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शुक्रवार, 24 जून 2011

काव्य का रचना शास्त्र : १ ध्वनि कविता की जान है... - आचार्य संजीव 'सलिल'

काव्य का रचना शास्त्र : १

ध्वनि कविता की जान है...

- आचार्य संजीव 'सलिल'



ध्वनि कविता की जान है, भाव श्वास-प्रश्वास.
अक्षर तन, अभिव्यक्ति मन, छंद वेश-विन्यास..

                 अपने उद्भव के साथ ही मनुष्य को प्रकृति और पशुओं से निरंतर संघर्ष करना पड़ा. सुन्दर, मोहक, रमणीय प्राकृतिक दृश्य उसे रोमांचित, मुग्ध और उल्लसित करते थे. प्रकृति की रहस्यमय-भयानक घटनाएँ उसे डराती थीं. बलवान हिंस्र पशुओं से भयभीत होकर वह व्याकुल हो उठता था. विडम्बना यह कि उसका शारीरिक बल और शक्तियाँ बहुत कम थीं. अपने अस्तित्व की रक्षा के लिए उसके पास देखे-सुने को समझने और समझाने की बेहतर बुद्धि थी. बाह्य तथा आतंरिक संघर्षों में अपनी अनुभूतियों को अभिव्यक्त करने और अन्यों की अभिव्यक्ति को ग्रहण करने की शक्ति का उत्तरोत्तर विकास कर मनुष्य सर्वजयी बन सका. 

साहित्य शिल्पीरचनाकार परिचय:-

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' नें नागरिक अभियंत्रण में त्रिवर्षीय डिप्लोमा. बी.ई.., एम. आई.ई., अर्थशास्त्र तथा दर्शनशास्त्र में एम. ऐ.., एल-एल. बी., विशारद,, पत्रकारिता में डिप्लोमा, कंप्युटर ऍप्लिकेशन में डिप्लोमा किया है। आपकी प्रथम प्रकाशित कृति 'कलम के देव' भक्ति गीत संग्रह है। 'लोकतंत्र का मकबरा' तथा 'मीत मेरे' आपकी छंद मुक्त कविताओं के संग्रह हैं। आपकी चौथी प्रकाशित कृति है 'भूकंप के साथ जीना सीखें'। आपनें निर्माण के नूपुर, नींव के पत्थर, राम नम सुखदाई, तिनका-तिनका नीड़, सौरभ:, यदा-कदा, द्वार खड़े इतिहास के, काव्य मन्दाकिनी २००८ आदि पुस्तकों के साथ साथ अनेक पत्रिकाओं व स्मारिकाओं का भी संपादन किया है। आपको देश-विदेश में १२ राज्यों की ५० सस्थाओं ने ७० सम्मानों से सम्मानित किया जिनमें प्रमुख हैं : आचार्य, २०वीन शताब्दी रत्न, सरस्वती रत्न, संपादक रत्न, विज्ञानं रत्न, शारदा सुत, श्रेष्ठ गीतकार, भाषा भूषण, चित्रांश गौरव, साहित्य गौरव, साहित्य वारिधि, साहित्य शिरोमणि, काव्य श्री, मानसरोवर साहित्य सम्मान, पाथेय सम्मान, वृक्ष मित्र सम्मान, आदि। वर्तमान में आप म.प्र. सड़क विकास निगम में उप महाप्रबंधक के रूप में कार्यरत हैं।
                अनुभूतियों को अभिव्यक्त और संप्रेषित करने के लिए मनुष्य ने सहारा लिया ध्वनि का. वह आँधियों, तूफानों, मूसलाधार बरसात, भूकंप, समुद्र की लहरों, शेर की दहाड़, हाथी की चिंघाड़ आदि से सहमकर छिपता फिरता. प्रकृति का रौद्र रूप उसे डराता. मंद समीरण, शीतल फुहार, कोयल की कूक, गगन और सागर का विस्तार उसमें दिगंत तक जाने की अभिलाषा पैदा करते. उल्लसित-उत्साहित मनुष्य कलकल निनाद की तरह किलकते हुए अन्य मनुष्यों को उत्साहित करता. अनुभूति को अभिव्यक्त कर अपने मन के भावों को विचार का रूप देने में ध्वनि की तीक्ष्णता, मधुरता, लय, गति की तीव्रता-मंदता, आवृत्ति, लालित्य-रुक्षता आदि उसकी सहायक हुईं. अपनी अभिव्यक्ति को शुद्ध, समर्थ तथा सबको समझ आने योग्य बनाना उसकी प्राथमिक आवश्यकता थी.

          सकल सृष्टि का हित करे, कालजयी आदित्य.
            जो सबके हित हेतु हो, अमर वही साहित्य.

               भावनाओं के आवेग को अभिव्यक्त करने का यह प्रयास ही कला के रूप में विकसित होता हुआ 'साहित्य' के रूप में प्रस्फुटित हुआ. सबके हित की यह मूल भावना 'हितेन सहितं' ही साहित्य और असाहित्य के बीच की सीमा रेखा है जिसके निकष पर किसी रचना को परखा जाना चाहिए. सनातन भारतीय चिंतन में 'सत्य-शिव-सुन्दर' की कसौटी पर खरी कला को ही मान्यता देने के पीछे भी यही भावना है. 'शिव' अर्थात 'सर्व कल्याणकारी, 'कला कला के लिए' का पाश्चात्य सिद्धांत पूर्व को स्वीकार नहीं हुआ. साहित्य नर्मदा का कालजयी प्रवाह 'नर्मं ददाति इति नर्मदा' अर्थात 'जो सबको आनंद दे, वही नर्मदा' को ही आदर्श मानकर सतत सृजन पथ पर बढ़ता रहा.

                 मानवीय अभिव्यक्ति के शास्त्र 'साहित्य' को पश्चिम में 'पुस्तकों का समुच्चय', 'संचित ज्ञान का भंडार', 'जीवन की व्याख्या', आदि कहा गया है. भारत में स्थूल इन्द्रियजन्य अनुभव के स्थान पर अन्तरंग आत्मिक अनुभूतियों की अभिव्यक्ति को अधिक महत्व दिया गया. यह अंतर साहित्य को मस्तिष्क और ह्रदय से उद्भूत मानने का है. आप स्वयं भी अनुभव करेंगे के बौद्धिक-तार्किक कथ्य की तुलना में सरस-मर्मस्पर्शी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है. विशेषकर काव्य (गीति या पद्य) में तो भावनाओं का ही साम्राज्य होता है. 

होता नहीं दिमाग से, जो संचालित मीत. 

दिल की सुन दिल से जुड़े, पा दिलवर की प्रीत..


साध्य आत्म-आनंद है :

                   काव्य का उद्देश्य सर्व कल्याण के साथ ही निजानंद भी मान्य है. भावानुभूति या रसानुभूति काव्य की आत्मा है किन्तु मनोरंजन मात्र ही साहित्य या काव्य का लक्ष्य या ध्येय नहीं है. आजकल दूरदर्शन पर आ रहे कार्यक्रम सिर्फ मनोरंजन पर केन्द्रित होने के कारण समाज को कुछ दे नहीं पा रहे जबकि साहित्य का सृजन ही समाज को कुछ देने के लिये किया जाता है. 

जन-जन का आनंद जब, बने आत्म-आनंद.

कल-कल सलिल-निनाद सम, तभी गूँजते छंद..

काव्य के तत्व :

बुद्धि भाव कल्पना कला, शब्द काव्य के तत्व.

तत्व न हों तो काव्य का, खो जाता है स्वत्व..

                   बुद्धि या ज्ञान तत्व काव्य को ग्रहणीय बनाता है. सत-असत, ग्राह्य-अग्राह्य, शिव-अशिव, सुन्दर-असुंदर, उपयोगी-अनुपयोगी में भेद तथा उपयुक्त का चयन बुद्धि तत्व के बिना संभव नहीं. कृति को विकृति न होने देकर सुकृति बनाने में यही तत्व प्रभावी होता है. 

                भाव तत्व को राग तत्व या रस तत्व भी कहा जाता है. भाव की तीव्रता ही काव्य को हृद्स्पर्शी बनाती है. संवेदनशीलता तथा सहृदयता ही रचनाकार के ह्रदय से पाठक तक रस-गंगा बहाती है. 

                    कल्पना लौकिक को अलौकिक और अलौकिक को लौकिक बनाती है. रचनाकार के ह्रदय-पटल पर बाह्य जगत तथा अंतर्जगत में हुए अनुभव अपनी छाप छोड़ते हैं. साहित्य सृजन के समय अवचेतन में संग्रहित पूर्वानुभूत संस्कारों का चित्रण कल्पना शक्ति से ही संभव होता है. रचनाकार अपने अनुभूत तथ्य को यथावत कथ्य नहीं बनता. वह जाने-अनजाने सच=झूट का ऐसा मिश्रण करता है जो सत्यता का आभास कराता है. 

                कला तत्त्व को शैली भी कह सकते हैं. किसी एक अनुभव को अलग-अलग लोग अलग-अलग तरीके से व्यक्त करते हैं. हर रचनाकार का किसी बात को कहने का खास तरीके को उसकी शैली कहा जाता है. कला तत्व ही 'शिवता' का वाहक होता है. कला असुंदर को भी सुन्दर बना देती है.

                 शब्द को कला तत्व में समाविष्ट किया जा सकता है किन्तु यह अपने आपमें एक अलग तत्व है. भावों की अभिव्यक्ति का माध्यम शब्द ही होता है. रचनाकार समुचित शब्द का चयन कर पाठक को कथ्य से तादात्म्य स्थापित करने के लिए प्रेरित करता है.

साहित्य के रूप :

दिल-दिमाग की कशमकश, भावों का व्यापार.

बनता है साहित्य की, रचना का आधार.. 

                  बुद्धि तत्त्व की प्रधानतावाला बोधात्मक साहित्य ज्ञान-वृद्धि में सहायक होता है. हृदय तत्त्व को प्रमुखता देनेवाला रागात्मक साहित्य पशुत्व से देवत्व की ओर जाना की प्रेरणा देता है. अमर साहित्यकार डॉ. हजारी प्रसाद द्विवेदी ने ऐसे साहित्य को 'रचनात्मक साहित्य' कहा है. 

साहित्य शिल्पीसादर समर्पित

            यह लेख श्रंखला मुझमें भाषा और साहित्य की रूचि जगानेवाली पूजनीय माता जी व प्रख्यात- आशु कवयित्री स्व. श्रीमति शांति देवी वर्मा की पुण्य-स्मृति को समर्पित  है। 
                                                -संजीव 

 लक्ष्य और लक्षण ग्रन्थ 

                    रचनात्मक या रागात्मक साहित्य के दो भेद लक्ष्य ग्रन्थ और लक्षण ग्रन्थ हैं साहित्यकार का उद्देश्य अलौकिक आनंद की सृष्टि करना होता है जिसमें रसमग्न होकर पाठक रचना के कथ्य, घटनाक्रम, पात्रों और सन्देश के साथ अभिन्न हो सके. 

             लक्ष्य ग्रन्थ में रचनाकार नूतन भावः लोक की सृष्टि करता है जिसके गुण-दोष विवेचन के लिये व्यापक अध्ययन-मनन पश्चात् कुछ लक्षण और नियम निर्धारित किये गये हैं लक्ष्य ग्रंथों के आकलन अथवा मूल्यांकन (गुण-दोष विवेचन) संबन्धी साहित्य लक्षण ग्रन्थ होंगे. लक्ष्य ग्रन्थ साहित्य का भावः पक्ष हैं तो लक्षण ग्रन्थ विचार पक्ष. काव्य के लक्षणों, नियमों, रस, भाव, अलंकार, गुण-दोष आदि का विवेचन 'साहित्य शास्त्र' के अंतर्गत आता है 'काव्य का रचना शास्त्र' विषय भी 'साहित्य शास्त्र' का अंग है. 

साहित्य के रूप -- 
१. लक्ष्य ग्रन्थ : (क) दृश्य काव्य, (ख) श्रव्य काव्य. 
२. लक्षण ग्रन्थ : (क) समीक्षा, (ख) साहित्य शास्त्र.
                                                                                                                                                    क्रमश: .....
                                                                                                                                       (आभार : साहित्य शिल्पी, मंगलवार, १० मार्च २००९) 

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बृहस्पतिवार, 23 जून 2011

विशेष लेख: चित्रपटीय गीतों में अनुप्रास अलंकार की छटा: -- नवीन चतुर्वेदी

विशेष लेख:
चित्रपटीय गीतों में अनुप्रास अलंकार की छटा:
 
नवीन चतुर्वेदी 
 *
'अनु' तथा 'प्रास' इन दो शब्दों के मेल से बनाता है शब्द अनुप्रास | 'अनु' का अर्थ है बार-बार और 'प्रास' का अर्थ है वर्ण / अक्षर | इस प्रकार अनुप्रास का शाब्दिक अर्थ हुआ कि जब एक अक्षर बार बार आए तो वहाँ अनुप्रास अलंकार होता है | बहुचर्चित पंक्ति ही काफी है अनुप्रास अलंकार को समझने के लिए:-

चंदू के चाचा ने चंदू की चाची को चाँदनी चौक में चाँदी की चम्मच से चाँदनी रात में चटनी चटाई 

इस पंक्ति में 'च' अक्षर के बार बार आने से यहाँ अनुप्रास अलंकार हुआ |

अनुप्रास अलंकार के भी कई भेद हैं, यथा:-

[१] छेकानुप्रास 
[२] वृत्यानुप्रास
[३] लाटानुप्रास
[४] अंत्यानुप्रास 
[५] श्रुत्यानुप्रास 

अब इन को समझते हैं एक एक कर |

छेकानुप्रास

किसी पंक्ति में एक से अधिक अक्षरों का बार बार आना 

उदाहरण :-
नानी तेरी मोरनी को मोर ले गए
बाकी जो बचा वो काले चोर ले गए 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'न' - 'र' - 'म' तथा 'क' अक्षरों की बारंबारता के लिए छेकानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


वृत्यानुप्रास

किसी पंक्ति में एक अक्षर का बार बार आना 

उदाहरण :-
चन्दन सा बदन, चंचल चितवन 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'च' अक्षर  की बारंबारता के लिए वृत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है|

लाटानुप्रास

किसी पंक्ति में एक शब्द का बार बार आना 

उदाहरण :-

आदमी हूँ, आदमी से प्यार करता हूँ 

हिन्दी फिल्म के इस गीत में 'आदमी' शब्द की बारंबारता के लिए लाटानुप्रास अलंकार का आभास होता है|


अंत्यानुप्रास

सीधे सादे शब्दों में कहा जाये तो पंक्ति के अंत में अक्षर / अक्षरों की समानता को अंत्यानुप्रास कहते हैं| दूसरे शब्दों में कहें तो छन्द बद्ध सभी कविताओं में तुक / काफिये के साथ अंत्यानुप्रास पाया जाता है| इस का महत्व संस्कृत के छंदों में अधिक प्रासंगिक है| यथा :-

श्रीमदभवतगीता का सब से पहला श्लोक 

धर्मक्षेत्रे, कुरुक्षेत्रे समवेता युयुत्सव:|
मामका: पाण्डवाश्चैव, किमकुर्वत संजय||

आप देखें छन्द बद्ध होने के बावजूद इस में अंत में तुक / काफिया नहीं है| अब संस्कृत के एक और श्लोक को देखते हैं:

नमामि शमीशान निर्वाण रूपं 
विभुं व्यापकं ब्रम्ह्वेद स्वरूपं 
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरीहं 
चिदाकाश माकाश वासं भजेहं 

तो अब आप को स्पष्ट हो गया होगा कि अंत्यानुप्रास का महत्व कब और क्यों प्रासंगिक है| आज कल तो छन्द बद्ध रचनाएँ तुकांत होने के कारण अंत्यानुप्रास युक्त होती ही हैं| गज़लें तो सारी की सारी अंत्यानुप्रास के साथ ही हुईं [गैर मुरद्दफ वाली गज़लें छोड़ कर]| 

कबीरा खड़ा बजार में मांगे सबकी खैर|
ना काहू से दोसती, ना काहू से बैर||
ऊपर के दोहे की दोनों पंक्तियों के अंत में 'र' अक्षर आने के कारण अंत्यानुप्रास अलंकार हुआ| अंत्यानुप्रास के कुछ और उदाहरण :- 

आए हो मेरी ज़िंदगी में तुम बहार बन के|
मेरे दिल में यूं ही रहना, तुम प्यार प्यार बन के||

चौदहवीं का चाँद हो या आफ़ताब हो|
जो भी हो तुम ख़ुदा की क़सम लाज़वाब हो|

संस्कृत श्लोकों के अलावा आधुनिक कविता में अंत्यानुप्रास की प्रासंगिकता उल्लेखनीय हो जाती है, यथा :-

ऑस की बूंदें
हासिल हैं सभी को 
बिना किसी भेद भाव के 
बराबर 
निरंतर 
यहाँ पर 
वहाँ पर 

श्रुत्यानुप्रास

इसे समझने से पहले समझते हैं कि एक वर्ग के अक्षर कौन से होते हैं| जैसे क-ख-ग-ग एक वर्ग के अक्षर हुए| च-छ-ज-झ एक वर्ग के अक्षर हुए| ट-ठ-ड-ढ एक वर्ग के अक्षर हुए| 

जब किसी एक वर्ग के अक्षर बार बार आयें तो वहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार होता है|

उदाहरण :-
एक लड़की को देखा तो ऐसा लगा, जैसे
खिलता गुलाब, जैसे शायर का ख़्वाब 
हिन्दी फिल्म के इस गीत में एक ही वर्ग के कई अक्षर जैसे कि 'क' 'ख' 'ग' अक्षरों के आने से श्रुत्यानुप्रास अलंकार का आभास होता है| एक और उदाहरण:-

दीदी तेरा देवर दीवाना - 'द' - 'त' व 'न' एक ही वर्ग से हैं इसीलिए यहाँ श्रुत्यानुप्रास अलंकार हुआ|


आशा करते हैं कि हिन्दी फिल्मों के गानों के माध्यम से अनुप्रास अलंकार के विभिन्न रूपों की ये व्याख्या आप को पसंद

बुधवार, 22 सितम्बर 2010

लेख : हिंदी की प्रासंगिकता और हम. संजीव वर्मा 'सलिल'

लेख :

हिंदी की प्रासंगिकता और हम.

संजीव वर्मा 'सलिल'

हिंदी जनवाणी तो हमेशा से है...समय इसे जगवाणी बनाता जा रहा है. जैसे-जिसे भारतीय विश्व में फ़ैल रहे हैं वे अधकचरी ही सही हिन्दी भी ले जा रहे हैं. हिंदी में संस्कृत, फ़ारसी, अरबी, उर्दू , अन्य देशज भाषाओँ या अंगरेजी शब्दों के सम्मिश्रण से घबराने के स्थान पर उन्हें आत्मसात करना होगा ताकि हिंदी हर भाव और अर्थ को अभिव्यक्त कर सके. 'हॉस्पिटल' को 'अस्पताल' बनाकर आत्मसात करने से भाषा असमृद्ध होती है किन्तु 'फ्रीडम' को 'फ्रीडमता' बनाने से नहीं. दैनिक जीवन में व्याकरण सम्मत भाषा हमेशा प्रयोग में नहीं लाई जा सकती पर वह समीक्षा, शोध या गंभीर अभिव्यक्ति हेतु अनुपयुक्त होती है. हमें भाषा के प्राथमिक, माध्यमिक, उच्च तथा शोधपरक रूपों में भेद को समझना तथा स्वीकारना होगा. तत्सम तथा तद्भव शब्द हिंदी की जान हैं किन्तु इनका अनुपात तो प्रयोग करनेवाले की समझ पर ही निर्भर है. हिन्दी में अहिन्दी शब्दों का मिश्रण दल में नमक की तरह हो किन्तु खीर में कंकर की तरह नहीं.

हिंदी में शब्दों की कमी को दूर करने की ओर भी लगातार काम करना होगा. इस सिलसिले में सबसे अधिक प्रभावी भूमिका चिट्ठाकार निभा सकते हैं. वे विविध प्रदेशों, क्षेत्रों, व्यवसायों, रुचियों, शिक्षा, विषयों, विचारधाराओं, धर्मों तथा सर्जनात्मक प्रतिभा से संपन्न ऐसे व्यक्ति हैं जो प्रायः बिना किसी राग-द्वेष या स्वार्थ के सामाजिक साहचर्य के प्रति असमर्पित हैं. उनमें से हर एक का शब्द भण्डार अलग-अलग है. उनमें से हर एक को अलग-अलग शब्द भंडार की आवश्यकता है. कभी शब्द मिलते हैं कभी नहीं. यदि वे न मिलनेवाले शब्द को अन्य चिट्ठाकारों से पूछें तो अन्य अंचलों या बोलियों के शब्द भंडार में से अनेक शब्द मिल सकेंगे. जो न मिलें उनके लिये शब्द गढ़ने का काम भी चिट्ठा कर सकता है. इससे हिंदी का सतत विकास होगा.

सिविल इन्जीनियरिंग को हिंदी में नागरिकी अभियंत्रण या स्थापत्य यांत्रिकी क्या कहना चाहेंगे? इसके लिये अन्य उपयुक्त शब्द क्या हो? 'सिविल' की हिंदी में न तो स्वीकार्यता है न सार्थकता...फिर क्या करें? सॉइल, सिल्ट, सैंड, के लिये मिट्टी/मृदा, धूल तथा रेत का प्रयोग मैं करता हूँ पर उसे लोग ग्रहण नहीं कर पाते. सामान्यतः धूल-मिट्टी को एक मान लिया जाता है. रोक , स्टोन, बोल्डर, पैबल्स, एग्रीगेट को हिंदी में क्या कहें? मैं इन्हें चट्टान, पत्थर, बोल्डर, रोड़ा, तथा गिट्टी लिखता हूँ . बोल्डर के लिये कोई शब्द नहीं है?

रेत के परीक्षण में 'मटेरिअल रिटेंड ऑन सीव' तथा 'मटेरिअल पास्ड फ्रॉम सीव' को हिंदी में क्या कहें? मुझे एक शब्द याद आया 'छानन' यह किसी शब्द कोष में नहीं मिला. छानन का अर्थ किसी ने छन्नी से निकला पदार्थ बताया, किसी ने छन्नी पर रुका पदार्थ तथा कुछ ने इसे छानने पर मिला उपयोगी या निरुपयोगी पदार्थ कहा. काम करते समय आपके हाथ में न तो शब्द कोष होता है, न समय. कार्य विभागों में प्राक्कलन बनाने, माप लिखने तथा मूल्यांकन करने का काम अंगरेजी में ही किया जाता है जबकि अधिकतर अभियंता, ठेकेदार और सभी मजदूर अंगरेजी से अपरिचित हैं. सामान्यतः लोग गलत-सलत अंगरेजी लिखकर काम चला रहे हैं. लोक निर्माण विभाग की दर अनुसूची आज भी सिर्फ अंगरेजी मैं है. निविदा हिन्दी में है किन्तु उस हिन्दी को कोई नहीं समझ पाता, अंगरेजी अंश पढ़कर ही काम करना होता है. किताबी या संस्कृतनिष्ठ अनुवाद अधिक घातक है जो अर्थ का अनर्थ कर देता है. न्यायलय में मानक भी अंगरेजी पाठ को ही माना जाता है. हर विषय और विधा में यह उलझन है. मैं मानता हूँ कि इसका सामना करना ही एकमात्र रास्ता है किन्तु चिट्ठाजगत हा एक मंच ऐसा है जहाँ ऐसे प्रश्न उठाकर समाधान पाया जा सके तो...? सोचें...

भाषा और साहित्य से सरकार जितना दूर हो बेहतर... जनतंत्र में जन, लोकतंत्र में लोक, प्रजातंत्र में प्रजा हर विषय में सरकार का रोना क्यों रोती है? सरकार का हाथ होगा तो चंद अंगरेजीदां अफसर पाँच सितारेवाले होटलों के वातानुकूलित कमरों में बैठकर ऐसे हवाई शब्द गढ़ेगे जिन्हें जनगण जान या समझ ही नहीं सकेगा. राजनीति विज्ञान में 'लेसीज फेयर' का सिद्धांत है जिसका आशय यह है कि वह सरकार सबसे अधिक अच्छी है जो सबसे कम शासन करती है. भाषा और साहित्य के सन्दर्भ में यही होना चाहिए. लोकशक्ति बिना किसी भय और स्वार्थ के भाषा का विकास देश-काल-परिस्थिति के अनुरूप करती है. कबीर, तुलसी सरकार नहीं जन से जुड़े और जन में मान्य थे. भाषा का जितना विस्तार इन दिनों ने किया अन्यों ने नहीं. शब्दों को वापरना, गढ़ना, अप्रचलित अर्थ में प्रयोग करना और एक ही शब्द को अलग-अलग प्रसंगों में अलग-अलग अर्थ देने में इनका सानी नहीं.

चिट्ठा जगत ही हिंदी को विश्व भाषा बना सकता है? अगले पाँच सालों के अन्दर विश्व की किसी भी अन्य भाषा की तुलना में हिंदी के चिट्ठे अधिक होंगे. क्या उनकी सामग्री भी अन्य भाषाओँ के चिट्ठों की सामग्री से अधिक प्रासंगिक, उपयोगी व् प्रामाणिक होगी? इस प्रश्न का उत्तर यदि 'हाँ' है तो सरकारी मदद या अड़चन से अप्रभावित हिन्दी सर्व स्वीकार्य होगी, इस प्रश्न का उत्तर यदि 'नहीं" है तो हिंदी को 'हाँ' के लिये जूझना होगा...अन्य विकल्प नहीं है. शायद कम ही लोग यह जानते हैं कि विश्व के अंतरिक्ष वैज्ञानिकों ने हमारे सौर मंडल और आकाशगंगा के परे संभावित सभ्यताओं से संपर्क के लिये विश्व की सभी भाषाओँ का ध्वनि और लिपि को लेकर वैज्ञानिक परीक्षण कर संस्कृत तथा हिन्दी को सर्वाधिक उपयुक्त पाया है तथा इन दोनों और कुछ अन्य भाषाओँ में अंतरिक्ष में संकेत प्रसारित किए जा रहे हैं ताकि अन्य सभ्यताएँ धरती से संपर्क कर सकें. अमरीकी राष्ट्रपति अमरीकनों को बार-बार हिन्दी सीखने के लिये चेता रहे हैं किन्तु कभी अंग्रेजों के गुलाम भारतीयों में अभी भी अपने आकाओं की भाषा सीखकर शेष देशवासियों पर प्रभुत्व ज़माने की भावना है. यही हिन्दी के लिये हानिप्रद है.

भारत विश्व का सबसे बड़ा बाज़ार है तो भारतीयों की भाषा सीखना विदेशियों की विवशता है. विदेशों में लगातार हिन्दी शिक्षण और शोध का कार्य बढ़ रहा है. हर वर्ष कई विद्यालयों और कुछ विश्व विद्यालयों में हिंदी विभाग खुल रहे हैं. हिन्दी निरंतर विकसित हो रहे है जबकि उर्दू समेत अन्य अनेक भाषाएँ और बोलियाँ मरने की कगार पर हैं. इस सत्य को पचा न पानेवाले अपनी मातृभाषा हिन्दी के स्थान पर राजस्थानी, मारवाड़ी, मेवाड़ी, अवधी, ब्रज, भोजपुरी, छत्तीसगढ़ी, मालवी, निमाड़ी, बुन्देली या बघेली लिखाकर अपनी बोली को राष्ट्र भाषा या विश्व भाषा तो नहीं बना सकते पर हिंदी भाषियों की संख्या कुछ कम जरूर दर्ज करा सकते हैं. इससे भी हिन्दी का कुछ बनना-बिगड़ना नहीं है. आगत की आहट को पहचाननेवाला सहज ही समझ सकता है कि हिंदी ही भावी विश्व भाषा है. आज की आवश्यकता हिंदी को इस भूमिका के लिये तैयार करने के लिये शब्द-निर्माण, शब्द-ग्रहण, शब्द-अर्थ का निर्धारण, अनुवाद कार्य तथा मौलिक सृजन करते रहना है जिसे विश्व विद्यालयों की तुलना में अधिक प्रभावी तरीके से चिट्ठाकर कर रहे हैं.

नए रचनाकारों के लिये आवश्यक है कि भाषा के व्याकरण और विधा की सीमाओं तथा परम्पराओं को ठीक से समझते हुए लिखें. नया प्रयोग अब तक लिखे को जानने के बाद ही हो सकता है. काव्य के क्षेत्र में हाथ आजमानेवालों को 'पिंगल' (काव्य-शास्त्र) में वर्णित नियम जानने ही चाहिए. इसमें किसी कठिन और उच्च कक्षा की पुस्तक की जरूरत नहीं है. १० वीं कक्षा तक की हिन्दी की किताबों में जो जानकारी है वह लेखन प्रारंभ करने के लिये पर्याप्त है. लिंग, वाचन, क्रिया, कारक, शब्द-भेद, उच्चारण के अनुसार हिज्जे कर शब्द को शुद्ध रूप में लिखना आ जाए तो गद्य-पद्य दोनों लिखा जा सकता है. बोलते समय हम प्रायः असावधान होते हैं. शब्दों के देशज (ग्रामीण या भदेसी) रूप बोलने में भले ही प्रचलित हैं पर साहित्य में दोष कहे गए हैं. कविता लिखते समय पिंगल (काव्य-शास्त्र) के नियमों और मान्यताओं का पालन आवश्यक है. कोई बदलाव या परिवर्तन विशेषज्ञता के बाद ही सुझाई जाना चाहिए.

विश्व वाणी हिन्दी के उन्नयन और उत्थान में हमारी भूमिका शून्य हो तो भी हिन्दी की प्रगति नहीं रुकेगी किन्तु यदि हम प्रभावी भूमिका निभाएँ तो यह जीवन की बड़ी उपलब्धि होगी. आइए, हम सब इस दिशा में चिंतन कर अपने-अपने विचारों को बाँटें.

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दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम/ सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

मंगलवार, 8 जून 2010

काव्य दोष या समझ का अंतर? ...

काव्य दोष या समझ का अंतर? ...

ई कविता पर एक प्रसंग में महाकवि तुलसी के काव्य को लेकर हुई चर्चा दिव्य नर्मदा के पाठकों के लिए प्रस्तुत है.
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आनंद कृष्ण: मैं आप सबके सामने गोस्वामी तुलसीदास का एक दोहा प्रस्तुत कर रहा हूँ जिसमें "क्रम-विपर्यय" का दोष है-
 
सचिव, बैद, गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहिं भय आस.
राज, धर्म, तन तीनि कर होहि बेगही नास.
 
इसका अर्थ स्पष्ट है की यदि सचिव (मंत्री), वैद्य (चिकित्सक) और गुरु: ये तीन व्यक्ति किसी भय के कारण अप्रिय नहीं बोलते हैं तो राज्य, धर्म और शरीर इन तीनों का शीघ्रता से नाश होता है.
 
पहली पंक्ति में क्रम है- सचिव, बैद और गुरु........... अगली पंक्ति में इनसे सम्बंधित क्षेत्रों का क्रम गड़बड़ा गया है- सचिव के लिए राज, बैद के लिए "तन" होना था पर "धर्म" आया है और गुरु के लिए "धर्म होना था किन्तु "तन" आया है......... ये दोष है...
 
इस दोष का ज़िक्र करने का अर्थ गोस्वामी तुलसीदास की शान में गुस्ताखी करना  नहीं समझा जाए सादर -आनंदकृष्ण, जबलपुर , मोबाइल : ०९४२५८००८१८   http://hindi-nikash.blogspot.कॉम    ******
परमपूज्य आनंदकृष्ण जी ,
आपके जैसे विद्वान तुलसीदास के जमाने में भी थे , जिन्होंने तुलसीदास की पूरी कृति को ही निरस्त कर दिया था । लेकिन दुर्भाग्य से उन पंडितों में से किसी का नाम आज किसी को याद नहीं है । याद रह गए तो सिर्फ तुलसीदास । वैसे छंद विधान में शब्दों को इतना आगे-पीछे रखने की छूट कवि को दी जाती है । अन्यथा ये कहावत ही न बन पाती कि जहां न पहुंचे रवि , वहां पहुंचे कवि । - ओमप्रकाश तिवारी    *****

परम आदरणीय तिवारी जी,
आनंद जी ने स्वयं स्पष्ट किया है कि उनका इरादा तुलसी दास जी क़ी शान में गुस्ताखी करने का कतई नहीं था. उनकी रचना से उदहारण देकर उन्होंने कुछ बुरा भी नहीं किया. 'क्रम विपर्यय' दोष क़ी चर्चा छंद शास्त्रों मैं पहले से है, हम अपनी श्रद्धा के आगे इतना विवश क्यों हो जाते हैं कि सच्ची बात अखरने लगती है. अगर तुलसी दास जी को भूल कर उस दोष पर विचार करें जो उस रचना मैं किसी कारण वश रह गया, तो भविष्य की कविता और सुन्दर हो सकती है. आशा है मेरे निवेदन को अन्यथा न लेंगे.      कृपाकांक्षी,  मदन मोहन 'अरविन्द'   *****

सचिव, बैद, गुरु तीनि जो, प्रिय बोलहिं भय आस.
राज, धर्म, तन तीनि कर होहि बेगहि नास.
यहाँ ऊपरी तौर पर 'क्रम विपर्यय दोष' है किन्तु गहराई से सोचें तो नहीं भी है. बैद भय के कारण प्रिय बोलेगा तो स्वास्थ्य बिगड़ेगा और रोगी के लिए धार्मिक अनुष्ठान वर्जित होने से धर्म की हानि होगी. इसी तरह गुरु भयवश प्रिय कहेगा तो ज्ञान नहीं मिल सकेगा और अज्ञान के कारण शरीर नष्ट होगा.

ऐसा ही एक और प्रसंग है: 'शंकर सुवन केसरी नंदन, तेज प्रताप महा जग वंदन' में निरर्थक शब्द-प्रयोग का दोष दिखता है चूंकि 'सुवन' शब्द का कोई अर्थ समझ में नहीं आता, सामान्य शब्द कोशों और अरविन्द कुमार के हिन्दी थिसारस में 'सुवन' शब्द ही नहीं है. बिहार में पंडितों की एक सभा में इस पर चर्चा कर सर्व सम्मति से संशोधन किया गया 'शंकर स्वयं केसरी नंदन' चूंकि हनुमान रूद्र के अवतार मान्य हैं यह ठीक भी लगता है किन्तु वास्तव में इसकी आवश्यकता ही नहीं है. 'सुवन' =
सूर्य, चन्द्रमा, पुत्र, पुष्प, सुमन, देवता, पंडित, अच्छे मनवाला (पृष्ठ १२८२, बृहत् हिन्दी कोष, संपादक: कलिका प्रसाद, राजवल्लभ सहाय, मुकुन्दीलाल श्रीवास्तव).

एक और; 'ढोल गंवार शूद्र पशु नारी' का उल्लेख कर तुलसी को नारी निंदक कहनेवाले यह भूल जाते हैं कि 'जय-जय गिरिवर राज किशोरी, जय महेश मुख चन्द्र चकोरी, जय गजवदन षडानन माता, जगत जननि दामिनी दुति गाता' में तुलसी नारी को 'जगत जननि' कहकर उसकी मान वन्दना करते हैं. यहाँ 'पशु नारी' का अर्थ 'पशु और नारी' नहीं 'पशुवत नारी' अर्थात पशु की तरह अमर्यादित आचरण करनेवाली नारी है.

यह मेरी बाल बुद्धि की सोच है. यदि मैं गलत हूँ तो विद्वज्जन क्षमा करते हुए मार्दर्शन करेंगे. 
  --संजीव 'सलिल'   *********

काव्य में दायें और बायें की लयात्मक दृष्टी से छूट होती है यह केवल दोष दृष्टि है.   -- मृदुल कीर्ति  ********

यह बहस का मुद्दा ही नहीं है.... ब्लोग्ग पर सतही बहस करनेवाले और जल्दी उत्तेजित होनेवाले बहुत हैं... आप इससे दूर ही रहें...  आपके बताये अर्थ सही हैं.    ---पूर्णिमा वर्मन.    *****


आप पाठक भी अपनी बात कहें...


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रविवार, 25 अप्रैल 2010

विशेष लेख: कविता में छंदानुशासन --संजीव 'सलिल'

शब्द ब्रम्ह में अक्षर, अनादि, अनंत, असीम और अद्भुत सामर्थ्य होती है. रचनाकार शब्द ब्रम्ह के प्रागट्य  का माध्यम मात्र होता है. इसीलिए सनातन प्राच्य परंपरा में प्रतिलिपि के अधिकार (कोपी राइट) की अवधारणा ही नहीं है. श्रुति-स्मृति, वेदादि के रचयिता मन्त्र दृष्टा हैं, मन्त्र सृष्टा नहीं. दृष्टा उतना ही देख और देखे को बता सकेगा जितनी उसकी क्षमता होगी.

रचना कर्म अपने आपमें जटिल मानसिक प्रक्रिया है. कभी कथ्य, कभी भाव रचनाकार को प्रेरित करते है.कि वह 'स्व' को 'सर्व' तक पहुँचाने के लिए अभिव्यक्त हो. रचना कभी दिल(भाव) से होती है कभी दिमाग(कथ्य) से. रचना की विधा का चयन कभी रचनाकार अपने मन से करता है कभी किसी की माँग पर. शिल्प का चुनाव भी परिस्थिति पर निर्भर होता है. किसी चलचित्र के लिए परिस्थिति के अनुरूप संवाद या पद्य रचना ही होगी लघु कथा, हाइकु या अन्य विधा सामान्यतः उपयुक्त नहीं होगी.

गजल का अपना छांदस अनुशासन है. पदांत-तुकांत, समान पदभार और लयखंड की द्विपदियाँ तथा कुल १२ लयखंड गजल की विशेषता है. इसी तरह रूबाई के २४ औजान हैं कोई चाहे और गजल या रूबाई की नयी बहर या औजान रचे भी तो उसे मान्यता नहीं मिलेगी. गजल के पदों का भार (वज्न) उर्दू में तख्ती के नियमों के अनुसार किया जाता है जो कहीं-कहीं हिन्दी की मात्र गणना से साम्य रखता है कहीं-कहीं भिन्नता. गजल को हिन्दी का कवि हिन्दी की काव्य परंपरा और पिंगल-व्याकरण के अनुरूप लिखता है तो उसे उर्दू के दाना खारिज कर देते हैं. गजल को ग़ालिब ने 'तंग गली' और आफताब हुसैन अली ने 'कोल्हू का बैल' इसी लिए कहा कि वे इस विधा को बचकाना लेखन समझते थे जिसे सरल होने के कारण सब समझ लेते हैं. विडम्बना यह कि ग़ालिब ने अपनी जिन रचनाओं को सर्वोत्तम मानकर फारसी में लिखा वे आज बहुत कम तथा जिन्हें कमजोर मानकर उर्दू में लिखा वे आज बहुत अधिक चर्चित हैं.

गजल का उद्भव अरबी में 'तशीबे' (संक्षिप्त प्रेम गीत) या 'कसीदे' (रूप/रूपसी की प्रशंसा) से तथा उर्दू में 'गजाला चश्म (मृगनयनी, महबूबा, माशूका) से वार्तालाप से हुआ कहा जाता है. अतः, नाज़ुक खयाली गजल का लक्षण हो यह स्वाभाविक है. हिन्दी-उर्दू के उस्ताद अमीर खुसरो ने गजल को आम आदमी और आम ज़िंदगी से बावस्ता किया. इस चर्चा का उद्देश्य मात्र यह कि हिन्दी में ग़ज़ल को उर्दू से भिन्न भाव भूमि तथा व्याकरण-पिंगल के नियम मिले, यह अपवाद स्वरूप हो सकता है कि कोई ग़ज़ल हिन्दी और उर्दू दोनों के मानदंडों पर खरी हो किन्तु सामान्यतः ऐसा संभव नहीं. हिन्दी गजल और उर्दू गजल में अधिकांश शब्द-भण्डार सामान्य होने के बावजूद पदभार-गणना के नियम भिन्न हैं, समान पदांत-तुकांत के नियम दोनों में मान्य है. उर्दू ग़ज़ल १२ बहरों के आधार पर कही जाती है जबकि हिन्दी गजल हिन्दी के छंदों के आधार पर रची जाती है. दोहा गजल में दोहा तथा ग़ज़ल और हाइकु ग़ज़ल में हाइकु और ग़ज़ल दोनों के नियमों का पालन होना अनिवार्य है किन्तु उर्दू ग़ज़ल में नहीं.

हिन्दी के रचनाकारों को समान पदांत-तुकांत की हर रचना को गजल कहने से बचना चाहिए. गजल उसे ही कहें जो गजल के अनुरूप हो. हिन्दी में सम पदांत-तुकांत की रचनाओं को मुक्तक कहा जाता है क्योकि हर द्विपदी अन्य से स्वतंत्र (मुक्त) होती है. डॉ. मीरज़ापुरी ने इन्हें प्रच्छन्न हिन्दी गजल कहा है. विडम्बनाओं को उद्घाटित कर परिवर्तन और विद्रोह की भाव भूमि पर रची गयी गजलों को 'तेवरी' नाम दिया गया है.

एक प्रश्न यह कि जिस तरह हिन्दी गजलों से काफिया, रदीफ़ तथा बहर की कसौटी पर खरा उतरने की उम्मीद की जाती है वैसे ही अन्य भाषाओँ (अंग्रेजी, बंगला, रूसी, जर्मन या अन्य) की गजलों से की जाती है या अन्य भाषाओँ की गजलें इन कसौटियों पर खरा उतरती हैं? अंग्रेजी की ग़ज़लों में  पद के अंत में उच्चारण नहीं हिज्जे (स्पेलिंग) मात्र मिलते हैं लेकिन उन पर कोई आपत्ति नहीं होती. डॉ. अनिल जैन के अंग्रेजी ग़ज़ल सन्ग्रह 'ऑफ़ एंड ओन' की रचनाओं में पदांत तो समान है पर लयखंड समान नहीं हैं.

हिन्दी में दोहा ग़ज़लों में हर मिसरे का कुल पदभार तो समान (१३+११) x२ = ४८ मात्रा होता है पर दोहे २३ प्रकारों में से किसी भी प्रकार के हो सकते हैं. इससे लयखण्ड में  भिन्नता आ जाती है. शुद्ध दोहा का प्रयोग करने पर हिन्दी दोहा ग़ज़ल में हर मिसरा समान पदांत का होता है जबकि उर्दू गजल के अनुसार चलने पर दोहा के दोनों पद सम तुकान्ती नहीं रह जाते. किसे शुद्ध माना जाये, किसे ख़ारिज किया जाये? मुझे लगता है खारिज करने का काम समय को करने दिया जाये. हम सुधार के सुझाव देने तक सीमित रहें तो बेहतर है.

गीत का फलक गजल की तुलना में बहुत व्यापक है. 'स्थाई' तथा 'अंतरा' में अलग-अलग लय खण्ड हो सकते है और समान भी किन्तु गजल में हर शे'र और हर मिसरा समान लयखंड और पदभार का होना अनिवार्य है. किसे कौन सी विधा सरल लगती है और कौन सी सरल यह विवाद का विषय नहीं है, यह रचनाकार के कौशल पर निर्भर है. हर विधा की अपनी सीमा और पहुँच है. कबीर के सामर्थ्य ने दोहों को साखी बना दिया. गीत, अगीत, नवगीत, प्रगीत, गद्य गीत और अन्य अनेक पारंपरिक गीत लेखन की तकनीक (शिल्प) में परिवर्तन की चाह के द्योतक हैं. साहित्य में ऐसे प्रयोग होते रहें तभी कुछ नया होगा. दोहे के सम पदों की ३ आवृत्तियों, विषम पदों की ३ आवृत्तियों, सम तह विषम पदों के विविध संयोजनों से नए छंद गढ़ने और उनमें रचने के प्रयोग भी हो रहे हैं.

हिन्दी कवियों में प्रयोगधर्मिता की प्रवृत्ति ने निरंतर सृजन के फलक को नए आयाम दिए हैं किन्तु उर्दू में ऐसे प्रयोग ख़ारिज करने की मनोवृत्ति है. उर्दू में 'इस्लाह' की परंपरा ने बचकाना रचनाओं को सीमित कर दिया तथा उस्ताद द्वारा संशोधित करने पर ही प्रकाशित करने के अनुशासन ने सृजन को सही दिशा दी  जबकि हिन्दी में कमजोर रचनाओं की बाढ़ आ गयी. अंतरजाल पर अराजकता की स्थिति है. हिन्दी को जानने-समझनेवाले ही अल्प संख्यक हैं तो स्तरीय रचनाएँ अनदेखी रह जाने या न सराहे जाने की शिकायत है. शिल्प, पिंगल आदि की दृष्टि से नितांत बचकानी रचनाओं पर अनेक टिप्पणियाँ तथा स्तरीय रचनाओं पर टिप्पणियों के लाले पड़ना दुखद है.

छंद मुक्त रचनाओं और छन्दहीन रचनाओं में भेद ना हो पाना भी अराजक लेखन का एक कारण है. छंद मुक्त रचनाएँ लय और भाव के कारण एक सीमा में गेय तथा सरस होती है. वे गीत परंपरा में न होते हुए भी गीत के तत्व समाहित किये होती हैं. वे गीत के पुरातन स्वरूप में परिवर्तन से युक्त होती हैं,  किन्तु छंदहीन रचनाएँ नीरस व गीत के शिल्प तत्वों से रहित बोझिल होती हैं.               

हिंद युग्म पर 'दोहा गाथा सनातन' की कक्षाओं और गोष्ठियों के ६५ प्रसंगों तथा साहित्य शिल्पी पर 'काव्य का रचना शास्त्र' में अलंकारों पर ५८ प्रसंगों में मैंने अनुभव किया है कि पाठक को गंभीर लेखन में रुची नहीं है. समीक्षात्मक गंभीर लेखन हेतु कोई मंच हो तो ऐसे लेख लिखे जा सकते हैं.

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Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर