हमें अपने वतन में आजकल अच्छा नहीं लगता.
हमारा देश जैसा था हमें वैसा नहीं लगता.
मेरी ममता के महलों को किया खंडहर विद्वेषों ने.
यहाँ थी प्रेम की बस्ती कभी ऐसा नहीं लगता.
भुलाये हमने सब आदर्श सीता-राम-लक्ष्मण के
हमारा आचरण रघुवंश के घर का नहीं लगता.
मिलन के नाम पर त्यौहार और उत्सव नहीं होते.
सभी धर्मों के सम्मलेन का अब मेला नहीं लगता.
कि जिनकी एक-इक रग में भरा है ज़हर नफरत का.
उन्हीं लोगों को अमृत प्रेम का मीठा नहीं लगता.
दिया विश्वास ने धोखा भरोसा घात कर बैठा.
हमारा खून भी 'सागर' हमें अपना नहीं लगता.
छंद: सुघोष (कोकिल- मूल अश्त्पदीय)
सूत्र: तगन गन गन - चार आवृत्ति
बहर; हजज सालिम मुसम्मन सालिम
अरकान: मफाईलुन - चार बार
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दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
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बुधवार, 1 अप्रैल 2009
ग़ज़ल -- रसूल अहमद 'सागर'
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