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बुधवार, 20 अक्तूबर 2010

काव्यानुवाद : श्री आदि शंकराचार्य विरचित ॐ निर्वाण षडकम ----मृदुल कीर्ति जी


निर्वाण षड्कम                                                         

(श्री आदि शंकराचार्य द्वारा विरचित)

हिन्दी काव्यानुवाद : मृदुल कीर्ति जी
*
मैं मन, बुद्धि, न चित्त अहंता, ना मैं धरनि न व्योम अनंता.
मैं जिव्हा ना, श्रोत, न वयना,  न ही नासिका ना मैं नयना.
मैं ना अनिल ,  न अनल   सरूपा, मैं तो ब्रह्म रूप,  तदरूपा .
चिदानंदमय ब्रह्म सरूपा ,  मैं  शिव-रूपा,  मैं शिव-रूपा ------------१

ना गतिशील,  न प्राण आधारा, न मैं वायु पांच प्रकारा.
सप्त धातु, पद, पाणि न संगा, अन्तरंग न ही पाँचों अंगा.
पंचकोष ना ,  वाणी रूपा , मैं तो ब्रह्म रूप,  तदरूपा
चिदानंदमय  ब्रह्म सरूपा,  मैं शिव-रूपा, मैं शिव-रूपा --------------२

ना मैं राग, न द्वेष, न नेहा,  ना मैं लोभ, मोह, मन मोहा.
मद-मत्सर ना अहम् विकारा,  ना मैं, ना  मेरो ममकारा
काम, धर्म, धन मोक्ष न रूपा,  मैं तो ब्रह्म रूप तदरूपा,
चिदानंदमय ब्रह्म सरूपा,  मैं शिव-रूपा,  मैं शिव-रूपा.--------------३

ना मैं पुण्य न पाप न कोई, ना मैं सुख-दुःख जड़ता जोई.
ना मैं तीर्थ, मन्त्र, श्रुति, यज्ञाः, ब्रह्म लीन मैं ब्रह्म की प्रज्ञा.
भोक्ता,  भोजन, भोज्य न रूपा,  मैं तो ब्रह्म रूप तदरूपा.
चिदानंदमय ब्रह्म सरूपा, मैं शिव-रूपा, मैं शिव रूपा.----------------४

ना मैं मरण भीत भय भीता, ना मैं जनम लेत ना जीता.
मैं  पितु, मातु, गुरु, ना मीता. ना मैं जाति-भेद कहूँ कीता.
ना मैं मित्र बन्धु अपि रूपा,  मैं तो ब्रह्म रूप तदरूपा.
चिदानंदमय ब्रह्म सरूपा,  मैं शिव-रूपा,  मैं शिव-रूपा.---------------५

निर्विकल्प आकार विहीना,  मुक्ति, बंध- बंधन सों हीना.
मैं तो परमब्रह्म अविनाशी, परे, परात्पर परम प्रकाशी.
व्यापक विभु मैं ब्रह्म अरूपा,  मैं तो ब्रह्म रूप तदरूपा.
चिदानंदमय ब्रह्म सरूपा,  मैं शिव-रूपा,  मैं शिव-रूपा.---------------६


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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर