स्तम्भ / लेबल

-acharya sanjiv 'salil' (238) -Acharya Sanjiv Verma 'Salil' (195) अंग्रेजी (1) अलंकार (4) अवधी (4) आयुर्वेद (3) आरोग्य आशा (1) कला (1) कविता (32) कहावत (1) कायस्थ (1) काव्यानुवाद (3) कुण्डलिनी (1) क्षणिका (1) गणेश (1) ग़ज़ल (13) गीत (56) गीति काव्य (1) गीतिका (14) घनाक्षरी (2) घरेलू नुस्खे (3) चिंतन (3) चित्रगुप्त (5) चौपाई (1) छत्तीसगढ़ी (1) जनक छंद (1) डॉ चित्रा चतुर्वेदी 'कार्तिका' (1) तसलीस (उर्दू त्रिपदी) अज़ीज़ अहमद अंसारी (1) दुर्गा (3) देश (2) दोहा (65) नर्मदा (9) नर्मदाष्टक (1) नव विधा (1) नवगीत (40) नारी विमर्श (1) निमाड़ी (1) नियाज़ (1) नज़्म: संजीव 'सलिल' (1) परिचर्चा: चिट्ठाकारी और टिप्पणी-लेखन (1) पुरातत्व (1) पुस्तक समीक्षा (1) प्रकृति (1) प्राकृतिक चिकित्सा (2) प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' (1) बाल साहित्य (1) बुंदेली (1) भक्ति काव्य (1) भजन (15) भवन (1) भारत (7) भोजपुरी (5) महादेवी वर्मा (1) मालवी (1) मुक्तक (6) मुक्तिका (78) मृदुल कीर्ति (4) राम (7) राष्ट्र वंदना (1) लघु कथा (3) लघुकथा (13) लेख: हिन्दी का हित चिंतन (1) विवाह गीत (3) विश्व काव्य सलिला : भागवत प्रसाद मिश्रा 'नियाज' ' (1) शब्द सलिला: लखपति -अजित वडनेरकर (1) शान्ति देवी वर्मा (1) श्यामलाल उपाध्याय (1) श्यामानन्द 'सरस्वती' (1) श्री कृष्ण (1) संजीव 'सलिल' (227) संस्मरण (1) समाचार (1) साधना (1) सूक्ति सलिला: शेक्सपिअर (1) सूक्ति-सलिला:प्रो. बी. पी. मिश्र 'नियाज़' / सलिल (1) सोरठा (1) स्वर्गीय शान्ति देवी वर्मा (1) स्वास्थ्य: घरेलू नुस्खे (1) हरिगीतिका (1) हाइकु (6) हास्य (6) हिंदी (6) हिन्दी काव्यानुवाद (1) हिन्दी ग़ज़ल (1) हिन्दी छंद (1) (1) ॥ श्रीरामरक्षास्तोत्र ॥ (2)
pustak sameeksha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं
pustak sameeksha लेबलों वाले संदेश दिखाए जा रहे हैं. सभी संदेश दिखाएं

शुक्रवार, 2 सितम्बर 2011

पुस्तक सलिला: 'खुले तीसरी आँख' : प्राणवंत ग़ज़ल संग्रह -- संजीव 'सलिल'

पुस्तक सलिला:                                                                   
 
'खुले तीसरी आँख' : प्राणवंत ग़ज़ल संग्रह
 
संजीव 'सलिल'
*
(पुस्तक विवरण: खुले तीसरी आँख, हिंदी ग़ज़ल (मुक्तिका) संग्रह, चन्द्रसेन 'विराट', प्रथम संस्करण, आकर डिमाई,  पृष्ठ १७८, मूल्य २५० रु., समान्तर प्रकाशन तराना उज्जैन)
 
हिंदी ग़ज़ल के सम्बन्ध में सुप्रसिद्ध गीत-गज़लकार श्री गोपाल प्रसाद सक्सेना 'नीरज' का मत है_ ''क्या संस्कृतनिष्ठ हिंदी में गज़ल लिखना संभव है? इस प्रश्न पर यदि गंभीरता से विचार किया जाये तो मेरा उत्तर होगा-नहीं |....हिंदी भाषा की प्रकृति भारतीय लोक जीवन के अधिक निकट है, वो भारत के ग्रामों, खेतों खलिहानों में, पनघटों बंसीवटों में ही पलकर बड़ी हुई है | उसमे देश की मिट्टी की सुगंध है | गज़ल शहरी सभ्यता के साथ बड़ी हुई है | भारत में मुगलों के आगमन के साथ हिंदी अपनी रक्षा के लिए गांव में जाकर रहने लगी थी जब उर्दू मुगलों के हरमों, दरबारों और देश के बड़े बड़े शहरों में अपने पैर जमा रही थी वो हिंदी को भी अपने रंग में ढालती रही इसलिए यहाँ के बड़े बड़े नगरों में जो संस्कृति उभर कर आई उसकी प्रकृति न तो शुद्ध हिंदी की ही है और न तो उर्दू की ही | यह एक प्रकार कि खिचड़ी संस्कृति है | गज़ल इसी संस्कृति की प्रतिनिधि काव्य विधा है | लगभग सात सौ वर्षों से यही संस्कृति नागरिक सभ्यता का संस्कार बनाती रही | शताब्दियों से जिन मुहावरों, शब्दों का प्रयोग इस संस्कृति ने किया है गज़ल उन्ही में अपने को अभिव्यक्त करती रही | अपने रोज़मर्रा के जीवन में भी हम ज्यादातर इन्ही शब्दों, मुहावरों का प्रयोग करते हैं | हम बच्चों को हिंदी भी उर्दू के माध्यम से ही सिखाते है, प्रभात का अर्थ सुबह और संध्या का अर्थ शाम, लेखनी का अर्थ कलम बतलाते हैं | कालांतर में उर्दू के यही पर्याय मुहावरे बनकर हमारा संस्कार बन जाते हैं | सुबह शाम मिलकर मन में जो बिम्ब प्रस्तुत करते हैं वो प्रभात और संध्या मिलकर नहीं प्रस्तुत कर पाते हैं | गज़ल ना तो प्रकृति की कविता है ना तो अध्यात्म की वो हमारे उसी जीवन की कविता है जिसे हम सचमुच जीते हैं | गज़ल ने भाषा को इतना अधिक सहज और गद्यमय बनाया है कि उसकी जुबान में हम बाजार से सब्जी भी खरीद सकते हैं | घर, बाहर, दफ्तर, कालिज, हाट, बाजार में गज़ल  की भाषा से काम चलाया जा सकता है | हमारी हिंदी भाषा और विशेष रूप से हिंदी खड़ी बोली का दोष यह है कि  हम बातचीत में जिस भाषा और जिस लहजे का प्रयोग करते हैं उसी का प्रयोग कविता में नहीं करते हैं | हमारी जीने कि भाषा दूसरी है और कविता की दूसरी इसीलिए उर्दू का शेर जहाँ कान में पड़ते ही जुबान पर चढ जाता है वहाँ हिंदी कविता याद करने पर भी याद नहीं रह पाती | यदि शुद्ध हिंदी में हमें गज़ल लिखनी है तो हमें हिंदी का वो स्वरुप तैयार करना होगा जो दैनिक जीवन की भाषा और कविता की दूरी  मिटा सके |''
 
नीरज के समकालिक प्रतिष्ठित गीत-गज़लकार श्री चंद्रसेन 'विराट' इस मत से सहमत नहीं हैं. अपने ११ हिंदी ग़ज़ल संग्रहों के माध्यम से विराट ने गज़लियत और शेरियत को हिंदी एक मिजाज में ढलने में सफलता पायी है, यह जरूर है कि विराट की भाषा शुद्ध और परिष्कृत होने के नाते अंग्रेजी भाषा में प्राथमिक शिक्षा पाये लोगों को क्लिष्ट लगेगी. विराट ने ग़ज़ल लेखन के शिल्प में उर्दू के मानकों को पूरी तरह अपनाया है. उनकी हर ग़ज़ल का हा र्शेर बहरों के अनुकूल है किन्तु वे उर्दू की लफ्ज़ गिराने या दीर्घ को लघु और लघु को दीर्घ की तरह पढ़ने की परंपरा से असहमत हैं. उनकी भाषिक दक्षता, शब्द भण्डार और अभिव्यक्ति क्षमता इतनी है कि कि भावाभिव्यक्ति उनके लिये शब्दों से खेलने की तरह है. शिल्प के निकष पर उनकी हिंदी ग़ज़लों को कोई खारिज नहीं कर सकता, कथ्य की कसौटी पर हिंदी की भाषागत शुचिता, भावगत प्रांजलता, बिम्बगत टटकापन, अलंकारगत आकर्षण, शैलीगत स्पष्ट व सरलता और संकल्पनागत मौलिकता विराट जी का वैशिष्ट्य है. अभियंता होने के नाते आपने सृजन को काव्यगत मानकों पर कसा जाना उन्हें अपरिहार्य प्रतीत होता है. उन्ही के शब्दों में-
यह जरूरी है कि कृति का आकलन होता रहे.
न्यूनताओं और दोषों का शमन होता रहे.
*
कथ्य, भाषा, भाव, शैली, शिल्प पर भी आपका
साथ रचना के सदा चिंतन-मनन होता रहे.
*
विराट की आत्मा का तरह उनकी ग़ज़लों का स्वर गीतमय है. वे आरंभ में ग़ज़ल को गीतिका कहते रहे हैं किन्तु यह संज्ञा हिंदी छंद शस्त्र में एक छंद विशेष की है. विराट जी के लिये हिंदी-उर्दू खिचडी के डाल-चाँवल की तरह है. वे हिंदी की शुद्धता के पक्षधर होते हुए भी उर्दू के शब्दों का यथावश्यक निस्संकोच प्रयोग करते हैं. विराट जी अपनी सृजन प्रक्रिया को स्वयं तटस्थ भाव से निरखते-परखते हैं. पहले आपने आप से पूछते हैं 'गीत सृजन कब-बकब होता है?', फिर उत्तर देते हैं- 'जब होना है तब होता है'. सृजन प्रक्रिया यांत्रिक नहीं होती कि मशीनी उत्पाद की तरह कविता का उत्पादन हो. विराट जी की अनुभूति हर रचनाकार की है- 'यह होना कैसे समझाऊँ? सचमुच खूब अजब होता है'. विराट जी सृजन का उत्स पीड़ा, दर्द, अभाव, वैषम्य जनित असंतोष और परिस्थिति में परिवर्तन की जिजीविषा को मानते हैं. उनके शब्दों में

'प्रेरक कोई कांटा, अनुभव / कोई एक सबब होता है.  - पृष्ठ ११
*
दर्द ही तो देवता अक्षय सृजन के स्रोत का / छंद से उसका हमेशा संस्तवन होता रहे.  - पृष्ठ ५
*
दुःख, दर्द, अश्रु, आहें तेरे ही नाम हैं सब / हम गीत में निरंतर इनको उचारते हैं. - पृष्ठ १३
*
दुःख न जग का गा सके, वह एक सच्चा कवि नहीं / प्यास होठों पर न जिसके, आँख में पानी न हो - पृष्ठ १२६
*
जीवन के मरु में कविता को मरु-उद्यान किया जाता है 
भीतर उतर स्वयं अपना ही अनुसन्धान किया जाता है. - पृष्ठ ६२
*
हम मीरा के वंशज हमने कहन विरासत में पाई है / अमरित के जैसी सच्चाई हमने पीकर ग़ज़ल कही है. - पृष्ठ १८
*
रोज जी-जी मरे / रोज मर-मर जिए...  जिंदगी क्यों मिली / सोचिए-सोचिए. - पृष्ठ ६७
*
विराट जी की सकारात्मक, तटस्थ, यथार्थपरक सोच उनकी हर रचना में मुखर होते हैं. वे सत्य से डरते नहीं, सत्य कितना भी अप्रिय हो उसे आवरण से ढंकते नहीं, जो जैसा है उसे वैसा ही स्वीकारते हैं और शुभ का संस्तवन करते समय अशुभ के परिवर्तन का आव्हान करना नहीं भूलते किन्तु उनके लिये परिवर्तन या बदलाव का रास्ता विनाश नहीं सुधार है. विराट जी सात्विकता, शुचिता, शालीनता, मर्यादा, संतुलन और निर्माण के कवि हैं. वे आजीविका से अभियंता रहे हैं और इस रूप में अपने योगदान से संतुष्ट भी रहे हैं, संभवतः इसीलिये वे ध्वंसात्मक क्रांति की भ्रान्ति से हमेशा दूर रहे हैं.
गीत, ग़ज़ल, मुक्तक, दोहों सँग हाथ लगा कुछ बड़े पुलों में
मैंने मेरा सारा जीवन व्यर्थ गुजारा नहीं लगा है - पृष्ठ ५०
*
इसी कारण विराट जी के काव्य में वीभत्स, भयानक या रौद्र रस लगभग अनुपस्थित हैं जबकि श्रृंगार, शांत व  करुणा का उपस्थिति सर्वत्र अनुभव की जा सकती है. विराट जी इंगितों में बात करने के अभ्यस्त हैं. वे पाठक को लगातार सोचने के लिये प्रेरित करते हैं.
इतने करुण हैं दृश्य कि देखे न जा सकें / क्यों देश को हो नाज? कहो क्या विचार है? - पृष्ठ १७१
*
हाथों से करके काम हुनरमंद वे हुए / हम हाथ की लकीर दिखाने में रह गये. - पृष्ठ १६४
*
करते प्रणाम सभी चमत्कार को यहाँ / सरसों हथेलियों पे जमाव तो बात है. -- पृष्ठ ४२
*
विराट जी समकालिक सामयिक परिस्थितियों का आकलन अपनी तरह से करते हैं और जो गलत होते देखते हैं निस्संकोच उद्घाटित करते हैं. 'खुले तीसरी आंख' में विराट जी ने हर रिसते नासूर पर नश्तर चलाये हैं किन्तु अपने विशिष्ट अंदाज़ में-
हमें जो दीखता होता नहीं है वह सियासत में / शिकारी के पिछाड़ी भी शिकारी और होता है. - पृष्ठ १७
*
यह आधुनिकता द्वंद्व है, छलना है, ढोंग है / जिस्मों की भूख-प्यास है, कहने को प्यार है. - पृष्ठ ५१
*
विराट-काव्य का सर्वाधिक आकर्षक और सशक्त पक्ष श्रृंगार है. वे श्रृंगार की उत्कटता को चरम पर ले जाते समय भी पूरी तरह सात्विक और मर्यादित रखते हैं-
सुबह से निर्जला एकादशी का व्रत तुम्हारा है / परिसा प्यार से मुझसे मगर खाया नहीं जाता.. - पृष्ठ १४८
भावनाओं की ऐसी सूक्ष्म अभिव्यक्ति की चादर शब्दों के ताने-बाने से बुनना विराट के ही बस की बात है. प्रिय के मुखड़े को हथेली में थामकर देखने की सामान्य मुद्रा को विराट जी कितना पावन क्षण बना सके हैं-
भागवत सा है तुम्हारा मुखड़ा / दो हथेली की रहल होती है. - पृष्ठ १३२ 
*
जब महफिल में उसे विराजित, सम्मुख पाया नहीं गया है
तब सचमुच में बहुत हृदय से, हमसे गया नहीं गया है. - पृष्ठ २५
*
प्यार को पूजा पर वरीयता देते विराट की अभिनव दृष्टि और बिम्ब का कमाल देखिये-
जिस पर तितली चिपक गयी थी, पूजा हित वह कुसुम न तोडा.
माफ़ करें इस प्रणय-मिथुन को तो अलगाया नहीं गया है. - पृष्ठ २५
*
विराट सनातन सत्य और समयजयी कवियों की विरासत थाती की तरह गहते हैं यह उनकी काव्य-पंक्तियाँ बताती है.
रहिमन धागा प्रेम का, मत तोड़ो चटकाय.
टूटे से फिर ना जुड़े, जुड़े गाँठ पद जाए..   - महाकवि रहीम
*
चलो जोड़ा गया टूटे हुए संबंध का धागा.
मगर जो पड़ गयी है वह गिरह देखी नहीं जाती. विराट - पृष्ठ३३
*
'दिल मिले या न मिले हाथ मिलाये रहिये' का भाव विराट की शैली में यूँ अभिव्यक्त हुआ है-
हमारे मन नहीं मिलते, फकत ये हाथ मिलते हैं.
लडाई के लिये होती सुलह देखी नहीं जाती. - पृष्ठ ३४
*
विराट के लिये कविता करना शौक, शगल या मनोरंजन नहीं पवित्र कर्त्तव्य, पूजा या जीवन-धर्म है. उन जैसे वरिष्ठ कवि-कुल गुरु की पंक्तियाँ नवोदितों को रिचाओं / मन्त्रों की तरह स्मरण कर आत्मस्थ करना चाहिए ताकि वे काव्य-रचना के सारस्वत कर्म का मर्म समझ सकें.

कितनी वक्रोक्ति, ध्वनि, रस का परिपाक है? / कथ्य क्या?, छंद क्या?, शब्द विन्यास है. - पृष्ठ १५४
*
गीत का लेखन तपस्या से न कम / आप कवि मन को तपोवन कीजिये. - पृष्ठ १५०
*
गजल का शे'र होठों पर, उअतर कर जिद करे बोले
कहे बिन रह न पायें जब, उसे तब ही कहा जाए. १२९
*
सच को सच कहता है सच्चा शायर / खूब हिम्मत से हो बेबाक बहुत. - पृष्ठ ११०
*
कविता, कविता हो, पद्य हो उसको / गद्य सा मत सपाट होने दे.
अपने कवि को तू कवि ही रख केवल / उसको चरण न भाट होने दे - पृष्ठ ११२
*
दुःख न जग का गा सके, वह एक सच्चा कवि नहीं.
प्यास होठों पर न जिसके, आँख में पानी न हो. - पृष्ठ १२६
*
समीक्ष्य कृति का आवरण आकर्षक, मुद्रण स्वच्छ व शुद्ध है. पाठ्य-त्रुटियाँ नगण्य हैं- यथा: पोशाख - पृष्ठ१३४, प्रितिष्ठित - पृष्ठ १३५. मुझे एक पंक्ति में अक्रम या व्युतिक्रम काव्य-दोष प्रतीत हुआ- 'तन के आँगन चौड़े, मन के पर गलियारे तंग रहे हैं' में पर को मन के पहले होना चाहिए. संयोजन शब्द 'पर' तन और 'मन' को जोड़ता है, गलियारे को नहीं. अस्तु...
'खुली तीसरी आँख' विराट जी का ११ वाँ हिंदी गजल संग्रह है. विराट जी का काव्य-कौशल इस संग्रह में शीर्ष पर है. सुधी पाठकों ही नहीं, कवियों के लिये भी यह संकलन पठनीय और मननीय भी है.

****************

 Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

मंगलवार, 13 जुलाई 2010

कृति चर्चा: 'कुछ मिश्री कुछ नीम' एक सारगर्भित मुक्तक संग्रह चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'

कृति चर्चा:

'कुछ मिश्री कुछ नीम' एक सारगर्भित मुक्तक संग्रह

चर्चाकार: आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संपादक दिव्य नर्मदा अंतर्जाल हिन्दी पत्रिका
*
{कृति विवरण: कुछ मिश्री कुछ नीम, मुक्तक संग्रह, मुक्तककार: चन्द्रसेन 'विराट', आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी सजिल्द, पृष्ठ १४४, मूल्य २५० रु., प्रकाशक: समान्तर प्रकाशन तराना उज्जैन, रचनाकार संपर्क: समय, १२१ बैकुंठधाम कोलोनी, इंदौर ४५२०१८, दूरभाष: ०७३१ २५६२५८६, चलभाष: ९३२९८९५५४०.}
*

विश्व वाणी हिन्दी को अपनी संस्कृत माँ से विरासत में मिले चांदस कोष अक जाज्वल्यमान रत्न है 'मुक्तक'. श्रव्य काव्य की पद्य शाखा के अंतर्गत मुक्तक काव्य गणनीय है. महापात्र विश्वनाथ (१३ वीं सदी) के अनुसार 'छन्दोंबद्धमयं पद्यं तें मुक्तेन मुक्तकं'  अर्थात जब एक पद अन्य पदों से मुक्त हो तब उसे मुक्तक कहते हैं. मुक्तक का शब्दार्थ ही है 'अन्यै: मुक्तमं इति मुक्तकं' अर्थात जो अन्य श्लोकों या अंशों से मुक्त या स्वतंत्र हो उसे मुक्तक कहते हैं. अन्य छन्दों, पदों ये प्रसंगों के परस्पर निरपेक्ष होने के साथ-साथ जिस काव्यांश को पढने से पाठक के अंत:करण में रस-सलिला प्रवाहित हो वही मुक्तक है- 'मुक्त्मन्यें नालिंगितम.... पूर्वापरनिरपेक्षाणि हि येन रसचर्वणा क्रियते तदैव मुक्तकं'

प्रबंध काव्यों, गीतों आदि में कवि की कल्पनाशीलता को पात्रों तथा घटनाक्रमों के आकाश में उड़ान भरने का अवसर सुलभ होता है किन्तु मुक्तक की संकुचित-लघु पंक्तियों में भावों, रसों, बिम्बों, प्रतीकों आदि का परिपाक कर सकना कवि के रचना कौशल की कड़ी परीक्षा है. आचार्य रामचन्द्र शुक्ल के शब्दों में: 'जिस कवि में कल्पना की समाहार शक्ति के साथ-साथ भाषा की समास शक्ति जितनी ही अधिक होगी, उतना ही वह मुक्तक की रचना में सफल होगा.'

समकालिक हिन्दी गीति-काव्य के शिखर हस्ताक्षर अभियंता श्री चन्द्रसेन 'विराट' के १३ गीत संग्रहों, १० ग़ज़ल संग्रहों, २ दोहा संग्रहों, ५ मुक्तक संग्रहों पट दृष्टिपात करें तो उनके समृद्ध शब्द-भंडार, कल्पनाप्रवण मानस, रससिक्त हृदय, भाव-बिम्ब-प्रतीक त्रयी के समायोजन की असाधारण क्षमता का लोहा मानना पड़ता है. निपुण अभियंता 'चन्द्रसेन' जिस तरह विविध निर्माण सामग्रियों का सम्यक समायोजन कर सुदृढ़ संरचनाओं को मूर्तित कर भारत को समृद्ध करते रहे ठीक वैसे ही उनके अन्दर विराजित 'विराट' काव्य के विविध उपादानों का सम्यक समन्वय कर विविध विधाओं, विषयों और कथ्यों से हिन्दी के सारस्वत कोष को संपन्न करने में जिउया रहा.

कुछ मिश्री कुछ नीम के मुक्तक जीवन की धूप-छाँव, सुख-दुःख, उन्नति-अवनति, उत्थान-अवसान, आगमन-प्रस्थान के दो पक्षों का प्रतिनिधित्व करने पर भी अथाह विश्वास, अनंत ऊर्जा, असीम क्रियाशीलता, अनादि औत्सुक्य तथा अगणित आयामों के पञ्च अमृतों से परिपूर्ण हैं, उनमें कहीं हताशा, निराशा, कुंठा, घृणा या द्वेष के पञ्च विकारों का स्थान नहीं है. विराट के चिन्तन में वैराट्य और औदार्य निरंतर दृष्टव्य है. वे ऊर्ध्वारोहण के पक्षधर हैं, अधोगमन की चर्चा नितांत आवश्यक हो तो भी इंगित मात्र से संकेतित करते हैं. इस मुक्तक संग्रह के उत्तरार्ध 'कुछ मिश्री' के कुछ मधुर मुक्तकों का आनंद लें:

थोड़ा तुभ की ओर देखो तो
कितना रती विभोर देखो तो
कितनी तीखी है धार हँसिये की
दूकी चन्द्र-कोदेखो तो
*
ज्ञान के घट का उठना बाकी है.
यवनिका-पट का उठना बाकी है
प्रकृति के कितने ही रहस्यों से
अब भी घूँघट का उठना बाकी है.
*
वसर है दृग मिला लेंगे.
प्यार को पने जमा लेंगे.
कोरा कुरता है पना भी
कोरी चूनर पे रंग डालेंगे.
*
क्षिणी, वाम न देखा जाये
ख्याति, पद-ना देखा जाये
ग्रन्थ रखें कि पुरस्कारों हित
न्य याम न देखा जाये.

विराट को अनुप्रास तथा उपमा अलंकारों का सानिंध्य प्रिय है. मुक्तकों में अनुप्रास और उपमा के सभी प्रकार जाने-अनजाने प्रयुक्त हुए हैं. उनके ये मुक्तक १७-१९ मात्राओं में निबद्ध होने पर भी लय वैविध्य से सलिला की चंचल लहरों की सी गतिशीलता की अनुभूति कराते हैं.

संकलन के हर मुक्तक में प्रथम, द्वितीय और चतुर्थ पंक्ति में अन्त्यानुप्रास (पदांत-तुकांत) को विराट सहजता से साध सके हैं, वह कहीं भी आरोपित प्रतीत नहीं होता. यह अन्त्यानुप्रास एक शब्द से लेकर ४-५ शब्दों तक का है. उक्त मुक्तकों में  क्रमशः 'ओर देखो तो, भोर देखो तो, कोर देखो तो', 'घट का उठना बाकी है, पट का उठना बाकी है, घट का उठना बाकी है', 'ला लेंगे, मा लेंगे, डालेंगे', वाम न देखा जाये, नाम न देखा जाये, याम न देखा जाये'   में अन्त्यानुप्रास अलंकार दृष्टव्य हैं.

छेकानुप्रास किसी पंक्ति में एक या अधिक वर्णों की दुहरी आवृत्ति से होता हैं. छेकानुप्रास की छटा उक्त उदाहरणों में देखिये: त- तु तो, क- कि क, क- कि की, द- दू दे, क- की को, क- के का, क- के कि, अ- आ अ, अ- अ आ, क- को कु, अ- आ अ, द- द दे, न- ना न, प- प पु, अ- अ आ आदि.

वृन्त्यानुप्रास : तुम ही कुम्हलाई हुई लगती हो, खूब सादा हो हज सुन्दर हो, सुख तो घटता है मय के सँग-सँग, क्रूर दुनिया को सुखी रती हो,  साजो-सामान से डर लगता है, दोस्त हों न मगर होने की, जानता हूँ वान जिस्मों की आदि पंक्तियों में रेखांकित शब्दों में वृत्यानुप्रास लगातार शब्दों में भी है और अलग-अलग प्रयुक्त शब्दों में भी.

इन मुक्तकों के सरस और मधुर बनने में श्रुत्यानुप्रास की भी महती भूमिका है:एक उच्चारण-स्थल से उच्चारित होनेवाले वर्ण समूह की आवृत्ति से उत्पन्न श्रुत्यानुप्रास अलंकार की झलक  थोड़ा तुभ की ओर देखो तो, कितनी तीखी है धार हँसिये की, दूज की चन्द्र-कोर देखो तो आदि पंक्तियों में समाहित है.

विराट के मुक्तकों का एक वैशिष्ट्य समान उच्चारण तथा भार के शब्दों का विविध पंक्तियों में एक समान स्थान पर आना है. ऐसे शब्द अर्थवत्ता प्रदान करने के साथ-साथ नाद सौन्दर्य की अभिवृद्धि भी करते हैं. निम्न मुक्तकों में शर्मदा, सर्वदा, नर्मदा तथा तबस्सुम, तलातुम, तरन्नुम ऐसे ही शब्द हैं जिनका प्रयोग विराट ने उसी तरह किया जिस तरह कोई चित्रकार विविध तूलिकाघातों का प्रयोग अभिन्नता में भिन्नता दर्शाने हेतु करता है.

शील की शर्मदा मिली मुझको
सौख्यदा सर्वदा मिली मुझको
भाग्यशाली हूँ तुम सरीखी जो
नेह की नर्मदा मिली मुझको.
*
हर तबस्सुम को तुम समझती हो.
हर तलातुम को तुम समझती हो.
जानता हूँ जवान जिस्मों की -
हर तरन्नुम को तुम समझती हो.

लाटानुप्रास ( एक शब्द की समान अर्थ में एकाधिक आवृत्ति ) रंग ही रंग नज़र आयेंगे, अपना प्यारा करीब होता है / हर सहारा करीब होता है / डूब जाती है नाव तब अक्सर / जब किनारा करीब होता है, प्राकृतिक रूप सलज सुन्दर हो / खूब सादा हो, सहज सुन्दर हो / कुछ न श्रृंगार न सज-धज जैसे / ओस भीगा सा जलज सुन्दर हो,  लिख दूँ किरणों से धूप का मुक्तक / रूपवाले अनूप का मुक्तक / आँख भरकर तुम्हें निहारूं तो / मुझको लिखना है रूप का मुक्तक, फागवाले प्रसंग की कविता / रंग पर है ये रंग की कविता / भीगे वस्त्रों ने स्पष्ट लिख दी है / अंग पर यह अनंग की कविता आदि  में खूबसूरती से प्रयुक्त हुआ है. अंतिम दो मुक्तकों में ३-३ बार लतानुप्रस का प्रयोग विराट जी के भाषा व छंद पर असाधारण अधिकार का साक्षी है.

उपमा अलंकार में विराट के प्राण बसते हैं. वे अपनी प्रेरणा के लिये अछूती और मौलिक उपमाएँ प्रयोग में लाते हैं तो पारंपरिक और प्रचलित उपमाओं से भी उन्हें परहेज़ नहीं है. तुम भी मुझ सी ही काम-काजी हो (७२), एक दर्पण सा चटख जाता मैं (७४) आदि में पूर्णोपमा, फूल के जैसे खिले रहने दो (७७), पूर्ण मुकुलित सा विमल होता है (४६) आदि में लुप्तोपमा की मोहक छवि एक ही पंक्ति में है जबकि 'भाग्यशाली हूँ तुम सरीखी जो / नेह की नर्मदा मिली मुझको' तथा अन्यत्र पूर्णोपमा दो पंक्तियों में है.

संग्रह के 'कुछ मिश्री' तथा 'कुछ नीम' शीर्षकों दो खंडों में क्रमशः १५१ तथा २६२ कुल ४१३ मुक्तक-रत्नों से समृद्ध यह विराटी मंजूषा हर सुरुचिसंपन्न पाठक को लुभाने में समर्थ है. विराट के ये मुक्तक नवोंमेषित उक्तियों के भंडार हैं. 'शब्द का जाप नहीं है कविता (१६३), तुम सचाई को गुन नहीं सकते (१७२), जो गलत हो सही नहीं बनता (१३९), फन ग़ज़ल का है खुदा की नेमत (१३८), रूप पीने से जी नहीं भरता (११८), प्रेम में ब्रम्ह का आनंद मिला (१०७) जैसे मुक्तकांश स्वतंत्र रूप से उक्तियों की तरह जुबान पर चढ़ने में समर्थ हैं.

गुरुत्वाकर्षण तथा बल के नियमों जैसी अनेक महत्वपूर्ण शोधें करनेवाले महान वैज्ञानिक सर आइजक न्यूटन को यह समझने में कठिनाई हुई कि जिस बड़े छेद में से बिल्ली निकल सकती है उसी में से उसका छोटा बच्छा भी निकल सकता है, बच्चे के लिये अलग से छोटा छेद बनाने की ज़रुरत नहीं है. इसका कारण मात्र यह है कि गूढ़ के समाधान में उलझा मस्तिष्क सहज स्तर पर नहीं उतर पाया. ऐसा ही विराट के साथ भी है. वे जिस भाव शिखर पर ध्यानस्थ रहते हैं वहाँ सामान्य भाषिक शुद्धताओं की अनदेखी स्वाभाविक है. 'ब्रम्ह की राह सुझाई देगी' एक अशुद्ध प्रयोग है, 'राह' के साथ 'सुझाई जाती' या 'दिखाई देती' प्रयोग शुद्ध होता.  पिन्हाने, सपन, तिराने (१७४), लंगौटा (१६७), तयारी (२४३), रस्ते (२२३), तयार (२०४) आदि अशुद्ध प्रयोग विराट की संस्कारी हिन्दी के मखमल में टाट का पैबंद लगते हैं. 'जाए' के स्थान पर 'जाये' का अशुद्ध प्रयोग भी एकाधिक स्थान पर है. 'जाए' का अर्थ 'गमन करना' और 'जाये' का अर्थ 'जन्म दिया' होता है. यह मुद्रण त्रुटि है तो भी नए पाठकों/ रचनाकारों को भ्रमित कर गलत प्रयोग बढ़ाएगी. विराम चिन्हों का प्रयोग न किया जाना भी विचारणीय है. विराट जी की कृतियाँ भाषिक प्रयोग के लिए मानकों की तरह देखी जाती हैं इसलिए अधिक सावधानी की अपेक्षा स्वाभाविक है.  

संबंधों को वस्त्रों की तरह बदलने के इस दौर में विराट की सात्विक प्रेमपरक दृष्टि तथा सनातन मूल्यों के प्रति प्रतिबद्धता मुझ जैसे अनुजों और नयी पीढी के रचनाकारों के लिये अनुकरणीय है. विराट दैनंदिन छोटे-छोटे प्रसंगों से गहन सत्यों को उद्घाटित करनें में समर्थ हैं. बानगी देखिये:

मेरी आँखों में चमक तुमसे है
प्यार की खास दमक तुमसे है
तुम न होतीं तो अलोना होता-
मेर जीवन में नमक तुमसे है.  (इस नमक पर दुनिया की सब मधुरता निछावर, अभिनव और अनूठा प्रयोग)
*
लिख दूँ किरणों से धूप का मुक्तक
रूपवाले अनूप का मुक्तक
आँख भार कर तुम्हें निहारूँ तो
मुझको लिखना है रूप का मुक्तक.  (वसनहीनता को प्रगति समझने वाली पीढी के लिये श्रृंगार की शालीनता, मर्यादा और सात्विकता दृष्टव्य)
*
श्रृंगार के कुशल चितेरे विराट की कलम से व्यंग्य कम ही उतरता है पर जब भी उतरता है, मन को छूता है-

चीजें मँहगी हैं आदमी सस्ते
आज बाज़ार से बड़ा क्या है
*
आज-कल शहर की गरिमा-महिमा
उसके बाज़ार से आँकी जाती
*
बिकती है मौत की सुपारी भी
यह भी बाज़ार का तरीका है
*
दीन सरसब्ज़ न हो जाएँ कहीं
फिर शुरू नब्ज़ न हो जाये कहीं
खूब चिंता है निर्धनों की तुम्हें
भूख को कब्ज़ न हो जाये कहीं.*

उक्त मुक्तकों में समय के पदचापों और उन पर कवि की प्रतिक्रिया को महसूस जा सकता है. 'कम लिखे को अधिक समझना' के पारंपरिक पक्षधर विराट शब्दों का तनिक भी अपव्यय नहीं करते.. हर पंक्ति का हर शब्द सटीक हो तो कविता की अनदेखी की ही नहीं जा सकती.

घर की बैठक में पुष्प डाली हो
तुलसी आँगन की दीप वाली हो
अन्नपूर्ण हो तुम रसोई में
सेज पर तुम ही आम्रपाली हो.

अपने मुक्तकों का वैशिष्ट्य उद्घाटित करते हुए विराट कहते हैं:

कल्पनाएँ तो विरल हैं मेरी
मान्यताएँ भी प्रबल हैं मेरी
देवता सुन कि मनुज मैं अब तक
आस्था दृढ़ है अचल है मेरी.

ऐसी दृढ़, अचल आस्था, प्रबल मान्यता और विरल कल्पना हर हिन्दी प्रेमी की हो मा शारदा से यही विनय है.

**************************************
दिव्यनर्मदा.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
२०४ विजय अपार्टमेन्ट, नेपिअर टाउन. जबलपुर ४८२००१
०७६१ २४१११३१ / ९४२५१ ८३२४४.

नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर