मुक्तिका:
करवा चौथ
संजीव 'सलिल'
*
करवा चौथ मनाने आया है चंदा.
दूर चाँदनी छोड़ भटकता क्यों बंदा..
खाली जेब हुई माँगे उपहार प्रिया.
निकल पड़ा है माँग-बटोरे कुछ चंदा..
घर जा भैये, भौजी पलक बिछाए है.
मत महेश के शीश बैठ होकर मंदा..
सूरज है स्वर्णाभ, चाँद पीताभ सलिल'
साँझ-उषा अरुणाभ, निशा का तम गंदा..
हर दंपति को जी भर खुशियाँ दे मौला.
'सलिल' मनाता शीश झुका आनंदकंदा..
***************************
दिव्य नर्मदा : हिंदी तथा अन्य भाषाओँ के मध्य साहित्यिक-सांस्कृतिक-सामाजिक संपर्क हेतु रचना सेतु A plateform for literal, social and cultural writings. Bridges gap between HINDI and other languages, literature & other forms of expression.
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बुधवार, 27 अक्तूबर 2010
मुक्तिका: करवा चौथ संजीव 'सलिल'
प्रस्तुतकर्ता Posted by :
sanjiv verma
चिप्पियाँ Labels:
-Acharya Sanjiv Verma 'Salil',
. muktika,
/samyik hindi kavya,
bharat.,
hindi gazal,
jabalpur,
karva chauth
| आपका मत your openion |
जनम जनम का साथ-----------रानी विशाल
जनम जनम का साथ-----------रानी विशाल
मांग सिंदूर, माथे पर बिंदिया
रचाई मेहंदी दोनों हाथ
साज सिंगार कर, आज मैं निखरी
लिए भाग सुहाग की आस
प्रिय यह जनम-जनम का साथ
पुण्य घड़ी का पुण्य मिलन बना
मेरे जग जीवन की आस
पूर्ण हुई मैं, परिपूर्ण आभिलाषा
पूर्ण हुई मैं, परिपूर्ण आभिलाषा
जब से पाया पुनीत यह साथ
प्रिय यह जनम-जनम का साथ
व्रत, पूजन कर दे अर्ध्य चन्द्र को
मांगू आशीष विशाल ये आज
जियूं सुहागन, मरू सुगागन
रहे अमर प्रेम सदा साथ
प्रिय यह जनम जनम का साथ
हर युग, हर जीवन, मिले साथ तुम्हारा
रहे तुम्हीं से चमकते भाग
मैं-तुम, तुम-मैं, रहे एक सदा हम
कभी ना छूटे यह विश्वास
प्रिय यह जनम-जनम का साथ
प्रिय यह जनम-जनम का साथ
व्रत, पूजन कर दे अर्ध्य चन्द्र को
मांगू आशीष विशाल ये आज
जियूं सुहागन, मरू सुगागन
रहे अमर प्रेम सदा साथ
प्रिय यह जनम जनम का साथ
हर युग, हर जीवन, मिले साथ तुम्हारा
रहे तुम्हीं से चमकते भाग
मैं-तुम, तुम-मैं, रहे एक सदा हम
कभी ना छूटे यह विश्वास
प्रिय यह जनम-जनम का साथ
आज करवा चौथ के पावन दिन पूरी आस्था और विश्वास के साथ परम पिता परमेश्वर के चरणों में यह परम अभिलाषा समर्पित है और आप सभी मेरे ब्लॉग परिवार को भी मेरा चरण वंदन आज कमेन्ट में अपने स्नेह के साथ यही आशीष प्रदान करें कि मैं हर जीवन हर जन्म अखंड विशाल सौभाग्य प्राप्त करूँ ....
प्रस्तुतकर्ता Posted by :
sanjiv verma
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suhaag
| आपका मत your openion |
शनिवार, 23 अक्तूबर 2010
गीत करवा चौथ पर: माटी तो माँ होती है... संजीव 'सलिल'
गीत करवा चौथ पर:
माटी तो माँ होती है...
संजीव 'सलिल'
**
माटी तो माँ होती है...
मैं भी माँ हूँ पर माँ बनने से पहले मैं नारी हूँ.
जो है मेरा प्रीतम प्यारा मैं भी उसको प्यारी हूँ.
सास नहीं सासू माँ ने मेरी आरती उतारी थी.
परिचय-पल से कुलवधू की छवि देखी, कमी बिसारी थी..
लगा द्वार पर हस्त-छाप मैंने पल में था जान लिया.
सासू माँ ने अपना वारिस मुझको ही है मान लिया..
मुझसे पहले कभी उन्हीं के हाथों की थी छाप लगी.
मुझ पर, छापों पर थीं उनकी नजरें गहरी प्रेम-पगी..
गले लगा, पूजा गृह ले जा पीढ़े पर बैठाया था.
उनके दिल की धड़कन में मैंने निज माँ को पाया था..
दीपक की दो बाती मुझसे एक करा वे मुस्काईं.
कुलवधू नहीं, मिली है बेटी, इसमें मेरी परछाईं.
सुन सिहरी, कुलदेवों की पूजा कर ज्यों ही पाँव छुए.
'देख इसे कुछ कष्ट न हो, वरना डाटूंगी तुझे मुए.'
माँ बेटे से बोल रहीं थी: 'इसका बहुत ध्यान रखना.
कुल-लक्ष्मी गुणवती नेक है, इसका सदा मान रखना ..'
मेरे नयन सजल, वे बोलीं: 'बेटी! जा आराम करो.
देती हूँ आशीष, समुज्ज्वल दोनों कुल का नाम करो.'
पर्व और त्यौहार मनाये हमने साथ सदा मिलकर.
गृह-बगिया में सुमन-कली जैसे रहते हैं हम खिलकर..
आई करवा चौथ, पुलक मैं पति की कुशल मनाऊँगी.
निर्जल व्रत कर मन की मृदुता को दृढ़-जयी बनाऊँगी..
सोचा, माँ बोली: 'व्रत मैं कर लूँगी, तू कुछ खा-पी ले.
उमर पड़ी है व्रत को, अभी लड़कपन है, हँसकर जी ले'
'माँ मत रोकें, व्रत करने दें, मेरे मन की आस यही.
जीवन-धन की कुशल न मानूँ इससे बढ़कर त्रास नहीं..'
माँ ने रोका, सविनय मैंने उन्हें मनाया-फुसलाया.
अनुमति पाकर मन-प्राणों ने जैसे नव जीवन पाया..
नित्य कार्य पश्चात् करी पूजा की हमने तैयारी.
तन-मन हम दोनों के प्रमुदित, श्वास-श्वास थी अग्यारी..
सास-बहू से माँ-बेटी बन, हमने यह उपवास किया.
साँझ हुई कब पता न पाया, जी भर जीवन आज जिया..
कुशल मनाना किसी स्वजन की देता है आनंद नया.
निज बल का अनुमान न था, अनुभूति नयी यह हुई पिया..
घोर कष्ट हो, संकट आये, तनिक न मैं घबड़ाऊँगी.
भूख-प्यास जैसे हर आपद-विपदा पर जय पाऊँगी..
प्रथा पुरातन, रीति सनातन, मैं भी इसकी बनी कड़ी.
सच ही मैं किस्मतवाली हूँ, थी प्रसन्नता मुझे बड़ी..
मैका याद न आया पल भर, प्रिय को पल-पल याद किया.
वे आये-बोले: 'पल भर भी ध्यान न तुमसे हटा प्रिया..''
चाँद देख पूजा की तो निज मन को था संतोष नया.
विजयी नारी भूख-प्यास पर, अबला नाहक कहा गया..
पिता-पुत्र के नयनों में, जो कुछ था कहा न सुना गया.
श्वास-श्वास का, आस-आस का, सरस स्वप्न नव बुना गया..
माँ का सच मैंने भी पाया, धरती धैर्य न खोती है.
पति-संतानों का नारी तपकर दृढ़ संबल होती है.
नारी ही माँ होती है.
***************************************
माटी तो माँ होती है...
संजीव 'सलिल'
**
माटी तो माँ होती है...
मैं भी माँ हूँ पर माँ बनने से पहले मैं नारी हूँ.
जो है मेरा प्रीतम प्यारा मैं भी उसको प्यारी हूँ.
सास नहीं सासू माँ ने मेरी आरती उतारी थी.
परिचय-पल से कुलवधू की छवि देखी, कमी बिसारी थी..
लगा द्वार पर हस्त-छाप मैंने पल में था जान लिया.
सासू माँ ने अपना वारिस मुझको ही है मान लिया..
मुझसे पहले कभी उन्हीं के हाथों की थी छाप लगी.
मुझ पर, छापों पर थीं उनकी नजरें गहरी प्रेम-पगी..
गले लगा, पूजा गृह ले जा पीढ़े पर बैठाया था.
उनके दिल की धड़कन में मैंने निज माँ को पाया था..
दीपक की दो बाती मुझसे एक करा वे मुस्काईं.
कुलवधू नहीं, मिली है बेटी, इसमें मेरी परछाईं.
सुन सिहरी, कुलदेवों की पूजा कर ज्यों ही पाँव छुए.
'देख इसे कुछ कष्ट न हो, वरना डाटूंगी तुझे मुए.'
माँ बेटे से बोल रहीं थी: 'इसका बहुत ध्यान रखना.
कुल-लक्ष्मी गुणवती नेक है, इसका सदा मान रखना ..'
मेरे नयन सजल, वे बोलीं: 'बेटी! जा आराम करो.
देती हूँ आशीष, समुज्ज्वल दोनों कुल का नाम करो.'
पर्व और त्यौहार मनाये हमने साथ सदा मिलकर.
गृह-बगिया में सुमन-कली जैसे रहते हैं हम खिलकर..
आई करवा चौथ, पुलक मैं पति की कुशल मनाऊँगी.
निर्जल व्रत कर मन की मृदुता को दृढ़-जयी बनाऊँगी..
सोचा, माँ बोली: 'व्रत मैं कर लूँगी, तू कुछ खा-पी ले.
उमर पड़ी है व्रत को, अभी लड़कपन है, हँसकर जी ले'
'माँ मत रोकें, व्रत करने दें, मेरे मन की आस यही.
जीवन-धन की कुशल न मानूँ इससे बढ़कर त्रास नहीं..'
माँ ने रोका, सविनय मैंने उन्हें मनाया-फुसलाया.
अनुमति पाकर मन-प्राणों ने जैसे नव जीवन पाया..
नित्य कार्य पश्चात् करी पूजा की हमने तैयारी.
तन-मन हम दोनों के प्रमुदित, श्वास-श्वास थी अग्यारी..
सास-बहू से माँ-बेटी बन, हमने यह उपवास किया.
साँझ हुई कब पता न पाया, जी भर जीवन आज जिया..
कुशल मनाना किसी स्वजन की देता है आनंद नया.
निज बल का अनुमान न था, अनुभूति नयी यह हुई पिया..
घोर कष्ट हो, संकट आये, तनिक न मैं घबड़ाऊँगी.
भूख-प्यास जैसे हर आपद-विपदा पर जय पाऊँगी..
प्रथा पुरातन, रीति सनातन, मैं भी इसकी बनी कड़ी.
सच ही मैं किस्मतवाली हूँ, थी प्रसन्नता मुझे बड़ी..
मैका याद न आया पल भर, प्रिय को पल-पल याद किया.
वे आये-बोले: 'पल भर भी ध्यान न तुमसे हटा प्रिया..''
चाँद देख पूजा की तो निज मन को था संतोष नया.
विजयी नारी भूख-प्यास पर, अबला नाहक कहा गया..
पिता-पुत्र के नयनों में, जो कुछ था कहा न सुना गया.
श्वास-श्वास का, आस-आस का, सरस स्वप्न नव बुना गया..
माँ का सच मैंने भी पाया, धरती धैर्य न खोती है.
पति-संतानों का नारी तपकर दृढ़ संबल होती है.
नारी ही माँ होती है.
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