बाल दोहे:
पेंग्विन सबकी मीत है
आचार्य संजीव 'सलिल'
बर्फ बीच पेंग्विन बसी, नाचे फैला पंख.
करे हर्ष-ध्वनि इस तरह, मानो गूँजे शंख..
लम्बी एक कतार में, खड़ी पढाती पाठ.
अनुशासन में जो रहे, होते उसके ठाठ..
श्वेत-श्याम बाँकी छटा, सबका मन ले मोह.
शांति इन्हें प्रिय, कभी भी, करें न किंचित क्रोध.
यह पानी में कूदकर, करने लगी किलोल.
वह जल में डुबकी लगा, नाप रही भू-गोल..
हिम शिखरों से कूदकर, मौज कर रही एक.
दूजी सबसे कह रही, खोना नहीं विवेक..
आँखें मूँदे यह अचल, जैसे ज्ञानी संत.
बिन बोले ही बोलती, नहीं द्वेष में तंत..
माँ बच्चे को चोंच में, खिला रही आहार.
हमने भी माँ से 'सलिल',पाया केवल प्यार..
पेंग्विन सबकी मीत है, गाओ इसके गीत.
हिल-मिलकर रहना सदा,'सलिल'सिखाती रीत..
***********
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
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सोमवार, 3 अगस्त 2009
बाल दोहे: बर्फ बीच पेंग्विन बसी
प्रस्तुतकर्ता Posted by :
sanjiv verma
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बृहस्पतिवार, 23 अप्रैल 2009
एक कुण्डली : आचार्य संजीव 'सलिल'
भुला न पाता प्यार को, कभी कोई इंसान.
पाकर-देकर प्यार सब जग बनता रस-खान
जग बनता रस-खान, नेह-नर्मदा नाता.
बन अपूर्ण से पूर्ण, नया संसार बसाता.
नित्य 'सलिल' कविराय, प्यार का ही गुण गाता.
खुद को जाये भूल, प्यार को भुला न पाता.
पाकर-देकर प्यार सब जग बनता रस-खान
जग बनता रस-खान, नेह-नर्मदा नाता.
बन अपूर्ण से पूर्ण, नया संसार बसाता.
नित्य 'सलिल' कविराय, प्यार का ही गुण गाता.
खुद को जाये भूल, प्यार को भुला न पाता.
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sanjiv verma
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
एक शे'र : आचार्य संजीव 'सलिल'
शिकवा न दुश्मनों से मुझको रहा 'सलिल'।
हैरत में हूँ दोस्तों ने प्यार से मारा।
| आपका मत your openion |
बुधवार, 1 अप्रैल 2009
तसलीस (उर्दू त्रिपदी) अज़ीज़ अहमद अंसारी, इंदौर

सब नज़ारे दिखाई देते हैं
मुझको छोटे से अपने इस घर में
चाँद तारे दिखाई देते हैं.
आप अपना जवाब होते हैं
जिनमें होती है दूरअंदेशी
वो सदा कामयाब होते हैं.
प्यार में अब यकीं नहीं मिलता
जिस्म ही आदमी का मिलता है
जिस्म में दिल कहीं नहीं मिलता.
क्या ये आँखों को खोलता भी है?
तुमने पूछा था पहले दिन मुझसे
अब वो तुतला के बोलता भी है.
जो मिले उसके संग होती है
जिंदगानी 'अज़ीज़' बच्चों सी
जैसे पानी का रंग होती है.
********************************
मुझको छोटे से अपने इस घर में
चाँद तारे दिखाई देते हैं.
आप अपना जवाब होते हैं
जिनमें होती है दूरअंदेशी
वो सदा कामयाब होते हैं.
प्यार में अब यकीं नहीं मिलता
जिस्म ही आदमी का मिलता है
जिस्म में दिल कहीं नहीं मिलता.
क्या ये आँखों को खोलता भी है?
तुमने पूछा था पहले दिन मुझसे
अब वो तुतला के बोलता भी है.
जो मिले उसके संग होती है
जिंदगानी 'अज़ीज़' बच्चों सी
जैसे पानी का रंग होती है.
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sanjiv verma
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गीतिका कैलाशनाथ तिवारी, इंदौर
बात कहने की हो तभी कहिये.
वर्ना बेहतर यही कि चुप रहिये.
प्यार से जिन्दगी संवरती है.
व्यर्थ विद्वेष में नहीं दहिये.

माना अब तो नहीं जरा फुर्सत.
गाहे-बगाहे पे मिलते रहिये.
हम तो हर रोज धूप सहते हैं.
आप भी धूप याँ कभी सहिये.
गीत गायें बड़ों के हर्ज़ नहीं.
बांह गिरतों की भी कभी गहिये.
सब जगह दुप धुल शोर भरा.
रहने जाऊं कहाँ ये अब कहिये.
फूल को खिलने के लिए ऐ दोस्त!
धूप ज्यादा नहीं पे कुछ चाहिए.
जिंदगी जीने का सही यह ढंग.
उससे मत लड़िये, उसमें ही बहिये.
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वर्ना बेहतर यही कि चुप रहिये.
प्यार से जिन्दगी संवरती है.
व्यर्थ विद्वेष में नहीं दहिये.

माना अब तो नहीं जरा फुर्सत.
गाहे-बगाहे पे मिलते रहिये.
हम तो हर रोज धूप सहते हैं.
आप भी धूप याँ कभी सहिये.
गीत गायें बड़ों के हर्ज़ नहीं.
बांह गिरतों की भी कभी गहिये.
सब जगह दुप धुल शोर भरा.
रहने जाऊं कहाँ ये अब कहिये.
फूल को खिलने के लिए ऐ दोस्त!
धूप ज्यादा नहीं पे कुछ चाहिए.
जिंदगी जीने का सही यह ढंग.
उससे मत लड़िये, उसमें ही बहिये.
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sanjiv verma
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