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शुक्रवार, 17 जून 2011

छंद सलिला: नवीन चतुर्वेदी


 
 अमृत ध्वनि छन्‍द - उन्नत धारा प्रेम की

उन्नत धारा प्रेम की, बहे अगर दिन रैन|
तब मानव मन को मिले, मन-माफिक सुख चैन||
मन-माफिक सुख चैन, अबाधित होंय अनन्दित|
भाव सुवासित, जन हित लक्षित, मोद मढें नित|
रंज  किंचित, कोई न वंचित, मिटे अदावत|
रहें इहाँ-तित, सब जन रक्षित, सदा समुन्नत||


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घनाक्षरी कवित्त - ढूँढ के छली को पेश कीजै दरबार में

आज सपने में ललिता ने ये दिया हुकुम,
ढूँढ के छली को पेश कीजे दरबार में|

दिलों को दुखाने की मिलेगी सज़ा उसे आज,
जुर्म इकबाल होगा अदालतेप्यार में|

प्रेम का कनून तोड़ा, राधा जी से मुँह मोड़ा,
बख्शा न जाएगा वो, छपा दो अख़बार में|

सभी जगा ढूँढा, पर, मिला नहीं श्याम, चूँकि-
बैठा था वो तो छुप के दिलेसरकार में||

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सांगोपांग सिंहावलोकन छन्‍द - 
 
तान दें पताका उच्च हिंद की जहान में
ध्यान दें समाज पर अग्रज हमारे सब,
अनुजों की कोशिशों को बढ़ के उत्थान दें| 

उत्थान दें
 जन-मन रुचिकर रिवाजों को,

भूत काल वर्तमान भावी को भी मान दें| 

मान दें
 मनोगत विचारों को समान रूप,
हर बार अपनी ही जिद्द को न तान दें| 

तान दें
 पताका उच्च हिंद की जहान में औ,

उस के तने रहने पे भी फिर ध्यान दें||
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ग़ज़ल - फगुआ उमंग तरंग में

 सजावटें बनावटें बुनावटें घुमावटें|
चिठिया में होंवो लिखावटें हरें सकलअकुलाहटें||

मृदुहास मयपरिहास भीवही खास आस जगा गया|
मधुमास कीअभिलाष मेंअतिशय ढ़ी झुँझलाहटें||

यदि प्रेम हैडरिए नहींअभिव्यक्त भी करिए सजन|
फगुआ उमंग तरंग मेंक्यूँ  लूटें साथ तरावटें||

अनुपमअमितअविरलअगमअभिनवअकथअनिवार्य सा|
अमि-रस भरायहु प्रेम-पथ चलें यहाँ कडुवाहटें||


नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर