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शुक्रवार, 16 मार्च 2012

भोजपुरी होली गीत -आनन्द पाठक,

एगो भोजपुरी होली गीत
आनन्द पाठक,जयपुर
 
काहे नS रंगवा लगउलु हो गोरिया ...काहे नS रंगवा लगउलु ?
 
अपने नS अईलु न हमके बोलऊलु ,’कजरीके हाथे नS चिठिया पठऊलु  
 होली में मनवा जोहत रहS गईलस. केकरा से जा के तू रंगवा लगऊलु
 
रंगवा लगऊलु......तू रंगवा लगऊलु... काहे केS मुँहवा फुलऊलु संवरिया
 काहे केS मुँहवा बनऊलु ?
 
रामS के संग होली सीता जी खेललीं ,’राधा जी खेललीं तS कृश्ना से खेललीं
होली के मस्ती में डूबलैं सब मनई नS अईलु तS तोरे फ़ोटुए से खेललीं
 
फोटुए से खेललीं... हो फ़ोटुए से खेललीं.... अरे ! केकराS से चुनरी रंगऊलु ?, 
 सँवरिया ! केकरा से चुनरी रंगऊलु ?
 
रमनथवाखेललस रमरतियाके संगे, ’मनतोरनी खेललस संघतिया के संगे
दुनिया नS कहलस कछु होली के दिनवा ,खेललस जमुनवा’ ’सुरसतियाके संगे
 
सुरसतिया के संगे.....सुर सतिया के संगे.... केकरा केS डर से तू बाहर नS अईलु  ,
 S अंगवा से अंगवा लगउलु
 
काहें गोड़धरिया करऊलु संवरिया..... काहें गोड़धरिया करऊलु.?..............काहें न रंगवा लगऊलु ?  
 

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शनिवार, 7 जनवरी 2012

भोजपुरी के संग: दोहे के रंग --संजीव 'सलिल'

भोजपुरी के संग: दोहे के रंग


संजीव 'सलिल'

भइल किनारे जिन्दगी, अब के से का आस?
ढलते सूरज बर 'सलिल', कोउ न आवत पास..
*
अबला जीवन पड़ गइल, केतना फीका आज.
लाज-सरम के बेंच के, मटक रहल बिन काज..
*
पुड़िया मीठी ज़हर की, जाल भीतरै जाल.
मरद नचावत अउरतें, झूमैं दै-दै ताल..
*
कवि-पाठक के बीच में, कविता बड़का सेतु.
लिखे-पढ़े आनंद बा, सब्भई जोड़े-हेतु..
*
रउआ लिखले सत्य बा, कहले दूनो बात.
मारब आ रोवन न दे, अजब-गजब हालात..
*
पथ ताकत पथरा गइल, आँख- न दरसन दीन.
मत पाकर मतलब सधत, नेता भयल विलीन..
*
हाथ करेजा पे धइल, खोजे आपन दोष.
जे नर ओकरा सदा ही, मिलल 'सलिल' संतोष..
*
मढ़ि के रउआ कपारे, आपन झूठ-फरेब.
लुच्चा बाबा बन गयल, 'सलिल' न छूटल एब..
*
कवि कहsतानी जवन ऊ, साँच कहाँ तक जाँच?
सार-सार के गह 'सलिल', झूठ-लबार न बाँच..
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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शुक्रवार, 23 अप्रैल 2010

कहावत सलिला: १ भोजपुरी कहावतें:

कहावत सलिला: १

भोजपुरी कहावतें:

संजीव 'सलिल'
*
कहावतें किसी भाषा की जान होती हैं. कहावतें कम शब्दों में अधिक भाव व्यक्त करती हैं. कहावतों के गूढार्थ तथा निहितार्थ भी होते हैं. यहाँ भोजपुरी कि कुछ कहावतें दी जा रही हैं. पाठकों से अनुरोध है कि अपने-अपने अंचल में प्रचलित लोक भाषाओँ, बोलियों की कहावतें भावार्थ सहित यहाँ दें ताकि अन्य जन उनसे परिचित हो सकें.

१. अबरा के मेहर गाँव के भौजी.

२. अबरा के भईंस बिआले कs टोला.

३. अपने मुँह मियाँ मीठू बा.

४. अपने दिल से जानी पराया दिल के हाल.

५. मुर्गा न बोली त बिहाने न होई.

६. पोखरा खनाचे जिन मगर के डेरा.

७. कोढ़िया डरावे थूक से.

८. ढेर जोगी मठ के इजार होले.

९. गरीब के मेहरारू सभ के भौजाई.

१०. अँखिया पथरा गइल.

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संकलक: संजीव 'सलिल, दिव्यनर्मदा@जीमेल.कॉम 

सोमवार, 17 अगस्त 2009

भोजपुरी गीतिका : आचार्य संजीव 'सलिल'

भोजपुरी गीतिका :

आचार्य संजीव 'सलिल'

पल मा तोला, पल मा मासा इहो साँच बा.

कोस-कोस प' बदल भासा इहो साँच बा..

राजा-परजा दूनो क हो गइल मुसीबत.

राजनीति कटहर के लासा इहो साँच बा..

जनगण के सेवा में लागल, बिरल काम बा.

अपना ला दस-बीस-पचासा, इहो साँच बा..

धँसल स्वार्थ मा साँसों के गाडी के पहिया.

सटते बनी गइल फुल्हों कांसा, इहो साँच बा..

सोन्ह गंध माटी के, महतारी के गोदी.

मुर्दों में दउरा दे सांसा, इहो साँच बा..

सून सपाट भयल पनघट, पौरा-चौबारा.

पौ बारा है नगर-सहर के, इहो साँच बा..

हे भासा-बोली के एकइ राम-कहानी.

जड़ जमीन मां जमा हरी है इहो साँच बा..

कुरसी के जय-जय ना कइल 'सलिल' एही से

असफलता के मिलल उंचासा, इहो साँच बा..

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रविवार, 17 मई 2009

काव्य किरण: भोजपुरी दोहे, -सलिल

: भोजपुरी दोहे :

आचार्य संजीव 'सलिल'

कइसन होखो कहानी, नहीं साँच को आँच.
कंकर संकर सम पूजहिं, ठोकर खाइल कांच..


कतने घाटल के पियल, पानी- बुझल न प्यास.
नेह नरमदा घाट चल, रहल न बाकी आस..


गुन अवगुन कम- अधिक बा, ऊँच न कोइ नीच.
मिहनत श्रम शतदल कमल, मोह-वासना कीच..
नेह-प्रेम पैदा कइल, सहज-सरल बेवहार.
साँझा सुख-दुःख बँट गइल, हर दिन बा तिवहार..

खूबी-खामी से बनल, जिनगी के पिहचान.
धूप-छाँव सम छनिक बा, मान अउर अपमान..


सहरन में जिनगी भयल, कुंठा-दुःख-संत्रास.
केई से मत कहब दुःख, सुन करिहैं उपहास..


फुनवा के आगे पड़ल, चीठी के रंग फीक.
सायर सिंह सपूत तो, चलल तोड़ हर लीक..


बेर-बेर छटनी क द स, हरदम लूट-खसोट.
दुर्गत भयल मजूर के, लगल चोट पर चोट..


दम नइखे दम के भरम, बिटवा भयल जवान.
एक कमा दू खर्च के, ऊँची भरल उडान..


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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर