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शनिवार, 28 अप्रैल 2012

नर्मदा वन्दना - शिव वन्दना --श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम'

रचना और रचनाकार:



परिचय: 

जन्म- ११ मई १९३१ को मथुरा के एक प्रतिष्ठित चतुर्वेदी परिवार में आपका जन्म हुआ। १४ मार्च २००५ को गौलोक वास सिधारने तक आप पूर्ण रूपेण साहित्य को समर्पित रहे।
योगदान - 'राष्ट्र हित शतक' एवम् 'पंकज दूत' खण्डकाव्य अन्य विभिन्न विषयों पर दर्जनों पुस्तकें प्रकाशित। अनेक ग्रंथों का सफलता पूर्वक संपादन श्री गोपाल पंचांग का श्री गणेश। आप निष्णात - विख्यात  भागवत कथाकार भी थे। बेबाक अभिव्यक्ति के लिए प्रख्यात अनेक शिष्यों को अपने काव्य संस्कार से संपन्न किया।
पुरस्कार सम्मान-
काव्य, यंत्र-मंत्र, कर्म काण्ड, ज्योतिष, पाण्डित्य एवम् शस्त्र विद्या जैसे अनेकों क्षेत्रों में महारत रखने वाले बहुमुखी प्रतिभा के धनी प्रात:स्मरणीय गुरुवर श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी को उनके अविस्मरणीय योगदान के लिए सम्मानित कर निम्न अलंकरण धन्य हुए-
भारती वैभव, विद्या भारती, ज्योतिष रत्न, कवि शिरोमणि, ब्रज भाषा भ्रमर, ज्योतिषाचार्य, ब्रज भाषा रत्न, ब्रज विभाकर, कविरत्न, दैवज्ञ भूषण, काव्य पद्माकर, ब्रज काव्य दिनकर, विद्या श्री
प्रस्तुत हैं स्व. प्रीतम जी रचित नर्मदा वंदना तथा शिव वन्दना-
 
 नर्मदा वन्दना

आयौ हौं दौरि द्वार श्री नर्मदा तिहारे पै जु
तुम्हीं अब मेरे सब कारज सँभारौगी

भारी भार सीस पै यै औचक पर्यौ है आन
ताकौं निज कृपा कर, बर दै उतारौगी

'प्रीतम' सु कवि हौ जु कामना की कामधेनु
प्याइ पय तृप्ति कर जनम सुधारौगी

ए हो मातु मेखलजा, रविजा सपूत हेतु
सेतु बाँधि शीघ्र, भव सिन्धु सों उबारौगी



शिव वन्दना
जय जयति जगदाधार जगपति जय महेश नमामिते
वाहन वृषभ वर सिद्धि दायक विश्वनाथ उमापते
सिर गंग भव्य भुजंग भूसन भस्म अंग सुसोभिते
सुर जपति शिव, शशि धर कपाली, भूत पति शरणागते

जय जयति गौरीनाथ जय काशीश जय कामेश्वरम
कैलाशपति, जोगीश, जय भोगीश, वपु गोपेश्वरम
जय नील लोहित गरल-गर-हर-हर विभो विश्वंभरम
रस रास रति रमणीय रंजित नवल नृत्यति नटवरम

तत्तत्त ताता ता तताता थे इ तत्ता ताण्डवम
कर बजत डमरू डिमक-डिम-डिम गूंज मृदु गुंजित भवम
बम-बम बदत वेताल भूत पिशाच भूधर भैरवम
जय जयति खेचर यक्ष किन्नर नित्य नव गुण गौरवम

जय प्रणति जन पूरण मनोरथ करत मन महि रंजने
अघ मूरि हारी धूरि जटि तुम त्रिपुर अरि-दल गंजने
जय शूल पाणि पिनाक धर कंदर्प दर्प विमोचने
'प्रीतम' परसि पद होइ पावन हरहु कष्ट त्रिलोचने



साभार: नवीन सी चतुर्वेदी ,
मुम्बई

मंगलवार, 4 अगस्त 2009

सरवन में शिव भजन कर: स्व. शान्ति देवी वर्मा

गिरिजा कर सोलह सिंगार

गिरिजा कर सोलह सिंगार
चलीं शिव शंकर हृदय लुभांय...

मांग में सेंदुर, भाल पे बिंदी,
नैनन कजरा लगाय.
वेणी गूंथी मोतियन के संग,
चंपा-चमेली महकाय.
गिरिजा कर सोलह सिंगार...

बांह बाजूबंद, हाथ में कंगन,
नौलखा हार सुहाय.
कानन झुमका, नाक नथनिया,
बेसर हीरा भाय.
गिरिजा कर सोलह सिंगार...

कमर करधनी, पाँव पैजनिया,
घुँघरू रतन जडाय.
बिछिया में मणि, मुंदरी मुक्ता,
चलीं ठुमुक बल खांय.
गिरिजा कर सोलह सिंगार...

लंहगा लाल, चुनरिया पीली,
गोटी-जरी लगाय.
ओढे चदरिया पञ्च रंग की ,
शोभा बरनि न जाय.
गिरिजा कर सोलह सिंगार...

गज गामिनी हौले पग धरती,
मन ही मन मुसकाय.
नत नैनों मधुरिम बैनों से
अनकहनी कह जांय.
गिरिजा कर सोलह सिंगार...

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बुधवार, 6 मई 2009

भजन: मिथिला में सजी बरात -स्व. शांतिदेवी

मिथिला में सजी बरात

मिथिला में सजी बरात, सखी! देखन चलिए...

शंख मंजीरा तुरही बाजे, सजे गली घर द्वार।

सखी! देखन चलिए...

हाथी सज गए, घोड़ा सज गए, सज गए रथ असवार।

सखी! देखन चलिए...

शिव-बिरंचि-नारद जी नभ से, देख करें जयकार।

सखी! देखन चलिए...

रामजी की घोडी झूम-नाचती, देख मुग्ध नर-नार।

सखी! देखन चलिए...

भरत-लखन की शोभा न्यारी, जनगण है बलिहार।

सखी! देखन चलिए...

लाल शत्रुघन लगें मनोहर, दशरथ रहे दुलार।

सखी! देखन चलिए...


'शान्ति' प्रफुल्लित हैं सुमंत जी, नाच रहे सरदार।

सखी! देखन चलिए...


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बुधवार, 15 अप्रैल 2009

शिव भजन -सतीश चन्द्र वर्मा, भोपाल

नमामि शंकर
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

बदन में भस्मी, गले में विषधर.
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

जटा से गंगा की धारा निकली.
विराजे मस्तक पे चाँद टिकली.
सदा विचरते बने दिगंबर,
नमामि शंकर, नमामि शंकर...

तुम्हारे मंदिर में नित्य आऊँ.
तुम्हारी महिमा के गीत गाऊँ.
चढ़ाऊँ चंदन तुम्हें मैं घिसकर,
नमामि शंकर,नमामि शंकर...

तुम्हीं हमारे हो एक स्वामी.
कहाँ हो आओ, हे विश्वगामी!
हरो हमारी व्यथा को आकर,
नमामि शंकर,नमामि शंकर...
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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर