खबरदार कविता:
लिव इन रिलेशनशिप के वाद में राधा-किशन
--संजीव 'सलिल'
*
मन से राधाकिशन तब, 'सलिल' रहे थे संग.
तन से रहते संग अब, मन करते हैं जंग..
तब निर्मल स्नेह था, अब है मांसल प्रेम.
राग शेष वैराग गुम, कैसे हो अब क्षेम?.
महारास में भाव था, लीला थी जग हेतु.
रसलीला क्रीडा हुई, देह तुष्टि का हेतु..
न्यायालय अँधा हुआ, बँधे हुए हैं नैन.
क्या जाने राधा-किशन, क्यों खोते थे चैन?.
हलकी-भारी तौल को, माने जब आधार.
नाम न्याय का ले करे, न्यायालय व्यापार..
भारहीन सच को 'सलिल', कोई न सकता नाप.
नाता राधा-किशन का, सके आत्म में व्याप..
रमण करें सुख में सदा, हो प्रसन्नचित आप.
नहीं अकेलापन सके, कभी आपमें व्याप..
*******
लिव इन रिलेशनशिप के वाद में राधा-किशन
--संजीव 'सलिल'
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मन से राधाकिशन तब, 'सलिल' रहे थे संग.
तन से रहते संग अब, मन करते हैं जंग..
तब निर्मल स्नेह था, अब है मांसल प्रेम.
राग शेष वैराग गुम, कैसे हो अब क्षेम?.
महारास में भाव था, लीला थी जग हेतु.
रसलीला क्रीडा हुई, देह तुष्टि का हेतु..
न्यायालय अँधा हुआ, बँधे हुए हैं नैन.
क्या जाने राधा-किशन, क्यों खोते थे चैन?.
हलकी-भारी तौल को, माने जब आधार.
नाम न्याय का ले करे, न्यायालय व्यापार..
भारहीन सच को 'सलिल', कोई न सकता नाप.
नाता राधा-किशन का, सके आत्म में व्याप..
रमण करें सुख में सदा, हो प्रसन्नचित आप.
नहीं अकेलापन सके, कभी आपमें व्याप..
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