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सोमवार, 25 जुलाई 2011

छंद सलिला : मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त संजीव 'सलिल'

छंद सलिला :
मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त

संजीव 'सलिल'
*
 
मनहरण घनाक्षरी छंद एक वर्णिक चतुश्पदिक छंद है. इसे कवित्त भी कहते है.
इसमें चार पद (पंक्ति) होते हैं. हर पद में ४ चरण होते हैं. पहले तीन चरणों में ८-८ तथा अंतिम चरण में ७ वर्ण होते हैं.
इसमें मात्राओं की नहीं, वर्णों अर्थात अक्षरों की गणना की जाती है. 
चरणान्त में ८-८-८-७ अक्षरों पर यति या विराम रखने का विधान है. 
पद (पंक्ति) के अंत में लघु-गुरु हो. 
इस छंद में भाषा के प्रवाह और गति पर विशेष ध्यान दें.
इस छंद का नामकरण 'घन' शब्द पर है जिसके हिंदी में ४ अर्थ १. मेघ/बादल, २. सघन/गहन, ३. बड़ा हथौड़ा, तथा ४. किसी संख्या का उसी में ३ बार गुणा (क्यूब) हैं. 
इस छंद में चारों अर्थ प्रासंगिक हैं. 
घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मेघ गर्जन की तरह निरंतरता की प्रतीति हो. 
घनाक्षरी में शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्दी में हो. 
घनाक्षरी पाठक/श्रोता के मन पर प्रहर सा कर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है. 
घनाक्षरी में ८ वर्णों की ३ बार आवृत्ति है.

घनाक्षरी सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
हिन्दी खड़ी बोली
घनाक्षरी रचना विधान :

आठ-आठ-आठ-सात, पर यति रखकर, मनहर घनाक्षरी, छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर चरण के आखिर में, 'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिये..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम, गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण- 'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
*
भारत गान :
भारती की आरती उतारिये 'सलिल' नित, सकल जगत को सतत सिखलाइये.
जनवाणी हिंदी को बनायें जगवाणी हम, भूत अंगरेजी का न शीश पे चढ़ाइये.
बैर ना विरोध किसी बोली से तनिक रखें, पढ़िए हरेक भाषा, मन में बसाइये.
शब्द-ब्रम्ह की सरस साधना करें सफल, छंद गान कर रस-खान बन जाइए.
*
भारत के, भारती के, चारण हैं, भाट हम, नित गीत गा-गाकर आरती उतारेंगे.
श्वास-आस, तन-मन, जान भी निसारकर,  माटी शीश धरकर, जन्म-जन्म वारेंगे..
सुंदर है स्वर्ग से भी, पावन है, भावन है, शत्रुओं को घेर घाट मौत के उतारेंगे-
कंकर भी शंकर है, दिक्-नभ अम्बर है, सागर-'सलिल' पग नित्य ही पखारेंगे..
*
नया या पुराना कौन?, कोई भी रहे न मौन, करके अछूती बात, दिल को छू जाइए. 
छंद है 'सलिल'-धार, अभिव्यक्ति दें निखार, शब्दों से कर सिंगार, रचना सजाइए..
भाव, बिम्ब, लय, रस, अलंकार पञ्चतत्व, हो विदेह देह ऐसी, कविता सुनाइए.
रसखान रसनिधि, रसलीन करें जग, आरती सरस्वती की, साथ मिल गाइए..
*

रविवार, 24 जुलाई 2011

घनाक्षरी सलिला : छत्तीसगढ़ी में अभिनव प्रयोग. -- संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी सलिला :
छत्तीसगढ़ी में अभिनव प्रयोग.
संजीव 'सलिल'
*
अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीना बहावथे.
बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानी भावथे..
बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरी इठलावथे.
भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारी भावथे..
*
नवी रीत बनन दे, नीक न्याब चलन दे, होसला ते बढ़न दे, कउवा काँव-काँव.
अगुवा के कोचिया, फगुवा के लोटिया, बिटिया के बोझिया, पिपल्या के छाँव..
अगोर पुरवईया, बटोर माछी भइया, अंजोर बैल-गइया, कुठरिया के ठाँव.
नमन माटी मइया, गले लगाये सइयां , बढ़ाव बैल-गइया, सुरग होथ गाँव....
*
देस के बिकास बर, सबन उजास बर, सुरसती दाई माई, दया बरसाय दे.
नव-नवा काम होथ, देस स्वर्ग धाम होथ, धरती म धान बोथ, फसल उगाय दे..
टूरा-टूरी गुणी होथ, मिहनती-धुनी होथ, हिरदा से नेह होथ, सलीका सिखाय दे.
डौका-डौकी चाह पाल, भाड़ मा दें डाह डाल, ऊँचा ही रखें कपाल, रीत नव बनाय दे..
*
रचना विधान: वर्णात्मक छंद, चार पद, हर पद में चार चरण, हर चरण में ८-८-८-७ पर यति, चरणान्त दीर्घ,  
Acharya Sanjiv Salil

शुक्रवार, 22 जुलाई 2011

घनाक्षरी सलिला: संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी सलिला:
संजीव 'सलिल'
*
बुन्देली-
जाके कर बीना सजे, बाके दर सीस नवे, मन के विकार मिटे, नित गुन गाइए.
ज्ञान, बुधि, भासा, भाव, तन्नक न हो अभाव, बिनत रहे सुभाव, गुनन सराहिए..
किसी से नाता लें जोड़, कब्बो जाएँ नहीं तोड़, फालतू न करें होड़, नेह सों निबाहिए.
हाथन तिरंगा थाम, करें सदा राम-राम, 'सलिल' से हों न वाम, देस-वारी जाइए..
*
छत्तीसगढ़ी-
अँचरा मा भरे धान, टूरा गाँव का किसान, धरती मा फूँक प्राण, पसीना बहावथे.
बोबरा-फार बनाव, बासी-पसिया सुहाव, महुआ-अचार खाव, पंडवानी भावथे..
बारी-बिजुरी बनाय, उरदा के पीठी भाय, थोरको न ओतियाय, टूरी इठलावथे.
भारत के जय बोल, माटी मा करे किलोल, घोटुल मा रस घोल, मुटियारी भावथे..
*
निमाड़ी-
गधा का माथा का सिंग, जसो नेता गुम हुयो, गाँव खs बटोsर वोsट, उल्लू की दुम हुयो.
मनख को सुभाव छे, नहीं सहे अभाव छे, करे खांव-खांव छे, आपs से तुम हुयो.. 
टीला पाणी झाड़ नद्दी, हाय खोद रए पिद्दी, भ्रष्टs सरsकारs रद्दी, पता नामालुम हुयो.
'सलिल' आँसू वादला, धरा कहे खाद ला, मिहsनतs का स्वाद पा,  दूर मातम हुयो..
*
मालवी: 
दोहा:
भणि ले  म्हारा देस की, सबसे राम-रहीम.
जल ढारे पीपल तले, अँगना चावे नीम.

शरद की चांदणी से, रात सिनगार करे, गगन से फूल झरे, बिजुरी भू पे गिरे.
आधी राती भाँग बाटी, दिया की बुझाई बाती, मिसरी-बरफ़ घोल्यो, नैना हैं भरे-भरे.
भाभीनी जेठानी रंगे, काकीनी मामीनी भीजें, सासू-जाया नहीं आया, दिल धीर न धरे..
रंग घोल्यो हौद भर, बैठी हूँ गुलाल धर, राह में रोके हैं यार, हाय! टारे न टरे..
*
राजस्थानी:
जीवण का काचा गेला, जहाँ-तहाँ मेला-ठेला, भीड़-भाड़ ठेलमठेला, मोड़ तरां-तरां का.
ठूँठ सरी बैठो काईं?, चहरे पे आई झाईं, खोयी-खोयी परछाईं, जोड़ तरां-तरां का...
चाल्यो बीच बजारा क्यों?, आवारा बनजारा क्यों?, फिरता मारा-मारा क्यों?, हार माने दुनिया .
नाव कनारे लागैगी, सोई किस्मत जागैगी, मंजिल पीछे भागेगी, तोड़ तरां-तरां का....
*
छंद विधान : चार पद, हर पद में चार चरण, ८-८-८-७ पर यति,  

Acharya Sanjiv Salil

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शुक्रवार, 17 जून 2011

छंद सलिला: नवीन चतुर्वेदी


 
 अमृत ध्वनि छन्‍द - उन्नत धारा प्रेम की

उन्नत धारा प्रेम की, बहे अगर दिन रैन|
तब मानव मन को मिले, मन-माफिक सुख चैन||
मन-माफिक सुख चैन, अबाधित होंय अनन्दित|
भाव सुवासित, जन हित लक्षित, मोद मढें नित|
रंज  किंचित, कोई न वंचित, मिटे अदावत|
रहें इहाँ-तित, सब जन रक्षित, सदा समुन्नत||


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घनाक्षरी कवित्त - ढूँढ के छली को पेश कीजै दरबार में

आज सपने में ललिता ने ये दिया हुकुम,
ढूँढ के छली को पेश कीजे दरबार में|

दिलों को दुखाने की मिलेगी सज़ा उसे आज,
जुर्म इकबाल होगा अदालतेप्यार में|

प्रेम का कनून तोड़ा, राधा जी से मुँह मोड़ा,
बख्शा न जाएगा वो, छपा दो अख़बार में|

सभी जगा ढूँढा, पर, मिला नहीं श्याम, चूँकि-
बैठा था वो तो छुप के दिलेसरकार में||

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सांगोपांग सिंहावलोकन छन्‍द - 
 
तान दें पताका उच्च हिंद की जहान में
ध्यान दें समाज पर अग्रज हमारे सब,
अनुजों की कोशिशों को बढ़ के उत्थान दें| 

उत्थान दें
 जन-मन रुचिकर रिवाजों को,

भूत काल वर्तमान भावी को भी मान दें| 

मान दें
 मनोगत विचारों को समान रूप,
हर बार अपनी ही जिद्द को न तान दें| 

तान दें
 पताका उच्च हिंद की जहान में औ,

उस के तने रहने पे भी फिर ध्यान दें||
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ग़ज़ल - फगुआ उमंग तरंग में

 सजावटें बनावटें बुनावटें घुमावटें|
चिठिया में होंवो लिखावटें हरें सकलअकुलाहटें||

मृदुहास मयपरिहास भीवही खास आस जगा गया|
मधुमास कीअभिलाष मेंअतिशय ढ़ी झुँझलाहटें||

यदि प्रेम हैडरिए नहींअभिव्यक्त भी करिए सजन|
फगुआ उमंग तरंग मेंक्यूँ  लूटें साथ तरावटें||

अनुपमअमितअविरलअगमअभिनवअकथअनिवार्य सा|
अमि-रस भरायहु प्रेम-पथ चलें यहाँ कडुवाहटें||

एक घनाक्षरी: एक सुर में गाइए..... संजीव 'सलिल'

एक घनाक्षरी:
एक सुर में गाइए.....
संजीव 'सलिल'
*
नया या पुराना कौन?, कोई भी रहे न मौन, 
करके अछूती बात, दिल को छू जाइए. 
छंद है 'सलिल'-धार, अभिव्यक्ति दें निखार, 
शब्दों से कर सिंगार, रचना सजाइए..
भाव, बिम्ब, लय, रस, अलंकार पञ्चतत्व,
हो विदेह देह ऐसी, कविता सुनाइए.
रसखान रसनिधि, रसलीन करें जग,
आरती सरस्वती की, साथ मिल गाइए..
************

बृहस्पतिवार, 16 जून 2011

एक घनाक्षरी ये तो सब जानते हैं संजीव 'सलिल'

एक घनाक्षरी
ये तो सब जानते हैं
संजीव 'सलिल'
*
ये तो सब जानते हैं, जान के न मानते हैं,
जग है असार पर, सार बिन चले ना.
मायका सभी को लगे, भला किन्तु ये है सच,
काम किसी का भी, ससुरार बिन चले ना..
मनुहार इनकार, इकरार इज़हार, 
भुजहार अभिसार, प्यार बिन चले ना.
रागी हो विरागी हो या, हतभागी बड़भागी,
दुनिया में काम कभी, नार बिन चले ना..
***********

शनिवार, 11 जून 2011

घनाक्षरी: नार बिन चले ना.. -----संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी:
संजीव 'सलिल'
नार बिन चले ना..
*
घर के न घाट के हैं, राह के न बाट के हैं, जो न सच जानते हैं, प्यार बिन चले ना.
जीत के भी हारते हैं, जो न प्राण वारते हैं, योद्धा यह जानते हैं, वार बिन चले ना..
दिल को जो जीतते हैं, कभी नहीं रीतते हैं, मन में वे ठानते हैं, हार बिन चले ना.
करते प्रयास हैं जो, वरते उजास हैं जो, सत्य अनुमानते हैं, नार बिन चले ना..
*
रम रहो राम जी में, जम रहो जाम जी में, थम रहो काम जी में, यार बिन चले ना.
नमन करूँ वाम जी, चमन करो धाम जी, अमन आठों याम जी, सार बिन चले ना..
कौन सरकार यहाँ?, कौन सरदार यहाँ?, कौन दिलदार यहाँ?, प्यार बिन चले ना.
लगाओ कचनार जी, लुभाओ रतनार जी, न तोडिये किनार जी, नार बिन चले ना..
*
वतन है बाजार जी, लीजिये उधार जी, करिए न सुधार जी, रार बिन चले ना. 
सासरे जब जाइए, सम्मान तभी पाइए, सालीजी को लुभाइए, कार बिन चले ना..
उतार हैं चढ़ाव हैं,  अभाव हैं निभाव हैं, स्वभाव हैं प्रभाव हैं, सार बिन चले ना.
करिए प्रयास खूब, वरिए हुलास खूब, रचिए उजास खूब, नार बिन चले ना..
*
नार= ज्ञान, पानी, नारी, शिशु जन्म के समय काटे जाने वाली नस.

घनाक्षरी: ---संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी:
संजीव 'सलिल'
*
बाबा रामदेव जी हैं, विश्व की धरोहर, बाबा रामदेव जी के, साथ खड़े होइए.
हाथ मलें शीश झुका, शीश पीटें बाद में ना, कोई अनहोनी देख, बाद में न रोइए..
सरकार को जगायें, सरदार को उठायें, सड़कों पर आइये, राजनीति धोइए.
समय पुकारता है, सोयें खोयें रोयें मत, तुमुल निनाद कर, क्रांति-बीज बोइए..
*
कौन किसी का यहाँ है?, कौन किसी का सगा है?, सेंकते सभी को देखा, रोटी निज स्वार्थ की.
लोकतंत्र में न लोक, मत सुना जा रहा है, खून चूसता है तंत्र, अदेखी लोकार्थ की.
घूस लेता नेता रोज, रिश्वतों का बोलबाला, अन्ना-बाबा कर रहे हैं, बात सर्वार्थ की.
घरों से निकल आयें, गीत क्रांति के सुनायें, बीन शांति की बजायें, नीति परमार्थ की.
*
अपना-पराया भूल, सह ले चुभन-शूल, माथे पर लगा धूल, इस प्यारे देश की.
माँ की कसम तुझे, पीछे मुड़  देख मत, लानत मिलेगी यदि, जां की फ़िक्र लेश की..
प्रतिनिधि को पकड़, नत मत हो- अकड़, बात मनवा झगड़, तजे नीति द्वेष की.
'सलिल' विदेश में जो, धन इस देश का है, देश वापिस लाइये, है शपथ अशेष की..
*
(मनहरण, घनाक्षरी, कवित्त छंद : ४-४-४-७)
  

सोमवार, 6 जून 2011

घनाक्षरी छंद : सामयिक नीतिपरक : .... राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये.. - संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी छंद :
--संजीव 'सलिल'

*
(८-८-८-७)
सामयिक नीतिपरक : ....
राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये..

धन परदेश में जो, गया इसी देश का है, देश-हित चाहते तो, देश में ले आइए
बाबा रामदेव जी ने, बात ठीक-ठीक की है, जन-मत चाहिए तो, उनको मनाइए..
कुमति हुई है मति, कोंगरेसियों की आज, संत से असंत को न, आप लड़वाइए.
सम्हल न पाये बात, इतनी बिगाड़ें मत, राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइए..
*
कुटिल कपिल ने जो, किया है कमीनापन, देख देश दुखी है न, सच झुठलाइए.
'मन' ने अमन को क्यों, खतरे में आज डाला?, भूल को सुधार लें, न नाश को बुलाइए..
संत-अपमान को न, सहन करेगा जन, चुनावी पराजय की, न सचाई भुलाइए.
'सलिल' सलाह मान, साधुओं का करें मान, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये..
*
काला धन जिनका है, क्यों न उनको फाँसी हो?, देश का विकास इसी, धन से कराइए.
आरती उतारते हैं, लुच्चे-लोफरों की- कुछ, शर्म करें नारियों का, मान न घटाइए.
पैदा तुम को भी किया, नारी ने ही पाल-पोस, नारी की चरण-रज, माथ से लगाइए..
नेता सेठ अफसर,  बुराई की जड़ में हैं, राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये..
*
Acharya Sanjiv Salil

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शुक्रवार, 3 जून 2011

घनाक्षरी ------संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी
संजीव 'सलिल'

*
.... राजनीति का अखाड़ा घर न बनाइये..
नीतिपरक :
जनगण हितकर, लोकनीति शीश धर, पद-मद भूलकर, देश को चलाइए.
सबसे अधिक दीन, सबसे अधिक हीन, जो है हित उसका न, कभी भी भुलाइए..
दीनबंधु दीनानाथ, द्वारिका के अधिपति, सम राज-पाट तज, मीत अपनाइए..
कंस को पछारिए या, मुरली को बजाइए, राजनीति का अखाड़ा, घर न बनाइये..
*
लाख़ मतभेद रहें, पर मनभेद न हों, भाई को गले हमेशा, हँस के लगाइए.
लात मार दूर कर, दशमुख-अनुज सा, दुश्मन को न्योत घर, कभी भी न लाइए..
भाई को दुश्मन कह, इंच भर भूमि न दे, नारि-अपमान कर, नाश न बुलाइए.
छल-छद्म, दाँव-पेंच, कूटनीति, दंद-फंद, राज नीति का अखाड़ा घर न बनाइये..
*
.....बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है..
शहनाई गूँज रही, नाच रहा मन मोर, जल्दी से हल्दी लेकर, करी मनुहार है.
आकुल हैं-व्याकुल हैं, दोनों एक-दूजे बिन, नया-नया प्रेम रंग, शीश पे सवार है..
चन्द्रमुखी, सूर्यमुखी, ज्वालामुखी रूप धरे, सासू की समधन पे, जग बलिहार है..
 गेंद जैसा या है ढोल, बन्ना तो है अनमोल, बन्नो का बदन जैसे, क़ुतुब मीनार है..
*
....देख तेरी सुंदरता चाँद भी लजाया है..
जिसका जो जोड़ीदार, करे उसे वही प्यार, कभी फूल कभी खार, मन के मन भाया है.
पास आये सुख मिले, दूर जाये दुःख मिले, साथ रहे पूर्ण करे, जिया हरषाया है..
चाह वाह आह दाह, नेह नदिया अथाह, कलकल हो प्रवाह, डूबा-उतराया है.
गर्दभ कहे गधी से, आँख मूँद कर जोड़, देख तेरी सुन्दरता चाँद भी लजाया है..
*
.... नार बिन चले ना.
पाँव बिन चल सके, छाँव बिन ढल सके, गाँव बिन पल सके, नार बिन चले ना.
नार करे वार जब, नैनन में नार आये, नार बाँध कसकर, नार बिन पले ना..
नार कटे ढोल बजे, वंश-बेल आगे बढ़े, लडुआ-हरीरा बँटे, बिन नार जले ना.
'सलिल' नवीन नार, नगद या हो उधार, हार प्यार अंगार, टाले से टले ना..
(छंद विधान : ८-८-८-७)
**********

Acharya Sanjiv Salil

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सोमवार, 30 मई 2011

घनाक्षरी / मनहरण कवित्त --- योगराज प्रभाकर

 घनाक्षरी / मनहरण कवित्त  
योगराज प्रभाकर 
Encyclopedia of Sikh Literature
Guru Shabd Ratnakar
Mahaan-Kosh
By Bhai Kahan Singh Nabha ji.
Excerpts from page no. 1577-1579



(अ) घनाक्षरी : यह छंद "कबित्त" का ही एक रूप है, लक्षण - प्रति चरण ३२ अक्षर, ८-८ अक्षरों पर विश्राम, अंत २ लघु !


निकसत म्यान ते ही, छटा घन म्यान ते ही
कालजीह लह लह, होय रही हल हल,
लागे अरी गर गेरे, धर पर धर सिर,
धरत ना ढहर चारों, चक्क परैं चल चल !

(आ) घनाक्षरी का दूसरा रूप है "रूप-घनाक्षरी", लक्षण: प्रति चरण ३२ अक्षर, १६-१६ पर दो विश्राम, इक्त्तीस्वां (३१ वाँ) दीर्घ, बत्तीसवां (३२ वाँ ) लघु !
मिसाल :

अबिचल नगर उजागर सकल जग
जाहर जहूर जहाँ जोति है जबर जान
खंडे हैं प्रचंड खर खड़ग कुवंड धरे
खंजर तुफंग पुंज करद कृपान बान !

(इ) घनाक्षरी का तीसरा रूप है "जलहरण", लक्षण: रूप है प्रति चरण ३२ अक्षर, १६-१६ पर दो विश्राम, इक्त्तीस्वां (३१ वाँ) लघु, बत्तीसवां (३२ वाँ ) दीर्घ, !

देवन के धाम धूलि ध्व्स्न कै धेनुन की
धराधर द्रोह धूम धाम कलू धांक परा
साहिब सुजन फ़तेह सिंह देग तेग धनी
देत जो न भ्रातन सो सीस कर पुन्न हरा !

(ई) घनाक्षरी का चौथा रूप है "देव-घनाक्षरी", लक्षण: रूप है प्रति चरण ३३ अक्षर, तीन विश्राम ८ पर, चौथा ९ पर, अंत में "नगण " !

सिंह जिम गाजै सिंह,
सेना सिंह घटा अरु,
बीजरी ज्यों खग उठै,
तीखन चमक चमक

घनाक्षरी / मनहरण कवित्त ... झटपट करिए --संजीव 'सलिल'

घनाक्षरी / मनहरण कवित्त
... झटपट करिए
संजीव 'सलिल'
*
लक्ष्य जो भी वरना हो, धाम जहाँ चलना हो,
काम जो भी करना हो, झटपट करिए.
तोड़ना नियम नहीं, छोड़ना शरम नहीं,
मोड़ना धरम नहीं, सच पर चलिए.
आम आदमी हैं आप, सोच मत चुप रहें,
खास बन आगे बढ़, देशभक्त बनिए-
गलत जो होता दिखे, उसका विरोध करें,
'सलिल' न आँख मूँद, चुपचाप सहिये.
*
छंद विधान: वर्णिक छंद, आठ चरण,
८-८-८-७ पर यति, चरणान्त लघु-गुरु.
*********
Acharya Sanjiv Salil

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शनिवार, 28 मई 2011

छंद परिचय: मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त -- संजीव 'सलिल'

मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त

संजीव 'सलिल'
*
मनहरण घनाक्षरी छंद एक वर्णिक छंद है.
इसमें मात्राओं की नहीं, वर्णों अर्थात अक्षरों की गणना की जाती है. ८-८-८-७ अक्षरों पर यति या विराम रखने का विधान है. चरण (पंक्ति) के अंत में लघु-गुरु हो. इस छंद में भाषा के प्रवाह और गति पर विशेष ध्यान दें. स्व. ॐ प्रकाश आदित्य ने इस छंद में प्रभावी हास्य रचनाएँ की हैं.

इस छंद का नामकरण 'घन' शब्द पर है जिसके हिंदी में ४ अर्थ १. मेघ/बादल, २. सघन/गहन, ३. बड़ा हथौड़ा, तथा ४. किसी संख्या का उसी में ३ बार गुणा (क्यूब) हैं. इस छंद में चारों अर्थ प्रासंगिक हैं. घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मेघ गर्जन की तरह निरंतरता की प्रतीति हो. घंक्षरी में शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्दी में हो. घनाक्षरी पाठक/श्रोता के मन पर प्रहर सा कर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है.

घनाक्षरी में ८ वर्णों की ३ बार आवृत्ति है. ८-८-८-७ की बंदिश कई बार शब्द संयोजन को कठिन बना देती है. किसी भाव विशेष को अभिव्यक्त करने में कठिनाई होने पर कवि १६-१५ की बंदिश अपनाते रहे हैं. इसमें आधुनिक और प्राचीन जैसा कुछ नहीं है. यह कवि के चयन पर निर्भर है. १६-१५ करने पर ८ अक्षरी चरणांश की ३ आवृत्तियाँ नहीं हो पातीं. 

मेरे मत में इस विषय पर भ्रम या किसी एक को चुनने जैसी कोई स्थिति नहीं है. कवि शिल्पगत शुद्धता को प्राथमिकता देना चाहेगा तो शब्द-चयन की सीमा में भाव की अभिव्यक्ति करनी होगी जो समय और श्रम-साध्य है. कवि अपने भावों को प्रधानता देना चाहे और उसे ८-८-८-७ की शब्द सीमा में न कर सके तो वह १६-१५ की छूट लेता है.

सोचने का बिंदु यह है कि यदि १६-१५ में भी भाव अभिव्यक्ति में बाधा हो तो क्या हर पंक्ति में १६+१५=३१ अक्षर होने और १६ के बाद यति (विराम) न होने पर भी उसे घनाक्षरी कहें? यदि हाँ तो फिर छन्द में बंदिश का अर्थ ही कुछ नहीं होगा. फिर छन्दबद्ध और छन्दमुक्त रचना में क्या अंतर शेष रहेगा. यदि नहीं तो फिर ८-८-८ की त्रिपदी में छूट क्यों?

उदाहरण हर तरह के अनेकों हैं. उदाहरण देने से समस्या नहीं सुलझेगी. हमें नियम को वरीयता देनी चाहिए. इसलिए मैंने प्रचालन के अनुसार कुछ त्रुटि रखते हुए रचना भेजी ताकि पाठक पढ़कर सुधारें और ऐसा न हों पर नवीन जी से अनुरोध किया कि वे सुधारें. पाठक और कवि दोनों रचनाओं को पढ़कर समझ सकते हैं कि बहुधा कवि भाव को प्रमुख मानते हुए और शिल्प को गौड़ मानते हुए या आलस्य या शब्दाभाव या नियम की जानकारी के अभाव में त्रुटिपूर्ण रचना प्रचलित कर देता है जिसे थोडा सा प्रयास करने पर सही शिल्प में ढाला जा सकता है.

अतः, मनहरण घनाक्षरी छंद का शुद्ध रूप तो ८-८-८-७ ही है. ८+८, ८+७ अर्थात १६-१५, या ३१-३१-३१-३१ को शिल्पगत त्रुटियुक्त घनाक्षरी ही माँना जा सकता है. नियम तो नियम होते हैं. नियम-भंग महाकवि करे या नवोदित कवि दोष ही कहलायेगा. किन्हीं महाकवियों के या बहुत लोकप्रिय या बहुत अधिक संख्या में उदाहरण देकर गलत को सही नहीं कहा जा सकता. शेष रचना कर्म में नियम न मानने पर कोई दंड तो होता नहीं है सो हर रचनाकार अपना निर्णय लेने में स्वतंत्र है.

घनाक्षरी रचना विधान :

आठ-आठ-आठ-सात पर यति रखकर,
मनहर घनाक्षरी छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर चरण के आखिर में,
'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिये..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधार सम,
गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण-
'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
*
वर्षा-वर्णन :
उमड़-घुमड़कर, गरज-बरसकर,
जल-थल समकर, मेघ प्रमुदित है.
मचल-मचलकर, हुलस-हुलसकर,
पुलक-पुलककर, मोर नरतित है..
कलकल,छलछल, उछल-उछलकर,
कूल-तट तोड़ निज, नाद प्रवहित है.
टर-टर, टर-टर, टेर पाठ हेर रहे,
दादुर 'सलिल' संग स्वागतरत है..
*
भारत गान :
भारत के, भारती के, चारण हैं, भाट हम,
नित गीत गा-गाकर आरती उतारेंगे.
श्वास-आस, तन-मन, जान भी निसारकर,
माटी शीश धरकर, जन्म-जन्म वारेंगे..
सुंदर है स्वर्ग से भी, पावन है, भावन है,
शत्रुओं को घेर घाट मौत के उतारेंगे-
कंकर भी शंकर है, दिक्-नभ अम्बर है,
सागर-'सलिल' पग नित्य ही पखारेंगे..
*
हास्य घनाक्षरी
 सत्ता जो मिली है तो जनता को लूट खाओ,
मोह होता है बहुत घूस मिले धन का|

नातों को भुनाओ सदा, वादों को भुलाओ सदा,
चाल चल लूट लेना धन जन-जन का|

घूरना लगे है भला, लुगाई गरीब की को,
फागुन लगे है भला, साली-समधन का|

विजया भवानी भली, साकी रात-रानी भली,
चौर्य कर्म भी भला है आँख-अंजन का||

मंगलवार, 24 मई 2011

छंद परिचय: मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त -- संजीव 'सलिल'

छंद परिचय:
मनहरण घनाक्षरी छंद/ कवित्त

संजीव 'सलिल' *
मनहरण घनाक्षरी छंद एक वर्णिक छंद है.
इसमें मात्राओं की नहीं, वर्णों अर्थात अक्षरों की गणना की जाती है. ८-८-८-७ अक्षरों पर यति या विराम रखने का विधान है. चरण (पंक्ति) के अंत में लघु-गुरु हो. इस छंद में भाषा के प्रवाह और गति पर विशेष ध्यान दें. स्व. ॐ प्रकाश आदित्य ने इस छंद में प्रभावी हास्य रचनाएँ की हैं.
इस छंद का नामकरण 'घन' शब्द पर है जिसके हिंदी में ४ अर्थ १. मेघ/बादल, २. सघन/गहन, ३. बड़ा हथौड़ा, तथा ४. किसी संख्या का उसी में ३ बार गुणा (क्यूब) हैं. इस छंद में चारों अर्थ प्रासंगिक हैं. घनाक्षरी में शब्द प्रवाह इस तरह होता है मेघ गर्जन की तरह निरंतरता की प्रतीति हो. घंक्षरी में शब्दों की बुनावट सघन होती है जैसे एक को ठेलकर दूसरा शब्द आने की जल्दी में हो. घनाक्षरी पाठक/श्रोता के मन पर प्रहर सा कर पूर्व के मनोभावों को हटाकर अपना प्रभाव स्थापित कर अपने अनुकूल बना लेनेवाला छंद है. घनाक्षरी में ८ वर्णों की ३ बार आवृत्ति है.
घनाक्षरी रचना विधान :
आठ-आठ-आठ-सात पर यति रखकर,
मनहर घनाक्षरी छन्द कवि रचिए.
लघु-गुरु रखकर चरण के आखिर में,
'सलिल'-प्रवाह-गति, वेग भी परखिये..
अश्व-पदचाप सम, मेघ-जलधर सम,
गति अवरोध न हो, यह भी निरखिए.
करतल ध्वनि कर, प्रमुदित श्रोतागण-
'एक बार और' कहें, सुनिए-हरषिए..
*
वर्षा-वर्णन:
उमड़-घुमड़कर, गरज-बरसकर,
जल-थल समकर, मेघ प्रमुदित है.
मचल-मचलकर, हुलस-हुलसकर,
पुलक-पुलककर, मोर नरतित है..
कलकल,छलछल, उछल-उछलकर,
कूल-तट तोड़ निज, नाद प्रवहित है.
टर-टर, टर-टर, टेर पाठ हेर रहे,
दादुर 'सलिल' संग स्वागतरत है..
*
भारत वंदना:
भारत के, भारती के, चारण हैं, भाट हम,
नित गीत गा-गाकर आरती उतारेंगे.
श्वास-आस, तन-मन, जान भी निसारकर,
माटी शीश धरकर, जन्म-जन्म वारेंगे..
सुंदर है स्वर्ग से भी, पवन है, भवन है,
शत्रुओं को घेर घात मौत के उतारेंगे-
कंकर भी शंका रही, दिक्-नभ अम्बर है,
सागर-'सलिल' पग नित्य ही पखारेंगे..
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षडऋतु वर्णन : मनहरण घनाक्षरी/कवित्त छंद
संजीव 'सलिल'
*

वर्षा :
गरज-बरस मेघ, धरती का ताप हर, बिजली गिराता जल, देता हरषाता है. 
शरद:
हरी चादर ओढ़ भू, लाज से सँकुचती है, देख रवि किरण से, संदेशा पठाता है.
शिशिर:
प्रीत भीत हो तो शीत, हौसलों पर बर्फ की, चादर बिछाता फिर, ठेंगा दिखलाता है. 
हेमन्त :
प्यार हार नहीं मान, कुछ करने की ठान, दरीचे से झाँक-झाँक, झलक दिखाता है.
वसंत :
रति-रतिनाथ साथ, हाथों में लेकर हाथ, तन-मन में उमंग, नित नव जगाता है.
ग्रीष्म :
देख क्रुद्ध होता सूर्य, खिलते पलाश सम, आसमान से गरम, धूप बरसाता है..
*
टिप्पणी : घनाक्षरी छंद को लय में पढ़ते समय बहुधा शब्दों को तोड़कर पड़ा जाता ताकि आरोह-अवरोह (उतर-चढ़ाव) बना रहे.

मंगलवार, 10 मई 2011

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद - घनाक्षरी कवित्त : नवीन चतुर्वेदी

सांगोपांग सिंहावलोकन छंद - घनाक्षरी कवित्त

नवीन चतुर्वेदी 

कवित्त का विधान
कुल ४ पंक्तियाँ
हर पंक्ति ४ भागों / चरणों में विभाजित
पहले, दूसरे और तीसरे चरण में ८ वर्ण
चौथे चरण में ७ वर्ण
इस तरह हर पंक्ति में ३१ वर्ण

सिंहावलोकन का विधान
कवित्त के शुरू और अंत में समान शब्द
जैसे प्रस्तुत कवित्त शुरू होता है "लाए हैं" से और समाप्त भी होता है "लाए हैं" से

सांगोपांग विधान
ये मुझे प्रात:स्मरणीय गुरुवर स्व. श्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' जी ने बताया कि छंद के अंदर भी हर पंक्ति जिस शब्द / शब्दों से समाप्त हो, अगली पंक्ति उसी शब्द / शब्दों से शुरू हो तो छंद की शोभा और बढ़ जाती है| वो इस विधान के छंन्द को सांगोपांग सिंहावलोकन छंद कहते थे|


कवित्त:
लाए हैं बाजार से दीप भाँति भाँति के हम,
द्वार औ दरीचों पे कतार से सजाए हैं|
सजाए हैं बाजार हाट लोगों ने, जिन्हें देख-
बाल बच्चे खुशी से फूले ना समाए हैं|
समाए हैं संदेशे सौहार्द के दीपावली में,
युगों से इसे हम मनाते चले आए हैं|
आए हैं जलाने दीप खुशियों के जमाने में,
प्यार की सौगात भी अपने साथ लाए हैं|| 
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मंगलवार, 15 दिसम्बर 2009

मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी) छंद: भारती की आरती --संजीव 'सलिल'

मनहरण (कवित्त/घनाक्षरी) छंद

संजीव 'सलिल'

भारती की आरती उतारिये 'सलिल' नित, सकल जगत को सतत सिखलाइये.
जनवाणी हिंदी को बनायें जगवाणी हम, भूत अंगरेजी का न शीश पे चढ़ाइये.
बैर ना विरोध किसी बोली से तनिक रखें, पढ़िए हरेक भाषा, मन में बसाइये.
शब्द-ब्रम्ह की सरस साधना करें सफल, छंद गान कर रस-खान बन जाइए.

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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर