हिन्दी हो जग-वाणी यदि, हम मिलकर करें प्रयास
 एक साथ मिल कलम चलायें, मन में लिये हुलास
सत-शिव-सुंदर शब्द-शब्द हो, सत-चित-आनंद अक्षर-
ऊर्जस्वित मन-प्राण कर, 'सलिल' जग में करें उजास
*
: जय हिंद : जय भारत : जय भारती : वंदे मातरम :

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Diwali Dohe: Sanjiv 'Salil', Voice sangya tandon

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शुक्रवार, 4 जनवरी 2013

मैथिली हाइकू : संजीव 'सलिल'

मैथिली हाइकू :
संजीव 'सलिल'
*
स्नेह करब
हमर मन्त्र अछि।
गले लगबै।
*
एहि  दुनिया
ईश्वर बनावल
प्रेम सं मिलु।
*
सभ सं प्यार  
नफरत करब
नs  ककरा से।
*
लिट्टी-चोखा
मधुबनी-मैथिली
बिहार गेल।
*
बिहारी जन
भगाएल जात
दोसर राज।
*
चलि पड़ल
विकासक राह प'
बिहारी बाबू।
*
चलय लाग
विकासक बयार
नीक धारणा ।
*
हम्मर गाम
भगवाने के नाम
लsक चलय।
*
हाल-बेहाल
जनता परेशान
मंहगाई सं।
*
लोकतंत्र में
चुनावक तैयारी
बड़का बात।
*

रविवार, 14 अक्तूबर 2012

चित्र पर कविता: हाइकु

सद्भाव 

इस स्तम्भ की अभूतपूर्व सफलता के लिये आप सबको बहुत-बहुत बधाई. एक से बढ़कर एक रचनाएँ अब तक प्रकाशित चित्रों में अन्तर्निहित भाव सौन्दर्य के विविध आयामों को हम तक तक पहुँचाने में सफल रहीं हैं. संभवतः हममें से कोई भी किसी चित्र के उतने पहलुओं पर नहीं लिख पाता जितने पहलुओं पर हमने रचनाएँ पढ़ीं. 

चित्र और कविता की कड़ी १. संवाद, २. स्वल्पाहार,
३. दिल-दौलत, ४. प्रकृति, ५ ममता,  ६.  पद-चिन्ह, ७. जागरण, ८. परिश्रम, ९. स्मरण तथा १०. उमंग के पश्चात् प्रस्तुत है चित्र ११. सद्भाव. ध्यान से देखिये यह नया चित्र और रच दीजिये एक अनमोल कविता.


हाइकु 

संजीव 'सलिल'
*
कौन हो तुम?
पीठ फेर हो खड़े 
मौन हो तुम।
*
बड़े हो तुम?
क्यों न करते बात 
अड़े हो तुम। 
*
हम हैं छोटे
दूरी करते दूर 
तुम हो खोटे। 
*
कैसे मानव?
मिटाया न अंतर 
हो अमानव।
*
मैं और तुम 
हमेशा मुस्कुरायें 
हाथ मिलायें। 
*
गिला  भुलायें 
गले से मिल गले 
खिलखिलायें।
*
हम हैं अच्छे 
दिल से मिला दिल 
मन के सच्चे।
*******
 
 
 

चित्र पर कविता: उमंग हाइकु: संजीव 'सलिल'

चित्र पर कविता: १०
उमंग

इस स्तम्भ की अभूतपूर्व सफलता के लिये आप सबको बहुत-बहुत बधाई. एक से बढ़कर एक रचनाएँ अब तक प्रकाशित चित्रों में अन्तर्निहित भाव सौन्दर्य के विविध आयामों को हम तक तक पहुँचाने में सफल रहीं हैं. संभवतः हममें से कोई भी किसी चित्र के उतने पहलुओं पर नहीं लिख पाता जितने पहलुओं पर हमने रचनाएँ पढ़ीं. 

चित्र और कविता की कड़ी १. संवाद, २. स्वल्पाहार,
३. दिल-दौलत, ४. प्रकृति, ५ ममता,  ६.  पद-चिन्ह, ७. जागरण, ८. परिश्रम तथा ९. स्मरण के पश्चात् प्रस्तुत है चित्र १० . उमंग. ध्यान से देखिये यह नया चित्र और रच दीजिये एक अनमोल कविता.



हाइकु:
संजीव 'सलिल'
*
उमंग छाई
तन-मन विहँसा
विधि मुस्काई.
*
बजे मृदंग
दिशाएँ झूम उठीं
बरसे रंग.
*
तरंगित है
तन-मन जीवन
उमंगित है.
*
बिखेरें रंग
हँसे धरा-गगन
गाए अभंग.
*

रविवार, 8 अप्रैल 2012

हाइकु: सपने --संजीव 'सलिल'

हाइकु
सपने
संजीव 'सलिल'
* नैन देखते
अनगिन सपने
मौन लेखते. 
*
कौन बसाये
सपनों की दुनिया?
कौन बताये??
*
रंगबिरंगा
सपनों सा संसार,
या भदरंगा?
*
नियतिनटी
बुन रही सपने
नितांत अपने.
*
होते साकार
वही जो निराकार
किन्तु साधार.
*
चित्र-विचित्र
अनगढ़ सपने
देखिये मित्र.
*
बेपेंदी के हैं
सपने औ' नपने?
क्षणभंगुर.
*
नहीं असार
सांसों का सिंगार
स्वप्निल संसार.
* जहाँ है चाह
ख्वाब कह रहे हैं
वहीं है राह.
*
तम में छोड़े
परछाईं भी साथ
ख्वाब न छोड़ें.
*
स्वप्नदर्शी
थे अभियंता, लेकिन
हैं दूरदर्शी.
*

रविवार, 18 मार्च 2012

अवधी हाइकु सलिला: --संजीव 'सलिल'

अवधी हाइकु सलिला:  

संजीव 'सलिल'

*
*
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*

रविवार, 16 जनवरी 2011

अवधी हाइकु सलिला: संजीव वर्मा 'सलिल'

अवधी हाइकु सलिला:  

संजीव वर्मा 'सलिल'

*
*
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*

मंगलवार, 21 सितम्बर 2010

त्रिपदिक रचना: प्रात की बात संजीव 'सलिल

त्रिपदिक रचना:

प्रात की बात

संजीव 'सलिल'
*
सूर्य रश्मियाँ
अलस सवेरे आ
नर्तित हुईं.
*
शयन कक्ष
आलोकित कर वे
कहतीं- 'जागो'.
*
कुसुम कली
लाई है परिमल
तुम क्यों सोये?
*
हूँ अवाक मैं
सृष्टि नई लगती
अब मुझको.
*
ताक-झाँक से
कुछ आह्ट हुई,
चाय आ गयी.
*
चुस्की लेकर
ख़बर चटपटी
पढ़ूँ, कहाँ-क्या?
*
अघट घटा
या अनहोनी हुई?
बासी खबरें.
*
दुर्घटनाएँ,
रिश्वत, हत्या, चोरी,
पढ़ ऊबा हूँ.
*
चहक रही
गौरैया, समझूँ क्या
कहती वह?
*
चें-चें करती
नन्हीं चोचें दिखीं
ज़िन्दगी हँसी.
*
घुसा हवा का
ताज़ा झोंका, मुस्काया
मैं बाकी आशा.
*
मिटा न सब
कुछ अब भी बहकी
उठूँ-सहेजूँ.
************

सोमवार, 6 सितम्बर 2010

मैथिली हाइकु : "शिष्य देखल " कुसुम ठाकुर

मैथिली हाइकु : 

 
"शिष्य देखल "

कुसुम  ठाकुर 
*


*
विद्वान छथि
ओ शिष्य कहाबथि
छथि विनम्र
*
गुरु हुनक
सौभाग्य हमर ई
ओ भेंटलथि
*
इच्छा हुनक
बनल छी माध्यम
तरि जायब
*
भरोस छैन्ह
छी हमर प्रयास
परिणाम की ?
*
भाषा प्रेमक
नहि उदाहरण
छथि व्यक्तित्व
*
छैन्ह उद्गार
देखल उपासक
नहि उपमा
*
कहथि नहि
विवेकपूर्ण छथि
उत्तम लोक
*
सामर्थ्य छैन्ह
प्रोत्साहन अद्भुत
हुलसगर
*
प्रयास करि
उत्तम फल भेंटs
तs कोन हानि
*
सेवा करथि
गंगाक उपासक
छथि सलिल
*

बुधवार, 4 अगस्त 2010

अभिनव प्रयोग: हाइकु / कुण्डली गीत: मन में दृढ विश्वास संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग:

हाइकु / कुण्डली  गीत:

मन में दृढ विश्वास

संजीव 'सलिल'
*












*
मन में दृढ
विश्वास रख हम
करें प्रयास...
*
अपनी क्या सामर्थ्य है?, लें हम पहले तोल.
और बाद में निकालें, अपने मुँह से बोल..
अपने मुँह से बोल, निकालें सरस हुलसकर.
जो सुन ले, प्रोत्साहित होकर मिले पुलककर..
कहे 'सलिल' कविराय, लक्ष्य साजन श्रम सजनी.
यही विनय है दैव!, चुके ना हिम्मत अपनी..
*
जब भी पायें
त्रास, तब मंजिल
रहती पास...
*
अपनी रचना से करें, मानव का अभिषेक.
नव विकास के दीप शत, जला सकें सविवेक..
जला सकें सविवेक, प्रकाशित हो सब दुनिया.
कान्हा-राधा से, घर-घर हों मुन्ना-मुनिया..
कहे 'सलिल' कविराय, पूर्णिमा हो हर रजनी.
प्रभु जैसी कथनी, वैसी हो करनी अपनी ..
*
दिखे सभी में
निज सदृश, प्रभु
का है आवास...
*
-दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

बृहस्पतिवार, 29 जुलाई 2010

अभिनव प्रयोग दोहा-हाइकु गीत समस्या पूर्ति: प्रतिभाओं की कमी नहीं... संजीव 'सलिल'

अभिनव प्रयोग / समस्या पूर्ति:

दोहा-हाइकु गीत

प्रतिभाओं की कमी नहीं...

संजीव 'सलिल'
*

*
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
         धूप-छाँव का खेल है
         खेल सके तो खेल.
         हँसना-रोना-विवशता
         मन बेमन से झेल.

         दीपक जले उजास हित,
         नीचे हो अंधेर.
         ऊपरवाले को 'सलिल' 
         हाथ जोड़कर टेर.

         उसके बिन तेरा नहीं
         कोई कहीं अस्तित्व.
         तेरे बिन उसका कहाँ
         किंचित बोल प्रभुत्व?

क्षमताओं की
कमी नहीं किंचित
समताओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
       पेट दिया दाना नहीं.
       कैसा तू नादान?
       'आ, मुझ सँग अब माँग ले-
        भिक्षा तू भगवान'.

        मुट्ठी भर तंदुल दिए,
        भूखा सोया रात.
        लड्डूवालों को मिली-
        सत्ता की सौगात.

       मत कहना मतदान कर,
       ओ रे माखनचोर.
       शीश हमारे कुछ नहीं.
       तेरे सिर पर मोर.

उपमाओं की
कमी नहीं किंचित
रचनाओं की.
प्रतिभाओं की
कमी नहीं किंचित,
विपदाओं की....
*
http://divyanarmada.blogspot.com

बुधवार, 28 जुलाई 2010

" हाइकु " ---कुसुम ठाकुर

" हाइकु " 
कुसुम ठाकुर 
*
 
 
 
*
सुख औ दुःख 
जीवन के दो पाट 
तो गम कैसा 

चलते रहो 
हौसला ना हो कम 
दुरियाँ क्या है 

लक्ष्य जो करो 
ज्यों ध्यान तुम धरो 
मिलता फल 

हार ना मानो 
ज्यों सतत प्रयास 
मंजिल पाओ 

कर्म ही पूजा 
उस सम ना दूजा 
कहो उल्लास 

ध्यान धरो 
बस मौन ही रहो 
पाओ उल्लास 

- कुसुम ठाकुर -

सोमवार, 12 जुलाई 2010

अवधी हाइकु सलिला: संजीव वर्मा 'सलिल'

अवधी हाइकु सलिला:

संजीव वर्मा 'सलिल'
*









*
सुखा औ दुखा
रहत है भइया
घर मइहाँ.
*
घाम-छांहिक
फूला फुलवारिम
जानी-अंजानी.
*
कवि मनवा
कविता किरनिया
झरझरात.
*
प्रेम फुलवा
ई दुनियां मइहां
महकत है.
*
रंग-बिरंगे
सपनक भित्तर
फुलवा हन.
*
नेह नर्मदा
हे हमार बहिनी
छलछलात.
*
अवधी बोली
गजब के मिठास
मिसरी नाई.
*
अवधी केर
अलग पहचान
हृदयस्पर्शी.
*
बेरोजगारी
बिखरा घर-बार
बिदेस प्रवास.
*
बोली चिरैया
झरत झरनवा
संगीत धारा.
*

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

रविवार, 11 जुलाई 2010

भोजपुरी हाइकु सलिला: संजीव वर्मा 'सलिल'

भोजपुरी  हाइकु
संजीव वर्मा 'सलिल'
*










*
पावन भूमि
भारत देसवा के
प्रेरण-स्रोत.
*
भुला दिहिल
बटोहिया गीत के
हम कृतघ्न.
*
देश-उत्थान?
आपन अवदान?
खुद से पूछ.
*
अंगरेजी के
गुलामी के जंजीर
साँच साबित.
*
सुख के धूप
सँग-सँग मिलल
दुःख के छाँव.
*
नेह अबीर
जे के मस्तक पर
वही अमीर.
*
अँखिया खोली
हो गइल अंजोर
माथे बिंदिया.
*
भोर चिरैया
कानन में मिसरी
घोल गइल.
*
काहे उदास?
हिम्मत मत हार
करल प्रयास.
*
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम

शनिवार, 26 जून 2010

हाइकु गीत: आँख का पानी संजीव 'सलिल'

हाइकु गीत:

आँख का पानी

संजीव 'सलिल'
*



        









                  


*
आँख का पानी,
        मर गया तो कैसे
              धरा हो धानी?...
             *
तोड़ बंधन
आँख का पानी बहा.
रोके न रुका.

             आसमान भी
             हौसलों की ऊँचाई
             के आगे झुका.

कहती नानी
       सूखने मत देना
               आँख का पानी....
            *
रोक न पाये
जनक जैसे ज्ञानी
आँसू अपने.

           मिट्टी में मिला
           रावण जैसा ध्यानी
           टूटे सपने.

आँख से पानी
      न बहे, पर रहे
             आँख का पानी...
             *
पल में मरे
हजारों बेनुगाह
गैस में घिरे.

           गुनहगार
           हैं नेता-अधिकारी
           झूठे-मक्कार.

आँख में पानी
       देखकर रो पड़ा
              आँख का पानी...
              *
-- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

शुक्रवार, 25 जून 2010

हाइकु का रंग मैथिली के सँग --- संजीव 'सलिल'

हाइकु का रंग मैथिली के सँग
संजीव 'सलिल'





 










स्नेह करब
की सगर दुनिया
देवक श्रृष्टि

प्रेमक संग
मिलु सब संग ज्यों
की नफरत


पान मखान
मधुबनी पेंटिंग
अछिए शान

सम्पूर्ण क्रान्ति
जय प्रकाश बाबू
बिसरी गेल
चले आज
विकासक बयार
नीक धारणा

चलि परल
विकासक रस्ता
तS बिहारी बाबू

*
चलय  आज
विकासक बयार
नीक धारणा
*

रविवार, 23 मई 2010

हाइकु का रंग मैथिली के संग ---कुसुम ठाकुर

हाइकु का रंग मैथिली के संग

कुसुम ठाकुर
*
कुसुम जी एक संवेदनशील रचनाकार हैं जो अपने चिट्ठों पर न केवल निरंतर सक्रिय रहती हैं अपितु खड़ी हिन्दी के साथ-साथ मैथिली और भोजपुरी में भी रचना कर्म कर पाती हैं. कुसुम जी ने पहली बार हाइकु रचे हैं. कुसुम के रचना उद्यान में खिली ये कलियाँ माँ शारदा के श्री चरणों में समर्पित कर रही है दिव्य नर्मदा:
*
आस बनल
अछि अहाँक अम्बे
हम टूगर
*
ध्यान धरब
हम कोना आ नहि
सूझे तैयो
*
पाप बहुत
हम कयने छी हे
अहिंक धीया
*
जायब कत
आब नहि सूझे
करू उद्धार
*
जायब कत
आब नहि सूझे
करू उद्धार
*
कुसुम जी के लिए दिव्य नर्मदा परिवार की ओर से हाइकु उपहार:
*
कुसुम गंध
मननीय हाइकु
सुगंध फैले.
*
मन को भाये
सार्थक हैं हाइकु
खूब बधाई.
*
बिंदु में सिन्धु
गागर में सागर
हाइकु छंद.
*
लिखें नित्य ही
हाइकु कवितायेँ
मजा भी आये.
*
कोशिश से ही
मिलती सफलता
यश-कीर्ति भी.
*
शब्द ब्रम्ह की
जब हो आराधना
हृदय खिले.
*
मन की बात
कह देता हाइकु
चंद शब्दों में.
*

रविवार, 25 अप्रैल 2010

विशेष लेख: कविता में छंदानुशासन --संजीव 'सलिल'

शब्द ब्रम्ह में अक्षर, अनादि, अनंत, असीम और अद्भुत सामर्थ्य होती है. रचनाकार शब्द ब्रम्ह के प्रागट्य  का माध्यम मात्र होता है. इसीलिए सनातन प्राच्य परंपरा में प्रतिलिपि के अधिकार (कोपी राइट) की अवधारणा ही नहीं है. श्रुति-स्मृति, वेदादि के रचयिता मन्त्र दृष्टा हैं, मन्त्र सृष्टा नहीं. दृष्टा उतना ही देख और देखे को बता सकेगा जितनी उसकी क्षमता होगी.

रचना कर्म अपने आपमें जटिल मानसिक प्रक्रिया है. कभी कथ्य, कभी भाव रचनाकार को प्रेरित करते है.कि वह 'स्व' को 'सर्व' तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्त हो. रचना कभी दिल(भाव) से होती है कभी दिमाग(कथ्य) से. रचना की विधा का चयन कभी रचनाकार अपने मन से करता है कभी किसी की माँग पर. शिल्प का चुनाव भी परिस्थिति पर निर्भर होता है. किसी चलचित्र के लिए परिस्थिति के अनुरूप संवाद या पद्य रचना ही होगी लघु कथा, हाइकु या अन्य विधा सामान्यतः उपयुक्त नहीं होगी.

गजल का अपना छांदस अनुशासन है. पदांत-तुकांत, समान पदभार और लयखंड की द्विपदियाँ तथा कुल १२ लयखंड गजल की विशेषता है. इसी तरह रूबाई के २४ औजान हैं कोई चाहे और गजल या रूबाई की नयी बहर या औजान रचे भी तो उसे मान्यता नहीं मिलेगी. गजल के पदों का भार (वज्न) उर्दू में तख्ती के नियमों के अनुसार किया जाता है जो कहीं-कहीं हिन्दी की मात्र गणना से साम्य रखता है कहीं-कहीं भिन्नता. गजल को हिन्दी का कवि हिन्दी की काव्य परंपरा और पिंगल-व्याकरण के अनुरूप लिखता है तो उसे उर्दू के दाना खारिज कर देते हैं. गजल को ग़ालिब ने 'तंग गली' और आफताब हुसैन अली ने 'कोल्हू का बैल' इसी लिए कहा कि वे इस विधा को बचकाना लेखन समझते थे जिसे सरल होने के कारण सब समझ लेते हैं. विडम्बना यह कि ग़ालिब ने अपनी जिन रचनाओं को सर्वोत्तम मानकर फारसी में लिखा वे आज बहुत कम तथा जिन्हें कमजोर मानकर उर्दू में लिखा वे आज बहुत अधिक चर्चित हैं.

गजल का उद्भव अरबी में 'तशीबे' (संक्षिप्त प्रेम गीत) या 'कसीदे' (रूप/रूपसी की प्रशंसा) से तथा उर्दू में 'गजाला चश्म (मृगनयनी, महबूबा, माशूका) से वार्तालाप से हुआ कहा जाता है. अतः, नाज़ुक खयाली गजल का लक्षण हो यह स्वाभाविक है. हिन्दी-उर्दू के उस्ताद अमीर खुसरो ने गजल को आम आदमी और आम ज़िंदगी से बावस्ता किया. इस चर्चा का उद्देश्य मात्र यह कि हिन्दी में ग़ज़ल को उर्दू से भिन्न भाव भूमि तथा व्याकरण-पिंगल के नियम मिले, यह अपवाद स्वरूप हो सकता है कि कोई ग़ज़ल हिन्दी और उर्दू दोनों के मानदंडों पर खरी हो किन्तु सामान्यतः ऐसा संभव नहीं. हिन्दी गजल और उर्दू गजल में अधिकांश शब्द-भण्डार सामान्य होने के बावजूद पदभार-गणना के नियम भिन्न हैं, समान पदांत-तुकांत के नियम दोनों में मान्य है. उर्दू ग़ज़ल १२ बहरों के आधार पर कही जाती है जबकि हिन्दी गजल हिन्दी के छंदों के आधार पर रची जाती है. दोहा गजल में दोहा तथा ग़ज़ल और हाइकु ग़ज़ल में हाइकु और ग़ज़ल दोनों के नियमों का पालन होना अनिवार्य है किन्तु उर्दू ग़ज़ल में नहीं.

हिन्दी के रचनाकारों को समान पदांत-तुकांत की हर रचना को गजल कहने से बचना चाहिए. गजल उसे ही कहें जो गजल के अनुरूप हो. हिन्दी में सम पदांत-तुकांत की रचनाओं को मुक्तक कहा जाता है क्योकि हर द्विपदी अन्य से स्वतंत्र (मुक्त) होती है. डॉ. मीरज़ापुरी ने इन्हें प्रच्छन्न हिन्दी गजल कहा है. विडम्बनाओं को उद्घाटित कर परिवर्तन और विद्रोह की भाव भूमि पर रची गयी गजलों को 'तेवरी' नाम दिया गया है.

एक प्रश्न यह कि जिस तरह हिन्दी गजलों से काफिया, रदीफ़ तथा बहर की कसौटी पर खरा उतरने की उम्मीद की जाती है वैसे ही अन्य भाषाओँ (अंग्रेजी, बंगला, रूसी, जर्मन या अन्य) की गजलों से की जाती है या अन्य भाषाओँ की गजलें इन कसौटियों पर खरा उतरती हैं? अंग्रेजी की ग़ज़लों में  पद के अंत में उच्चारण नहीं हिज्जे (स्पेलिंग) मात्र मिलते हैं लेकिन उन पर कोई आपत्ति नहीं होती. डॉ. अनिल जैन के अंग्रेजी ग़ज़ल सन्ग्रह 'ऑफ़ एंड ओन' की रचनाओं में पदांत तो समान है पर लयखंड समान नहीं हैं.

हिन्दी में दोहा ग़ज़लों में हर मिसरे का कुल पदभार तो समान (१३+११) x२ = ४८ मात्रा होता है पर दोहे २३ प्रकारों में से किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. इससे लयखण्ड में  भिन्नता आ जाती है. शुद्ध दोहा का प्रयोग करने पर हिन्दी दोहा ग़ज़ल में हर मिसरा समान पदांत का होता है जबकि उर्दू गजल के अनुसार चलने पर दोहा के दोनों पद सम तुकान्ती नहीं रह जाते. किसे शुद्ध माना जाये, किसे ख़ारिज किया जाये? मुझे लगता है खारिज करने का काम समय को करने दिया जाये. हम सुधार के सुझाव देने तक सीमित रहें तो बेहतर है.

गीत का फलक गजल की तुलना में बहुत व्यापक है. 'स्थाई' तथा 'अंतरा' में अलग-अलग लय खण्ड हो सकते है और समान भी किन्तु गजल में हर शे'र और हर मिसरा समान लयखंड और पदभार का होना अनिवार्य है. किसे कौन सी विधा सरल लगती है और कौन सी सरल यह विवाद का विषय नहीं है, यह रचनाकार के कौशल पर निर्भर है. हर विधा की अपनी सीमा और पहुँच है. कबीर के सामर्थ्य ने दोहों को साखी बना दिया. गीत, अगीत, नवगीत, प्रगीत, गद्य गीत और अन्य अनेक पारंपरिक गीत लेखन की तकनीक (शिल्प) में परिवर्तन की चाह के द्योतक हैं. साहित्य में ऐसे प्रयोग होते रहें तभी कुछ नया होगा. दोहे के सम पदों की ३ आवृत्तियों, विषम पदों की ३ आवृत्तियों, सम तह विषम पदों के विविध संयोजनों से नए छंद गढ़ने और उनमें रचने के प्रयोग भी हो रहे हैं.

हिन्दी कवियों में प्रयोगधर्मिता की प्रवृत्ति ने निरंतर सृजन के फलक को नए आयाम दिए हैं किन्तु उर्दू में ऐसे प्रयोग ख़ारिज करने की मनोवृत्ति है. उर्दू में 'इस्लाह' की परंपरा ने बचकाना रचनाओं को सीमित कर दिया तथा उस्ताद द्वारा संशोधित करने पर ही प्रकाशित करने के अनुशासन ने सृजन को सही दिशा दी  जबकि हिन्दी में कमजोर रचनाओं की बाढ़ आ गयी. अंतरजाल पर अराजकता की स्थिति है. हिन्दी को जानने-समझनेवाले ही अल्प संख्यक हैं तो स्तरीय रचनाएँ अनदेखी रह जाने या न सराहे जाने की शिकायत है. शिल्प, पिंगल आदि की दृष्टि से नितांत बचकानी रचनाओं पर अनेक टिप्पणियाँ तथा स्तरीय रचनाओं पर टिप्पणियों के लाले पड़ना दुखद है.

छंद मुक्त रचनाओं और छन्दहीन रचनाओं में भेद ना हो पाना भी अराजक लेखन का एक कारण है. छंद मुक्त रचनाएँ लय और भाव के कारण एक सीमा में गेय तथा सरस होती है. वे गीत परंपरा में न होते हुए भी गीत के तत्व समाहित किये होती हैं. वे गीत के पुरातन स्वरूप में परिवर्तन से युक्त होती हैं,  किन्तु छंदहीन रचनाएँ नीरस व गीत के शिल्प तत्वों से रहित बोझिल होती हैं.               

हिंद युग्म पर 'दोहा गाथा सनातन' की कक्षाओं और गोष्ठियों के ६५ प्रसंगों तथा साहित्य शिल्पी पर 'काव्य का रचना शास्त्र' में अलंकारों पर ५८ प्रसंगों में मैंने अनुभव किया है कि पाठक को गंभीर लेखन में रुची नहीं है. समीक्षात्मक गंभीर लेखन हेतु कोई मंच हो तो ऐसे लेख लिखे जा सकते हैं.

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

सोमवार, 15 मार्च 2010

सलिल के हाइकु

आया वसंत,
इन्द्रधनुषी हुए
दिशा-दिगंत..
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शोभा अनंत
हुए मोहित, सुर
मानव संत..
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प्रीत के गीत
गुनगुनाती धूप
बनालो मीत.
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जलाते दिए
एक-दूजे के लिए
कामिनी-कंत..
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पीताभी पर्ण
संभावित जननी
जैसे विवर्ण..
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हो हरियाली
मिलेगी खुशहाली
होगे श्रीमंत..
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चूमता कली
मधुकर गुंजार
लजाती लली..
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सूरज हुआ
उषा पर निसार
लाली अनंत..
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प्रीत की रीत
जानकार न जाने
नीत-अनीत.
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क्यों कन्यादान?
अब तो वरदान
दें एकदंत..
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