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सोमवार, 21 नवम्बर 2011

मुक्तक: भारत --संजीव 'सलिल'

मुक्तक:
भारत
संजीव 'सलिल'
*
तम हरकर प्रकाश पा-देने में जो रत है.
दंडित उद्दंडों को कर, सज्जन हित नत है..
सत-शिव सुंदर, सत-चित आनंद जीवन दर्शन-
जिसका जग में देश वही अपना भारत है..
*
भारत को भाता है, जीवन का पथ सच्चा.
नहीं सुहाता देना-पाना धोखा-गच्चा..
धीर-वीर गंभीर रहे आदर्श हमारे-
पाक नासमझ समझ रहा है नाहक कच्चा..
*
भारत नहीं झुका है, भारत नहीं झुकेगा.
भारत नहीं रुका है, भारत नहीं रुकेगा..
हम-आप मेहनती हों, हम-आप नेक हों तो-
भारत नहीं चुका है, भारत नहीं चुकेगा..
*
हम भारती के बेटे, सौभाग्य हमारा है.
गिरकर उठे तोमाँने हँस-हँसकर दुलारा है..
किस्मत की कैद हमको किंचित नहीं गवारा-
अवसर ने द्वार पर आ हमको ही पुकारा है..
*
हमने जग को दिखलाया कंकर में शंकर.
मानवता के शत्रु हेतु हम हैं प्रलयंकर..
पीड़ित, दीन, दुखी मानवता के हैं रक्षक-
सज्जन संत जनों को हम ही हैं अभ्यंकर..
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Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
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सोमवार, 5 अप्रैल 2010

खबरदार कविता: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है --सलिल

खबरदार कविता:
खबर: हमारी सरहद पर इंच-इंच कर कब्ज़ा किया जा रहा है.
दोहा गजल:
संजीव 'सलिल'
कदम-कदम घुस रहा है, कर सरहद को पार.
हर हद को छिप-तोड़कर, करे पीठ पर वार..
*
करे प्यार से घात वह, हमें घात से प्यार.
बजा रहे हैं गाल हम, वह साधे हथियार..
*
बेहयाई से हम कहें, अब रुक भी जा यार.
घुस-घुस घर में मरता, वह हमको हर बार..
*
संसद में मतभेद क्यों?, हों यदि एक विचार.
कड़े कदम ले सके तब, भारत की सरकार.
*
असरकार सरकार क्यों?, हुई न अब तक यार.
करता है कमजोर जो, 'सलिल' वही गद्दार..
*
अफसरशाही राह का, रोड़ा- क्यों दरकार?
क्यों सेना में सियासत, रोके है हथियार..
*
दें जवाब हम ईंट का, पत्थर से हर बार.
तभी देश बच पायेगा, चेते अब सरकार..
*
मानवता के नाम पर, रंग जाते अखबार.
आतंकी मजबूत हों, थाम जाते हथियार..
*

शुक्रवार, 5 मार्च 2010

जनमत: हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा?

चिंतन :  हिंदी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा?
सोचिये और अपना मत बताइए:
आप की सोच के अनुसार हिन्दी भारत की राष्ट्र भाषा है या राज भाषा?
क्या आम मानते हैं कि हिन्दी भविष्य की विश्व भाषा है?
क्या संस्कृत और हिन्दी के अलावा अन्य किसी भाषा में अक्षरों का उच्चारण ध्वनि विज्ञानं के नियमों के अनुसार किया जाता है?
अक्षर के उच्चारण और लिपि में लेखन में साम्य किन भाषाओँ में है?
अमेरिका के राष्ट्रपति अमेरिकियों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिए क्यों प्रेरित कर रहे हैं?
अन्य सौरमंडलों में संभावित सभ्यताओं से संपर्क हेतु विश्व की समस्त भाषाओँ को परखे जाने पर संस्कृत और हिन्दी सर्वश्रेष्ठ पाई गयीं हैं तो भारत में इनके प्रति उदासीनता क्यों?
क्या भारत में अंग्रेजी के प्रति अंध-मोह का कारण उसका विदेशी शासन कर्ताओं से जुड़ा होना नहीं है?
आचार्य संजीव सलिल / http://divyanarmada.blogspot.com

शुक्रवार, 8 मई 2009

दो गीतिकाएँ: -रमेश श्रीवास्तव 'चातक', सिवनी

आम जनता के हक में सदा शूल रहे हैं।
आज गाँधी के अनुयायी फल-फूल रहे हैं॥

सीधे-सादे पेड़ तो हर दिन हैं कट रहे।
आरक्षितों में शूल और बबूल रहे हैं॥

कश्मीर तो भारत के माथे का मुकुट है।
भारत समूचा एक है हम भूल रहे हैं॥

आ गया 'चातक' पुनः चुनाव् का मौसम।
वादों के झूठे झूले सब झूल रहे हैं॥

उस दर पे मेरी गर्दन इसलिए न झुक सकी।
'चातक' की इबादत के कुछ उसूल रहे हैं॥

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यह बात मेरे अपने तजुर्बे में आई है।
साफ़ बात कहने में केवल बुराई है॥

जब एक बनो, नेक बनो तभी हो इन्सां।
सब के लिये रब ने यह दुनिया बनाई है॥

आपस में बाँट लें सभी के सुख-औ'- दुःख को हम।
आपस में बँटोगे तो बहुत ही बुराई है॥

क्यों लड़ते-झगड़ते हो, उलझते हो दोस्तों?
आपस में लड़कर किसने सुख-शान्ति पाई है?

'चातक; की प्यास के लिए, दरिया भी कम रहा।
स्वाति की एक बूँद सदा काम आयी है॥

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मंगलवार, 5 मई 2009

वीर नारी: आचार्य संजीव 'सलिल'


दोहांजलि:

वीरांगनाओं के प्रति

दिव्यनर्मदा@जीमेल.कॉम">दिव्यनर्मदा@जीमेल.कॉम

वीरांगना शतश: नमन, नत मस्तक हम आज।

त्याग तुम्हारा अपरिमित, रखी देश की लाज।

स्वामी, सुत, पितु, भ्रात को, तुमने कर बलिदान।

बचा-बढ़ाई देश की, युगों-युगों से शान।

रक्षित कर निज देश को, उन्नत रखतीं माथ।

गाथा जनगण गा रहा, रहे शीश पर हाथ।

दुर्गा, लक्ष्मी, चेन्नम्मा, रचें नया इतिहास।

प्राण लुटाये देश पर, प्रसरित कीर्ति-उजास।

जीजा बाई ने जना, शिवा सरीखा शूर।

भारत माँ के मुकुट का, रत्न अपरिमित नूर।

लक्ष्मीबाई ब्रिगेड ने, खूब मचाई धूम।

दिल दहले अँगरेज़ के, देश गया था झूम।

तुमने गवाँ सुहाग निज, बचा लिया है देश।

उऋण न हो सकते कभी, हम सब ऋण से लेश।

प्रिय शहीद के शौर्य की, याद बनी पाथेय।

उस के सुत को उसी सा, बना सको है ध्येय।

त्याग-तपस्या अपरिमित, तुम करुणा की मूर्ति।

नहीं अभावों की तनिक, कोई कर सके पूर्ति।

तव चरणों में स्वर्ग है, माने-पूजे नित्य।

तभी देश यह हो सके, रक्षित और अनित्य।

भारत माँ साकार तुम, दो सबको वरदान।

तव चरणों में हो सके, 'सलिल' विहँस बलिदान।
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सोमवार, 13 अप्रैल 2009

पान-पन्हैया और आम चुनाव- संजीव 'सलिल'

पान पन्हैया की रही, भारत में पहचान।
पान बन गया लबों की, युगों-युगों से शान।
रही पन्हैया शेष थी, पग तज आयी हाथ।
'सलिल' मिसाइल बन चली, छूने सीधे माथ।
जब-जब भारत भूमि में होंगें आम चुनाव।
तब-तब बढ़ जायेंगे अब जूतों के भाव।
- आचार्य संजीव 'सलिल' सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

सोमवार, 30 मार्च 2009


गीत

वीर प्रसूता माँ के उदगार

डॉ. महाश्वेता चतुर्वेदी, बरेली

चलो, देश के काम आ गया, अपना प्यारा लाल...

जिसकी अर्थी ने जीवन का अर्थ हमें समझाया.
दुनिया के माया-जालों में कभी नहीं उलझाया.
जिसे तिरंगे में पाकर, उन्नत है मेरा भाल....

सीमा के उस प्रहरी ने मातृत्व सफल कर डाला.
मृत्युंजय बनकर जिसने सारा विषाद हर डाला.
अनुरागी नब गया उसी का, निष्ठुर चाहे काल...

बलिदानी सूत एक अकेला, बना मुझे वरदान.
सौंप गया है, भारत माँ को अमृतमय मुस्कान.
और पुत्र ऐसे पाकर हो, माता सदा निहाल...

वीर-प्रसूता रह्हों, सदा जब-जब मैं जीवन पाऊँ.
विदुला और कभी जीजाबाई बनकर हरषाऊँ.
हो बन्दूक खिलौना, उसकी वीरोचित हो चाल...

हर माँ अपने बालक को मानव बनना सिखलाये.
अर्थवान जीवन हो, ऐसा काम देश के आये.
रुद्र और दुर्गा सी सन्तति, करती सदा कमाल...

देश-धर्म पर मिटानेवाले ही जिंदा कहलाते हैं.
चट्टानों औ' गिरिश्रृंगों को, वे पल में दहलाते हैं.
हस शहीद के मेले पर, हृदयों में उठा, उबाल...

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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर