प्राचीर.
हर संकट हर हो सके, दृढ़ संबल मतिधीर..
*
माँ की स्मृति दीप है, यादें मधुर सुवास.
आँख मूँदकर सुमिर ले, माँ का हो आभास..
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

मंगलवार, 8 मई 2012

दोहा सलिला: अमलतास है धन्य... --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
अमलतास है धन्य...
संजीव 'सलिल'
*

*
चटक धूप सह खिल रहा, अमलतास है धन्य.
गही पलाशी विरासत, सुमन न ऐसा अन्य..
*
मौन मौलश्री संत सम, शांत लगाये ध्यान.
भीतर जो घटता निरख, सत-शिव-सुंदर जान..
*
देवदारु पछता रहा, बनकर भू पर भार.
भू जल पी मरुथल बना, जीवन जी निस्सार..
*
ऊँचा पेड़ खजूर का, एकाकी बिन बाँह.
श्रमित पथिक अकुला रहा, मिली  न तिल भार छाँह..
*
आम्र बौर की पालकी, शहनाई है कूक.
अंतर में ऋतुराज के, प्रकृति मिलन की हूक..
*
कदली पत्रों से सजा, मंडप-बंदनवार.
कचनारी वधु ने किया, केसर-धवल सिंगार..
*
पवन झंकोरे झुलाते झूला, गाकर छंद.
प्रेम पींग जितना बढ़े, उतना ही आनंद..
*
शिशु रवि प्राची से रहा, अपलक रूठ निहार.
धरती माँ ने गोद से, नाहक दिया उतार..
*
जनक गगन के गाल पर, मलती उषा गुलाल.
लाड़ लड़ाती लडैती, जननी धरा निहाल..
*
चहक-चहक पंछी करें, कलरव चारों ओर.
पर्ण डाल पर झूमते होकर भाव-विभोर..
*
शैशव हँसता गोद में, बचपन करे किलोल.
गति किशोर, मति जवानी, प्रौढ़ शांति का ढोल..
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com

सोमवार, 7 मई 2012

नीर-क्षीर दोहा यमक: मन राधा तन रुक्मिणी... --संजीव 'सलिल'

नीर-क्षीर दोहा यमक:
मन राधा तन रुक्मिणी...
संजीव 'सलिल'
*

*
मन राधा तन रुक्मिणी, मीरां चाह अनाम.
सूर लखें घनश्याम को, जब गरजें घन-श्याम..
*
अ-धर अधर पर बाँसुरी, उँगली करे प्रयास.
लय स्वर गति यति धुन मधुर, श्वास लुटाये हास..
*
नीति देव की देवकी, जसुमति मृदु मुस्कान.
धैर्य नन्द, वासुदेव हैं, समय-पूर्व अनुमान..
*
गो कुल का पालन करे, गोकुल में गोपाल.
धेनु रेणु में लोटतीं, गूँजे वेणु रसाल..
*
मार सकी थी पूत ना, मरी पूतना आप.
जयी पुण्य होता 'सलिल', मिट जाता खुद पाप..
*
तृणावर्त के शस्त्र थे, अनगिन तृण-आवर्त.
प्रभु न केंद्र-धुरि में फँसे, तृण-तृण हुए विवर्त..
*
लिए वेणु कर-कालिया, चढ़ा कालिया-शीश.
कूद रहा फन को कुचल, ज्यों तरु चढ़े कपीश..
*
रास न आया रचाना, न ही भुलाना रास.
कृष्ण कहें 'चल रचा ना' रास, न बिसरा हास..
*
कदम-कदम जा कदम चढ़, कान्हा लेकर वस्त्र.
त्रस्त गोपियों से कहे, 'मत नहाओ निर्वस्त्र'..
*
'गया कहाँ बल दाऊ जू?', कान्हा करते तंग.
सुरा पिए बलदाऊ जू, गिरे देख जग दंग..
*
जल बरसाने के लिए, इंद्र करे आदेश.
बरसाने की लली के, प्रिय रक्षें आ देश..
*

बृहस्पतिवार, 3 मई 2012

गर्मी के दोहे --आनंद कृष्ण



गर्मी के दोहे 

आनंद कृष्ण 
*
भीषण गर्मी पड़ रही है ......... इस मौके पर सात दोहे प्रस्तुत हैं. ये सभी दोहे अपने आप में स्वतंत्र हैं किन्तु समेकित रूप में ये ग्रीष्म ऋतु के एक पूरे दिन का चित्रण करने का प्रयास हैं...... प्रयास की सफलता का मूल्यांकन आप  करेंगे ना-??????


निकल पड़ा था भोर से पूरब का मजदूर.
दिन भर बोई धूप को लौटा थक कर चूर.
 
पिघले सोने सी कहीं बिखरी पीली धूप.
कहीं पेड़ की छाँव में इठलाता है रूप.
 
तपती धरती जल रही, उर वियोग की आग.
मेघा प्रियतम के बिना, व्यर्थ हुए सब राग.
 
झरते पत्ते कर रहे, आपस में यों बात-
जीवन का यह रूप भी, लिखा हमारे माथ.
 
क्षीणकाय निर्बल नदी, पडी रेट की सेज.
"आँचल में जल नहीं-" इस, पीडा से लबरेज़.
 
दोपहरी बोझिल हुई, शाम हुई निष्प्राण.
नयन उनींदे बुन रहे, सपनों भरे वितान.
 
उजली-उजली रात के, अगणित तारों संग.
मंद पवन की क्रोड़ में, उपजे प्रणय-प्रसंग.

सादर-
आनंदकृष्ण, जबलपुर
मोबाइल : 09425800818

रविवार, 22 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: अंगरेजी में खाँसते... --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
अंगरेजी में खाँसते...
संजीव 'सलिल'
*
अंगरेजी में खाँसते, समझें खुद को  श्रेष्ठ.
हिंदी की अवहेलना, समझ न पायें नेष्ठ..
*
टेबल याने सारणी, टेबल माने मेज.
बैड बुरा माने 'सलिल', या समझें हम सेज..
*
जिलाधीश लगता कठिन, सरल कलेक्टर शब्द.
भारतीय अंग्रेज की, सोच करे बेशब्द..
*
नोट लिखें या गिन रखें, कौन बताये मीत?
हिन्दी को मत भूलिए, गा अंगरेजी गीत..
*
जीते जी माँ ममी हैं, और पिता हैं डैड.
जिस भाषा में श्रेष्ठ वह, कहना सचमुच सैड..
*
चचा फूफा मौसिया, खो बैठे पहचान.
अंकल बनकर गैर हैं, गुमी स्नेह की खान..
*
गुरु शिक्षक थे पूज्य पर, टीचर हैं लाचार.
शिष्य फटीचर कह रहे, कैसे हो उद्धार?.
*
शिशु किशोर होते युवा, गति-मति कर संयुक्त.
किड होता एडल्ट हो, एडल्ट्री से युक्त..
*
कॉपी पर कॉपी करें, शब्द एक दो अर्थ.
यदि हिंदी का दोष तो अंगरेजी भी व्यर्थ..
*
टाई याने बाँधना, टाई कंठ लंगोट.
लायर झूठा है 'सलिल', लायर एडवोकेट..
*
टैंक अगर टंकी 'सलिल', तो कैसे युद्धास्त्र?
बालक समझ न पा रहा, अंगरेजी का शास्त्र..
*
प्लांट कारखाना हुआ, पौधा भी है प्लांट.
कैन नॉट को कह रहे, अंगरेजीदां कांट..
*
खप्पर, छप्पर, टीन, छत, छाँह रूफ कहलाय.
जिस भाषा में व्यर्थ क्यों, उस पर हम बलि जांय..
*
लिख कुछ पढ़ते और कुछ, समझ और ही अर्थ.
अंगरेजी उपयोग से, करते अर्थ-अनर्थ..
*
हीन न हिन्दी को कहें, भाषा श्रेष्ठ विशिष्ट.
अंगरेजी को श्रेष्ठ कह, बनिए नहीं अशिष्ट..
*
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.इन

शनिवार, 21 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: शब्दों से खिलवाड़- १ --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
शब्दों से खिलवाड़- १
संजीव 'सलिल'
*
शब्दों से खिलवाड़ का, लाइलाज है रोग..
कहें 'स्टेशन' आ गया, आते-जाते लोग.
*
'पौधारोपण' कर कहें, 'वृक्षारोपण' आप.
गलत शब्द उपयोग कर, करते भाषिक पाप..
*
'ट्रेन' चल रही किन्तु हम, चला रहें हैं 'रेल'. 
हिंदी माता है दुखी, देख शब्द से खेल..
*
कहते 'हैडेक' पेट में, किंतु नहीं 'सिरदर्द'.
बने हँसी के पात्र तो, मुख-मंडल है ज़र्द..
*
'फ्रीडमता' 'लेडियों' को, मिले दे रहे तर्क.
'कार्य' करें तो शर्म है, गर्व करें यदि 'वर्क'..
*
'नेता' 'लीडर' हो हुए, आम जनों से दूर.
खून चूसते देश का, मिल अफसर मगरूर..
*
'तिथि' आने की ज्ञात तो, 'अतिथि' रहे क्यों बोल?
शर्म न गलती पर करें, पीट रहे हैं ढोल..
*
क्यों 'बस' को 'मोटर' कहें, मोटर बस का यंत्र.
सही-गलत के फर्क का, सिर्फ अध्ययन मंत्र.. 
*
'नृत्य' न करना भूलकर, डांस इंडिया डांस. 
पूजा पेशा हो गयी, शाकाहारी मांस..
*
'सर्व' न कर 'सर्विस' करें, कहलायें 'सर्वेंट'.
'नौकर' कहिये तो लगे, हिंदी इनडीसेंट..  
*
'ममी-डैड' माँ-बाप को, कहें उठाकर शीश.
बने लँगूरा कूदते, हँसते देख कपीश..
*

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: धूप-छाँव दोहा-यमक --संजीव 'सलिल

दोहा सलिला:
धूप-छाँव दोहा-यमक
संजीव 'सलिल
*
शब नम आँखें मूँदकर, सहे तिमिर धर धीर.
शबनम की बूँदें कहें, असह हुई थी पीर..
*
मत नट वर, नटवर वरे, महकी प्रीत कदम्ब.
सँकुच लाजवंती हुई, सहसा आयीं अम्ब.. 
*
छीन रही कल छुरी से, मौन कलछुरी छीन.
चमचे के गुण गा आरही, चमची होकर दीन..
*
छान-बीनकर बात कर, कोई न हो नाराज.
छान-बीनकर जतन से, रखिए 'सलिल' अनाज..
*
अगर मिले ना राज तो,  राजा हो नाराज.
राज मिले तो हो मुदित, सिर पर धारे ताज.
*
भय का भूत न भूत से, आकर डँस ले आज.
रख खुद पर विश्वास मन,करता चल निज काज..
*
लगे दस्त तो दस्त ही, करता चुप रह साफ़.
क्यों न करो तुम भी 'सलिल', त्रुटि औरों की माफ़?.
*
हरदम हर दम का रखें, नाहक आप हिसाब.
चलती खुद ही धौंकनी, बँटे-मिटते ख्वाब..
*
बुनकर बुन कर से रहा, कोरी चादर रोज.
कोरी चादर क्यों नहीं?, कर कुछ इसकी खोज..
*
पत्र-कार मत खोजिये, होंगे आप निराश.
पत्रकार को सनसनी की ही, रही तलाश..
*
अमा नत हुए क्यों नयन?, गुमी अमानत आज.
नयन उठा कैसे करें, बात? आ रही लाज..
*
..Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in



सोमवार, 16 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: दोहा कहे मुहावरे --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा कहे मुहावरे
संजीव 'सलिल'
*
'अपने मुँह मिट्ठू बने', मियाँ हकीकत भूल.
खुद को कोमल कहे ज्यों, पैना शूल बबूल.१.
*
'रट्टू तोता' बन करें, देश-भक्ति का जाप.
लूट रहे हैं देश को, नेताजी कर पाप.२.
*
कभी न देखी महकती, 'सलिल' फूल की धूल.
किन्तु महक-खिलता मिला, हमें 'धूल का फूल'.३.
*
दिनकर ने दिन कर कहा, 'जो जागे सो पाय'.
'जो सोये सो खोय' हर, अवसर व्यर्थ गंवाय.४.
*
'जाको राखे साइयाँ', वाको मारे कौन?
नजर उतारें व्यर्थ मत, लेकर राई-नौन.५.
*
'अगर-मगर कर' कर रहे, पाया अवसर व्यर्थ.
'बना बतंगड़ बात का', 'करते अर्थ अनर्थ'.६.
*
'चमड़ी जाए पर नहीं दमड़ी जाए' सोच.
जिसकी- उसकी सोच में, सचमुच है कुछ लोच.७.
*
'कुछ से 'राम-रहीम कर', कुछ से 'कर जय राम'.
'राम-राम' दिल दे मिला, दूरी मिटे तमाम.८.
*
सर कर सरल न कठिन तज, कर अनवरत प्रयास.
'तिल-तिल जल' दीपक हरे, तम दे सतत उजास.९.
*
जब खाल से हो सामना, शिष्ट रहें नि:शब्द.
'बाल न बाँका कर सके', कह कोई अपशब्द.१०.
*
खल दे सब जग को खलिश, तपिश कष्ट संताप.
औरों का 'दिल दुखाकर',  करता है नित पाप.११.
*

रविवार, 8 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: सपने देखे रात भर --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
सपने देखे रात भर, भोर गये सब भूल.
ज्यों सुगंध से रहित हों, सने धूल से फूल..
*
स्वप्न सुहाने देखते, जागे सारी रैन.
सुबह पूछते हैं स्वजन, लाल-लाल क्यों नैन..
*
मिले आपसे हो गये, सब सपने साकार.
निराकार होने लगे, अब गुपचुप साकार..
*
जिनके सपनों में बसे, हम अनजाने मीत.
अपने सपनों में वही, बसे निभाने प्रीत..
*
तजें न सपने देखना, स्वप्न बढ़ाते मान.
गैर न सपनों में रहें, रखिये इसका ध्यान..
*
रसनिधि हैं, रसखान हैं, सपने हैं रसलीन.
स्वप्न रहित जग-जिंदगी, लगे 'सलिल' रसहीन..
*
मीरा के सपने बसे, जैसे श्री घनश्याम.
मेरे सपनों में बसें, वैसे देव अनाम..
*
स्वप्न न देखे तो लिखे, कैसे सुमधुर गीत.
पले स्वप्न में ही सदा, दिल-दिलवर में प्रीत..
*
स्वप्न साज हैं छेड़िए, इनके नाजुक तार.
मंजिल के हो सकेंगे, तभी 'सलिल' दीदार..
*
अपने सपने कभी भी, देख न पाये गैर.
सावधान हों रहेगी, तभी आपकी खैर..
*
अपने सपने कीजिये, कभी नहीं नीलाम.
ये अमूल्य-अनमोल हैं, 'सलिल' यही बेदाम..
*

बुधवार, 4 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
इस नश्वर संसार में, कहीं-कहीं है सार.
सार वहीं है जहाँ है, अंतर्मन में प्यार..
*
प्यार नहीं तो मानिए, शेष सभी निस्सार.
पग-पग पर मग में चुभें, सतत अनगिनत खार..
*
सारमेय का शोर सुन, गज न बदलते राह.
वानर उछलें डाल पर, सिंह न करता चाह..
*
कमल ललित कोमल कुसुम, सब करते सम्मान.
कौन भुला सकता रहा, कब-कब क्या अवदान?.
*
खार खलिश देता सदा, बदले नहीं स्वभाव.
करें अदेखी दूर रह, चुभे न हो टकराव..
*
दीप्ति उजाला दे तभी, जब होता अँधियार.
दीप्ति तीव्र लख सूर्य की, मुंदें नयन-पट द्वार..
*
थूकें सूरज पर अगर, खुद पर गिरती गंद.
नादां फिर भी थूकते, हैं होकर निर्द्वंद..
*
दाता दे- लेता नहीं, अगर ग्रहीता आप.
जिसका उसको ही मिले, हर लांछन दुःख शाप..
*
शब्दब्रम्ह के उपासक, चलें सृजन की राह.
शब्द-मल्ल बन डाह दे, करें न सुख की चाह..
*
अपनी-अपनी सोच है, अपने-अपने दाँव.
अपनी-अपनी डगर है, अपने-अपने पाँव..
*
लगे अप्रिय जो कीजिए, 'सलिल' अदेखी आप.
जितनी चर्चा करेंगे, अधिक सकेगा व्याप..
*
कौन किसी का सगा है, कही किसको गैर.
काव्य-सृजन करते रहें, चाह सभी की खैर..
*
बुद्धि प्रखर हो तो 'सलिल', देती है अभिमान.
ज्ञान समझ दे मद हरे, हो विनम्र इंसान..
*
शिला असहमति की प्रबल, जड़ हो रोके धार.
'सलिल' नम्रता-सेंध से, हो जाता भव-पार..
*
बुद्धि-तत्व करता 'सलिल', पैदा नित मतभेद.
स्नेह-शील-सौहार्द्र से, हो न सके मन-भेद..
*
एक-एक बिखरे हुए, तारे दें न प्रकाश.
चन्द्र-किरण मिल एक हो, चमकातीं आकाश..
*
दरवाज़े बारात हो, भाई करें तकरार.
करें अनसुनी तो बड़े, हो जाते लाचार..
*
करे नासमझ गलतियाँ, समझदार हों मौन.
सार रहित आक्षेप पर, बेहतर है हों मौन..
*
मैदां को छोड़ें नहीं, बदलें केवल व्यूह.
साथ आपके जब 'सलिल', व्यापक मौन समूह..
*
गहते-कहते सार को, तजते कवि निस्सार.
पंक तजे पंकज कमल, बने देव-श्रृंगार..
*

दोहा सलिला: नीर-क्षीर दोहा-यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
नीर-क्षीर दोहा-यमक
संजीव 'सलिल' 
*
पोती पोती बीनकर, बिखरे सुमन अनेक.
दादी देती सीख: 'बन, धागा रख घर एक'..
*
हर ने की हर भक्त की, मनोकामना पूर्ण.
दर्प दुष्ट का हर लिया, भस्म काम संपूर्ण..
*
चश्मा हो तो दिख सके, सारी दुनिया साफ़.
चश्मा हो तो स्नानकर, हो जा निर्मल साफ़..
*
रागी राग गुँजा रहा, मन में रख अनुराग.
राग-द्वेष से दूर हो, भक्त वरे बैराग..
*
कलश ताज का देखते, सिर पर रखकर ताज.
ताज धूल में मिल कहे:, 'प्रेम करो निर्व्याज'..
*
अंगुल भर की छोकरी, गज भर लम्बी पूंछ.
गज को चुभ कर दे विकल, पूंछ न सकती ऊंछ..
*
हैं अजान उससे भले, देते नित्य अजान.
जिसके दर पर मौलवी, बैठे बन दरबान..
*
खेल खेलकर भी रहा, 'सलिल' खिलाड़ी मौन.
जिनसे खेले पूछते:, 'कहाँ छिपा है कौन?.
*
स्त्री स्त्री कर करे, शिकन वस्त्र की दूर.
शिकन माथ की कह रही, अमन-चैन है दूर..
*
गोद लिया पर गोद में, बिठा न करते प्यार.
बिन पूछे ही पूछता, शिशु- चुप पालनहार..
*
जब सुनते करताल तब, देते हैं कर ताल.
मस्त न हो सुन झूमिये, शेष! मचे भूचाल.. 
*******
 

बृहस्पतिवार, 8 मार्च 2012

दोहा पिचकारी लिये - -संजीव 'सलिल'


दोहा सलिला:

दोहा पिचकारी लिये                                                                           
संजीव 'सलिल'
*
दोहा पिचकारी लिये,फेंक रहा है रंग.
बरजोरी कुंडलि करे, रोला कहे अभंग..
*
नैन मटक्का कर रहा, हाइकु होरी संग.
फागें ढोलक पीटती, झांझ-मंजीरा तंग..
*
नैन झुके, धड़कन बढ़ी, हुआ रंग बदरंग.
पनघट के गालों चढ़ा, खलिहानों का रंग..
*
चौपालों पर बह रही, प्रीत-प्यार की गंग.
सद्भावों की नर्मदा, बजा रही है चंग..
*
गले ईद से मिल रही, होली-पुलकित अंग.
क्रिसमस-दीवाली हुलस, नर्तित हैं निस्संग..
*
गुझिया मुँह मीठा करे, खाता जाये मलंग.
दाँत न खट्टे कर- कहे, दहीबड़े से भंग..
*
मटक-मटक मटका हुआ, जीवित हास्य प्रसंग.
मुग्ध, सुराही को तके, तन-मन हुए तुरंग..
*
बेलन से बोला पटा, लग रोटी के अंग.
आज लाज तज एक हैं, दोनों नंग-अनंग..
*
फुँकनी को छेड़े तवा, 'तू लग रही सुरंग'.
फुँकनी बोली: 'हाय रे! करिया लगे भुजंग'..
*
मादल-टिमकी में छिड़ी, महुआ पीने जंग.
'और-और' दोनों करें, एक-दूजे से मंग..
*
हाला-प्याला यों लगे, ज्यों तलवार-निहंग.
भावों के आवेश में, उड़ते गगन विहंग..
*
खटिया से नैना मिला, भरता माँग पलंग.
उसने बरजा तो कहे:, 'यही प्रीत का ढंग'..
*
भंग भवानी की कृपा, मच्छर हुआ मतंग.
पैर न धरती पर पड़ें, बेपर उड़े पतंग..
*
रंग पर चढ़ा अबीर या, है अबीर पर रंग.
बूझ न कोई पा रहा, सारी दुनिया दंग..
*
मतंग=हाथी, विहंग = पक्षी,

रविवार, 4 मार्च 2012

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
गले मिले दोहा यमक
संजीव 'सलिल'
*
देव! दूर कर बला हर, हो न करबला और.
जयी न हो अन्याय फिर, चले न्याय का दौर..
*
'सलिल' न हो नवजात की, अब कोइ नव जात.
मानव मानव एक हों, भेद नहीं हो ज्ञात..
*
मन असमंजस में पड़ा, सुनकर खाना शब्द.
खा या खा ना क्या कहा?, सोच रहा नि:शब्द..
*
किस उधेड़-बुन में पड़े, फेरे मुँह चुपचाप.
फिर उधेड़-बुन कर सकें, स्वेटर पूरा आप..
*
होली हो ली हो रही, होगी नहीं समाप्त.
रंग नेह का हमेशा, रहे जगत में व्याप्त..
*
खाला ने खाली दवा, खाली शीशी फेंक.
देखा खालू दूर से, आँख रहे हैं सेंक..
*
आपा आपा खो नहीं, बिगड़ जायेगी बात.
जो आपे में ना रहे, उसकी होती मात..
*
स्वेद सना तन कह रहा, प्रथा सनातन खूब.
वरे सफलता वही जो, श्रम में जाए डूब..
*
साजन सा जन दूसरा, बिलकुल नहीं सुहाय.
सजनी अपलक रात में, जागे नींद न आय..
*
बाल-बाल बच गये सब, ग्वाल बाल रह मौन.
बाल किशन के खींचकर, भागी बाला कौन?
*
बाला का बाला चमक, बता गया चुप नाम.
मैया से किसने करी, चुगली लेकर नाम..
*

शनिवार, 3 मार्च 2012

दोहा का रंग :होली के संग


दोहा का रंग :होली के संग
 
 कुमार रवीन्द्र

बदल गई घर-घाट की, देखो तो बू-बास।

बाँच रही हैं डालियाँ, रंगों का इतिहास।१।


उमगे रँग आकाश में, धरती हुई गुलाल।
उषा सुन्दरी घाट पर, बैठी खोले बाल।२।

 
हुआ बावरा वक्त यह, सुन चैती के बोल।
पहली-पहली छुवन के, भेद रही रितु खोल।३।


बीते बर्फीले समय, हवा गा रही फाग।

देवा एक अनंग है- रहा देह में जाग।४।


पर्व हुआ दिन, किन्तु, है, फिर भी वही सवाल।

'होरी के घर' क्यों भला, अब भी वही अकाल।५।


लोकेश ‘साहिल

होली पर साजन दिखे, छूटा मन का धीर।

गोरी के मन-आँगने, उड़ने लगा अबीर।१।


होली अब के बार की, ऐसी कर दे राम।

गलबहिंया डाले मिलें, ग़ालिब अरु घनश्याम।२।


मनसा-वाचा-कर्मणा, भूल गए सब रीत।

होली के संतूर से, गूँजे ऐसे गीत।३।


इक तो वो मादक बदन, दूजे ये बौछार।

क्यों ना चलता साल भर, होली का त्यौहार।४।


थोड़ी-थोड़ी मस्तियाँ, थोड़ा मान-गुमान।

होली पर 'साहिल' मियाँ, रखना मन का ध्यान।५।


अनवारेइस्लाम

किस से होली खेलिए, मलिए किसे गुलाल।

चहरे थे कुछ चाँद से   डूब  गए इस साल।१।


नेताओं ने पी  रखी, जाने कैसी भंग।

मुश्किल है पहचानना, सब चहरे बदरंग।२।


योगी तो भोगी हुए, संसारी सब संत।

जिनकी कुटियों में रहे, पूरे बरस बसंत।३।


कैसी थीं वो होलियाँ, कैसे थे अहसास।

ज़ख़्मी है अब आस्था, टूट गए विशवास।४।



योगराज प्रभाकर

नाच उठा आकाश भी, ऐसा उड़ा अबीर।

ताज नशे में झूमता,यमुना जी के तीर।१।

.

बरसाने की लाठियाँ, खाते हैं बड़भाग।

जो पावै सौगात ये, तन मन बागो बाग़।२।

.

तन मन पे यूँ छा गई, होली की तासीर।

राँझे को रँगने चली, ले पिचकारी हीर।३।

. 
 होली के हुडदंग में, योगी राज उवाच।
पटिआले की भांग ने,फेल करी इस्काच।४।


रंग लगावें सालियाँ, बापू भयो जवान।

हुड़ हुड़ हुड़ करता फिरे, बन दबंग सलमान।५।


समीर लाल 'समीर'

होली के हुड़दंग में, नाचे पी कर भाँग।

दिन भर फिर सोते रहे, सब खूँटे पर टाँग।१।


नयन हमारे नम हुए, गाँव आ गया याद।

वो होली की मस्तियाँ,  कीचड़ वाला नाद।२।

महेन्द्र वर्मा

निरखत बासंती छटा, फागुन हुआ निहाल।

इतराता सा वह चला, लेकर रंग गुलाल।१।

 
कलियों के संकोच से, फागुन हुआ अधीर।
वन-उपवन के भाल पर, मलता गया अबीर।२।


टेसू पर उसने किया, बंकिम दृष्टि निपात।

लाल, लाज से हो गया, वसन हीन था गात।३।


अमराई की छाँव में, फागुन छेड़े गीत।

बेचारे बौरा गए, गात हो गए पीत।४।


फागुन और बसंत मिल, करें हास-परिहास।

उनको हंसता देखकर, पतझर हुआ उदास।५।


मयंक अवस्थी

सब चेहरे हैं एक से हुई पृथकता दंग।

लोकतंत्र में घुल गया साम्यवाद का रंग।१।


रंग - भंग - हुड़दंग का, समवेती आहंग।

वातायन ढोलक हुआ, मन बन गया मृदंग।२।


आज अबीर-गुलाल में, हुई मनोरम जंग।

इन्द्रधनुष सा हो गया, युद्धक्षेत्र का रंग।३। 
 
वंदना गुप्ता

होली में जलता जिया, बालम हैं परदेश।
मोबाइल स्विच-ऑफ है, कैसे दूँ संदेश।१।

भोर हुई कब की, मगर, बोल रहा ना काग।
बिन सजना इस बार भी, 'फाग' लगेगा 'नाग'।२।

कभी कभी हत्थे चढ़ें, माधव कृष्ण मुरारि।
फिर काहे को छोड़ दें, उन को ब्रज की नारि।३।

रूपचन्द्र शास्त्री मयंक


फागुन में नीके लगें, छींटे औ' बौछार।

सुन्दर, सुखद-ललाम है, होली का त्यौहार।१।


शीत विदा होने लगा, चली बसन्त बयार।

प्यार बाँटने आ गया, होली का त्यौहार।२।


पाना चाहो मान तो, करो मधुर व्यवहार।

सीख सिखाता है यही, होली का त्यौहार।३।


रंगों के इस पर्व का, यह ही है उपहार।

भेद-भाव को मेंटता, होली का त्यौहार।४।


तन-मन को निर्मल करे, रंग-बिरंगी धार।

लाया नव-उल्लास को, होली का त्यौहार।५।


भंग न डालो रंग में, वृथा न ठानो रार।

देता है सन्देश यह, होली का त्यौहार।६।


छोटी-मोटी बात पर, मत करना तकरार।

हँसी-ठिठोली से भरा, होली का त्यौहार।७।


सरस्वती माँ की रहे, सब पर कृपा अपार।

हास्य-व्यंग्य अनुरक्त हो, होली का त्यौहार।८।

 
ऋता शेखर ‘मधु’

फगुनाहट की थाप पर,बजा फाग का राग।

पिचकारी की धार पर, मच गइ भागम भाग।१।


कुंजगली में जा छुपे, नटखट मदन गुपाल।

ब्रजबाला बच के चली, फिर भी हो गइ लाल।२।


मने प्रीत का पर्व ये, सद्‌भावों के साथ।

दो ऐसा सन्देश अब, तने गर्व से माथ।३।

 
धर्मेन्द्र कुमार ‘सज्जन’

रंगों के सँग घोलकर, कुछ, टूटे-संवाद।

ऐसी होली खेलिए, बरसों आए याद।१।


जाकर यूँ सब से मिलो, जैसे मिलते रंग।

केवल प्रियजन ही नहीं, दुश्मन भी हों दंग।२।


तुमरे टच से, गाल ये, लाल हुये, सरताज।

बोलो तो रँग दूँ तुम्हें, इसी रंग से आज।३।


सूखे रंगों से करो, सतरंगी संसार।

पानी की हर बूँद को, रखो सुरक्षित यार।४।


सौरभ शेखर

लगा गयी हर डाल पर, रुत बसंत की आग।

उड़ा धूल की आंधियां, हवा खेलती फाग।१।


 टल पाया ना इस बरस, सलहज का इसरार।

कुगत कराने को स्वयँ, पहुँचे सासू द्वार।२।


जम कर होली खेलिए, बिछा रंग की सेज।

जात धरम ना रंग का, फिर किसलिए गुरेज।३।


पल भर हजरत भूल कर, दुःख,पीड़ा,संताप।

जरा नोश फरमाइए, नशा ख़ुशी का आप।४।
साधना वैद

अबके कुछ ऐसा करो, होली पर भगवान।

हर भूखे के थाल में, भर दो सब पकवान।१।


 हिरण्यकश्यप मार कर, करी धर्म की जीत।

हे नरसिँह कब आउगे, जनता है भयभीत।२।


खुशियों का त्यौहार है, खुल कर खेलो फाग।

बैर, दुश्मनी, द्वेष का, दिल से कर दो त्याग।३।
आशा सक्सेना

गहरे रंगों से रँगी, भीगा सारा अंग।

एक रंग ऐसा लगा, छोड़ न पाई संग।१। 
 

 विजया सर चढ़ बोलती, तन मन हुआ अनंग।
चंग संग थिरके क़दम, उठने लगी तरंग।२।


राणा प्रताप सिंह

बच्चे, बूढ़े, नौजवाँ, गायें मिलकर फाग।
एक ताल, सुर एक हो, एकहि सबका राग।१।

सेन्हुर, टिकुली, आलता, कब से हुए अधीर।
प्रिय आयें तो फाग में, फिर से उड़े अबीर।२।

महँगाई ने सोख ली, पिचकारी की धार।
गुझिया मुँह बिचका रही, फीका है त्यौहार।३।

अबके होली में बने, कुछ ऐसी सरकार।
छोटा जिसका पेट हो, छोटी रहे डकार।४।

मिली नहीं छुट्टी अगर, मत हो यार उदास।
यारों सँग होली मना, यार बड़े हैं खास।५।

सौरभ पाण्डेय


फाग बड़ा चंचल करे, काया रचती रूप।

भाव-भावना-भेद को, फागुन-फागुन धूप।१।


फगुनाई ऐसी चढ़ी,  टेसू धारें आग।

दोहे तक तउआ रहे,  छेड़ें मन में फाग।२।


 भइ! फागुन में उम्र भी, करती जोरमजोर।

फाग विदेही कर रहा, बासंती बरजोर।३।


जबसे सिंचित हो गये, बूँद-बूँद ले नेह ।

मन में फागुन झूमता, चैताती है देह।४।


बोल हुए मनुहार से, जड़वत मन तस्वीर।

मुग्धा होली खेलती, गुद-गुद हुआ अबीर।५।


धूप खिली, छत, खेलती, अल्हड़ खोले केश।

इस फागुन फिर रह गये, बचपन के अवशेष।६।


करता नंग अनंग है, खुल्लमखुल्ले भाव।

होश रहे तो नागरी,  जोशीले को ताव ।७।


हम तो भाई देस के,  जिसके माने गाँव ।

गलियाँ घर-घर जी रहीं - फगुआ, कुश्ती-दाँव।८।

 
नये रंग, सुषमा नई, सरसे फाग बहाव ।
लाँघन आतुर, देहरी, उत्सुक के मृदु-भाव।९।


विजेंद्र शर्मा

इंतज़ार   के  रंग  में, गई   बावरी   डूब।
होली पर इस बार भी, आये  ना महबूब।१।

सरहद से  आया नहीं,  होली  पे  क्यूँ   लाल।
भीगी  आँखें  रंग से,  करती   रहीं    सवाल।२।

मौक़ा था पर यार ने, डाला नहीं गुलाल।
मुरझाये से  ही  रहे,  मेरे  दोनों   गाल।३।

कौन बजावे फाग पे,  ढोल, नगाड़े, चंग।
कहाँ किसी को चाव है, गायब हुई उमंग।४।

गीली - गीली आँख से, करे शिकायत गाल।
बैरी ख़ुद आया नहीं, भिजवा दिया गुलाल।५।
 
डा. श्याम गुप्त

गोरे गोरे अंग पै, चटख चढि गये रंग।
रंगीले आँचर उडैं, जैसें नवल पतंग ।१।

 लाल हरे पीले रँगे, रँगे अंग-प्रत्यंग।
कज़्ज़ल-गिरि सी कामिनी, चढौ न कोऊ रंग।२।

भरि पिचकारी सखी पर, वे रँग-बान चलायँ।
लौटें नैनन बान भय, स्वयं सखा रँगि जायँ।३।

भ्रकुटि तानि बरजै सुमुखि, मन ही मन ललचाय।
पिचकारी ते श्याम की, तन मन सब रँगि जाय।४।

भक्ति ग्यान औ प्रेम की, मन में उठै तरंग।
कर्म भरी पिचकारि ते, रस भीजै अंग-अंग।५।

ऐसी होली खेलिये, जरै त्रिविधि संताप।
परमानन्द प्रतीति हो, ह्रदय बसें प्रभु आप ।६।
 
महेश चंद्र गुप्ता ‘ख़लिश’

'हो ली’, ’हो ली’ सब करें, मरम न जाने कोय।
क्या हो ली क्या ना हुई, मैं समझाऊँ तोय।१।

हो ली पूजा हस्ति की, माया जी के राज।
हाथी पे परदे पड़े, बिगड़ गए सब काज।२।

हो ली लूट-खसूट बहु, राजा के दरबार।
पहुँचे जेल तिहाड़ में, जुगत भई बेकार।३।

हो ली बहु बिध भर्त्सना, हे चिद्दू म्हाराज।
नहीं नकारो सत्य को, अब तो आओ बाज।४।

हो ली अन्ना की 'ख़लिश', जग में जय जयकार।
शायद उनको हो रही, अब गलती स्वीकार।५।

रविकर


शिशिर जाय सिहराय के, आये कन्त बसन्त ।

अंग-अंग घूमे विकल, सेवक स्वामी सन्त ।१।
 
 मादक अमराई मुकुल, बढ़ी आम की चोप ।
अंग-अंग हों तरबतर, गोप गोपियाँ ओप ।२।


जड़-चेतन बौरा रहे, खोरी के दो छोर ।

पी पी पगली पीवरी, देती बाँह मरोर ।३।


सर्षप पी ली मालती, ली ली लक्त लसोड़ ।

कृष्ण-नाग हित नाचती, सके लाल-सा गोड़ ।४।


ओ री हो री होरियाँ, चौराहों पर साज ।

ताकें गोरी छोरियाँ, अघी अभय अंदाज ।५।


अखिलेश तिवारी


इन्द्र-जाल चहुँ फाग का, रंगों की रस-धार।

हुई राधिका साँवरी, और कृष्ण रतनार।१।


फागुन ने तहजीब पर, तानी जब संगीन।

बरजोरी कर सादगी, हुई स्वयँ रंगीन।२।


क्या धरती? आकाश तक, है होली के संग।

चहरे-चहरे पर टँके, इंद्र-धनुष के रंग।३।


आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'


होली होली हो रही, होगी बारम्बार।
होली हो अबकी बरस, जीवन का श्रृंगार।१।


होली में हुरिया रहे, खीसें रहे निपोर।

गौरी-गौरा एक रंग, थामे जीवन डोर।२।


होली अवध किशोर की, बिना सिया है सून।

जन प्रतिनिधि की चूक से, आशाओं का खून।३।


 होली में बृजराज को, राधा आयीं याद।

कहें रुक्मिणी से -'नहीं, अब गुझियों में स्वाद'।४।


होली में कैसे डले, गुप्त चित्र पर रंग।

चित्रगुप्त की चातुरी, देख रहे सबरंग।५।


होली पर हर रंग का, 'उतर गया है रंग'।

जामवंत पर पड़ हुए, सभी रंग बदरंग।६।


होली में हनुमान को, कहें रँगेगा कौन।

लाल-लाल मुँह देखकर, सभी रह गए मौन।७।


होली में गणपति हुए, भाँग चढ़ाकर मस्त।

डाल रहे रँग सूंढ से, रिद्धि-सिद्धि हैं त्रस्त।८।


होली में श्री हरि धरे, दिव्य मोहिनी रूप।

कलशा ले ठंडाइ का, भागे दूर अनूप।९।


होली में निर्द्वंद हैं, काली जी सब दूर।

जिससे होली मिलें, हो, वह चेहरा बेनूर।१०।


होली मिलने चल पड़े, जब नरसिंह भगवान्।

ठाले बैठे  मुसीबत, गले पड़े श्रीमान।११।


ज्योत्सना शर्मा [मार्फत पूर्णिमा वर्मन]


भंग चढ़ाकर आ गई, खिली फागुनी धूप ।
कभी हँसे दिल खोलकर, कभी बिगारे रूप।१।


धानी-पीली ओढनी, ओढ धरा मुस्काय ।

सातों रंग बिखेर कर, सूरज भागा जाय ।२।


सतरंगी किरणें रचें, मिलकर उजली धूप।

होली का सद्भाव दे, जग को उज्ज्वल रूप।३।


कितना छिपकर आइये, गोप गोपियों संग ।

राधे से छुपते नहीं, कान्हा तुहरे रंग ।४।


हुई बावरी चहुँ दिशा, मस्ती बरसे रंग।

बाल, वृद्ध नर नार सब, जन-मन सरसे संग।५।


पूर्णिमा वर्मन

रंग-रंग राधा हुई, कान्हा हुए गुलाल।

वृंदावन होली हुआ, सखियाँ रचें धमाल।१।


होली राधा श्याम की, और न होली कोय।

जो मन राँचे श्याम रँग, रंग चढ़े ना कोय।२।


आसमान टेसू हुआ, धरती सब पुखराज।

मन सारा केसर हुआ, तन सारा ऋतुराज।३।


फागुन बैठा देहरी, कोठे चढ़ा गुलाल।

होली टप्पा दादरा, चैती सब चौपाल।४।


महानगर की व्यस्तता, मौसम घोले भंग।
इक दिन की आवारगी, छुट्टी होली रंग।५।

 
डा. जे. पी. बघेल
 
बंब बजी,  ढोलक बजी, बजे  ढोल ढप चंग।
फागुन की दस्तक भई, थिरकन लागे अंग।१।
 
होरी  आई  मधु भरी,  बूढ़े  भये  जवान।
रसिया भये अनंग के, मारक तीर कमान।२।
 
हुरियारे नाचत फिरत, धरे  कामिनी  वेष।
असर वारुणी, भंग के, भाखा भनत भदेस।३।
 
गली गली टोली चलीं, उड़त अबीर गुलाल ।
हुरियारे नाचत चलत, ठुमकि ताल बेताल।४।
 
ब्रज की होरी  के  रहे,   अजब  निराले  ढंग ।
कहीं कहीं महफिल जमीं, कहीं कहीं हुड़दंग।५।

होली-उत्सव   नागरी,  लोक-पर्व  है   धूल ।
ब्रज में होली धूल है, लोक न पाया भूल।६।

नृत्य-गीत, आमोद,  रँग,  पंकिल  धूलि  प्रहार ।
ब्रज को प्रिय रज-धूसरण, जग जानी लठमार।७।

राजेन्द्र स्वर्णकार

रँग दें हरी वसुंधरा, केशरिया आकाश ! 
इन्द्रधनुषिया मन रँगें, होंठ रँगें मृदुहास !१!
                       
होली के दिन भूलिए… भेदभाव अभिमान !
रामायण से मिल’ गले मुस्काए कुरआन !२!
                     
हिन्दू मुस्लिम सिक्ख का फर्क रहे ना आज !
मौसम की मनुहार की रखिएगा कुछ लाज !३!

पर्व… ईद होली सभी देते यह सन्देश !
हृदयों से धो दीजिए… बैर अहम् विद्वेष !४!
  
होली ऐसी खेलिए, प्रेम पाए विस्तार !
मरुथल मन में बह उठे… मृदु शीतल जल-धार !५!
 
नवीन सी. चतुर्वेदी
 
तुमने ऐसा भर दिया, इस दिल में अनुराग।
हर दिन, हर पल, हर घड़ी, खेल रहा दिल फाग।१।


यही बुजुर्गों से सुनी, इस होली की रीत।

हमें करे बदरंग जो, बढ़े उसी से प्रीत।२।

आभार ज्ञापन 


अनुरागी सब आ गये, लिए फाग-अनुराग   
ठाले-बैठे ब्लॉग के, खूब खुले हैं भाग
 
 मिल-जुल कर सबने दिया, निज-निज दान यथेष्ठ  
कोई भी कमतर नहीं, सब के सब हैं श्रेष्ठ

सुन कर मेरी प्रार्थना, जुटे यहाँ जो मित्र
उन सब को अर्पण करूँ, निज अनुराग पवित्र


जब-जब दुनिया में बढ़ा, कुविचारों का वेग
तब तब ही साहित्य ने, क़लम बनायी तेग 
 
संग्रहकर्ता: नविन च. चतुर्वेदी, आभार ठाले-बैठे
***********

बृहस्पतिवार, 1 मार्च 2012

दोहा सलिला: होली हो अबकी बरस --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

होली हो अबकी बरस

संजीव 'सलिल'

*

होली होली हो रही, होगी बारम्बार.
होली हो अबकी बरस, जीवन का श्रृंगार.१.

होली में हुरिया रहे, खीसें रहे निपोर.
गौरी-गौरा एक रंग, थामे जीवन डोर.२.

होली अवध किशोर की, बिना सिया है सून.
जन प्रतिनिधि की चूक से, आशाओं का खून.३.

होली में बृजराज को, राधा आयीं याद.
कहें रुक्मिणी से -'नहीं, अब गुझियों में स्वाद'.४.

होली में कैसे डले, गुप्त चित्र पर रंग.
चित्रगुप्त की चतुरता, देख रहे सबरंग.५.

होली पर हर रंग का, 'उतर गया है रंग'.
जामवंत पर पड़ हुए, सभी रंग बदरंग.६.

होली में हनुमान को, कहें रंगेगा कौन.
लाल-लाल मुँह देखकर, सभी रह गए मौन.७.

होली में गणपति हुए, भाँग चढ़ाकर मस्त.
डाल रहे रंग सूंढ़ से, रिद्धि-सिद्धि हैं त्रस्त.८.

होली में श्री हरि धरे, दिव्य मोहिनी रूप.
ठंडाई का कलश ले, भागे दूर अनूप.९.

होली में निर्द्वंद हैं, काली जी सब दूर.
जिससे होली मिलें हो, वह चेहरा बेनूर.१०.

होली मिलने चल पड़े, जब नरसिंह भगवान्.
ठाले बैठे  मुसीबत गले पड़े श्रीमान.११.

************


 

मंगलवार, 28 फरवरी 2012

बासंती दोहा ग़ज़ल: -- संजीव 'सलिल'


बासंती दोहा ग़ज़ल: संजीव 'सलिल'

बासंती दोहा ग़ज़ल  (मुक्तिका)                                                                                                     

संजीव 'सलिल'
*
स्वागत में ऋतुराज के, पुष्पित शत कचनार.
किंशुक कुसुम विहँस रहे, या दहके अंगार..

पर्ण-पर्ण पर छा गया, मादक रूप निखार.
पवन खो रहा होश निज, लख वनश्री श्रृंगार..

महुआ महका देखकर, चहका-बहका प्यार.
मधुशाला में बिन पिए, सिर पर नशा सवार..

नहीं निशाना चूकती, पंचशरों की मार.
पनघट-पनघट हो रहा, इंगित का व्यापार..

नैन मिले लड़ मिल झुके, करने को इंकार.
देख नैन में बिम्ब निज, कर बैठे इकरार..

मैं तुम यह वह ही नहीं, बौराया संसार.
फागुन में सब पर चढ़ा, मिलने गले खुमार..

ढोलक, टिमकी, मँजीरा, करें ठुमक इसरार.
फगुनौटी चिंता भुला. नाचो-गाओ यार..

घर-आँगन, तन धो लिया, अनुपम रूप निखार.
अपने मन का मैल भी, किंचित 'सलिल' बुहार..

बासंती दोहा ग़ज़ल, मन्मथ की मनुहार.
सीरत-सूरत रख 'सलिल', निर्मल सहज सँवार..

***********************************

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर