हिन्दी हो जग-वाणी यदि, हम मिलकर करें प्रयास
 एक साथ मिल कलम चलायें, मन में लिये हुलास
सत-शिव-सुंदर शब्द-शब्द हो, सत-चित-आनंद अक्षर-
ऊर्जस्वित मन-प्राण कर, 'सलिल' जग में करें उजास
*
: जय हिंद : जय भारत : जय भारती : वंदे मातरम :

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Diwali Dohe: Sanjiv 'Salil', Voice sangya tandon

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शनिवार, 18 मई 2013

shashthi purti kavivar rakesh khandelwal

युग कवि राकेश खंडेलवाल के प्रति प्रणतांजलि:

लेखनी में शारदा का वास है, रचते रहो,
युग हलाहल से कहो कवि -कंठ में पचते रहो।
काल चारण बन तुम्हारे गीत गायेगा-
कवि-चरण ठहराव से बचते रहो।।
*
तुम नहीं बस तुम, समय की चेतना हो,
ह्रदय में अन्तर्निहित मनु-वेदना हो।
नाद अनहद गुंजाते हो अक्षरों से-
भाव लय रस शब्द मंथित रेतना हो।।
*
अक्षरी आकाश के राकेश हो तुम,
शब्द के वातास में भावेश हो तुम।
नाद अनहद से निनादित गीत सर्जक-
नव प्रतीकों में बसे बिम्बेश हो तुम।।
*
गीत तुम लिखते नहीं हो, गीत तुममें प्रगट होते,
भाव उर में आ अजाने रसों की नव फसल बोते।
रस न बस में रह स्वयं के, मानते आदेश कवि का-
लय विलय हो प्राण में तब हो समाधित खो न खोते।।
*
विनयावनत
संजीव 
कविवर राकेश खंडेलवाल की षष्ठी पूर्ति पर विशेष वीडिओ
द्वारा शार्दूला नोगजा

 

अमिताभ त्रिपाठी

काव्याकाश के निर्मल राकेश को उनकी षष्ठिपूर्ति पर हार्दिक बधाई!
कुछ लोग जन्मना कवि होते हैं
कुछ लोग कवित्व का अर्जन कर लेते हैं श्रम से
और कुछ लोगों पर यह थोप दिया जाता है या वे इसे जबरदस्ती ओढ़ लेते हैं। 
यहाँ मैनें फ्रांसिस बेकन की नकल मारी है सिर्फ़ यह बताने के लिये की इसकी पहली पंक्ति पर राकेश जी विराजमान हैं और अन्तिम पर मैं सगर्व खड़ा हूँ। इन दोनों सीमाओं के बीच यदि समाकलन कर दिया जाय तो शेष सभी कवि आ जायेंगे। आज के भी, कल के भी और आने वाले कल के भी।
राकेश जी में कविता अजस्र पयस्विनी की भाँति बहती है बिना किसी अवरोध के और बिना किसी कृत्रिमता के। राकेश जी के काव्यलोक का भ्रमण करने पर ज्ञात होता है कि कविता वहाँ पर किसी लम्बे फीते की तरह खुलती चली जाती है। अविच्छिन्न और अनवरुद्ध। 
फ़िराक़ ने ग़ज़ल के बारे में कहा है कि यह गद्य की विधा है। अर्थात्‌ वहाँ पर बातों को कहा जाता है और सुना जाता हैं, जैसा कि सामान्य वार्तालाप में होता है। राकेश जी की कविताओं को पढ़ कर मेरे मन में कई बार यह विचार उठता है कि उनके गीत वास्तव में लयात्मक गद्य हैं। राकेश जी के काव्य में मानवीकरण, रूपक और बिम्ब प्रचुरता से समाविष्ट हैं जिसके कारण उसके वाचन या गायन से परिवेश स्वतः जीवन्त हो उठता है। उनका बिम्ब विधान इतना सार्थक और सटीक होता है कि वह अमूर्त का साक्षात स्पर्श करा देता है। 
मेरा बहुत मन है कि मैं उनकी काव्ययोजना और बिम्ब विधान पर कुछ लिखूँ परन्तु तथाकथित व्यस्तता और अपने अपरिभाषित आलस्य के कारण अवसर खिसकता जा रहा है। डर है किसी और ने लिख दिया तो मुझे बड़ा दुख होगा। फिर भी कुछ बातें...
राकेश जी आजीविका के लिये जिस व्यवसाय में हैं वह उन्हें इतना समय नहीं देता कि वे व्यवस्थित योजना के द्वारा लेखन करें फिर भी आश्चर्य हैं जब भी उनका कोई गीत 
हमारे सामने आता है तो वह एक सुचिन्तित और सुव्यस्थित योजना लिये हुये होता है। सहजता, सरलता और अकृत्रिमता उनके गीतों का प्रमुख गुण है। उनके बिम्ब प्रायः सुग्राह्य होते हैं। विस्तार भय से अभी उदाहरण नहीं दे रहा हूँ।
राकेश जी बहुत से प्रयोग नहीं करते। भावना को काव्य-यात्रा का पाथेय मानते हुये जिस भी प्रवाह (छन्द) में बात निकल पड़ती बहुत स्वाभावित रीति से उसी तरंग में बहते चले जाते हैं।
राकेश जी काव्य में बौद्धिक या छान्दसिक चमत्कार उत्पन्न करने की आधुनिक या प्राचीन किसी भी रीति (या आन्दोलन) का अनुसरण करते दिखाई नहीं देते।
उनकी शैली का लालित्य उनकी भाषा और काव्यगत वाक्य विन्यास में दिखाई देता है।
......अभी इतना ही
राकेश जी, आप शतायु हों आपकी लेखनी इसी तरह प्रवहमान रहे, उसका यश और कीर्ति अक्षुण्ण रहे यही ईश्वर से प्रार्थना है। कुछ अनुचित लिख दिया हो तो क्षमा कर दीजियेगा।
सादर
अमित, रचनाधर्मिता
Amitabh Tripathi <amitabh.ald@gmail.com>

शनिवार, 12 जनवरी 2013

गीत-प्रति गीत शार्दूला-राकेश खंडेलवाल

गीत-प्रति गीत

शार्दूला-राकेश खंडेलवाल


अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता
*
अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता, अभी भाव मन के सभी नींद में हैं
रही रोशनी श्याम चूनर लपेटे, अभी कल्पनाएँ गगन सीप में हैं
लगा इक सितारा कि टूटा, कि टूटा, मगर कामना एक मन में न आई
रहे कान सुनते कि बहुजन हितों की, सकल योजनायें अभी कीप में हैं

खुदी के सुखों पे अड़े राजनेता, भला देश को नीतियाँ कौन देगा
रही सभ्यता ओढ़ घर में जो घूंघट, नई सोच को रीतियाँ कौन देगा
न जाने समुन्दर लहर पी रहा क्यों, नहीं तीर पर धार रत्नाभ आती
जलें पाँव, झुक कर चुनें, क्या चुनें हम, गरम रेत को सीपियाँ कौन देगा

नहीं राम की दिव्यता जो समझते, कहें स्वर्ण मृग ने सिया को लुभाया
वृथा जो बजाते रहे गाल अपने, रहें चुप! बताया जो, काफी बताया
रही रीत महफ़िल सजेगी, चलेगा सफ़र गीत का बिन रुके शोक में भी
हुई हार जब भी धुनों की कलह से, दहक गीत ने राग कापी सुनाया

सादर शार्दुला
8 जनवरी 13
*
Rakesh Khandelwal

शार्दुला,एक खूबसूरत निर्वाह के लिये अशेष बधाईयाँ.

जहाँ से इस रचना की पंक्तियाँ प्रारम्भ होती हैं वहीं से चलकर कुछ पंक्तियाँ इस रचना को समर्पित:

अभी गीत कोई नहीं होंठ छूता अभी भाव मन के सभी नींद में हैं
रही रोशनी श्याम चूनर लपेटे, अभी कल्पनाएँ गगन सीप में हैं
लहर कोई उमड़ी नहीं सिन्धु में जो किनारे से जा बात कोई संवारे
सपन को निमंत्रण रहा भेजता मैं,छुपी दस्तकें अजनबी द्वीप में हैं

रहे ताकते सरगमों के सभी सुर, हुये तार खामोश सारंगियों के
फ़िसल्ती रही होंठ की कोर पर से गज़ल ने कोई नज़्म जो गुनगुनाई
उबासी समेटे रहे खिड्कियूं पर सकल सरजना के निमिष लड़खड़ाते
हवाओं की थिरकन रही प्रश्न ओढ़े, न संभव हुआ पत्र कुछ भी सुनाते

बिछी पंथ पर दृष्टि की चादरें जो बिना स्पर्श के रह गईं चांदनी सी
क्षितिज के सिरे तक टंगा शून्य केवल धुँआसा न हो कोई आकार उभरा
उठा टुटती डोर के चन्द टुकड़े नहीं उंगलियां बुन सकी हैं दुशाला
ना आया पुन:: चित्र बन सामने भी गया डूब स्मृति की गली में जो मुखड़ा


बुने मंत्र जितने कभी साधना को नहीं कोई सुर की चढ़ा पालकी में
रही दीप की वर्तिका थरथराती ना ढाढस अनिश्चय ने कोई बंधाया
सूना था टपकती सुधा है निशा में,टंके व्योम पर चौदहवें चन्द्रमा से
हथेली बढी की बढी रह गई है नहीं आंजुरी में अभी कुछ समाया
*

बुधवार, 19 दिसम्बर 2012

गीत : रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे राकेश खंडेलवाल

गीत :

रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे

राकेश खंडेलवाल 
 
*
स्वप्न की वीथियों में उगे फूल बन
रंग जितने फ़िसल तूलिका से गिरे
फिर अवनिका-पटल चित्र करने लगा
बिम्ब बनते हुये जब गगन से झरे
 

कोई सूरजमुखी में बदल रह गया
कोई करने लगा भोर पीताम्बरी
पोर पर आ कोई हल्दिया बन गया
कोई पुरबाईयाँ कर गया केसरी
हँस पड़ा कोई भुजपाश ले गुलमुहर 
कोई कचनार सा खिलखिलाने लगा
और थामे हुये रश्मियाँ धूप की
कोई आ झील पर झिलमिलाने लगा
 

बाँह  मौसम ने फ़ैलाई जितनी अधिक
दृश्य आ आके उतने ही उनमें भरे
 

वाखरों पर नयन की खड़े ओढ़ ला
मौसमों की गली से नये आवरण
सावनी एक मल्हार पहने हुये
फिर कली पर बुने कुछ नये आभरण
तीर नदिया के जलते हुये दीप की
वर्तिका की तरह नृत्य करते हुये
झोलियों में संजोये हुये बिम्ब को
चित्र दहलीज पर कर के रखते हुये
 

नभ सलिल से जो रजताभ कण चुन लिये
वाटिकाओं की ला वीथियों में धरे
 

वेणियों पर उतर आ गये रूप की
मोतियों में गुँथे,मोगरे से सजे
और हथफूल को केन्द्र करते हुये
कंगनों को पकड़ घुँघरुओं से बजे
टेसुई आभ होकर अलक्तक बने
फिर हिना से हथेली रचाने लगे
पांखुरी पांखुरी हो बिछे सेज पर
और फ़िर कामनायें सजाने लगे


हो गए शिल्प नूतन पुन: आस की
चेतना में घुली कल्पना के परे 
__._,_.___

बुधवार, 31 अक्तूबर 2012

विशेष रचना: विजयादशमी ...? राकेश खंडेलवाल

विशेष गीत:










विजयादशमी ...?
राकेश खंडेलवाल 
  *
विजयादशमी विजय पर्व है विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
जाने कितने दिन बीते हैं एक प्रश्न को लेकर फ़िरते
कभी धूप में तपे , ओढ़ कर कभी गगन पर बादल घिरते
चट्टानों के दृढ़ सीने से लौटा है सवाल टकराकर
और बह गया बिन उत्तर के नदिया की धारा में तिरते
 
रहा कौंधता यही प्रश्न इक हर इक प्रहर और हर पल छिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
रामकथा ने बतलाया था हुआ अस्त इस दिन दशकन्धर
जिसकी खातिर अनायास ही बन्धन में था बँधा समन्दर
थी अस्त्य पर विजय सत्य की, तना न्याय का गर्वित सीना
एक तीर ने सोख लिया था आर्यावर्त पर टँका ववंडर
 
रातें हुईं चाँदनी तब से,मढ़े स्वर्ण से थे सारे दिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
पर वो तब की बातें थीं जो मन को तो बहला देती हैं
किन्तु उदर की यज्ञाग्नि में आहुति एक नहीं देती हैं
सपनों के खींचे चित्रों से टकराता है स्थिति का पत्थर
तो मुट्ठी में शेष रही बस जमना के तट की रेती है
 
आशवासन चुभते हैं मन में जैसे चुभती हो तीखी पिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
कल के स्वर्णिम आश्वासन में रँगते हुये बरस बीते हैं
मेहमां एक निशा का है तम गाते गाते दिन बीते हैं
इन्द्रधनुष के परे स्वर्ण मुद्राओं की बातों में उलझे
जितने कलश खोल; कर देखे पाये सब के सब रीते हैं
 
नवजीवन की आंखें खुलती हैं तो अब आशाओं के बिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
अपना बस इतिहास लगाये सीने से कब तक जीना है
कब तक उगी प्यास को आंखों का ही गंगाजल पीना है
जीवन की चौसर पर बाजी कब कब किसके साथ रहे एहै
मा फ़लेषु को छोड़ अधूरा ही श्लोक  गया बीना है
 
जिन खोजा तिन पाया सुनते आये, दिखता कहीं नहीं तिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
नहीं जीत का नहीं पराजय का ही पल हासिल हो पाया
इस यात्रा में कितना हमने खोया और भला क्या पाया
क्षणिक भ्रमों में अपनी जय का कर लेते उद्गोष भले ही
लेकिन सांझ ढले पर एकाकीपन महज साथ दे पाया
 
चुकता नहीं सांस की पूंजी का धड़कन दे देकर भी ॠन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
विजयी कौन? अराजकता के दिन प्रतिदिन बढ़ते शासन में
विजयी कौन? एक वह जिसको सांसें मिलती हैं राशन में
जयश्री का अपहरण किये बैठे हैं सामन्तों के वंशज
विजयी कौन?विजय के होते नये नये नित अनुवादन में
 
सत्यमेव जयते का नारा, काट रहा अपने दिन गिन गिन
विजयादशमी विजय पर्व है, विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
विजयी वह को हिन्दी का सम्मेलन करता है विदेश में
विजयी वह जो लक्ष्मी ढूँढ़ा करता आयातित गणेश में
विजयी वह जो फ़टी गूदड़ी भी तन से उतार लेता है
विजयी वह जो दोनों हाथों से संचय करता प्रदेश में
 
विजयी नहीं सपेरा, बजवाती जो बीन वही इक नागिन
विजयादशमी विजय पर्व है विजयी कौन हुआ है लेकिन
 
______________________________

बृहस्पतिवार, 27 सितम्बर 2012

गीत: रचें नयन में आ राँगोली -राकेश खंडेलवाल

कसौटी पर कंचन:
गीत:  

रचें नयन में आ राँगोली

राकेश खंडेलवाल 
*
दीवाली के जले दियों की किरन किरन में तुम प्रतिबिम्बित
रंग तुम्हारी अँगड़ाई से पाकर के सजती है होली

तुम तो तुम हो तुलनाओं के लिये नहीं है कुछ भी संभव
कचनारों में चैरी फूलों में, चम्पा में आभा तुमसे
घटा साँवरी,पल सिन्दूरी, खिली धूप का उजियारापन
अपना भाग्य सराहा करते पाकर के छायायें तुमसे
 
उगे दिवस की वाणी हो या हो थक कर बैठी पगडंडी
जब भी बोली शब्द कोई तो नाम तुम्हारा ही बस बोली
 
फ़िसली हुई पान के पत्तों की नोकों से जल की बूँदें
करती हैं जिस पल प्रतिमा के चरणों का जाकर प्रक्षालन
उस पल मन की साधें सहसा घुल जाया करतीं रोली में
और भावनायें हो जातीं कल्पित तुमको कर के चन्दन
 
अविश्वास का पल हो चाहे या दृढ़ गहरी हुई आस्था
अर्पित तुमको भरी आँजुरी, करे अपेक्षा रीती झोली

आवश्क यह नहीं सदा ही खिलें डालियों पर गुलमोहर
आवश्यक यह नहीं हवा के झोंके सदा गंध ही लाये
यह भी निश्चित नहीं साधना पा जाये हर बार अभीप्सित
यह भी तय कब रहा अधर पर गीत प्रीत के ही आ पाय
 
लेकिन इतना तय है प्रियतम, जब भी रजनी थपके पलकें
तब तब स्वप्न तुम्हारे ही बस रचें नयन में आ राँगोली
 
*****

मंगलवार, 21 अगस्त 2012

गीत : आज मंदिर को... राकेश खंडेलवाल / एस. एन. शर्मा 'कमल'

रचना - प्रति रचना 

गीत :

आज मंदिर को...


राकेश खंडेलवाल 

आज मंदिर को गये हैं छोड़ कर उसके पुजारी
दूसरी इक मूर्ति से निष्ठायें अपनी जोड़ते हैं
किन्तु हमने एक ही आराध्य को माना हमेशा
आज भी उसके चरण में नारियल ला फ़ोड़ते हैं
एक प्रतिमा संगामरमर की लगा नव आलयों में
थालियाँ नूतन सजा कर गा रहे हैं आरती नव
किन्तु शायद ये विदित उनको नहीं हो पा रहा है
छोड़ कर अपने निलय को देव विस्थापित हुआ कब
प्राण तो पाषाण में रहते सदा ही ओ पुजारी
खोल कर अपने नयन तू झाँकता तो देख पाता
शिव जटाओं की  तरह उलझी हुई पगडंडियों में
एक भागीरथ सहज भागीरथी को ढूँढ़ पाता
बात तो नूतन नहीं, इतिहास भी बतला गया है
एक को साधे सधै सब, साधिये सब शून्य मिलता
पंथ हर इक मोड़ पर बदले हुये चलते पथिक को
है नहीं संभव मिले उसको कभी वांछित सफ़लता
********

<rakesh518@yahoo.com>

प्रति रचना: 

sn Sharma का प्रोफ़ाइल फ़ोटो 

एस. एन. शर्मा 'कमल'

     देवता जब प्राण खो पाषाण बन जाएँ
  पुजारी क्या करे
  पंख ही जब काट दे सैय्याद नभचर के
  गगनचारी क्या करे
  खो जाए सुरसरि शिव-जटा पगडंडियों में जब
  त्रस्त भागीरथ क्या करे
  पंथ पर दीवार उठ जाए अगर अन्याय की
  सहमा पथिक भी क्या करे
  इतिहास के पन्ने रंगे हो वरिष्ठों के रुधिर से
  न्याय की हो विफलता
  दुष्ट को प्रश्रय मिले जिस ठौर पर ही सर्वदा 
  संभव कहाँ फिर सफलता
  भागीरथ की तपस्या जब व्याध के विष-बाण से 
  विद्ध हो अभिशप्त बन जाये
  सम्बन्धियों की आत्माएं भटकती रह जाएंगी
  वहाँ पर बिन मुक्ति पाए  
*************************************** 

बृहस्पतिवार, 19 अप्रैल 2012

रचना-प्रति रचना: राकेश खंडेलवाल-संजीव 'सलिल

रचना-प्रति रचना
राकेश खंडेलवाल-संजीव 'सलिल
*

यह अब हमको नहीं गवारा 

राकेश खंडेलवाल

*

जो पगडंडी ह्रदय कुंज से ,बन्द हुये द्वारे तक जाती
उस पर चिह्न पड़ें कदमों के यह अब हमको नहीं गवारा
अजनबियत की गहन धुंध ने ओढ़ लिया है जिन चेहरों ने
उनके अक्स नहीं अब मन के आईने में बनें दुबारा
सम्बन्धों के वटवृक्षों की जड़ें खोखली ही निकलीं वे
रहे सींचते निशा दिवस हम जिनको प्रीत-नीर दे देकर
सूख चुकीं शाखाओं को पुष्पित करने को कलमें रोपीं
व्यर्थ भटकना हुआ रहे ज्यों मरुथल में नौकायें खे कर
पता नहीं था हमें बाग यह उन सब को पी चुप रहता है
भावों के जिन ओस कणों से हमने इसका रूप संवारा
छिली हथेली दस्तक देते देते बन्द पड़े द्वारे पर
देहरी पर जाकर के बैठी रहीं भावनायें बंजारी
झोली का सूनापन बढ़ता निगल गया फ़ैली आंजुरिया
और अपेक्षा, ओढ़ उपेक्षा रही मारती मन बेचारी
चाहे थी अनुभूति चाँदनी बन आगे बढ़ कंठ लगाये
किन्तु असंगति हठी ही रही उसने बार बार दुत्कारा
उचित नहीं है हुये समाधिस्थों को छेड़े जा कोई स्वर
जिसने अंगीकार किया है एकाकीपन, हो एकाकी
अपनी सुधियों के प्याले से हम वह मदिरा रिक्त कर चुके
भर कर गई जिसे अहसासों की गगरी ले कर के साकी
वह अनामिका की दोशाला, जिस पर कोई पता नहीं है
पहुँच कहो कैसे सकता अब उस तक कोई भी हरकारा.
*********
मुक्तिका:
तार रहा जो...
संजीव 'सलिल'
*
तार रहा जो सारी दुनिया, क्या उसको भी तिर-तरना है?
लुटा रहा जो मुक्त हस्त, क्या शेष अशेष उसे धरना है??
*
जो पगडंडी हृदय कुञ्ज के रुद्ध द्वार तक पहुँच न पाती.
उस मग पर पग बार-बार रख, कदमों को मंजिल वरना है..
*
ओढ़ अपरिचय का कोहरा जो अन्तर्यामी दूर दृष्टि से,
दूर दृष्टि रख काव्य कलश में, बिम्ब आस्था का भरना है..
*
संबंधों के वट प्रतिबंधों की दीमक खोखला कर रही.
स्नेहिल अनुबंधों की औषधि, दे जग हरियाला करना है..
*
जीवन जीने की चिंता में पल-पल मरना त्याग सकें हम.
मरणधर्मियों को हँस-हँसकर अजर-अमर हो जी-मरना है.
*
अँजुरी में चाँदनी लिये हम, उषा-गाल पर मल आये हैं.
प्यास-हास का आस-दीप अब संध्या के द्वारे बरना है..
*
मिलन-निशा को नशा मिलन का, शरद पूर्णिमा कर देता है.
सुधियों को अमरत्व न दे, पल-पल नवजीवन वापरना है..
***
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

शुक्रवार, 10 फरवरी 2012

रचना-प्रति रचना राकेश खंडेलवाल-संजीव 'सलिल'

रचना-प्रति रचना 

राकेश खंडेलवाल-संजीव 'सलिल'
*

पुरबाई के साथ घड़ी भर को बह जाएँ 

उभरा करते भाव अनगिनत मन की अंगनाई में पल पल
कोई बैठे पास चार पल तो थोड़ा सा उसे बताएं

दालानॉ में रखे हुए गमलों में उगे हुए हम पौधे
जिनकी चाहत एक घड़ी तो अपनी धरती से जुड़ पायें
होठों को जो सौंप दिए हैं शब्द अजनबी आज समय ने
उनको बिसरा कर बचपन की बोली में कुछ तो गा पायें

लेकिन ओढ़े हुए आवरण की मोटी परतों के पीछे
एक बार फिर रह जाती है घुट कर मन की अभिलाषाएं

अटके हुए खजूरों पर हम चाहें देखें परछाई को
जो की अभी तक पदचिह्नों से बिना स्वार्थ के जुडी हुई है
पीठ फेर कर देख लिया था किन्तु रहे असफल हम भूलें
घुटनों की परिणतियाँ निश्चित सदा उदर पर मुडी हुई हैं

यद्यपि अनदेखा करते हैं अपने बिम्ब नित्य दर्पण में
फिर भी चाहत पुरबाई के साथ घड़ी भर को बह जाएँ

फागुन की पूनम कार्तिक की मावस करती है सम्मोहित
एक ज्वार उठता है दूजे पल सहसा ही सो जाता है
लगता तो है कुछ चाहत है मन की व्याकुलता के अन्दर
लेकिन चेतन उसको कोई नाम नहीं देने पाटा है

पट्टी बांधे हुए आँख पर एक वृत्त की परिधि डगर कर
सोचा करते शायद इक दिन हम अपना इच्छित पा जाएँ
*

आदरणीय राकेश जी!

आपकी रचना का वाचन कर कलम से उतरे भाव आपको सादर समर्पित.


उभरा करते भाव अनगिनत 

उभरा करते भाव अनगिनत, कवि की कविताई में पल-पल.

कोई आ सुध-बुध बिसराये, कोई आकर हमें जगाये...

*
कमल-कुसुम हम दिग-दिगंत में सुरभि लुटाकर व्याप सके हैं.

हो राकेश-दीप्ति नभ मंडल को पल भर में नाप सके हैं.

धरे धरा पर पग, हाथों में उठा सौर मंडल हम सकते-

बाधाओं को सिगड़ी में भर,सुलगा, निज कर ताप सके हैं.

अचल विजय के वाहक अपने सपने जब नीलाम हुए तो

कोई न पाया श्रम-सीकर की बोली बोले, गले लगाये...     

*
अर्पण और समर्पण के पल, पूँजी बनकर संबल देते.

श्री प्रकाश पाथेय साथ ले, श्वास-आस को परिमल देते.

जड़ न जमाले जड़ चिंतन, इसलिए चाह परिवर्तन की कर-

शब्द-शब्द विप्लव-विद्रोहों को कविता रचकर स्वर देते.

सर्जन और विसर्जन की लय-ताल कलम से जब उतरी तब    

अलंकार, रस, छंद त्रिवेणी, नेह नर्मदा पुलक नहाये...
*
उगे पूर्व से पर पश्चिम की नकल कर रहे हैं अनजाने.

सायों के बढ़ने से कद को आँक रहे हैं कम पैमाने.

नहीं मिटाई पर पहले से ज्यादा लम्बी रेखा खींची-

प्रलोभनों ने मुँह की खाई,जब आये लालच दिखलाने.

कंकर-में शंकर के दर्शन तभी हुए जब गरल पी लिया-

तजकर राजमार्ग पगडंडी पर मीरा बन कदम बढ़ाये...  

*****
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

रविवार, 29 जनवरी 2012

गीत: कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में.... --राकेश खंडेलवाल

गीत:
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में....

राकेश खंडेलवाल
*
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में
 
हो गया जब एक दिन सहसा मेरा यह मन अकेला
कोई बीता पल लगा देने मुझे उस  पार हेला
दूर छूटे चिह्न पग के फूल बन खिलने लगे तो
सो गये थे वर्ष बीते एक पल को फिर जगे तो
मन हुआ आतुर बुलाऊँ पास मैं फ़िर वो दुपहरी
जो कटी मन्दिर उगे कुछ पीपलों की चाँव में
आ चुका है वक्त चाहे दूर फिर भी आस बोले
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में....
 
वह जहाँ कंचे ढुलक हँसते गली के मोड़ पर थे
वह जहाँ उड़ती पतंगें थीं हवा में होड़ कर के
गिल्लियाँ उछ्ला करीं हर दिन जहाँ पर सांझ ढलते
और उजड़े मन्दिरों में भी जहाँ थे दीप जलते
वह जहाँ मुन्डेर पर उगती रही थी पन्चमी आ
पाहुने बन कर उतरते पंछियों  की कांव में
चाहता मन तय करे फ़िर सिन्धु की गहराईयों को
कुछ पुराने पेड़ बाकी हों अभी उस गांव में.....
 
पेड़ वे जिनके तले चौपाल लग जाती निरन्तर
और फिर दरवेश के किस्से निखरते थे संवर कर
चंग पर आल्हा बजाता एक रसिया मग्न होकर
दूसरा था सुर मिलाता राग में आवाज़ बो कर
और वे पगडंडियां कच्ची जिन्हें पग चूमते थे
दौड़ते नजरें बचा कर हार पी कर दाँव में
शेष है संभावना कुछ तो रहा हो बिना बदले
कुछ पुराने पेड़ हों शायद अभी उस गांव में.....
 
वृक्ष जिनकी छांह  थी ममता भरे आँचल सरीखी
वृक्ष जिनके बाजुओं से बचपनों ने बात सीखी
वे कि बदले वक्त की परछाई से बदले नहीं थे
और जिनको कर रखें सीमित,कहीं गमले नहीं थे
वे कि जिनकी थपकियाँ उमड़ी हुई हर पीर हरती
ज़िंदगी सान्निध्य में जिनके सदा ही थी संवारती
है समाहित गंध जिनकी धड़कनों, हर सां स में
हाँ  पुराने पेड़ शाश्वत ही रहेंगे गाँव मब
वे पुराने पेड़ हर युग में रहेंगे गांव में.....
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