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रविवार, 25 अप्रैल 2010

माँ को दोहांजलि: संजीव 'सलिल

माँ को दोहांजलि:

संजीव  'सलिल'

माँ गौ भाषा मातृभू, प्रकृति का आभार.
श्वास-श्वास मेरी ऋणी, नमन करूँ शत बार..

भूल मार तज जननि को, मनुज कर रहा पाप.
शाप बना जेवन 'सलिल', दोषी है सुत आप..

दो माओं के पूत से, पाया गीता-ज्ञान.
पाँच जननियाँ कह रहीं, सुत पा-दे वरदान..

रग-रग में जो रक्त है, मैया का उपहार.
है कृतघ्न जो भूलता, अपनी माँ का प्यार..

माँ से, का, के लिए है, 'सलिल' समूचा लोक.
मातृ-चरण बिन पायेगा, कैसे तू आलोक?

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

मंगलवार, 2 जून 2009

मेरी भाषा

मेरी भाषा

विवेक रंजन श्रीवास्तव "विनम्र"
OB 11 , विद्युत मंडल कालोनी , रामपुर, जबलपुर म.प्र.

मेरी भाषा
हिन्दी नही है
अंग्रेजी या तमिल भी नही .

मेरी भाषा है
पालने में झूलती किलकारियाँ
चिड़ियों की चहचहाहट
झरनों का कलकल नाद
बादलों की ओट से
सूरज की ताँक झाँक .

मेरी भाषा है
मौन की
नेह की भाषा
स्पर्श की
चैन की भाषा
आखों की
मुस्कान की भाषा
ईमान की
इंसान की भाषा

ना त्रिभाषा ....
बस एक ही भाषा
अंजान से
पहचान की भाषा

बुधवार, 27 मई 2009

भाषा वैभव: मगही

भाषा वैभव स्तम्भ के अर्न्तगत आप पड़ेंगे भारत की अपेक्षाकृत कम प्रचलित बोलियों की रचनाएँ। मगही किसी समय भारत से बौद्ध धर्म के प्रचार के लिए अंतर्राष्ट्रीय माध्यम भाषा के रूप में भूमिका निभा चुकी है। पाली , प्राकृत, मागधी, कैथी, अंगिका, बज्जिका, मैथिली आदि बिहार में समय-समय पर प्रचलित रही हैं। नयी पीढी को विरासत से परिचित कराने के लिए यह साप्ताहिक स्तम्भ प्रारम्भ किया जा रहा है। इस सत्र में प्रस्तुत है डॉ. मणि शंकर प्रसाद रचित मगही गीत

गुंजन जय-जय भारती

गाँव-गाँव में, नगर-डगर में
गुन्जय जय-जय भारती....

हिंया न राजा, हिंया न रानी
सबके देश पियारा है।
हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई
सब में भाईचारा है।

झूम-झूम के भारत-जनता
गावय गाँधी आरती।
गाँव-गाँव में, नगर-डगर में
गुन्जय जय-जय भारती....

मरघट से पनघट तक कैसन
रूप-गंध अलसात है।
बंजर भुइंयाँ विहँस रहल आउ
सगरो सुख अलसात है।

गूंगा गावय गीत सोहावन
मरिया बन गेल मालती।
गाँव-गाँव में, नगर-डगर में
गुन्जय जय-जय भारती....


मड़िया के झाँकय इंजोरिया
मधु रस से मातल हर कोर।
गदरैयल जन-जन के भाषा
उतर पड़ल है सुख के भोर।

सुघड़ गोरिया झूम रहल कि
बुढियन ओढे बरसाती।
गाँव-गाँव में, नगर-डगर में
गुन्जय जय-जय भारती...

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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर