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मंगलवार, 11 अक्तूबर 2011

सामयिक दोहा मुक्तिका: संदेहित किरदार..... संजीव 'सलिल

सामयिक दोहा मुक्तिका:
संदेहित किरदार.....
संजीव 'सलिल
*
लोकतंत्र को शोकतंत्र में, बदल रही सरकार.
असरदार सरदार सशंकित, संदेहित किरदार..

योगतंत्र के जननायक को, छलें कुटिल-मक्कार.
नेता-अफसर-सेठ बढ़ाते, प्रति पल भ्रष्टाचार..

आम आदमी बेबस-चिंतित, मूक-बधिर लाचार.
आसमान छूती मंहगाई, मेहनत जाती हार..

बहा पसीना नहीं पल रहा, अब कोई परिवार.
शासक है बेफिक्र, न दुःख का कोई पारावार..

राजनीति स्वार्थों की दलदल, मिटा रही सहकार.
देश बना बाज़ार- बिकाऊ, थाना-थानेदार..

अंधी न्याय-व्यवस्था, सच का कर न सके दीदार.
काले कोट दलाल- न सुनते, पीड़ित का चीत्कार..

जनमत द्रुपदसुता पर, करे दु:शासन निठुर प्रहार.
कृष्ण न कोई, कौन सकेगा, गीता-ध्वनि उच्चार?

सबका देश, देश के हैं सब, तोड़ भेद-दीवार.
श्रृद्धा-सुमन शहीदों को दें, बाँटें-पायें प्यार..

सिया जनास्था का कर पाता, वनवासी उद्धार.
सत्ताधारी भेजे वन को, हर युग में हर बार..

लिये खडाऊँ बापू की जो, वही बने बटमार.
'सलिल' असहमत जो वे भी हैं, पद के दावेदार..

'सलिल' एक है राह, जगे जन, सहे न अत्याचार.
अफसरशाही को निर्बल कर, छीने निज अधिकार..

*************

रविवार, 24 अप्रैल 2011

षटपदियाँ : संजीव 'सलिल'

षटपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*
लोक-लाज, शालीनता, शर्म, हया, मर्याद.
संयम अनुशासन भुला, नव पीढ़ी बर्बाद..
नव पीढ़ी बर्बाद, प्रथाओं को कुरीति कह.
हुई बड़ों से दूर, सके ना लीक सही गह..
मैकाले की नीति सफल हुई, यही शोक है.
लोकतंत्र में हुआ तंत्र से दूर लोक है..
*
तिमिर मिटाकर कर रहा, उजियारे का दान.
सारे जग में श्रेष्ठ है, भारत देश महान..
भारत देश महान, न इस सा देश अन्य है.
सत-शिव -सुंदर का आराधक, सच अनन्य है..
सत-चित-आनंद नित वरता, तम सकल हटाकर.
सूर्य उगाता नील गगन से तिमिर हटाकर..
*
छले दूरदर्शन, रहे निकट देख ले सूर.
करा देह-दर्शन रहा, बेशर्मी भरपूर.
बेशर्मी भरपूर, मौज-मस्ती में डूबा.
पथ भूला है युवा, तन्त्र से अपने ऊबा..
कहे 'सलिल' परदेश युवाओं को है भाता?
दूर देश से भटक, धुनें सिर फिर पछताता..
*

सोमवार, 31 जनवरी 2011

जनगण के मन में: -संजीव सलिल

जनगण के मन में

जनतंत्र की सोच को समर्पित कविता           

-संजीव सलिल
*
जनगण के मन में जल पाया,
नहीं आस का दीपक
कैसे हम स्वाधीन देश जब
लगता हमको क्षेपक

हम में से
हर एक मानता
निज हित सबसे पहले.
नहीं देश-हित कभी साधता
कोई कुछ भी कह ले

कुछ घंटों 'मेरे देश की धरती'
फिर हो 'छैंया-छैंया'
वन काटे, पर्वत खोदे,
भारत माँ घायल भैया

किसको चिंता? यहाँ देश की?
सबको है निज हित की
सत्ता पा- निज मूर्ति लगाकर,
भारत की दुर्गति की.

श्रद्धा, आस्था, निष्ठा बेचो
स्वार्थ साध लो अपना.
जाये भाड़ में किसको चिंता
नेताजी का सपना

कौन हुआ आजाद?
भगत है कौन देश का बोलो?
झंडा फहराने के पहले
निज मन जरा टटोलो

तंत्र न जन का
तो कैसा जनतंत्र तनिक समझाओ?
प्रजा उपेक्षित प्रजातंत्र में
क्यों कारण बतलाओ?

लोक तंत्र में लोक मौन क्यों?
नेता क्यों वाचाल?
गण की चिंता तंत्र न करता
जनमत है लाचार

गए विदेशी, आये स्वदेशी,
शासक मद में चूर.
सिर्फ मुनाफाखोरी करता
व्यापारी भरपूर

न्याय बेचते जज-वकील मिल
शोषित- अब भी शोषित
दुर्योधनी प्रशासन में हो
सत्य किस तरह पोषित?

आज विचारें
कैसे देश हमारा साध्य बनेगा?
स्वार्थ नहीं सर्वार्थ
हमें हरदम आराध्य रहेगा.


२४ जनवरी २०११

सोमवार, 3 जनवरी 2011

कविता: लोकतंत्र का मकबरा संजीव 'सलिल'

कविता:
लोकतंत्र का मकबरा
संजीव 'सलिल'
*
(मध्य प्रदेश के नये विधान सभा भवन के उद्घाटन के अवसर पर २००१ में लिखी गयी )

विश्व के
महानतम लोकतन्त्र के
विशालतम राज्य के
रोजी-रोटी के लिये चिंतित
पेयजल और
शौच-सुविधा से वंचित
विपन्न जनगण के,
तथाकथित गाँधीवादी, राष्ट्रवादी,
साम्यवादी, बहुजनवादी,
समाजवादी, आदर्शवादी,
जनप्रतिनिधियों के
बैठने-सोचने,
ऐठने-टोंकने,
 लड़ने-झगड़ने और
मनमानी करने के लिये
बनाया गाय है एक भवन,
जिसकी भव्यता देख
दंग रह जायें
किन्नर-अप्सराएँ,
यक्ष और देवगण.

पैर ही नहीं
दृष्टि और चरित्र भी
स्खलित हो साये
इतने चिकने फर्श.
इतना ऊँचा गुम्बद
कि नीचा नजर आये अर्श.
श्वासरोधी चमक
अचंभित करती दमक.
वास्तुकला का
नायाब नमूना.
या गरीब प्रदेश की
खस्ताहाल अर्थव्यवस्था को
जान-बूझकर
लगाया गया चूना?
लोकतन्त्र का भगेविधाता
झोपडीवासी मतदाता
 देश का आम आदमी,
बापू का दरिद्र नारायण
नित नये करों की
भट्टी में जा रहा है भूना.  

नई करोड़ की प्रस्तावित लागत,
बावन करोड खा गयी इमारत.
साज-सज्जा फिर भी अधूरी
हाय! हाय!! ये मजबूरी.
काश!
इतना धन मिल जाता
 गरीब बच्चों के
गरीब माँ-बापों को
तो हजारों बेटियों के
हाथ हो जाते पीले,
अनेकों मरीजों का
हो जाता इलाज.
बच जाते जाने
कितनों के प्राण.

अनगिन गावों तक
पहुँचतीं सड़कें.
खुलते कल-कारखाने
बहुत तडके..
मिलती भूखों को दाल-रोटी.
खुशियाँ कुछ बड़ी, कुछ छोटीं.
लेकिन-
ज्यादा जरूरी समझा गया
आतप, वर्षा, शीत,
नंगे बदन झेलनेवाले
मतदाताओं के
जनप्रतिनिधियों को
एयर कंडीशन में बैठाना.
जनगण के दुःख-दर्द,
देश की माटी-पानी,
हवा और गर्द से
दूर रखना-बचाना
ताकि
इतिहास की पुनरावृत्ति न हो सके.
लोकतन्त्री शुद्धोधन (संविधान) के
सिद्धार्थी राजकुमार (जनप्रतिनिधि)
जीवन का सत्य न तलाशने लगें.
परिश्रम के पानी और 'अनुभव की माटी से
शासन-प्रशासन की जनसेवी सूरत
न निखारने लगें.
आम आदमी के
दुःख, दर्द, पीड़ा के
फलसफे न बघारने लगें.

इसलिए-
ऐश्वर्या उअर वैभव,
सुख और सुविधा,
ऐश और आराम का
चकाचौंधभरा माया-महल बनवाया गया है.
कुरुक्षेत्र के
महाभारत के समान
चुनावी महासमर में
ध्रित्रश्त्री रीति-नीति से
चुने गये दुर्योधनी विधायकों से
गाँधीवादी आदर्शों की
असहाय द्रौपद्र्र का खुलेआम
चीरहरण कराया गया है,
ताकि -
जनतंत्री कृष्ण, लोकतंत्री पांडव
और गणतंत्री कुरुकुल के
सनातन शत्रु
धृतराष्ट्री न्यायपालिका,
दुर्योधनी विधायिका,
शकुनी पत्रकारिता, दुशासनी प्रशासन के सहारे ,
संभावनाओं के अभिमन्यु को
घपलों-घोटालों के चक्रव्यूह में
घेरकर उसका काम तमाम कर कि
तमाम काम हो गया.
और जनगण को
तारने की आड़ में खुद तर सकें.
 एक नहीं,
अनेक पीढ़ियों के लिये
काली लक्ष्मी से
सारस्वत सफेदी को शर्मानेवाले
इरावती वाहन ला सकें.
अपने घरों को
सहस्त्रक्षी इन्द्र का विलास भवन बना सकें.
अपने ऐश-आराम और
भोग-विलास की खातिर
देश के आम लोगों के
सुख-चैन को बेचकर गा सकें
उद्दंडता के ध्वनि-विस्तारक यंत्र पर
देश प्रेम के छद्म गीत गा सकें.
सत्य को तलाशते विदुर पत्रकारों
संजय जैसे निष्पक्ष अधिकारियों की
आवाज़ को सुविधा से घोंट,
दबा या दफना सकें.
नीति, नियम, विचार, सिद्धांत भूलकर
बना सकें ऐसी नीतियां कि
आम आदमी मँहगाई की मार से
रोजी-रोटी के जुगाड़ की चिंता में
न जिंदा रह पाये न मारा.
अस्मिता बचाने,
लज्जा छिपाने और
सिर न झुकाने की विरासत
चेतना और विवेक का मारा
रह जाये अधमरा.
इसलिए... मात्र इसलिए
मुकम्मल कराया गया है
शानदार
मगर बेजानदार
लोकतंत्र का मकबरा.

**********************

कविता: लोकतन्त्र मकबरा न हो... संजीव 'सलिल'

कविता:

लोकतन्त्र मकबरा न हो...

संजीव 'सलिल'
*
लोकतंत्र है
जनगण-मन की ,
आशाओं का पावन मंदिर.

हाय!
हो रहा आज अपावन.
हमने शीश कटाये
इसकी खातिर हँसकर.
त्याग और बलिदानोंकी थी
झड़ी लगा दी.

आयी आज़ादी तो
भुला देश हित हमने
निजी हितों को
दी वरीयता.

राजनीति-
सत्ता, दल, बल,
छल-नीति होगई.
लोकनीति-जननीति बने
यह आस खो गयी. 
घपलों-घोटालों की हममें
होड़ लगी है.
मेहनत-ईमानदारी की
क्यों राह तजी है?

मँहगे आम चुनाव,
भ्रष्टतम हैं सरकारें.
असर न कुछ होता
दुतकारें या फटकारें.

दोहरे चेहरे भारत की
पहचान बन गये.
भारतवासी खुद से ही
अनजान हो गये.

भुला विरासत
चकाचौंध में भरमाये क्यों?
सरल सादगी पर न गर्व
हम शरमाये क्यों?

लोकतन्त्र का नित्य कर रहे
क्रय-विक्रय हम.
अपने मुख पर खुद ही
कालिख लगा रहे हम.

नाग, साँप, बिच्छू ही
लड़ते हैं चुनाव अब.
आसमाँ छू रहे
जमीं पर आयें भाव कब?

सामाजिक समरसता को
हम तोड़ रहे हैं.
सात्विक, सहज, सरलता से
मुँह मोड़ रहे हैं.

लोकतंत्र पर लोभतन्त्र
आघात कर रहा.
साये से अपने ही
इंसां आज डर रहा.

क्षत-विक्षत हो
सिसक रहा जनतंत्र छुपाओ.
लोक तंत्र मकबरा न हो
मिल इसे बचाओ.

*********************

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

दोहा-नवगीत : बरसो राम धड़ाके से -संजीव 'सलिल'

दोहा-नवगीत :
बरसो राम धड़ाके से


संजीव 'सलिल'
*
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

*
लोकतंत्र की जमीं पर, 
लोभतंत्र के पैर
अंगद जैसे जम गए 
अब कैसे हो खैर?

अपनेपन की आड़ ले, 
भुना रहे हैं बैर
देश पड़ोसी मगर बन- 
कहें मछरिया तैर

मारो इन्हें कड़ाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !
*
कर विनाश मिल, कह रहे, 
बेहद हुआ विकास
तम की कर आराधना- 
उल्लू कहें उजास

भाँग कुएँ में घोलकर, 
बुझा रहे हैं प्यास
दाल दल रहे आम की- 
छाती पर कुछ खास

पिंड छुड़ाओ डाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !
*
मगरमच्छ अफसर मुए, 
व्यापारी घड़ियाल
नेता गर्दभ रेंकते- 
ओढ़ शेर की खाल

देखो लंगड़े नाचते, 
लूले देते ताल
बहरे शीश हिला रहे- 
गूँगे करें सवाल

चोरी होती नाके से, 
बरसो राम धड़ाके से !
मरे न दुनिया फाके से !

****************

मंगलवार, 1 जून 2010

मुक्तिका: जंगल काटे....... --संजीव 'सलिल'


मुक्तिका:

जंगल काटे...

संजीव 'सलिल'
*
जंगल काटे, पर्वत खोदे, बिना नदी के घाट रहे हैं.
अंतर में अंतर पाले वे अंतर्मन-सम्राट रहे हैं?.

जननायक जनगण के शोषक, लोकतंत्र के भाग्य-विधाता.
निज वेतन-भत्ता बढ़वाकर अर्थ-व्यवस्था चाट रहे हैं..

सत्य-सनातन मूल्य, पुरातन संस्कृति की अब बात मत करो.
नव विकास के प्रस्तोता मिल इसे बताए हाट रहे हैं..

मखमल के कालीन मिले या मलमल के कुरते दोनों में
अधुनातनता के अनुयायी बस पैबन्दी टाट रहे हैं..

पट्टी बाँधे गांधारी सी, न्याय-व्यवस्था निज आँखों पर.
धृतराष्ट्री हैं न्यायमूर्तियाँ, अधिवक्तागण भाट रहे हैं..

राजमार्ग निज-हित के चौड़े, जन-हित की पगडंडी सँकरी.
जात-पाँत के ढाबे-सम्मुख ऊँच-नीच के खाट रहे हैं..

'सेवा से मेवा' ठुकराकर 'मेवा हित सेवा' के पथ पर
पग रखनेवाले सेवक ही नेता-साहिब लाट रहे हैं..

मिथ्या मान-प्रतिष्ठा की दे रहे दुहाई बैठ खाप में
'सलिल' अत्त के सभी सयाने मिल अपनी जड़ काट रहे हैं..

********************
हाट = बाज़ार, भारत की न्याय व्यवस्था की प्रतीक मूर्ति की आँखों पर पट्टी चढी है, लाट साहिब = बड़े अफसर, खाप = पंचायत, जन न्यायालय, अत्त के सयाने = हद से अधिक होशियार = व्यंगार्थ वास्तव में मूर्ख. .

- दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर