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सोमवार, 5 मार्च 2012

फागुन के मुक्तक --संजीव 'सलिल'

फागुन के मुक्तक
संजीव 'सलिल'
*

:)) laughing बसा है आपके ही दिल में प्रिय कब से हमारा दिल.
=D> applause बनाया उसको माशूका जो बिल देने के है काबिल..
:)) laughing चढ़ायी भाँग करके स्वांग उससे गले मिल लेंगे-
=D> applause रहे अब तक न लेकिन अब रहेंगे हम तनिक गाफिल..
*
:)) laughing दिया होता नहीं तो दिया दिल का ही जला लेते.
=D> applause अगर सजती नहीं सजनी न उससे दिल मिला लेते..
:)) laughing वज़न उसका अधिक या मेक-अप का कौन बतलाये?
=D> applause करा खुद पैक-अप हम क्यों न उसको बिल दिला लेते..
*
:)) laughing फागुन में गुन भुलाइए बेगुन हुजूर हों.
=D> applause किशमिश न बनिए आप अब सूखा खजूर हों..
:)) laughing माशूक को रंग दीजिए रंग से, गुलाल से-
=D> applause भागिए मत रंग छुड़ाने खुद मजूर हों..
*

सोमवार, 21 नवम्बर 2011

मुक्तक: भारत --संजीव 'सलिल'

मुक्तक:
भारत
संजीव 'सलिल'
*
तम हरकर प्रकाश पा-देने में जो रत है.
दंडित उद्दंडों को कर, सज्जन हित नत है..
सत-शिव सुंदर, सत-चित आनंद जीवन दर्शन-
जिसका जग में देश वही अपना भारत है..
*
भारत को भाता है, जीवन का पथ सच्चा.
नहीं सुहाता देना-पाना धोखा-गच्चा..
धीर-वीर गंभीर रहे आदर्श हमारे-
पाक नासमझ समझ रहा है नाहक कच्चा..
*
भारत नहीं झुका है, भारत नहीं झुकेगा.
भारत नहीं रुका है, भारत नहीं रुकेगा..
हम-आप मेहनती हों, हम-आप नेक हों तो-
भारत नहीं चुका है, भारत नहीं चुकेगा..
*
हम भारती के बेटे, सौभाग्य हमारा है.
गिरकर उठे तोमाँने हँस-हँसकर दुलारा है..
किस्मत की कैद हमको किंचित नहीं गवारा-
अवसर ने द्वार पर आ हमको ही पुकारा है..
*
हमने जग को दिखलाया कंकर में शंकर.
मानवता के शत्रु हेतु हम हैं प्रलयंकर..
पीड़ित, दीन, दुखी मानवता के हैं रक्षक-
सज्जन संत जनों को हम ही हैं अभ्यंकर..
******
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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मंगलवार, 9 अगस्त 2011

काव्य सलिला:: संजीव 'सलिल'

काव्य सलिला::
कही अनकही बात
संजीव 'सलिल'
*
अपनी कोशिश छुएँ उनका आसमां,
उनकी चाहत नापलें मेरी जमीं.
न वो बाज आये, न हम बाज आये, 
बात बिगड़ी है नहीं, बनती नहीं..

या तो न बरसे, या छत फाड़कर बरसे,
निकल पड़े हम खाली हाथ घरसे.
ऐ बादलों! ऐ बिजलियों! न रोको,
रुकेंगे नहीं पग हमारे निडर से..

बंद आँखों से किया दीदार जब-जब,
सनम को साकार पाया 'सलिल' तब-तब.
खोल आँखें खोजता था उस हर दम,
कोशिशें लेकिन हमेशा हो गयीं कम..

दोस्तों की मेहरबानी देखिये,
पीठ पर है ज़ख्म कितने लेखिये.
आँकिए हमको न उनसे कम तनिक,
शूल के संग फूल भी अवरेखिये..

नींद फूलों ने चुराई चुप रहे,
चैन शूलों ने भुलाया चुप रहे.
बोल ने रस घोल कानों में कहा-
बोलता है वही जो बस चुप रहे..

मधुकरी की चाह मधुकर को रही.
तितलियों ने बाँह कलियों की गही.
भ्रमर अनहद भूलकर पछता रहा-
 कौन जाने क्या गलत है?, क्या सही?..

कब कहा कुछ? कब लिखा मैंने कभी?
लिखाया जिसने न वह प्रगटा कभी..
मिली जब जो तालियाँ या गालियाँ-
विहँसकर स्वीकार वह करता सभी..
एक दोहा:
काव्य सृजन के खेल का एक नियम विख्यात.
कही अनकही रह गयी, कही अनकही बात..
Acharya Sanjiv Salil

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सोमवार, 18 जुलाई 2011

कविता : -- संजीव 'सलिल'

कविता
संजीव 'सलिल'
*
युग को सच्चाई का दर्पण, हर युग में दिखाती चले कविता.
दिल की दुनिया में पलती रहे, नव युग को बनाती पले कविता..
सूरज की किरणों संग जागे, शशि-किरणों संग ढले कविता.
योगी, सौतन, बलिदानी में, बन मन की ज्वाल जले कविता.
*

बुधवार, 18 मई 2011

मुक्तक: भारत संजीव 'सलिल'

मुक्तक:
भारत
संजीव 'सलिल'
*
भारत नहीं झुका है, भारत नहीं झुकेगा.
भारत नहीं रुका है, भारत नहीं रुकेगा..
हम-आप मेहनती हों, हम एक-नेक हों तो-
भारत नहीं पिटा है, भारत नहीं पिटेगा..
*
तम हरकर प्रकाश पा-देने में जो रत है.
दंडित उद्दंदों को कर, सज्जन हित नत है..
सत-शिव-सुंदर, सत-चित-आनंद जीवन दर्शन-
जिसका है वह देश जगत-प्यारा भारत है..
*
भारत को भाता है जीवन सीधा-सच्चा.
नहीं सुहाता देना या लेना नित गच्चा..
धीर वीर गंभीर रहा नेतृत्व हमारा-
'सलिल' नासमझ समझ रहा है हमको कच्चा..
*

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

षटपदियाँ : संजीव 'सलिल'

षटपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*
इनके छंद विधान में अंतर को देखें. प्रथम अमृत ध्वनि है, शेष कुण्डलिनी
भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल.
*
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल..
तज भेदों के, शूल अनवरत, रहें सृजनरत.
मिलें अंगुलिका, बनें मुष्टिका, दुश्मन गारत..
तरसें लेनें. जन्म देवता, विमल विनयरत.
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत..
*
कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान.
हुए पराजित पलों में, कोटि-कोटि विद्वान..
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर.
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर..
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर.
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर..  
*
सुंदरियाँ घातक; सलिल' पल में लें दिल जीत.
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत.
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर.
बिछुड़ें तो अवढरदानी  भी हों प्रलयंकर.
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ.
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ..
*

एक चतुष्पदी : संजीव 'सलिल'

एक चतुष्पदी :

संजीव 'सलिल'
*
हार मिलीं अनगिन मैंने जयहार समझ उनको पहना.
जग-जीवन ने अपमान दिया मैंने मना उसको गहना..
प्रभु से माँगा 'जो जब देना, मुझको सिखला देना सहना-
आखिर में साँसों-आसों की चादर को सीख सकूँ तहना..
Acharya Sanjiv Salil

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मंगलवार, 10 अगस्त 2010

माँ को अर्पित चौपदे: संजीव 'सलिल'


         माँ को अर्पित चौपदे: संजीव 'सलिल'

Picture 128.jpg

बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ.
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ..
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ..
*
मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ.
खेल-कूद शाला नटख़टपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ..
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ..


खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ.
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ..
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी-
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ..
*
गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ.
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ..
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ..
*
कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ.
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ.
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ..
*
आशा आँगन, पुष्पा उपवन, भोर किरण की सुषमा है माँ.
है संजीव आस्था का बल, सच राजीव अनुपमा है माँ..
राज बहादुर का पूनम जब, सत्य सहाय 'सलिल' होता तब-
सतत साधना, विनत वन्दना, पुण्य प्रार्थना-संध्या है माँ..
*
माँ निहारिका माँ निशिता है, तुहिना और अर्पिता है माँ
अंशुमान है, आशुतोष है, है अभिषेक मेघना है माँ..
मन्वंतर अंचित प्रियंक है, माँ मयंक सोनल सीढ़ी है-
ॐ कृष्ण हनुमान शौर्य अर्णव सिद्धार्थ गर्विता है माँ

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मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कृति चर्चा: 'कुछ मिश्री कुछ नीम' एक सारगर्भित मुक्तक संग्रह चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

कृति चर्चा:

'कुछ मिश्री कुछ नीम' एक सारगर्भित मुक्तक संग्रह

चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संपादक दिव्य नर्मदा अंतर्जाल हिन्दी पत्रिका
*
{कृति विवरण: कुछ मिश्री कुछ नीम, मुक्तक संग्रह, मुक्तककार: चन्द्रसेन 'विराट', आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, पृष्ठ १४४, मूल्य २५० रु., प्रकाशक: समान्तर प्रकाशन तराना उज्जैन, रचनाकार संपर्क: समय, १२१ बैकुंठधाम कोलोनी, इंदौर ४५२०१८, दूरभाष: ०७३१ २५६२५८६, चलभाष: ९३२९८९५५४०.}
*

विश्व वाणी हिन्दी को अपनी संस्कृत माँ से विरासत में मिले चांदस कोष अक जाज्वल्यमान रत्न है 'मुक्तक'. श्रव्य काव्य की पद्य शाखा के अंतर्गत मुक्तक काव्य गणनीय है. महापात्र विश्वनाथ (१३ वीं सदी) के अनुसार 'छन्दोंबद्धमयं पद्यं तें मुक्तेन मुक्तकं'  अर्थात जब एक पद अन्य पदों से मुक्त हो तब उसे मुक्तक कहते हैं. मुक्तक का शब्दार्थ ही है 'अन्यै: मुक्तमं इति मुक्तकं' अर्थात जो अन्य श्लोकों या अंशों से मुक्त या स्वतंत्र हो उसे मुक्तक कहते हैं. अन्य छन्दों, पदों ये प्रसंगों के परस्पर निरपेक्ष होने के साथ-साथ जिस काव्यांश को पढने से पाठक के अंत:करण में रस-सलिला प्रवाहित हो वही मुक्तक है- 'मुक्त्मन्यें नालिंगितम.... पूर्वापरनिरपेक्षाणि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदैव मुक्तकं'

प्रबंध काव्यों, गीतों आदि में कवि की कल्पनाशीलता को पात्रों तथा घटनाक्रमों के आकाश में उड़ान भरने का अवसर सुलभ होता है किन्तु मुक्तक की संकुचित-लघु पंक्तियों में भावों, रसों, बिम्बों, प्रतीकों आदि का परिपाक कर सकना कवि के रचना कौशल की कड़ी परीक्षा है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में: 'जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ-साथ भाषा की समास शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतना ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा.'

समकालिक हिन्दी गीति-काव्य के शिखर हस्ताक्षर अभियंता श्री चन्द्रसेन 'विराट' के १३ गीत संग्रहों, १० ग़ज़ल संग्रहों, २ दोहा संग्रहों, ५ मुक्तक संग्रहों पट दृष्टिपात करें तो उनके समृद्ध शब्द-भंडार, कल्पनाप्रवण मानस, रससिक्त हृदय, भाव-बिम्ब-प्रतीक त्रयी के समायोजन की असाधारण क्षमता का लोहा मानना पड़ता है. निपुण अभियंता 'चन्द्रसेन' जिस तरह विविध निर्माण सामग्रियों का सम्यक समायोजन कर सुदृढ़ संरचनाओं को मूर्तित कर भारत को समृद्ध करते रहे ठीक वैसे ही उनके अन्दर विराजित 'विराट' काव्य के विविध उपादानों का सम्यक समन्वय कर विविध विधाओं, विषयों और कथ्यों से हिन्दी के सारस्वत कोष को संपन्न करने में जिउया रहा.

कुछ मिश्री कुछ नीम के मुक्तक जीवन की धूप-छाँव, सुख-दुःख, उन्नति-अवनति, उत्थान-अवसान, आगमन-प्रस्थान के दो पक्षों का प्रतिनिधित्व करने पर भी अथाह विश्वास, अनंत ऊर्जा, असीम क्रियाशीलता, अनादि औत्सुक्य तथा अगणित आयामों के पञ्च अमृतों से परिपूर्ण हैं, उनमें कहीं हताशा, निराशा, कुंठा, घृणा या द्वेष के पञ्च विकारों का स्थान नहीं है. विराट के चिन्तन में वैराट्य और औदार्य निरंतर दृष्टव्य है. वे ऊर्ध्वारोहण के पक्षधर हैं, अधोगमन की चर्चा नितांत आवश्यक हो तो भी इंगित मात्र से संकेतित करते हैं. इस मुक्तक संग्रह के उत्तरार्ध 'कुछ मिश्री' के कुछ मधुर मुक्तकों का आनंद लें:

थोड़ा तुभ की ओर देखो तो
कितना रती विभोर देखो तो
कितनी तीखी है धार हँसिये की
दूकी चन्द्र-कोदेखो तो
*
ज्ञान के घट का उठना बाकी है.
यवनिका-पट का उठना बाकी है
प्रकृति के कितने ही रहस्यों से
अब भी घूँघट का उठना बाकी है.
*
वसर है दृग मिला लेंगे.
प्यार को पने जमा लेंगे.
कोरा कुरता है पना भी
कोरी चूनर पे रंग डालेंगे.
*
क्षिणी, वाम न देखा जाये
ख्याति, पद-ना देखा जाये
ग्रन्थ रखें कि पुरस्कारों हित
न्य याम न देखा जाये.

विराट को अनुप्रास तथा उपमा अलंकारों का सानिंध्य प्रिय है. मुक्तकों में अनुप्रास और उपमा के सभी प्रकार जाने-अनजाने प्रयुक्त हुए हैं. उनके ये मुक्तक १७-१९ मात्राओं में निबद्ध होने पर भी लय वैविध्य से सलिला की चंचल लहरों की सी गतिशीलता की अनुभूति कराते हैं.

संकलन के हर मुक्तक में प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ पंक्ति में अन्त्यानुप्रास (पदांत-तुकांत) को विराट सहजता से साध सके हैं, वह कहीं भी आरोपित प्रतीत नहीं होता. यह अन्त्यानुप्रास एक शब्द से लेकर ४-५ शब्दों तक का है. उक्त मुक्तकों में  क्रमशः 'ओर देखो तो, भोर देखो तो, कोर देखो तो', 'घट का उठना बाकी है, पट का उठना बाकी है, घट का उठना बाकी है', 'ला लेंगे, मा लेंगे, डालेंगे', वाम न देखा जाये, नाम न देखा जाये, याम न देखा जाये'   में अन्त्यानुप्रास अलंकार दृष्टव्य हैं.

छेकानुप्रास किसी पंक्ति में एक या अधिक वर्णों की दुहरी आवृत्ति से होता हैं. छेकानुप्रास की छटा उक्त उदाहरणों में देखिये: त- तु तो, क- कि क, क- कि की, द- दू दे, क- की को, क- के का, क- के कि, अ- आ अ, अ- अ आ, क- को कु, अ- आ अ, द- द दे, न- ना न, प- प पु, अ- अ आ आदि.

वृन्त्यानुप्रास : तुम ही कुम्हलाई हुई लगती हो, खूब सादा हो हज सुन्दर हो, सुख तो घटता है मय के सँग-सँग, क्रूर दुनिया को सुखी रती हो,  साजो-सामान से डर लगता है, दोस्त हों न मगर होने की, जानता हूँ वान जिस्मों की आदि पंक्तियों में रेखांकित शब्दों में वृत्यानुप्रास लगातार शब्दों में भी है और अलग-अलग प्रयुक्त शब्दों में भी.

इन मुक्तकों के सरस और मधुर बनने में श्रुत्यानुप्रास की भी महती भूमिका है:एक उच्चारण-स्थल से उच्चारित होनेवाले वर्ण समूह की आवृत्ति से उत्पन्न श्रुत्यानुप्रास अलंकार की झलक  थोड़ा तुभ की ओर देखो तो, कितनी तीखी है धार हँसिये की, दूज की चन्द्र-कोर देखो तो आदि पंक्तियों में समाहित है.

विराट के मुक्तकों का एक वैशिष्ट्य समान उच्चारण तथा भार के शब्दों का विविध पंक्तियों में एक समान स्थान पर आना है. ऐसे शब्द अर्थवत्ता प्रदान करने के साथ-साथ नाद सौन्दर्य की अभिवृद्धि भी करते हैं. निम्न मुक्तकों में शर्मदा, सर्वदा, नर्मदा तथा तबस्सुम, तलातुम, तरन्नुम ऐसे ही शब्द हैं जिनका प्रयोग विराट ने उसी तरह किया जिस तरह कोई चित्रकार विविध तूलिकाघातों का प्रयोग अभिन्नता में भिन्नता दर्शाने हेतु करता है.

शील की शर्मदा मिली मुझको
सौख्यदा सर्वदा मिली मुझको
भाग्यशाली हूँ तुम सरीखी जो
नेह की नर्मदा मिली मुझको.
*
हर तबस्सुम को तुम समझती हो.
हर तलातुम को तुम समझती हो.
जानता हूँ जवान जिस्मों की -
हर तरन्नुम को तुम समझती हो.

लाटानुप्रास ( एक शब्द की समान अर्थ में एकाधिक आवृत्ति ) रंग ही रंग नज़र आयेंगे, अपना प्यारा करीब होता है / हर सहारा करीब होता है / डूब जाती है नाव तब अक्सर / जब किनारा करीब होता है, प्राकृतिक रूप सलज सुन्दर हो / खूब सादा हो, सहज सुन्दर हो / कुछ न श्रृंगार न सज-धज जैसे / ओस भीगा सा जलज सुन्दर हो,  लिख दूँ किरणों से धूप का मुक्तक / रूपवाले अनूप का मुक्तक / आँख भरकर तुम्हें निहारूं तो / मुझको लिखना है रूप का मुक्तक, फागवाले प्रसंग की कविता / रंग पर है ये रंग की कविता / भीगे वस्त्रों ने स्पष्ट लिख दी है / अंग पर यह अनंग की कविता आदि  में खूबसूरती से प्रयुक्त हुआ है. अंतिम दो मुक्तकों में ३-३ बार लतानुप्रस का प्रयोग विराट जी के भाषा व छंद पर असाधारण अधिकार का साक्षी है.

उपमा अलंकार में विराट के प्राण बसते हैं. वे अपनी प्रेरणा के लिये अछूती और मौलिक उपमाएँ प्रयोग में लाते हैं तो पारंपरिक और प्रचलित उपमाओं से भी उन्हें परहेज़ नहीं है. तुम भी मुझ सी ही काम-काजी हो (७२), एक दर्पण सा चटख जाता मैं (७४) आदि में पूर्णोपमा, फूल के जैसे खिले रहने दो (७७), पूर्ण मुकुलित सा विमल होता है (४६) आदि में लुप्तोपमा की मोहक छवि एक ही पंक्ति में है जबकि 'भाग्यशाली हूँ तुम सरीखी जो / नेह की नर्मदा मिली मुझको' तथा अन्यत्र पूर्णोपमा दो पंक्तियों में है.

संग्रह के 'कुछ मिश्री' तथा 'कुछ नीम' शीर्षकों दो खंडों में क्रमशः १५१ तथा २६२ कुल ४१३ मुक्तक-रत्नों से समृद्ध यह विराटी मंजूषा हर सुरुचिसंपन्न पाठक को लुभाने में समर्थ है. विराट के ये मुक्तक नवोंमेषित उक्तियों के भंडार हैं. 'शब्द का जाप नहीं है कविता (१६३), तुम सचाई को गुन नहीं सकते (१७२), जो गलत हो सही नहीं बनता (१३९), फन ग़ज़ल का है खुदा की नेमत (१३८), रूप पीने से जी नहीं भरता (११८), प्रेम में ब्रम्ह का आनंद मिला (१०७) जैसे मुक्तकांश स्वतंत्र रूप से उक्तियों की तरह जुबान पर चढ़ने में समर्थ हैं.

गुरुत्वाकर्षण तथा बल के नियमों जैसी अनेक महत्वपूर्ण शोधें करनेवाले महान वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन को यह समझने में कठिनाई हुई कि जिस बड़े छेद में से बिल्ली निकल सकती है उसी में से उसका छोटा बच्छा भी निकल सकता है, बच्चे के लिये अलग से छोटा छेद बनाने की ज़रुरत नहीं है. इसका कारण मात्र यह है कि गूढ़ के समाधान में उलझा मस्तिष्क सहज स्तर पर नहीं उतर पाया. ऐसा ही विराट के साथ भी है. वे जिस भाव शिखर पर ध्यानस्थ रहते हैं वहाँ सामान्य भाषिक शुद्धताओं की अनदेखी स्वाभाविक है. 'ब्रम्ह की राह सुझाई देगी' एक अशुद्ध प्रयोग है, 'राह' के साथ 'सुझाई जाती' या 'दिखाई देती' प्रयोग शुद्ध होता.  पिन्हाने, सपन, तिराने (१७४), लंगौटा (१६७), तयारी (२४३), रस्ते (२२३), तयार (२०४) आदि अशुद्ध प्रयोग विराट की संस्कारी हिन्दी के मखमल में टाट का पैबंद लगते हैं. 'जाए' के स्थान पर 'जाये' का अशुद्ध प्रयोग भी एकाधिक स्थान पर है. 'जाए' का अर्थ 'गमन करना' और 'जाये' का अर्थ 'जन्म दिया' होता है. यह मुद्रण त्रुटि है तो भी नए पाठकों/ रचनाकारों को भ्रमित कर गलत प्रयोग बढ़ाएगी. विराम चिन्हों का प्रयोग न किया जाना भी विचारणीय है. विराट जी की कृतियाँ भाषिक प्रयोग के लिए मानकों की तरह देखी जाती हैं इसलिए अधिक सावधानी की अपेक्षा स्वाभाविक है.  

संबंधों को वस्त्रों की तरह बदलने के इस दौर में विराट की सात्विक प्रेमपरक दृष्टि तथा सनातन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता मुझ जैसे अनुजों और नयी पीढी के रचनाकारों के लिये अनुकरणीय है. विराट दैनंदिन छोटे-छोटे प्रसंगों से गहन सत्यों को उद्घाटित करनें में समर्थ हैं. बानगी देखिये:

मेरी आँखों में चमक तुमसे है
प्यार की खास दमक तुमसे है
तुम न होतीं तो अलोना होता-
मेर जीवन में नमक तुमसे है.  (इस नमक पर दुनिया की सब मधुरता निछावर, अभिनव और अनूठा प्रयोग)
*
लिख दूँ किरणों से धूप का मुक्तक
रूपवाले अनूप का मुक्तक
आँख भार कर तुम्हें निहारूँ तो
मुझको लिखना है रूप का मुक्तक.  (वसनहीनता को प्रगति समझने वाली पीढी के लिये श्रृंगार की शालीनता, मर्यादा और सात्विकता दृष्टव्य)
*
श्रृंगार के कुशल चितेरे विराट की कलम से व्यंग्य कम ही उतरता है पर जब भी उतरता है, मन को छूता है-

चीजें मँहगी हैं आदमी सस्ते
आज बाज़ार से बड़ा क्या है
*
आज-कल शहर की गरिमा-महिमा
उसके बाज़ार से आँकी जाती
*
बिकती है मौत की सुपारी भी
यह भी बाज़ार का तरीका है
*
दीन सरसब्ज़ न हो जाएँ कहीं
फिर शुरू नब्ज़ न हो जाये कहीं
खूब चिंता है निर्धनों की तुम्हें
भूख को कब्ज़ न हो जाये कहीं.*

उक्त मुक्तकों में समय के पदचापों और उन पर कवि की प्रतिक्रिया को महसूस जा सकता है. 'कम लिखे को अधिक समझना' के पारंपरिक पक्षधर विराट शब्दों का तनिक भी अपव्यय नहीं करते.. हर पंक्ति का हर शब्द सटीक हो तो कविता की अनदेखी की ही नहीं जा सकती.

घर की बैठक में पुष्प डाली हो
तुलसी आँगन की दीप वाली हो
अन्नपूर्ण हो तुम रसोई में
सेज पर तुम ही आम्रपाली हो.

अपने मुक्तकों का वैशिष्ट्य उद्घाटित करते हुए विराट कहते हैं:

कल्पनाएँ तो विरल हैं मेरी
मान्यताएँ भी प्रबल हैं मेरी
देवता सुन कि मनुज मैं अब तक
आस्था दृढ़ है अचल है मेरी.

ऐसी दृढ़, अचल आस्था, प्रबल मान्यता और विरल कल्पना हर हिन्दी प्रेमी की हो मा शारदा से यही विनय है.

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मंगलवार, 18 मई 2010

चार चतुष्पदियाँ : तितली पर ---संजीव वर्मा 'सलिल'


                                                         तितली से बगिया हुई, प्राणवान-जीवंत.
तितली यह सच जानती, नहीं मोह में तंत..
भ्रमर लोभ कर रो रहा, धोखा पाया कंत.
फूल कहे, सच को समझ, अब तो बन जा संत..
*

जग-बगिया में साथ ही, रहें फूल औ' शूल.
नेह नर्मदा संग ही, जैसे रहते कूल..
'सलिल' न भँवरा बन, न दे मतभेदों को तूल.
हर दिल बस, हर दिल बसा दिल में, झगड़े भूल..
*

नहीं लड़तीं, नहीं जलतीं, हमेशा मेल से रहतीं.
तितलियों को न देखा आदमी की छाँह भी गहतीं..
हँसों-खेलो, न झगड़ो ज़िंदगी यह चंद पल की है-
करो रस पान हो गुण गान, भँवरे-तितलियाँ कहतीं..
*

तितलियाँ ही न हों तो फूल का रस कौन पायेगा?
भ्रमर किस पर लुटा दिल, नित्य किसके गीत गायेगा?
न कलियाँ खिल सकेंगीं, गर न होंगे चाहनेवाले-
'सलिल' तितली न होगी, बाग़ में फिर कौन जायेगा?.

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सोमवार, 10 मई 2010

मातृ दिवस पर माँ को अर्पित चौपदे: ---संजीव 'सलिल'

मातृ दिवस  पर माँ को अर्पित चौपदे: संजीव 'सलिल'                            


बारिश में आँचल को छतरी, बना बचाती थी मुझको माँ.
जाड़े में दुबका गोदी में, मुझे सुलाती थी गाकर माँ..
गर्मी में आँचल का पंखा, झलती कहती नयी कहानी-
मेरी गलती छिपा पिता से, बिसराती थी मुस्काकर माँ..
*  
मंजन स्नान आरती थी माँ, ब्यारी दूध कलेवा थी माँ.
खेल-कूद शाला नटख़टपन, पर्व मिठाई मेवा थी माँ..
व्रत-उपवास दिवाली-होली, चौक अल्पना राँगोली भी-
संकट में घर भर की हिम्मत, दीन-दुखी की सेवा थी माँ..
*
खाने की थाली में पानी, जैसे सबमें रहती थी माँ.
कभी न बारिश की नदिया सी कूल तोड़कर बहती थी माँ.. 
आने-जाने को हरि इच्छा मान, सहज अपना लेती थी- 
सुख-दुःख धूप-छाँव दे-लेकर, हर दिन हँसती रहती थी माँ..
*
गृह मंदिर की अगरु-धूप थी, भजन प्रार्थना कीर्तन थी माँ.
वही द्वार थी, वातायन थी, कमरा परछी आँगन थी माँ..
चौका बासन झाड़ू पोंछा, कैसे बतलाऊँ क्या-क्या थी?-
शारद-रमा-शक्ति थी भू पर, हम सबका जीवन धन थी माँ..
*
कविता दोहा गीत गजल थी, रात्रि-जागरण चैया थी माँ.
हाथों की राखी बहिना थी, सुलह-लड़ाई भैया थी माँ.
रूठे मन की मान-मनौअल, कभी पिता का अनुशासन थी-
'सलिल'-लहर थी, कमल-भँवर थी, चप्पू छैंया नैया थी माँ..     
*
आशा आँगन, पुष्पा उपवन, भोर किरण की सुषमा है माँ.
है संजीव आस्था का बल, सच राजीव अनुपमा है माँ..
राज बहादुर का पूनम जब, सत्य सहाय 'सलिल' होता तब-
सतत साधना, विनत वन्दना, पुण्य प्रार्थना-संध्या है माँ..
*
माँ निहारिका माँ निशिता है, तुहिना और अर्पिता है माँ 
अंशुमान है, आशुतोष है, है अभिषेक मेघना है माँ..
मन्वंतर अंचित प्रियंक है, माँ मयंक सोनल श्रेया है-
ॐ कृष्ण हनुमान शौर्य अर्णव सिद्धार्थ गर्विता है माँ                                 
*
दिव्यनर्मदा.ब्लॉगस्पोट.कॉम





सोमवार, 3 मई 2010

मुक्तक : माँ के प्रति प्रणतांजलि: संजीव 'सलिल'

माँ के प्रति प्रणतांजलि:

तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी.
दोहा गीत गजल कुण्डलिनी, मुक्तक छप्पय रूबाई सी..
मन को हुलसित-पुलकित करतीं, यादें 'सलिल'  डुबातीं दुख में-
होरी गारी बन्ना बन्नी, सोहर चैती शहनाई सी.. 
*
मानस पट पर अंकित नित नव छवियाँ ऊषा अरुणाई सी.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी..
प्यार हौसला थपकी घुड़की, आशीर्वाद दिलासा देतीं-
नश्वर जगती पर अविनश्वर विधि-विधना की परछांई सी..
*
उँगली पकड़ सहारा देती, गिरा उठा गोदी में लेती.
चोट मुझे तो दर्द उसे हो, सुखी देखकर मुस्का देती.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी-
'सलिल' अभागा माँ बिन रोता, श्वास -श्वास है रुसवाई सी..
*
जन्म-जन्म तुमको माँ पाऊँ, तब हो क्षति की भरपाई सी.
दूर हुईं जबसे माँ तबसे घेरे रहती तन्हाई सी.
अंतर्मन की पीर छिपाकर, कविता लिख मन बहला लेता-
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी
*
कौशल्या सी ममता तुममें, पर मैं राम नहीं बन पाया.
लाड़ दिया जसुदा सा लेकिन, नहीं कृष्ण की मुझमें छाया.
मूढ़ अधम मुझको दामन में लिए रहीं तुम निधि पाई सी.
तन पुलकित, मन सुरभित करतीं, माँ की सुधियाँ पुरवाई सी
*

बृहस्पतिवार, 22 अप्रैल 2010

कुछ मुक्तक : --संजीव 'सलिल'


कुछ मुक्तक

संजीव 'सलिल'
*
मनमानी को जनमत वही बताते हैं.
जो सत्ता को स्वार्थों हेतु भुनाते हैं.
'सलिल' मौन रह करते अपना काम रहो-
सूर्य-चन्द्र क्या निज उपकार जताते हैं?
*
दोस्तों की आजमाइश क्यों करें?
मौत से पहले ही बोलो क्यों मरें..
नाम के ही हैं. मगर हैं साथ जो-
'सलिल' उनके बिन अकेले क्यों रहें?.
*
मौत से पहले कहो हम क्यों मरें?
जी लिए हैं बहुत डर, अब क्यों डरें?
आओ! मधुशाला में तुम भी संग पियो-
तृप्त होकर जग को तरें, हम तरें..
*
दोस्तों की आजमाइश तब करें.
जबकि हो मालूम कि वे हैं खरे..
परखकर खोटों को क्या मिल जायेगा?
खाली से बेहतर है जेबें हों भरे..
*
दोस्तों की आजमाइश वे करें.
जो कसौटी पर रहें खुद भी खरे..
'सलिल' खुद तो वफ़ा के मानी समझ-
बेवफाई से रहा क्या तू परे?
*
क्या पाया क्या खोया लगा हिसाब जरा.
काँटें गिरे न लेकिन सदा गुलाब झरा.
तेरी जेब भरी तो यही बताती है-
तूने बाँटा नहीं, मिला जो जोड़ धरा.
*

बृहस्पतिवार, 11 मार्च 2010

दोहे - मुक्तक : --'सलिल'

दोहे - मुक्तक :

पर्वत शिखरों पर बसी धूप-छाँव सँग शाम.
वृक्षों पर कलरव करें, पंछी पा आराम..
*
बिना दाम मेहनत करे, रवि बँधुआ मजदूर.
आसमान चुप सिसकता, शोषण है भरपूर..
*
आँख मिचौली खेलते, बदल-सूरज संग.
यह भगा वह पकड़ता, देखे धरती दंग..
*
पवन सबल निर्बल लता, वह चलता है दाँव.
यह थर-थर-थर कांपती, रहे डगमगा पाँव..
*
कली-भ्रमर मद-मस्त हैं, दुनिया से बेफिक्र.
त्रस्त तितलियाँ हो रहीं, सुन-सुनकर निज ज़िक्र..
*
सदा सुहागिन रच रही, प्रणय ऋचाएँ झूम.
जूही-चमेली चकित चित, तकें 'सलिल' मासूम..
*
धूल जड़ों को पोसकर, खिला रही है धूल.
सिसक रही सिकता 'सलिल', मिले फूल से शूल..

समय बदला तो समय के साथ ही प्रतिमान बदले.
प्रीत तो बदली नहीं पर प्रीत के अनुगान बदले.
हैं वही अरमान मन में, है वही मुस्कान लब पर-
वही सुर हैं वही सरगम 'सलिल' लेकिन गान बदले..
*
रूप हो तुम रंग हो तुम सच कहूँ रस धार हो तुम.
आरसी तुम हो नियति की प्रकृति का श्रृंगार हो तुम..
भूल जाऊँ क्यों न खुद को जब तेरा दीदार पाऊँ-
'सलिल' लहरों में समाहित प्रिये कलकल-धार हो तुम..
*
नारी ही नारी को रोके इस दुनिया में आने से.
क्या होगा कानून बनाकर खुद को ही भरमाने से?.
दिल-दिमाग बदल सकें गर, मान्यताएँ भी हम बदलें-
'सलिल' ज़िंदगी तभी हँसेगी, क्या होगा पछताने से?
*
ममता को सस्मता का पलड़े में कैसे हम तौल सकेंगे.
मासूमों से कानूनों की परिभाषा क्या बोल सकेंगे?
जिन्हें चाहिए लाड-प्यार की सरस हवा के शीतल झोंके-
'सलिल' सिर्फ सुविधा देकर साँसों में मिसरी घोल सकेंगे?
*

शुक्रवार, 15 जनवरी 2010

मुक्तक : संजीव 'सलिल'

हैं उमंगें जो सदा नव काम देती हैं हमें.
कोशिशें हों सफल तो अंजाम देती हैं हमें.
तरंगें बनतीं-बिगड़तीं बहें निर्मल हो 'सलिल'-
पतंगें छू गगन को पैगाम देती हैं हमें.
*
सुनो यह पैगाम मत जड़ को कभी भी छोड़ना.
थाम कर लगाम कर में अश्व को तुम मोड़ना.
जहाँ जाना है वहीं के रास्ते पर हों कदम-
भुला कर निज लक्ष्य औरों से करो तुम होड़ ना.
*
लक्ष्य मत भूलो कभी भी, कोशिशें करते रहो.
लक्ष्य पाकर मत रुको, मंजिल नयी वरते रहो.
इरादों की डोर कर में हौसलों की चरखियाँ-
आसमां में पतंगों जैसे 'सलिल' उड़ते रहो.
*
आसमां जब भी छुओ तो ज़मीं पर रखना नज़र.
कौन जाने हवाओं का टूट जाये कब कहर?
जड़ें हों मजबूत बरगद की तरह अपनी 'सलिल'-
अमावस के बाद देखोगे तभी उजली सहर..
*
अमावस के बाद ही पूनम का उजाला होगा.
सघन कितना हो मगर तिमिर तो काला होगा.
'सलिल' कोशिश के चरागों को न बुझने देना-
नियति ने शूल को भी फूल संग पाला होगा..
*

बुधवार, 13 जनवरी 2010

मुक्तक / चौपदे संजीव वर्मा 'सलिल'

मुक्तक / चौपदे

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / संजिव्सलिल.ब्लॉग.सीओ.इन
सलिल.संजीव@जीमेल.com

साहित्य की आराधना आनंद ही आनंद है.
काव्य-रस की साधना आनंद ही आनंद है.
'सलिल' सा बहते रहो, सच की शिला को फोड़कर.
रहे सुन्दर भावना आनंद ही आनंद है.

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ll नव शक संवत, आदिशक्ति का, करिए शत-शत वन्दन ll
ll श्रम-सीकर का भारत भू को, करिए अर्पित चन्दन ll
ll नेह नर्मदा अवगाहन कर, सत-शिव-सुन्दर ध्यायें ll
ll सत-चित-आनंद श्वास-श्वास जी, स्वर्ग धरा पर लायें ll
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दिल को दिल ने जब पुकारा, दिल तड़प कर रह गया.
दिल को दिल का था सहारा, दिल न कुछ कह कह गया.
दिल ने दिल पर रखा पत्थर, दिल से आँखे फेर लीं-
दिल ने दिल से दिल लगाया, दिल्लगी दिल सह गया.


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कर न बेगाना मुझे तू, रुसवा ख़ुद हो जाएगा.
जिस्म में से जाँ गयी तो बाकी क्या रह जाएगा?
बन समंदर तभी तो दुनिया को कुछ दे पायेगा-
पत्थरों पर 'सलिल' गिरकर व्यर्थ ही बह जाएगा.

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कौन किसी का है दुनिया में. आना-जाना खाली हाथ.
इस दरवाजे पर मय्यत है उस दरवाजे पर बारात.
सुख-दुःख धूप-छाँव दोनों में साज और सुर मौन न हो-
दिल से दिल तक जो जा पाये 'सलिल' वही सच्चे नगमात.


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हमने ख़ुद से करी अदावत, दुनिया से सच बोल दिया.
दोस्त बन गए दुश्मन पल में, अमृत में विष घोल दिया.
संत फकीर पादरी नेता, थे नाराज तो फ़िक्र न थी-
'सलिल' अवाम आम ने क्यों काँटों से हमको तोल दिया?

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मुंबई पर दावा करते थे, बम फूटे तो कहाँ गए?
उसी मांद में छुपे रहो तुम, मुंह काला कर जहाँ गए.
दिल पर राज न कर पाए, हम देश न तुमको सौंपेंगे-
नफरत फैलानेवालों को हम पैरों से रौंदेंगे.

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http://divyanarmada.blogspot.com

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर