स्तम्भ / लेबल

-acharya sanjiv 'salil' (238) -Acharya Sanjiv Verma 'Salil' (195) अंग्रेजी (1) अलंकार (4) अवधी (4) आयुर्वेद (3) आरोग्य आशा (1) कला (1) कविता (32) कहावत (1) कायस्थ (1) काव्यानुवाद (3) कुण्डलिनी (1) क्षणिका (1) गणेश (1) ग़ज़ल (13) गीत (56) गीति काव्य (1) गीतिका (14) घनाक्षरी (2) घरेलू नुस्खे (3) चिंतन (3) चित्रगुप्त (5) चौपाई (1) छत्तीसगढ़ी (1) जनक छंद (1) डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' (1) तसलीस (उर्दू त्रिपदी) अज़ीज़ अहमद अंसारी (1) दुर्गा (3) देश (2) दोहा (65) नर्मदा (9) नर्मदाष्टक (1) नव विधा (1) नवगीत (40) नारी विमर्श (1) निमाड़ी (1) नियाज़ (1) नज़्म: संजीव 'सलिल' (1) परिचर्चा: चिट्ठाकारी और टिप्पणी-लेखन (1) पुरातत्व (1) पुस्तक समीक्षा (1) प्रकृति (1) प्राकृतिक चिकित्सा (2) प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' (1) बाल साहित्य (1) बुंदेली (1) भक्ति काव्य (1) भजन (15) भवन (1) भारत (7) भोजपुरी (5) महादेवी वर्मा (1) मालवी (1) मुक्तक (6) मुक्तिका (78) मृदुल कीर्ति (4) राम (7) राष्ट्र वंदना (1) लघु कथा (3) लघुकथा (13) लेख: हिन्दी का हित चिंतन (1) विवाह गीत (3) विश्व काव्य सलिला : भागवत प्रसाद मिश्रा 'नियाज' ' (1) शब्द सलिला: लखपति -अजित वडनेरकर (1) शान्ति देवी वर्मा (1) श्यामलाल उपाध्याय (1) श्यामानन्द 'सरस्वती' (1) श्री कृष्ण (1) संजीव 'सलिल' (227) संस्मरण (1) समाचार (1) साधना (1) सूक्ति सलिला: शेक्सपिअर (1) सूक्ति-सलिला:प्रो. बी. पी. मिश्र 'नियाज़' / सलिल (1) सोरठा (1) स्वर्गीय शान्ति देवी वर्मा (1) स्वास्थ्य: घरेलू नुस्खे (1) हरिगीतिका (1) हाइकु (6) हास्य (6) हिंदी (6) हिन्दी काव्यानुवाद (1) हिन्दी ग़ज़ल (1) हिन्दी छंद (1) (1) ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥ (2)
laghukatha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
laghukatha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

बुधवार, 23 फरवरी 2011

म.प्र. लघुकथाकार परिषद् : वार्षिक सम्मलेन संपन्न लघुकथा लेखन में विशिष्ट अवदानकर्ता सम्मानित

म.प्र. लघुकथाकार परिषद् : वार्षिक सम्मलेन संपन्न
लघुकथा लेखन में विशिष्ट अवदानकर्ता सम्मानित

जबलपुर, २०-२-२०११. म. प्र. लघुकथाकार परिषद् जबलपुर का २६ वां वार्षिक सम्मेलन अरिहंत होटल के सभागार में इलाहाबाद विश्वविद्यालय के पूर्व कुलपति डॉ. हरिराज सिंह 'नूर' के मुख्यातिथ्य तथा ज्येष्ठ पत्रकार-साहित्यकार डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' की अध्यक्षता में संपन्न हुआ. अतिथि स्वागतोपरान्त लघुकथा लेखन के क्षेत्र में विशिष्ट योगदान हेतु सम्मानित किए जा रहे व्यक्तित्वों का परिचय देते हुए उन्हें प्रथम पंक्ति में आसीन करवाया गया. इसके साथ ही सम्मानितों के व्यक्तित्व-कृतित्व पर संक्षिप्त प्रकाश डालते हुए परिपत्र का वितरण किया गया. 
परिषद् के अध्यक्ष मु. मोइनुद्दीन अतहर ने परिषद् के गठन, उद्देश्यों तथा गतिविधियों पर प्रकाश डाला. सचिव श्री कुँवर प्रेमिल ने लघुकथा के उद्भव, विकास तथा महत्त्व को प्रतिपादित किया.

तत्पश्चात मुख्य अतिथि एवं अध्यक्ष के कर कमलों से आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' संपादक दिव्य नर्मदा, जबलपुर को बृजबिहारी श्रीवास्तव स्मृति सम्मान, श्री पारस दासोत, जयपुर को सरस्वती पुत्र सम्मान, श्री अनिल अनवर, संपादक मरु गुलशन जोधपुर को रासबिहारी स्मृति सम्मान, श्री अशफाक कादरी, बीकानेर को डॉ. श्रीराम ठाकुर 'दादा' स्मृति सम्मान, डॉ. राज कुमारी शर्मा 'राज', गाज़ियाबाद को गोपालदास स्मृति सम्मान से तथा आनंद मोहन अवस्थी सृजन सम्मान से डॉ. के. बी. श्रीवास्तव, मुजफ्फरपुर व मु. मोइनुद्दीन अतहर को सम्मानित किया गया.
अभी बहुत कुछ शेष है....डॉ. तनूजा चौधरी
लघुकथा के वैशिष्ट्य पर अपने विचार व्यक्त करते हुए विशिष्ट वक्ता डॉ. तनूजा चौधरी, अध्यक्ष हिंदी विभाग शासकीय स्वशासी विज्ञानं स्नातकोत्तर महाविद्यालय जबलपुर ने कहा ''लघुकथा स्वस्थ्य सामाजिक संरचना को पुष्ट करने के लिये विसंगतियों को इंगित कर पुष्ट आधार प्रदान करती है. काम शब्दों में मन को स्पर्श करनेवाली चुभन समेटते हुए लघुकथा पाठक के प्रथम आकर्षण का केंद्र होती है तथा इसका अंत सोचने के लिये प्रेरित करता है. साहित्य में लघुकथा की घर में गृहणी से साम्यता स्थापित करते हुए विदुषी वक्ता ने कहा कि इससे यह न मानें कि सभी कुछ समाप्त प्राय या नकारात्मक मात्र है, अपितु इससे यही निष्कर्षित होता है कि अभी भे एबहुत कुछ शेष है जिसकी रक्षा के लिये लघुकथा समर्पित है.''

लघुकथा फिलर नहीं पिलर... डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र'

अध्यक्ष डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' ने अपने संपादन के दिनों की स्मृति तजा करते हुए बताया कि प्रारंभ में लघुकथा को पूरक (फिलर) के रूप में मन जाता था किन्तु अब यह स्तम्भ (पिलर) के रूप में स्थापित हो गयी है.

सम्मेलन में मु मोइनुद्दीन अतहर द्वारा सम्पादित पत्रिका लघुकथा अभिव्यक्ति के अंक १५, कुँवर प्रेमिल द्वारा सम्पादित प्रतिनिधि लघुकथाएं २०११, तथा श्री मनोहर शर्मा 'माया' लिखित लघुकथा संकलन मकडजाल का विमोचन संपन्न हुआ तथा सजरी माया के कृतित्व का परिचय देते परिपत्र का वितरण किया गया.

साहित्य सृजन में विशिष्ट अवदान हेतु स्थानीय रचनाकारों सर्व श्री/श्रीमती प्रभात दुबे, प्रभा पाण्डे 'पुरनम', डॉ. गायत्री तिवारी, रामप्रसाद 'अटल' को यश अर्चन सम्मान से तथा रत्ना ओझा, राजकुमार, मनोहर चौबे 'आकाश', मृदुल मोहन अवधिया, लक्ष्मी शर्मा, ब्रिजेन्द्र पाण्डेय व राजीव गुप्ता को लघुकथा सेवा सम्मान से सम्मानित किया गया.

अध्यक्षीय संबोधन में डॉ. हरिराज सिंह 'नूर' ने संस्कारधानी में साहित्य सृजन की स्वस्थ्य परंपरा को अनुकर्णीय बताया तथा लघुकथा के विकास को भावी साहित्य व समाज के लिये दिशादर्शक बताया.

कार्यक्रम के अंतिम सत्र में अतिथि लघुकथाकारों ने अपनी प्रतिनिधि लघुकथा का वाचन तथा श्री अंशलाल पंद्रे ने एक भक्ति गीत का गायन किया.
नर्मदा में नौका विहार तथा काव्य गोष्ठी
२१ फरवरी को संस्कारधानी जबलपुर में पधारे डॉ. हरिराज सिंह 'नूर', डॉ, राजकुमारी शर्मा 'राज', श्री अनिल अनवर, श्री अशफाक कादरी तथा श्री पारस दासोत के सम्मान में विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल भेड़ाघाट में संगमरमरी चट्टानों के मध्य प्रवाहित सनातन सलिला नर्मदा में नौका विहार तथा धुआंधार जलप्रपात के प्रमाण व सरसकाव्य गोष्ठी से इस सारस्वत अनुष्ठान का समापन हुआ.

****************

रविवार, 20 फरवरी 2011

लघुकथा बरगद का दर्द रवींद्र खरे 'अकेला'

लघुकथा                                                                     
बरगद का दर्द

रवींद्र खरे 'अकेला'
*

घर के सामने लगे बूढ़े बरगद के पेड़ को देख वह बेहद खुश होता.

घरवाली ताने देती- 'रोज डलवा-डलवा भरके इन पत्तन को फेंकना पड़ता है.मैं तो तंग आ गई बरगद के पेड़ से। मैं तो शुरू से ही कहती आ रही हूँ कि कटवा क्यूँ नहीं देते इस पेड़ को। वह कुछ न कहता चुपचाप रहता।

आज सुबह से ही तीनों बहुओं में कहा-सुनी के बाद तेज लड़ाई हो गयी जिसमें बेटे भी बहुओं के साथ हो गये  छोटा बेटा छगनू तो बँटवारे को लेकर अड़ ही गया कि आज तो इस घर से अलग होकर ही दम लूँगा।

उसने पत्नी से बरगद के पत्तों को इकट्ठे किये गये डलवे का सबके सामने उंडेल दिया जिनमें कुछ हरे पत्ते थे, कुछ पीले, कुछ सूखे, कुछ अध्-पीले, कुछ एकदम हरी कोंपल सदृश उसने सभी तरह के पत्तों को करीने से संवारकर लगाया और छगनू से पूछा -बेटे तू चाहता है अलग घर में बँटवारा कर रहना मुझे कोई ऐतराज नहीं  तू शौक से अलग रह सकता है. घर में तुझे जो सामान अच्छा लगे वह सब ले जा तेरी मर्जी मैं कुछ नहीं मना करूंगा किंतु एक बात मेरी सुनता जा ये सारे पत्ते जो तू देख रहा है न, इसी बरगद के पेड़ के हैं न?

'हाँ,  तो इसमें क्या नई बात है ?'

'देख, इसमें कुछ पत्ते तो एकदम पीले हैं, सूखे हुये जो पेड़ से अलग हो गये क्योंकि वे अब उनके साथ नहीं रह सकते थे और कुछ अध-पीले हैं जो, पीलों क देखा-देखी अलग हो गये और कुछ एकदम से हरे थे उन्हें बरगद का साथ गवारा नहीं हुआ और वे तीव्र हवा के झोंको के बहकावे में आकर उनके साथ उड़कर मौज-मस्ती की दृष्टि से चलकर उनके साथ हो लिये परिणामस्वरूप अब तुम्हारे सामने हैं बिखरे हुइ. अब यदि ये सब पत्ते चाहें भी कि दुबारा उसी पेड़ पर टहनी में लगकर शेष जीवन व्यतीत कर लें तब भी संभव नहीं है, इनके लिये दोबारा इसी बरगद के पेड़ में जाकर लगना।

मैंने तो बेटे घर में यह बरगद का पौधा इसलिये रोंपकर बड़ा किया था कि जब मैं बड़ा हो जाऊँगा और खेत पर हल जोतकर जब शाम को वापिस आऊँगा तो इसी पेड़ की छाँव में बैठकर सुस्ताकर अपनी थकान दूर कर लिया करूँगा किन्तु तुम चाहते हो कि यह पेड़ ही न रहे तो तुम्हारी मर्जी वैसे तुम्हारी तरह तुम्हारी माँ भी वर्षों से तानें देती आ रही है कि रोज डलवा भर पत्ते भरकर साफ करती हूँ घर को और रोज फैल जाते हैं ढेरों पत्ते इसलिये अब फैसला तुम्हें करना है यदि तुम समझ सको इस बरगद का दर्द तो ठीक नहीं तो तुम्हारी मर्जी।'

छगनू ने विभिन्न रंगों के पत्तों को देखा सबक ले वह कभी बापू की तो कभी बरगद को देख रहा था उसे अपनी गलती का अहसास हो गया था. उसने पत्नी को प्यार-सहित समझाकर बरगद वाले घर में ही आजीवन रहने का सकारात्मक निर्णय लिया।
***************

: साहित्य समाचार: मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् : २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन जबलपुर, २०-२-२०११,

: साहित्य समाचार:
मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् : २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन
    जबलपुर, २०-२-२०११, 
अरिहंत होटल, रसल चौक, जबलपुर

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' व अन्य लघुकथाकार सम्मानित होंगे

जबलपुर. लघुकथा के क्षेत्र में सतत सक्रिय रचनाकारों कर अवदान को प्रति वर्ष सम्मानित करने हेतु प्रसिद्ध संस्था मध्य प्रदेश लघु कथाकार परिषद् का २६ वाँ वार्षिक सम्मेलन अरिहंत होटल, रसल चौक, जबलपुर में २०-२-२०११ को अपरान्ह १ बजे से आमंत्रित है.

परिषद् के अध्यक्ष मो. मोइनुद्दीन 'अतहर' तथा सचिव कुँवर प्रेमिल द्वारा प्रसरित विज्ञप्ति के अनुसार इस वर्ष ७ लघुकथाकारों को उनके उल्लेखनीय अवदान हेतु सम्मानित किया जा रहा है.

ब्रिजबिहारीलाल श्रीवास्तव सम्मान - श्री संजीव वर्मा 'सलिल', जबलपुर.
सरस्वती पुत्र सम्मान -                   श्री पारस दासोत जयपुर.
रासबिहारी पाण्डेय सम्मान -           श्री अनिल अनवर, जोधपुर.
डॉ. श्रीराम ठाकुर दादा सम्मान -      श्री अशफाक कादरी बीकानेर.
जगन्नाथ कुमार दास सम्मान-        श्री डॉ. वीरेन्द्र कुमार दुबे, जबलपुर.
गोपालदास सम्मान -                     डॉ. राजकुमारी शर्मा 'राज', गाज़ियाबाद.
आनंदमोहन अवस्थी सम्मान-         डॉ. के बी. श्रीवास्तव, मुजफ्फरपुर- मो. मोइनुद्दीन 'अतहर', जबलपुर.

कार्यक्रम प्रो. डॉ. हरिराज सिंह 'नूर' पूर्व कुलपति इलाहाबाद विश्वविद्यालय की अध्यक्षता, प्रो. डॉ. जे. पी. शुक्ल पूर्व कुलपति रानी दुर्गावती विश्वविद्यालय जबलपुर के मुख्यातिथ्य तथा श्री राकेश 'भ्रमर', श्री अंशलाल पंद्रे व श्री निशिकांत चौधरी के विशेषातिथ्य में संपन्न होगा.

इस अवसर पर मो. मोइनुद्दीन 'अतहर' द्वारा सम्पादित परिषद् की लघुकथा केन्द्रित पत्रिका अभिव्यक्ति के जनवरी-मार्च २०११ अंक, श्री कुँवर प्रेमिल द्वारा सम्पादित प्रतिनिधि लघुकथाएँ २०११  तथा श्री मनोहर शर्मा 'माया' लिखित लघुकथाओं के संग्रह मकड़जाल का विमोचन संपन्न होगा.

द्वितीय सत्र में डॉ. तनूजा चौधरी व डॉ. राजकुमार तिवारी 'सुमित्र' लघु कथा के अवदान, चुनौती और भविष्य विषय पर विचार अभिव्यक्ति करेंगे.
*****************
         

http://divyanarmada.blogspot.com

शुक्रवार, 18 फरवरी 2011

लघुकथा : तपस्या - रविन्द्र खरे 'अकेला'

लघुकथा                                                                                                                                                            
तपस्या

रविन्द्र खरे 'अकेला'

वह वीणा के तार को ठीक करने लगी, उसे लगा उसके गायन में एकरसता नहीं आ पा रही है, वीणा ठीक से झंकृत नहीं हो पा रही है, वह वीणा को ठीक कर पाती कि
उसमें से आवाज सुनाई दी-‘तुम मुझमें कमी ढूँढ रही हो जबकि कमी तुम्हारे खुद के सुरों में है।’

एक पल तो वह अवाक्-सी रह गयी, यह कमरे में किसकी आवाज है, जब ध्यान से सुना तो पाया कि वीणा में से ही शब्दों के स्वर फूट रहे हैं।

तुम अपने सुरों की तपस्या को बढ़ाओ ठीक से प्यार से मेरे ऊपर उंगलिया चलाना सीखो फिर देखो मैं कितनी सुमधुर तानें तुम्हें देती हूँ।  एक तुम हो कि बस बिना मेहनत किये एक ही दिन में सुर साम्राज्ञी बन जाना चाहती हो, मेरे कान उमेठने से तुम्हें क्या मिलेगा, मेरे तार टूट गये तो जो स्वर तुम सुन पा रही हो वह भी बंद हो जायेंगे। एक बात मेरी ध्यान से सुन लो सफलता का कोई शार्ट कट नहीं होता  यदि तुम सर्वोच्च शिखर पर पहुँचना चाहती हो तो तुम्हें शुरूआत नीच की सीढ़ी से ही करनी होगी नियमित अभ्यास, लगन, मेहनत से तुम गायन में सर्वोच्च शिखर पर पहुंच सकती हो सिर्फ अपनी तपस्या में कमी न आने देना फिर मैं और तुम दोनों मिलकर सारी दुनिया पर राज करेंगे लेकिन एक बात गांठ बाँध कर सुन लो दूसरों की कमियाँ देखने से पहले अपने अंदर भी झाँक कर देख लेना चाहिए;

उसे वीणा के कहे एक-एक शब्द जैसे मंत्र के समान प्रतीत हुये उसने उस दिन से अपने गले के सुरों पर ध्यान देकर नियमित रियाज शुरू कर दिया- और आज उसके साथ
वही वीणा है, जिसने उसे अन्तर्राष्ट्रीय वीणा प्रतियोगिता में प्रथम स्थान दिलाया है .वे दोनों आज बहुत खुश थीं- दोनों की तपस्या रंग लाई थी।

**************

बुधवार, 24 नवम्बर 2010

लघुकथा: अस्तित्व --- रवीन्द्र खरे 'अकेला'

लघुकथा:

अस्तित्व

रवीन्द्र खरे 'अकेला'
*
शाम गहराने लगी थी। उसके माथे पर थकान स्पष्ट झलकने लगी थी- वह निरन्तर हथौड़ा चला-चलाकर कुंदाली की धार बनाने में व्यस्त था।

तभी निहारी ने हथौड़े से कहा कि तू कितना निर्दयी है मेरे सीने में इतनी बार प्रहार करता है कि मेरा सीना तो धक-धक कर रह जाता है, तुझे एक बार भी दया नहीं आती। अरे तू कितना कठोर है, तू क्या जाने पीड़ा-कष्ट क्या होता है, तेरे ऊपर कोई इस तरह पूरी ताकत से प्रहार करता तो तुझे दर्द का एहसास होता?

अच्छा तू ही बता तू इतनी शाम से चुपचाप जमीन पर पसरी रहती है और रामू काका कितने प्यार से मेरी परवरिश करते हैं और तेरे ऊपर रखकर ही वे किसानों, मजदूरों के लिये खुरपी, कुंदाली में धार बनाते हैं, ठोक-ठोक कर-निहारी (कुप्पे) से हथौड़े ने पूछा।

‘‘भला तुमने कभी सोचा है यदि मैं ही नहीं रहूँ तो तुम्हारा भला लुहार काका के घर में क्या काम? पड़ी रहेगी किसी अनजान-वीराने में, उल्टे कोई राह चलते तुझसे टकराकर गिर ही जायेगा तो बगैर गाली दिये आगे बढ़ेगा नहीं...’’

निहारी को अपनी भलू का अहसास हो गया था, उसने तुरन्त अपनी गलती स्वीकारते हुये कहा-""हां हथौड़े भइया! तुम ठीक ही कह रहे हो श्रम का फल मीठा होता है। भला लुहार काका और हथौड़े भइया तुम्हारे बिना मेरा क्या अस्तित्व?""
**************

बृहस्पतिवार, 11 नवम्बर 2010

लघु कथा: चित्रगुप्त पूजन -- संजीव 'सलिल'

लघु कथा:                                                                                                        
चित्रगुप्त पूजन  
संजीव 'सलिल' 
अच्छे अच्छों का दीवाला निकालकर निकल गई दीपावली और आ गयी दूज... 

सकल सृष्टि के कर्म देवता, पाप-पुण्य नियामक निराकार परात्पर परमब्रम्ह चित्रगुप्त जी और कलम का पूजन कर ध्यान लगा तो मनस-चक्षुओं ने देखा अद्भुत दृश्य.  

निराकार अनहद नाद... ध्वनि के वर्तुल... अनादि-अनंत-असंख्य. वर्तुलों का आकर्षण-विकर्षण... घोर नाद से कण का निर्माण... निराकार का क्रमशः सृष्टि के प्रागट्य, पालन और नाश हेतु अपनी शक्तियों को तीन अदृश्य कायाओं में स्थित करना... 

महाकाल के कराल पाश में जाते-आते जीवों की अनंत असंख्य संख्या ने त्रिदेवों और त्रिदेवियों की नाम में दम कर दिया. सब निराकार के ध्यान में लीन हुए तो हर चित्त में गुप्त प्रभु की वाणी आकाश से गुंजित हुई:
__ "इस समस्या के कारण और निवारण तुम तीनों ही हो. अपनी पूजा, अर्चना, वंदना, प्रार्थना से रीझकर तुम ही वरदान देते हो औरउनका दुरूपयोग होने पर परेशान होते हो. करुणासागर बनने के चक्कर में तुम निष्पक्ष, निर्मम तथा तटस्थ होना बिसर गये हो." 

-- तीनों ने सोच:' बुरे फँसे, क्याकरें कि परमपिता से डांट पड़ना बंद हो'. 

एक ने प्रारंभ कर दिया परमपिता का पूजन, दूसरे ने उच्च स्वर में स्तुति गायन तथा तीसरे ने प्रसाद अर्पण करना. 

विवश होकर परमपिता को धारण करना पड़ा मौन.  

तीनों ने विधायिका, कार्यपालिका तथा न्यायपालिका पर कब्जा किया और भक्तों पर करुणा करने का दस्तूर और अधिक बढ़ा दिया. 

*****************

बुधवार, 10 नवम्बर 2010

लघुकथा : दीपावली ---संजीव 'सलिल'

दीपावली                                                                                                                                                                                                             
संजीव 'सलिल' 
सवेरे अखबार आये... हिन्दी के, अंग्रेजी के, राष्ट्रीय, स्थानीय.... 
सभी में एक खबर प्रमुखता से.... ''अमरीकी राष्ट्रपति ओबामा ने महात्मा की समाधि पर बहुत मँहगी माला चढ़ायी.''  मैं
ने कुछ पुराने अख़बार पलटाये.... पढ़ीं अलग-अलग समय पर छपी खबरें: '
'राष्ट्रपति स्वर्णमंदिर में गये..., 
गृहमंत्री ने नमाज़ अदा की..., 
लोकसभाध्यक्ष गिरिजाघर गये..., 
राज्यपाल बौद्ध मठ में..., 
विधान सभाध्यक्ष ने जैन संत से आशीष लिया...,  
पुस्तकालय जाकर बहुत से अखबार पलटाये... 
खोजता रहा... थक गया पर नहीं मिली वह खबर जिसे पढ़ने के लिये मेरे प्राण तरस रहे थे.... 
खबर कुछ ऐसी... कोई जनप्रतिनिधि या अधिकारी या साहित्यकार या संत भारतमाता के मंदिर में जलाने गया एक दीप.... हार कर खोज बंद कर दी.... 
अचानक फीकी लगाने लगी थी दीपावली....  
***************

बृहस्पतिवार, 4 नवम्बर 2010

बोध कथा : ''भाव ही भगवान है''. संजीव 'सलिल'

बोधकथा                                                    
''भाव ही भगवान है''.
संजीव 'सलिल'
*
एक वृद्ध के मन में अंतिम समय में नर्मदा-स्नान की चाह हुई. लोगों ने बता दिया की नर्मदा जी अमुक दिशा में कोसों दूर बहती हैं, तुम नहीं जा पाओगी. वृद्धा न मानी... भगवान् का नाम लेकर चल पड़ी...कई दिनों के बाद उसे एक नदी... उसने 'नरमदा तो ऐसी मिलीं रे जैसे मिल गै मतारे औ' बाप रे' गाते हुए परम संतोष से डुबकी लगाई. कुछ दिन बाद साधुओं का एक दल आया... शिष्यों ने वृद्धा की खिल्ली उड़ाते हुए बताया कि यह तो नाला है. नर्मदा जी तो दूर हैं हम वहाँ से नहाकर आ रहे हैं. वृद्धा बहुत उदास हुई... बात गुरु जी तक पहुँची. गुरु जी ने सब कुछ जानने के बाद, वृद्धा के चरण स्पर्श कर कहा : 'जिसने भाव के साथ इतने दिन नर्मदा जी में नहाया उसके लिए मैया यहाँ न आ सकें इतनी निर्बल नहीं हैं. मैया तुम्हें नर्मदा-स्नान का पुण्य है लेकिन जो नर्मदा जी तक जाकर भी भाव का अभाव मिटा नहीं पाया उसे नर्मदा-स्नान का पुण्य नहीं है. मैया! तुम कहीं मत जाओ, माँ नर्मदा वहीं हैं जहाँ तुम हो.''

'कंकर-कंकर में शंकर', 'मन चंगा तो कठौती में गंगा' का सत्य भी ऐसा ही है. 'भाव का भूखा है भगवान' जैसी लोकोक्ति इसी सत्य की स्वीकृति है. जिसने इस सत्य को गह लिया उसके लिये 'हर दिन होली, रात दिवाली' हो जाती है. 
****************

मंगलवार, 26 अक्तूबर 2010

रवींद्र खरे 'अकेला' रचित 'मेरी लघुकथाओं का पहला नाबाद शतक' विमोचित :

कृति विमोचन:
रवींद्र खरे 'अकेला' रचित 'मेरी लघुकथाओं का पहला नाबाद शतक' विमोचित :


भोपाल . मध्यप्रदेश के राज्यपाल महामहिम श्री रामेश्वर ठाकुर के करकमलों से दिव्यनर्मदा परिवार के अभिन्न अंग श्री रविन्द्र खरे 'अकेला' के नव प्रकाशित लघुकथा संग्रह 'मेरी लघुकथाओं का पहला नाबाद शतक' का विमोचन पूर्व सांसद श्री कैलाशनारायण सारंग, अध्यक्ष अखिल भारतीय कायस्थ महासभा की विशेष उपस्थिति में संपन्न हुआ. श्री अकेला को हार्दिक बधाई एवं शुभकामनायें. 

बुधवार, 4 नवम्बर 2009

लघुकथा एकलव्य आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

लघुकथा

एकलव्य

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

- 'नानाजी! एकलव्य महान धनुर्धर था?'

- 'हाँ; इसमें कोई संदेह नहीं है.'

- उसने व्यर्थ ही भोंकते कुत्तों का मुंह तीरों से बंद कर दिया था ?'

-हाँ बेटा.'

- दूरदर्शन और सभाओं में नेताओं और संतों के वाग्विलास से ऊबे पोते ने कहा - 'काश वह आज भी होता.'


*****

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर