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शनिवार, 12 मई 2012

लघुकथा: एकलव्य --संजीव 'सलिल'

लघुकथा:
एकलव्य

संजीव 'सलिल'
*
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'
- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'
- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'
-हाँ बेटा.'
- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'
*****
-सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम / दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.इन

शनिवार, 14 अप्रैल 2012

लघुकथा: जंगल में जनतंत्र - संजीव 'सलिल'

लघुकथा:
जंगल में जनतंत्र -
संजीव 'सलिल'

जंगल में चुनाव होनेवाले थे। मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे।

- ' जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये। सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये।' '

-''मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद। आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ।'' भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया।

मंत्री जी खुश हुए। तभी उल्लू ने आकर कहा- 'अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं। हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी' और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया।

 विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी।
समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे - 'जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद। '


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Acharya Sanjiv verma 'Salil'
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मंगलवार, 6 दिसम्बर 2011

लघुकथा: काल की गति --संजीव 'सलिल'

लघुकथा: काल की गति संजीव 'सलिल' * 'हे भगवन! इस कलिकाल में अनाचार-अत्याचार बहुत बढ़ गया है. अब तो अवतार लेकर पापों का अंत कर दो.' - भक्त ने भगवान से प्रार्थना की. ' नहीं कर सकता.' भगवान् की प्रतिमा में से आवाज आयी . ' क्यों प्रभु?' 'काल की गति.' 'मैं कुछ समझा नहीं.' 'समझो यह कि परिवार कल्याण के इस समय में केवल एक या दो बच्चों के होते राम अवतार लूँ तो लक्ष्मण, शत्रुघ्न और विभीषण कहाँ से मिलेंगे? कृष्ण अवतार लूँ तो अर्जुन, नकुल और सहदेव के अलावा कौरव ९८ कौरव भी नहीं होंगे. चित्रगुप्त का रूप रखूँ तो १२ पुत्रों में से मात्र २ ही मिलेंगे. तुम्हारा कानून एक से अधिक पत्नियाँ भी नहीं रखने देगा तो १२८०० पटरानियों को कहाँ ले जाऊंगा? बेचारी द्रौपदी के ५ पतियों की कानूनी स्थिति क्या होगी? भक्त और भगवान् दोनों को चुप देखकर ठहाका लगा रही थी काल की गति. *****

सोमवार, 31 अक्तूबर 2011

बुंदेली लघुकथा

उड़ा उड़ौवल 

- प्रभुदयाल श्रीवास्तव


बच्चों में बच्चा बनकें खेलबे में कित्तो आनंद जोतो उनईं खों पता होत जोन बच्चों के संगे खेलत हैं|हमाई रोज की आदत है के खाना खाओ औरबच्चा घेर लेत हैं"दादाजी आओ उड़ा उड़ौवल खेलें"बच्चों ने जैसै कई सो हम खेलबे बैठ गये|ई खेल में सबरे बच्चा पाल्थी मार कें बैठ जात हैं और हाथों के पंजा जमीन पर घर देत हैं| एक बच्चा पारी की शुरुवाद करत है और केत है "तोता उड़"और सबरे बच्चा अपनों एक हाथ ऊपर कर देत हैं|बच्चा फिर केत है कौआ उड़ और बच्चे फिर अपनों एक हाथ ऊपर खों तान देत हैं|बच्चा फिर कैत है के घोड़ा उड़,अब जोन के दिमाग के स्क्रू टाइट रेत हैं उनके हाथ ऊपर नईं उठत, कहूं घोड़ा सोई उड़त....|पे जोन अकल के दुश्मन रेत हैं उनके हाथ ऊपर उठ जात हैं| बच्चा चिल्लान लगत............ हो हो हार गये और हारबे वारे खों घूंसा खाने परत|घोड़ा उड़ है तो पेनाल्टी में घूंसा तो खानेई पर हे|

आज कौआ उड़ावे के बाद बच्चों ने कई गधा उड़, और गलती से हमाओ हाथ ऊपर उठ गओ| हम हार चुके ते|बच्चा चिल्लान लगे " दादाजी ने गधा उड़ा दओ दादाजी हार गये हॊ हो ही ही हू हू,"सब जोर सें हँस रये ते|छोटू जोन हमाये सामने बैठो तो हमें चिड़ा रओ तो"दादाजी गधा कैसें उड़ हे ऊके तो पंखई नईं होत|" और हम सोच रयेते के आजकाल गधई तो उड़ रये आसमान में|छुटपन में हमाये संगे जित्ते गधा पड़तते सबई तो उड़ रए आसमान में||कौनऊं भौत बड़ो अफसर बन गओ,कौनऊं विधायक बन गओ और कौनऊं तो मंत्री तक हैं|और इते जो हाल है के हम कौआ बनकें फुदक रये कबऊं ई मुडेर पे कबऊं ऊ मुडेर पे|
 
आभार: साहत्य शिल्पी
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बुधवार, 7 सितम्बर 2011

लघु कथा: गुरु दक्षिणा संजीव 'सलिल'

लघुकथा:                                                                                
गुरु दक्षिणा
संजीव 'सलिल'
*
एकलव्य का अद्वितीय धनुर्विद्या अभ्यास देखकर गुरुवार द्रोणाचार्य चकराये कि अर्जुन को पीछे छोड़कर यह श्रेष्ठ न हो जाए.

उन्होंने गुरु दक्षिणा के बहाने एकलव्य का बाएँ हाथ का अँगूठा माँग लिया और यह सोचकर प्रसन्न हो गए कि काम बन गया. प्रगट में आशीष देते हुए बोले- 'धन्य हो वत्स! तुम्हारा यश युगों-युगों तक इस पृथ्वी पर अमर रहेगा.

'आपकी कृपा है गुरुवर!' एकलव्य ने बायें हाथ का अँगूठा गुरु दक्षिणा में देकर विकलांग होने का प्रमाणपत्र बनवाया और छात्रवृत्ति का जुगाड़ कर लिया. छात्रवृत्ति के रुपयों से प्लास्टिक सर्जरी कराकर अँगूठा जुड़वाया, द्रोणाचार्य एवं अर्जुन को ठेंगा बताते हुए 'अंगूठा' चुनाव चिन्ह लेकर चुनाव समर में कूद पड़ा.

तब से उसके वंशज आदिवासी द्रोणाचार्य से शिक्षा न लेकर अँगूठा लगाने लगे.

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Acharya Sanjiv Salil

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शुक्रवार, 12 अगस्त 2011

लघुकथा: सफलता संजीव 'सलिल'

लघुकथा:                                                                                             
सफलता 
संजीव 'सलिल'
*
गुरु छात्रों को नीति शिक्षा दे रहे थे- 

- ' एकता में ताकत होती है. सबको एक साथ हिल-मिलकर रहना चाहिए- तभी सफलता मिलती है.' 

= ' नहीं गुरु जी! यह तो बीती बात है, अब ऐसा नहीं होता. इतिहास बताता है कि सत्ता के लिए आपस में लड़ने वाले जितने अधिक नेता जिस दल में होते हैं' उसके सत्ता पाने के अवसर उतने ज्यादा होते हैं. समाजवादियों के लिये सत्ता अपने सुख या स्वार्थ सिद्धि का साधन नहीं जनसेवा का माध्यम थी. वे एक साथ मिलकर चले, धीरे-धीरे नष्ट हो गये. क्रांतिकारी भी एक साथ सुख-दुःख सहने की कसमें खाते थे. अंतत: वे भी समाप्त हो गये. जिन मौकापरस्तों ने एकता की फ़िक्र छोड़कर अपने हित को सर्वोपरि रखा, वे आज़ादी के बाद से आज तक येन-केन-प्रकारेण कुर्सी पर काबिज हैं.' -होनहार छात्र बोला. 

- गुरु जी चुप!

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रविवार, 26 दिसम्बर 2010

लघुकथा एकलव्य संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा                                                                                       

एकलव्य

संजीव वर्मा 'सलिल'

*
- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'

- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'

- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'

-हाँ बेटा.'

- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'

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रविवार, 19 दिसम्बर 2010

लघुकथा: काफिला संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा:
  
काफिला

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
कें... कें... कें...

मर्मभेदी कटर ध्वनि कणों को छेड़ते एही दिल तक पहुँच गयी तो रहा न गया.बाहर निकलकर देखा कि एक कुत्ता लंगड़ाता-घिसटता-किकयाता हुआ सड़क के किनारे पर गर्द के बादल में अपनी पीड़ा को सहने की कोशिश कर रहा था.

हा...हा...हा...

अट्टहास करता हुआ एक सिरफिरा भिखारी उस कुत्ते के समीप आया ... अपने हाथ की अधखाई रोटी कुत्ते की ओर बढ़ाकर उसे खिलाने और सांत्वना देने की कोशिश करने लगा. तभी खाकी वर्दी में एक पुलिस सिपाही दिखाते ही दोनों सहम गये. मैंने सिपाही की ओर प्रश्नवाचक निगाहों से देखा तो वह चिल्ला रहा था 'स्साले... मादर... सड़क पर ऐसे पड़े रहते हैं मानों इनके बाप की जागीर है. ... पर दो लात जमाव तभी हटते हैं.'

'अरे भाई! नाराज़ क्यों होते हो? सड़क पर न रहें तो जाएँ कहाँ? इनका घर-द्वार तो हैं नहीं.' मैंने कहा.

'भाड़ में जाएँ. इनके बाप ने मुझसे पूछ कर तो इन्हें पैदा नहीं किया था..... खुद तो मरेंगे ही मेरी भी नौकरी भी चाट लेंगे. इधर ये सूअर हटते नहीं उधर उन कुत्तों को एक पल का धैर्य नहीं है.'

'अरे, कहे गरम होते हो? कौन छीनेगा तुम्हारी नौकरी? कौन है जिसे गरिया भी रहे हो उससे और डर भी रहे हो.' 

'और कौन? अपने मंत्री जी और उनका बिटुआ.'

तभी लाल बत्तियों से सजी गाड़ियों का लम्बा काफिला सनसनाता हुआ निकलने लगा. लोक और लोकतंत्र की तरह भिखारी और कुत्ता सहमकर एक तरफ दुबक गये.

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सोमवार, 24 अगस्त 2009

लघुकथाएँ: “शिष्टता” और “जंगल में जनतंत्र” श्री प्राण शर्मा और आचार्य संजीव ‘सलिल’

दो लघुकथाएँ: श्री प्राण शर्मा और आचार्य संजीव ‘सलिल’ की लघुकथाएँ Posted by श्रीमहावीर

कुछ दिन पूर्व दिव्य नर्मदा में 'तितली' पर दो रचनाकारों की रचनाएँ आपने पढी और सराही थीं. आज उन्ही दोनों अर्थात श्री प्राण शर्मा जी और सलिल जी की एक-एक लघु कथा “शिष्टता” और “जंगल में जनतंत्र” 'मंथन' दिनांक १९-८-२००९ से प्रस्तुत हैं पाठकीय टिप्पणियों सहित-


लघुकथा

शिष्टता

प्राण शर्मा

किसी जगह एक फिल्म की शूटिंग हो रही थी. किसी फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो वहां दर्शकों की भीड़ नहीं उमड़े, ये मुमकिन ही नहीं है. छोटा-बड़ा हर कोई दौड़ पड़ता है उस स्थल को जहाँ फिल्म की आउटडोर शूटिंग हो रही होती है. इस फिल्म की आउटडोर शूटिंग के दौरान भी कुछ ऐसा ही हुआ. दर्शक भारी संख्या में जुटे. उनमें एक अंग्रेज भी थे. किसी भारतीय फिल्म की शूटिंग देखने का उनका पहला अवसर था.

पांच मिनटों के एक दृश्य को बार-बार फिल्माया जा रहा था. अंग्रेज महोदय उकताने लगे. वे लौट जाना चाहते थे लेकिन फिल्म के हीरो के कमाल का अभिनय उनके पैरों में ज़ंजीर बन गया था.

आखिर फिल्म की शूटिंग पैक अप हुई. अँगरेज़ महोदय हीरो की ओर लपके. मिलते ही उन्होंने कहा-” वाह भाई, आपके उत्कृष्ट अभिनय की बधाई आपको देना चाहता हूँ.”

एक अँगरेज़ के मुंह से इतनी सुन्दर हिंदी सुनकर हीरो हैरान हुए बिना नहीं रह सका.

उसके मुंह से निकला-”Thank you very much.”


” क्या मैं पूछ सकता हूँ कि आप भारत के किस प्रदेश से हैं?

” I am from Madya Pradesh.” हीरो ने सहर्ष उत्तर दिया.

” यदि मैं मुम्बई आया तो क्या मैं आपसे मिल सकता हूँ?

” Of course”.

” इस के पहले कि विदा लूं आपसे मैं एक बात पूछना चाहता हूँ. आपसे मैंने आपकी भाषा में प्रश्न किये किन्तु आपने उनके उत्तर अंगरेजी में दिए. बहुत अजीब सा लगा मुझको.”

” देखिये, आपने हिंदी में बोलकर मेरी भाषा का मान बढ़ाया, क्या मेरा कर्त्तव्य नहीं था कि अंग्रेजी में बोलकर मैं आपकी भाषा का मान बढ़ाता?”

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लघुकथा

जंगल में जनतंत्र

आचार्य संजीव ‘सलिल’

जंगल में चुनाव होनेवाले थे. मंत्री कौए जी एक जंगी आमसभा में सरकारी अमले द्वारा जुटाई गयी भीड़ के आगे भाषण दे रहे थे.- ‘ जंगल में मंगल के लिए आपस का दंगल बंद कर एक साथ मिलकर उन्नति की रह पर कदम रखिये. सिर्फ़ अपना नहीं सबका भला सोचिये.’

‘ मंत्री जी! लाइसेंस दिलाने के लिए धन्यवाद. आपके कागज़ घर पर दे आया हूँ. ‘ भाषण के बाद चतुर सियार ने बताया. मंत्री जी खुश हुए.

तभी उल्लू ने आकर कहा- ‘अब तो बहुत धांसू बोलने लगे हैं. हाऊसिंग सोसायटी वाले मामले को दबाने के लिए रखी’ और एक लिफाफा उन्हें सबकी नज़र बचाकर दे दिया.

विभिन्न महकमों के अफसरों उस अपना-अपना हिस्सा मंत्री जी के निजी सचिव गीध को देते हुए कामों की जानकारी मंत्री जी को दी.

समाजवादी विचार धारा के मंत्री जी मिले उपहारों और लिफाफों को देखते हुए सोच रहे थे – ‘जंगल में जनतंत्र जिंदाबाद. ‘

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सोमवार, 27 अप्रैल 2009

लघुकथा : असली तीर्थ -मो. मोइनुद्दीन 'अतहर'

क्यों भैया! क्या तीरथ करने गए थे? बहुत दिनों बाद दिखाई दिए हो.

पुराने जूतों की मरम्मत करते हुए वह शांत भाव से बोला: 'नईं तो, बऊ!मोरी तकदीर मन कहाँ धरो तीरथ-बरत. बो तो पैसेवालों को काम आय.'

फिर जूते की एडी में कील ठोंकते हुए बोला- 'मोरो तो जेई तीरथ है. '

उसकी आँखों में आँसू छलछला आये थे.

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बृहस्पतिवार, 9 अप्रैल 2009

लघुकथा : आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

लघु कथा
ज़हर
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
--'टॉमी को तुंरत अस्पताल ले जाओ।' जैकी बोला।
--'जल्दी करो, फ़ौरन इलाज शुरू होना जरूरी है। थोड़ी सी देर भी घातक हो सकती है।' टाइगर ने कहा।
--'अरे! मुझे हुआ क्या है?, मैं तो बीमार नहीं हूँ फ़िर काहे का इलाज?' टॉमीने पूछा।
--'क्यों अभी कटा नहीं उसे...?' जैकी ने पूछा।
--'काटा तो क्या हुआ?, आदमी को काटना हमारा जन्म सिद्ध अधिकार है।'
--'है तो किसी आदमी को काटता, तूने तो नेता को काट लिया। कमबख्त कह ज़हर चढ़ गया तो भाषण देने, धोखा देने, झूठ बोलने, रिश्वत लेने, घोटाला करने और न जाने कौन-कौन सी बीमारियाँ घेर लेंगी? बहस मत कर, जाकर तुंरत इलाज शुरू करा। जैकी ने आदेश के स्वर में कहा...बाकी कुत्तों ने सहमती जताई और टॉमी चुपचाप सर झुकाए चला गया इलाज कराने।
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रविवार, 29 मार्च 2009

लघु कथा

शब्द और अर्थ

सलिल

शब्द कोशकार ने अपना कार्य समाप्त किया...कमर सीधी कर लूँ , सोचते हुए लेटा कि काम की मेज पर कुछ खटपट सुनायी दी... मन मसोसते हुए उठा और देखा कि यथास्थान रखे शब्दों के समूह में से निकल कर कुछ शब्द बाहर आ गए थे। चश्मा लगाकर पढ़ा , वे शब्द 'लोकतंत्र', प्रजातंत्र', 'गणतंत्र' और 'जनतंत्र' थे।
शब्द कोशकार चौका - ' अरे! अभी कुछ देर पहले ही तो मैंने इन्हें यथास्थान रखा रखा था, फ़िर ये बाहर कैसे...?'
'चौंको मत...तुमने हमारे जो अर्थ लिखे हैं वे अब हमें अनर्थ लगते हैं। दुनिया का सबसे बड़ा लोक तंत्र लोभ तंत्र में बदल गया है। प्रजा तंत्र में तंत्र के लिए प्रजा की कोई अहमियत ही नहीं है। गन विहीन गन तंत्र का अस्तित्व ही सम्भव नहीं है। जन गन मन गाकर जनतंत्र की दुहाई देने वाला देश सारे संसाधनों को तंत्र के सुख के लिए जुटा रहा है। -शब्दों ने एक के बाद एक मुखर होते हुए कहा।

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शुक्रवार, 27 मार्च 2009

लघुकथा ; वह गरीब है ना... -- अवनीश तिवारी, मुम्बई

वह गरीब है ना...

आज फ़िर दफ्तर के कामों में उलझे होने और बचे कामों को पूरा करने की तंग अवधि के कारण, दोपहर के खाने से दूर रहना पड़ा सुबह का वह बैग शाम जाते समय भी उतना ही वजनदार था काम पूरा हो जाने की खुशी पेट के भूख को भुला कर रह रह संतोष का पुट मष्तिष्क में छोड़ जा रही थी यह संतोष मेरी चाल की तेजी में बदल मुझे अपने घर की ओर ले जा रही थी एकाएक पास के चाट की दूकान पर नज़र पड़ी और भूक ने अपना मुंह उढा लिया मन चाट का स्वाद लेने ललच पड़ा और मैं चाट की दूकान पर आ जमा मै चाट के लिए कह कर खडा रहा ४-६ जनों की मांग पहले से होने के कारण मेरा नंबर अभी नहीं आया था इस बीच एक फटे हाल , कुछ अधिक उम्र का दुबला सा आदमी, पैरों के टूटते हुए चप्पलो को खींचते धीरे - धीरे बढ़ा आ रहा था उसकी दीनता दूर से ही अपना परिचय दे रही थी गहरे रंग के इस आदमी ने भी चाट के लिए कहा और मेरे समीप रूक मुंह लटका कर खड़ा हुआ पास फेंकें गए चाट के जुठे पत्तलों को चाटने कई कुत्ते जमें थे उनमें एक पिल्ला किसी ज्यादा भरे जुठे पत्तल को पा उसे तूफानी गति से चाटे जा रहा था कोई दूसरा तंदुरुस्त कुत्ता उस पिल्लै को पत्तल चाटते देख उसकी तरफ़ झपटा और उसे काट भगाया पिल्लै को पत्तल चाटने के लिए मिली इस सजा से हुए हल्ले से चौक और यह सब देख उस गरीब के ह्रदय की पीड़ा उसके मुंह तक आ गयी वह कुत्ते की ओर अपने दाहिने हाथ की तर्जनी से निशाना लगा झुंझलाहट में बोल पड़ा - " ये उसे क्यों मारता है, वह गरीब है ना " गरीबी की व्यथा से निकला यह दर्द सुन मैं सन्न सा रह गया और लोग यह सब देख सुन उसे अनदेखा कर अपने अपने चाट में मस्त हो गए दीनता की पुकार हर कोई नहीं समझ सकता मै भी अपना चाट खा वहां से निकल पडा वह क्षणिक घटना बार बार दिमाग में चोट करे जा रही थी, जिससे आहत मैं अब मंद गति से, किसी सोच में खो चला जा रहा था

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर