संजीव 'सलिल
इन्तिज़ार दिल से करोगे जो पता होता.
छोड़कर शर्मो-हया मैं ही मिल गयी होती.
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
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शनिवार, 18 अप्रैल 2009
एक शेर
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sanjiv verma
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शुक्रवार, 17 अप्रैल 2009
एक शे'र : आचार्य संजीव 'सलिल'
शिकवा न दुश्मनों से मुझको रहा 'सलिल'।
हैरत में हूँ दोस्तों ने प्यार से मारा।
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बृहस्पतिवार, 16 अप्रैल 2009
एक शे'र : दोस्त -आचार्य संजीव 'सलिल'
ऐ 'सलिल' तू दिल को अब मजबूत कर ले।
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए॥
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए॥
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sanjiv verma
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बुधवार, 15 अप्रैल 2009
शे'र आचार्य संजीव 'सलिल'
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आचार्य संजीव 'सलिल'
दोस्त जब मेहरबां हुए हम पर।
दुश्मनों की न फिर ज़ुरूरत थी.
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sanjiv verma
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