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सोमवार, 7 मई 2012

नीर-क्षीर दोहा यमक: मन राधा तन रुक्मिणी... --संजीव 'सलिल'

नीर-क्षीर दोहा यमक:
मन राधा तन रुक्मिणी...
संजीव 'सलिल'
*

*
मन राधा तन रुक्मिणी, मीरां चाह अनाम.
सूर लखें घनश्याम को, जब गरजें घन-श्याम..
*
अ-धर अधर पर बाँसुरी, उँगली करे प्रयास.
लय स्वर गति यति धुन मधुर, श्वास लुटाये हास..
*
नीति देव की देवकी, जसुमति मृदु मुस्कान.
धैर्य नन्द, वासुदेव हैं, समय-पूर्व अनुमान..
*
गो कुल का पालन करे, गोकुल में गोपाल.
धेनु रेणु में लोटतीं, गूँजे वेणु रसाल..
*
मार सकी थी पूत ना, मरी पूतना आप.
जयी पुण्य होता 'सलिल', मिट जाता खुद पाप..
*
तृणावर्त के शस्त्र थे, अनगिन तृण-आवर्त.
प्रभु न केंद्र-धुरि में फँसे, तृण-तृण हुए विवर्त..
*
लिए वेणु कर-कालिया, चढ़ा कालिया-शीश.
कूद रहा फन को कुचल, ज्यों तरु चढ़े कपीश..
*
रास न आया रचाना, न ही भुलाना रास.
कृष्ण कहें 'चल रचा ना' रास, न बिसरा हास..
*
कदम-कदम जा कदम चढ़, कान्हा लेकर वस्त्र.
त्रस्त गोपियों से कहे, 'मत नहाओ निर्वस्त्र'..
*
'गया कहाँ बल दाऊ जू?', कान्हा करते तंग.
सुरा पिए बलदाऊ जू, गिरे देख जग दंग..
*
जल बरसाने के लिए, इंद्र करे आदेश.
बरसाने की लली के, प्रिय रक्षें आ देश..
*

बुधवार, 18 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: धूप-छाँव दोहा-यमक --संजीव 'सलिल

दोहा सलिला:
धूप-छाँव दोहा-यमक
संजीव 'सलिल
*
शब नम आँखें मूँदकर, सहे तिमिर धर धीर.
शबनम की बूँदें कहें, असह हुई थी पीर..
*
मत नट वर, नटवर वरे, महकी प्रीत कदम्ब.
सँकुच लाजवंती हुई, सहसा आयीं अम्ब.. 
*
छीन रही कल छुरी से, मौन कलछुरी छीन.
चमचे के गुण गा आरही, चमची होकर दीन..
*
छान-बीनकर बात कर, कोई न हो नाराज.
छान-बीनकर जतन से, रखिए 'सलिल' अनाज..
*
अगर मिले ना राज तो,  राजा हो नाराज.
राज मिले तो हो मुदित, सिर पर धारे ताज.
*
भय का भूत न भूत से, आकर डँस ले आज.
रख खुद पर विश्वास मन,करता चल निज काज..
*
लगे दस्त तो दस्त ही, करता चुप रह साफ़.
क्यों न करो तुम भी 'सलिल', त्रुटि औरों की माफ़?.
*
हरदम हर दम का रखें, नाहक आप हिसाब.
चलती खुद ही धौंकनी, बँटे-मिटते ख्वाब..
*
बुनकर बुन कर से रहा, कोरी चादर रोज.
कोरी चादर क्यों नहीं?, कर कुछ इसकी खोज..
*
पत्र-कार मत खोजिये, होंगे आप निराश.
पत्रकार को सनसनी की ही, रही तलाश..
*
अमा नत हुए क्यों नयन?, गुमी अमानत आज.
नयन उठा कैसे करें, बात? आ रही लाज..
*
..Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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बुधवार, 4 अप्रैल 2012

दोहा सलिला: नीर-क्षीर दोहा-यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
नीर-क्षीर दोहा-यमक
संजीव 'सलिल' 
*
पोती पोती बीनकर, बिखरे सुमन अनेक.
दादी देती सीख: 'बन, धागा रख घर एक'..
*
हर ने की हर भक्त की, मनोकामना पूर्ण.
दर्प दुष्ट का हर लिया, भस्म काम संपूर्ण..
*
चश्मा हो तो दिख सके, सारी दुनिया साफ़.
चश्मा हो तो स्नानकर, हो जा निर्मल साफ़..
*
रागी राग गुँजा रहा, मन में रख अनुराग.
राग-द्वेष से दूर हो, भक्त वरे बैराग..
*
कलश ताज का देखते, सिर पर रखकर ताज.
ताज धूल में मिल कहे:, 'प्रेम करो निर्व्याज'..
*
अंगुल भर की छोकरी, गज भर लम्बी पूंछ.
गज को चुभ कर दे विकल, पूंछ न सकती ऊंछ..
*
हैं अजान उससे भले, देते नित्य अजान.
जिसके दर पर मौलवी, बैठे बन दरबान..
*
खेल खेलकर भी रहा, 'सलिल' खिलाड़ी मौन.
जिनसे खेले पूछते:, 'कहाँ छिपा है कौन?.
*
स्त्री स्त्री कर करे, शिकन वस्त्र की दूर.
शिकन माथ की कह रही, अमन-चैन है दूर..
*
गोद लिया पर गोद में, बिठा न करते प्यार.
बिन पूछे ही पूछता, शिशु- चुप पालनहार..
*
जब सुनते करताल तब, देते हैं कर ताल.
मस्त न हो सुन झूमिये, शेष! मचे भूचाल.. 
*******
 

रविवार, 4 मार्च 2012

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
गले मिले दोहा यमक
संजीव 'सलिल'
*
देव! दूर कर बला हर, हो न करबला और.
जयी न हो अन्याय फिर, चले न्याय का दौर..
*
'सलिल' न हो नवजात की, अब कोइ नव जात.
मानव मानव एक हों, भेद नहीं हो ज्ञात..
*
मन असमंजस में पड़ा, सुनकर खाना शब्द.
खा या खा ना क्या कहा?, सोच रहा नि:शब्द..
*
किस उधेड़-बुन में पड़े, फेरे मुँह चुपचाप.
फिर उधेड़-बुन कर सकें, स्वेटर पूरा आप..
*
होली हो ली हो रही, होगी नहीं समाप्त.
रंग नेह का हमेशा, रहे जगत में व्याप्त..
*
खाला ने खाली दवा, खाली शीशी फेंक.
देखा खालू दूर से, आँख रहे हैं सेंक..
*
आपा आपा खो नहीं, बिगड़ जायेगी बात.
जो आपे में ना रहे, उसकी होती मात..
*
स्वेद सना तन कह रहा, प्रथा सनातन खूब.
वरे सफलता वही जो, श्रम में जाए डूब..
*
साजन सा जन दूसरा, बिलकुल नहीं सुहाय.
सजनी अपलक रात में, जागे नींद न आय..
*
बाल-बाल बच गये सब, ग्वाल बाल रह मौन.
बाल किशन के खींचकर, भागी बाला कौन?
*
बाला का बाला चमक, बता गया चुप नाम.
मैया से किसने करी, चुगली लेकर नाम..
*

सोमवार, 9 जनवरी 2012

गले मिले दोहा यमक : -- संजीव 'सलिल'

गले मिले दोहा यमक
संजीव 'सलिल'
*
दस सिर तो देखे मगर, नौ कर दिखे न दैव.
नौकर की ही चाह क्यों, मालिक करे सदैव..
*
करे कलेजा चाक री, लगे चाकरी सौत.
सजन न आये चौथ पर, अरमानों की मौत..
*
बिना हवा के चाक पर, है सरकार सवार.
सफर करे सर कार क्यों?, परेशान सरदार..
*
चाक जनम से घिस रहे, कोई न समझे पीर.
पीर सिया की सलिल थी, राम रहे प्राचीर..
*
कर वट की आराधना, ब्रम्हदेव का वास.
करवट ले सो चैन से, ले अधरों पर हास..
*
पी मत खा ले जाम तू, गह ले नेक सलाह.
जाम मार्ग हो तो करे, वाहन-इंजिन दाह..
*
माँग न रम पी ले शहद, पायेगा नव शक्ति.
नरम जीभ टूटे नहीं, टूटे रद की पंक्ति..
*
कर धन गह कर दिवाली, मना रहे हैं रोज.
करधन-पायल ठुमकतीं, क्यों करिए कुछ खोज?
*
सीना चीरें पवनसुत, दिखे राम का नाम.
सीना सीना जानता, कहिये कौन अनाम?
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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मंगलवार, 3 जनवरी 2012

दोहा सलिला: दोहा-यमक-मुहावरे, मना रहे नव साल --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा-यमक-मुहावरे, मना रहे नव साल
संजीव 'सलिल'
*
बरस-बरस घन बरस कर, तनिक न पाया रीत.
बदले बरस न बदलती, तनिक प्रीत की रीत..
*
साल गिरह क्यों साल की, होती केवल एक?
मन की गिरह न खुद खुले, खोलो कहे विवेक..
*
गला काट प्रतियोगिता, कर पर गला न काट.
गला बैर की बर्फ को, मन की दूरी पाट..
*
पानी शेष न आँख में, यही समय को पीर.
पानी पानी हो रही, पानी की प्राचीर..
*
मन मारा, नौ दिन चले, सिर्फ अढ़ाई कोस.
कोस रहे संसार को, जिसने पाला पोस..
*
अपनी ढपली उठाकर, छेड़े अपना राग.
राग न विराग न वर सका, कर दूषित अनुराग..
*
गया न आये लौटकर, कभी समय सच मान.
पल-पल का उपयोग कर, करो समय का मान..
*
निज परछाईं भी नहीं, देती तम में साथ.
परछाईं परछी बने, शरणागत सिर-माथ..
*
दोहा यमक मुहावरे, मना रहे नव साल.
साल रही मन में कसक, क्यों ना बने मिसाल?
*
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बृहस्पतिवार, 29 दिसम्बर 2011

गले मिले दोहा-यमक भोग लगा प्रभु को प्रथम --संजीव 'सलिल

गले मिले दोहा-यमक
भोग लगा प्रभु को प्रथम
संजीव 'सलिल
*
भोग लगा प्रभु को प्रथम, फिर करना सुख-भोग.
हरि को अर्पण किये बिन बनता भोग कुरोग..
*
कहें दूर-दर्शन किये, दर्शन बहुत समीप.
चाहा था मोती मिले, पाई खाली सीप..
*
जी! जी! कर जीजा करें, जीजी का दिल शांत.
जी, जा जी- वर दे रहीं, जीजी कोमल कांत..
*
वाहन बिना न तय किया, सफ़र किसी ने मीत.
वाह न की जिसने- भरी, आह गँवाई प्रीत..
*
बटन न सोहे काज बिन, हो जाता निर्व्याज.
नीति- कर्म कर फल मिले, मत कर काज अकाज.
*
मन भर खा भरता नहीं, मन- पर्याप्त छटाक.
बरसों काम रुका रहा, पल में हुआ फटाक..
*
बाटी-भरता से नहीं, मन भरता भरतार.
पेट फूलता बाद में, याद आये करतार..
*
संज्ञा के बदले हुए, सर्वनाम उपयोग.                                                                                                            सर्व नाम हरि के 'सलिल', है सुंदर संयोग..

उसका रण वह ही लड़े, किस कारण रह मौन.
साथ न देते शेष क्यों, बतलायेगा कौन??
*
ताज महल में सो रही, बिना ताज मुमताज.
शिव-मंदिर को मकबरा, बना दिया बेकाज.                                                    .
*
योग कर रहे सेठ जी, योग न कर कर जोड़.
जोड़ सकें सबसे अधिक, खुद से खुद कर होड़..
*******

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एक हुए दोहा-यमक: दिलवर का दिल वर लिया संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा-यमक
दिलवर का दिल वर लिया
संजीव वर्मा 'सलिल'
*
दिलवर का दिल वर लिया, सिल ने सधा काज.
दिलवर ने दिल पर किया, ना जाने कब राज?

जीवन जीने के लिये, जी वन कह इंसान.
अगर न जी वन सका तो, भू होगी शमशान..

 मंजिल सर कर मगर हो, ठंडा सर मत भूल.
अकसर केसर-दूध पी, सुख-सपनों में झूल..

जिसके सर चढ़ बोलती, 'सलिल' सफलता एक.
अवसर पा बढ़ता नहीं, खोता बुद्धि-विवेक..

टेक यही बिन टेक के, मंजिल पाऊँ आज.
बिना टेक अभिनय करूँ, हो हर दिल पर राज..

दिल पर बिजली गिराकर, हुए लापता आप.
'सलिल' ला पता आपका, करे प्रेम का जाप..                                                                                                                                                                                                                                               

कर धो खा जिससे न हो, बीमारी का वार.
कर धोखा जो जी रहे, उन्हें न करिए प्यार..

पौधों में जल डाल- दें, काष्ठ हवा फल फूल.  
डाल कभी भी काट मत, घातक है यह भूल..

********************************
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                      
Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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शनिवार, 12 नवम्बर 2011

दोहा सलिला गले मिले दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला
गले मिले दोहा यमक
--संजीव 'सलिल'
*
जिस का रण वह ही लड़े, किस कारण रह मौन.
साथ न देते शेष क्यों?, बतलायेगा कौन??
*
ताज महल में सो रही, बिना ताज मुमताज.
शिव मंदिर को मकबरा, बना दिया बेकाज..
*
भोग लगा प्रभु को प्रथम, फिर करना सुख-भोग.
हरि को अर्पण किये बिन, बनता भोग कुरोग..
*
योग लगते सेठ जी, निन्यान्नबे का फेर.
योग न कर दुर्योग से, रहे चिकित्सक-टेर..
*
दस सर तो देखे मगर, नौ कर दिखे न दैव.
नौकर की ही चाह क्यों, मालिक करे सदैव?
*
करे कलेजा चाक री, अधम चाकरी सौत.
सजन न आये चौथ पर, अरमानों की मौत..
*
चढ़े हुए सर कार पर, हैं सरकार समान.
सफर करे सर कार क्यों?, बिन सरदार महान..
*
चाक घिस रहे जन्म से. कोइ न समझे पीर.
गुरु को टीचर कह रहे, मंत्री जी दे पीर..
*
रखा आँख पर चीर फिर, दिया कलेजा चीर.
पीर सिया की सलिल थी, राम रहे प्राचीर..
*
पी मत खा ले जाम तू, है यह नेक सलाह.
जाम मार्ग हो तो करे, वाहन इंजिन दाह..
*
कर वट की आराधना, ब्रम्हदेव का वास.
करवट ले सो चैन से, ले अधरों पर हास..
*



रविवार, 6 नवम्बर 2011

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
गले मिले दोहा यमक 
संजीव 'सलिल'
*
दिलवर का दिल वर लिया, दिल ने साधा काम.
दिल ने दिल को कर दिया, है दिलवर के नाम..
*
जीवन जीने के लिये, जी वन कह इन्सान.
वन न अगर जी सका तो, भू होगी शमशान..
*
मंजिल सर कर मगर हो, ठंडा सर मत भूल.
कर को कर से मिला कर, बढ़ चल यही उसूल..
*
जिसके सर चढ़ बोलती, 'सलिल' सफलता एक.
वह केसर सा श्रेष्ठ हो, कैसे बिना विवेक..
*
टेक यही बिन टेक के, मंजिल पाऊँ आज.
बिना टेक अभिनय करूँ दर्शक-दिल पर राज..
*
दिल पर बिजली गिराकर, हुए लापता आप.
'सलिल' ला पता आपका, करे प्रेम का जाप..
*
पौधों में जल डाल- दें, काष्ठ हवा फल फूल.
बैठ डाल पर डाल को काट न- होगी भूल..
*
वाह न कर बिन काम के, चाह न कर बिन काज.
वाहन बन निर्माण का, हो उन्नति का राज..
*
काज-बटन के काज बिन, रहता वस्त्र अपूर्ण.
बिना धार तलवार कब. हो पाती है पूर्ण?.
*
मन भर खा भरता नहीं, मन- पर्याप्त छटाक.
बाटी-भरता खा रहे, गरमागरम फटाक..
*
संज्ञा के बदले हुए, सर्वनाम उपयोग.
सर्व नाम हरि के 'सलिल', है सुन्दर संयोग..
***

शनिवार, 5 नवम्बर 2011

दोहा सलिला: गले मिले दोहा यमक -- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
गले मिले दोहा यमक
संजीव 'सलिल'

*
तेज हुई तलवार से, अधिक कलम की धार.
धार सलिल की देखिये, हाथ थाम पतवार..
*
तार रहे पुरखे- भले, मध्य न कोई तार.
तार-तम्यता बनी है, सतत तार-बे-तार..
*
हर आकार -प्रकार में, है वह निर-आकार.
देखें हर व्यापार में, वही मिला साकार..
*
चित कर विजयी हो हँसा, मल्ल जीत कर दाँव.
चित हरि-चरणों में लगा, तरा मिली हरि छाँव..
*
लगा-लगा चक्कर गिरे, चक्कर खाकर आप.
बन घनचक्कर भागते, समझ पुण्य को पाप..
*
बाँहों में आकाश भर, सजन मिले आ काश.
खिलें चाह की राह में, शत-शत पुष्प पलाश..
*
धो-खा पर धोखा न खा, सदा सजग रह मीत.
डगमग डग मग पर रहें, कर मंजिल से प्रीत..
*
खा ले व्यंजन गप्प से, बेपर गप्प न छोड़.
तोड़ नहीं वादा 'सलिल', ले सब जग से होड़..
*
करो कामना काम ना, किंचित बिगड़े आज.
कोशिश के सर पर रहे, लग्न-परिश्रम ताज..
*
वेणु अधर में क्यों रहे, अधर-अधर लें थाम.
तन-मन की समिधा करे, प्राण यज्ञ अविराम..
*
सज न, सजन को सजा दे, सजा न पायें यार.
बरबस बरस न बरसने, दें दिलवर पर प्यार..
*
चलते चलते...
कली छोड़कर फूल से, करता भँवरा प्रीत.
देख बे-कली कली की, बे-अकली ताज मीत..
*

बुधवार, 2 नवम्बर 2011

दोहा सलिला: गले मिले दोहा-यमक संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

गले मिले दोहा-यमक

संजीव 'सलिल'
*
ध्यान रखें हम भूमि का, कहता है आकाश.
लिखें पेड़ की भूमिका, पौध लगा हम काश..
*
बड़े न बनें खजूर से, बड़े न बोलें बोल.
चटखारे कह रहे हैं, दही बड़े अनमोल..
*
तंग गली से हो गये, ग़ालिब जी मशहूर.
तंग गली से हो गये, 'सलिल' तंग- अब दूर..
(ग़ालिब ने ग़ज़ल की आलोचना कर उसे तंग गली कहा था.)
*
रीत कुरीत न बन सके, खोजें ऐसी रीत.
रीत प्रीत की निभाये, नायक गाकर गीत..
*
लिया अनार अ-नार ने, नार देखकर दंग.
नार बिना नारद करे, क्यों नारद से जंग..
*
तारा देवी पूज कह, चंदा-तारा मौन.
तारा किसने का-किसे, कहो बताये कौन..
*
कैसे मानूँ है नहीं, अब जगजीवन राम.
जब तुलसी कह गये हैं, हैं जग-जीवन राम..
*
कबिरा कहता अभी कर, मन कहता कर बाद.
शीघ्र करे आबाद हो, तुरत करे नाबाद..
*
शेर शे'र कहता नहीं, कर देता है ढेर.
क्या बटेर तुमको दिखी, कभी लगाते टेर..
*
मुँह का बिगड़े स्वाद यदि, चुटकी भर खा खार.
हँसे आबले पाँव के, देख राह पुर खार..
*
चुस्की लेते चाय की, पा चुटकी भर धूप.
चुटकी लेते विहँस कर,  हुआ गुलाबी रूप..
*

Acharya Sanjiv verma 'Salil'

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बृहस्पतिवार, 27 अक्तूबर 2011

दोहा सलिला: दोहों की दीपावली, अलंकार के संग..... संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:                                                                        

दोहों की दीपावली, अलंकार के संग.....

संजीव 'सलिल'
*
दोहों की दीपावली, अलंकार के संग.
बिम्ब भाव रस कथ्य के, पंचतत्व नवरंग..
*
दिया दिया लेकिन नहीं, दी बाती औ' तेल.
तोड़ न उजियारा सका, अंधकार की जेल..   -यमक
*
गृहलक्ष्मी का रूप तज, हुई पटाखा नार.     -अपन्हुति
लोग पटाखा खरीदें, तो क्यों हो  बेजार?.    -यमक,
*
मुस्कानों की फुलझड़ी, मदिर नयन के बाण.  -अपन्हुति
जला फुलझड़ी चलाती, प्रिय कैसे हो तरण?.   -यमक
*
दीप जले या धरा पर, तारे जुड़े अनेक.
तम की कारा काटने, जाग्रत किये विवेक..      -संदेह
*
गृहलक्ष्मी का रूप लख, मैया आतीं याद.
वही करधनी चाबियाँ, परंपरा मर्याद..            -स्मरण
*
मानो नभ से आ गये, तारे भू पर आज.          -भ्रांतिमान 
लगे चाँद सा प्रियामुख, दिल पर करता राज..  -उपमा
*
दीप-दीप्ति दीपित द्युति, दीपशिखा दो देख. -वृत्यानुप्रास
जला पतंगा जान दी, पर न हुआ कुछ लेख.. -छेकानुप्रास
*
दिननाथ ने शुचि साँझ को, फिर प्रीत का उपहार.
दीपक दिया जो झलक रवि की, ले हरे अंधियार.. -श्रुत्यानुप्रास
अन्त्यानुप्रास हर दोहे के समपदांत में स्वयमेव होता है.
*
लक्ष्मी को लक्ष्मी मिली, नर-नारायण दूर.  -लाटानुप्रास
जो जन ऐसा देखते, आँखें रहते सूर..      
*
घर-घर में आनंद है, द्वार-द्वार पर हर्ष.      -पुनरुक्तिप्रकाश
प्रभु दीवाली ही रहे, वर दो पूरे वर्ष..
*
दीप जला ज्योतित हुए, अंतर्मन गृह-द्वार.   -श्लेष
चेहरे-चेहरे पर 'सलिल', आया नवल निखार..
*
रमा उमा से पूछतीं, भिक्षुक है किस द्वार?
उमा कहें बलि-द्वार पर, पहुंचा रहा गुहार..   -श्लेष वक्रोक्ति 
*
रमा रमा में मन मगर, रमा न देतीं दर्श.
रमा रमा में मन मगर, रमा न देतीं दर्श?  - काकु वक्रोक्ति 
*
मिले सुनार सुनार से, अलंकार के साथ.
चिंता की रेखाएँ शत, हैं स्वामी के माथ..  -पुनरुक्तवदाभास  

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शनिवार, 22 अक्तूबर 2011

दोहा सलिला: एक हुए दोहा यमक - संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
एक हुए दोहा यमक-
संजीव 'सलिल'
*
दाना दाना चाहता, सिर्फ जरूरत-योग्य.
नादां दाना चाहता, प्रचुर नहीं जो भोग्य..
*
दाने-दाने पर लिखा, जबसे उसने नाम.
खाए या फेरे 'सलिल', सोचे उमर तमाम..
*
खोटे खोटे या नहीं. कहें देखकर कृत्य.
खरे खरे हैं या नहीं, कहे सुकृत्य-कुकृत्य..
*
देखा सु-नार सुनार को, अलंकार के संग.
उतर गया पतिदेव के, चेहरे का क्यों रंग??
*
जब साँसों का तार था, तब न बजाय साज.
गया गया वह तार दे, निज पुरखों को आज.
*
मुश्किल में हूँ दैव मैं, आकर तनिक निवार.
खटमल काटें रातभर, फिर जा छिपें निवार..
*
बिना नाव-पतवार के, कैसे उतरूँ पार?
उन्मत नारी सी नदी, देती कष्ट अपार..
*
खुदा नहीं खोदा गढ़ा, और गिर गये आप.
खुदा-खुदा का कर रहे, अब क्यों नाहक जाप..
*
बिन पेंदी लोटा 'सलिल', लोटा करता खूब.
तनिक गया मँझधार में, जाता पल में डूब..
*
कर वट पूजन हैं बसे, उसमें देव अनंत.
करवट लें पाकर सघन, छाँव देव नर संत..
*
झटपट-चटपट पट उठा, देख चित्र-पट खेल.
चित-पट पट-चित को 'सलिल', हँस-मुस्काकर झेल..
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बुधवार, 19 अक्तूबर 2011

दोहा सलिला: एक हुए दोहा-यमक- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

एक हुए दोहा-यमक-

संजीव 'सलिल'
*
हरि! जन की आवाज़ सुन, हरि-जन बचा न एक.
काबिल को अवसर मिले, हरिजन रखे विवेक..
*
'त्रास न दें'- वर दे दिया, मन हो गया प्रसन्न.
फिर मन भर संत्रास दे, तत्क्षण किया विपन्न..
*
घटा बरस कर थम गयी, घटा वृष्टि का जोर.
घटा अनघटा कुछ नहीं, सलिल-धार मुँहजोर..
*
जब तक तू कमजोर है, तनिक लगा कम जोर.
शह देकर जो मात दे, कहलाये शहजोर..
*
जान बनी अनजान क्यों?, जान-बूझ कर आज.
बनी जान पर जान की, बिगड़े बनते काज.
*
बँधी थान पर भैंसिया, करे जुगाली मस्त.
थान नापते सेठ जी, तुंदियल होकर त्रस्त..
*
बीन बजाकर बीन ले, रुपये किस्मत बाँच.
अरे सपेरे! मौन मत, रह कह दे कुछ साँच..
*
दिखा हाथ की सफाई, बाजीगर हर्षाय.
दिखा हाथ की सफाई, ठग सबको कलपाय..
*
करें धाम जा पुण्य वे, करें धाम आ पाप.
ऐसे जीवन मूल्य को, क्या कहियेगा आप??
*
धनी न आया धना का, चिंतित हुआ ललाट.
धनी गिन रहा धन अमित, कर-कर बंद कपाट..
*
तितली-कलियों में हुआ, जब स्नेहिल सम्बन्ध.
समलैंगिकता ने किया, तब सुदृढ़ अनुबंध..
*
Acharya Sanjiv Salil

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बुधवार, 5 अक्तूबर 2011

दोहा सलिला: एक हुए दोहा यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:

एक हुए दोहा यमक

-- संजीव 'सलिल'
*
दिया दिया लेकिन नहीं, बाली उसमें ज्योत.
बाली उमर न ला सकी, उजियारे को न्योत..
*
संग समय के जंग है, ताकत रखें अकूत.
न हों कुमारी अब 'सलिल', सुकुमारी- मजबूत..
*
लाल किसी का हो- मिला, खून सभी का लाल.
हों या ना हों पास में, हीरे मोती लाल..
*
चली चाल पर चाप पर, नहीं सुधारी चाल.
तभी चालवासी करें, थू-थू बिगड़े हाल..
*
पाल और पतवार बिन, पेट न पाती पाल.
नौका मौका दे चलें, जब चप्पू सब काल..
*
काल न आता, आ गया, काल बन गया काल.
कौन कहे सत्काल कब, कब अकाल-दुष्काल..
*
भाव बिना अभिनय विफल, खाओ न ज्यादा भाव.
ताव-चाव गुम हो गये, सुनकर ऊँचे भाव..
*
असरकार सरकार औ', असरदार सरदार.
अब भारत को दो प्रभु, सचमुच है दरकार..
*
सम्हल-सम्हल चल ढाल पर, फिसल न जाये पैर.
ढाल रहे मजबूत तो, मना जान की खैर..
*
दीख पालने में रहे, 'सलिल' पूत के पैर.
करे कार्य कुछ पूत हो, तभी सभी की खैर..
*
खैर मना ले जान की, लगा पान पर खैर.
पान मान का खिला-खा, मिट जाये सब  बैर..
*

मंगलवार, 27 सितम्बर 2011

एक हुए दोहा यमक: -- संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा यमक:
संजीव 'सलिल'
*
लिए विरासत गंग की, चलो नहायें गंग.
भंग न हो सपना 'सलिल', घोंटें-खायें भंग..
*
सुबह शुबह में फर्क है, सकल शकल में फर्क.
उच्चारण में फर्क से, होता तर्क कु-तर्क..
*
बुला कहा आ धार पर, तजा नहीं आधार.
निरा धार होकर हुआ, निराधार साधार..
*
ग्रहण किया आ भार तो, विहँस कहा आभार.
देय - अ-देय ग्रहण किया, तत्क्षण ही साभार..
*
नाप सके भू-चाल जो बना लिए हैं यंत्र.
नाप सके भूचाल जो, बना न पाए तंत्र..
*
शह देती है मात तो, राह भटकता लाल.
शह पाकर फिर मात पा, हुआ क्रोध से लाल..
*
दह न अगन में दहन कर, मन के सारे क्लेश.
लग न सृजन में लगन से, हर कर हर विद्वेष..
*
सकल स कल कर कार्य सब, स कल सकल मत देख.
अकल अ कल बिन अकल हो, मीन मेख मत लेख..
*
दान नहीं आदान है, होता दान प्रदान.
अगर कहा आ-दान तो, हो न निदान प्रदान..
*
जान बूझकर दे रही, जान आप पर जान.
जान बचाते फिर रहे, जान जान से जान..
*
एक खुशी मुश्किल हुई, सुलभ हुए शत रंज.
सारे सुख-दुःख भुलाकर, चल खेलें शतरंज..
*

रविवार, 25 सितम्बर 2011

एक हुए दोहा यमक: -- संजीव 'सलिल'

एक हुए दोहा यमक:
-- संजीव 'सलिल'
*
हरि से हरि-मुख पा हुए, हरि अतिशय नाराज.
बनना था हरि, हरि बने, बना-बिगाड़ा काज?
हरि = विष्णु, वानर, मनुष्य (नारद), देवरूप, वानर
*
नर, सिंह, पुर पाये नहीं, पर नरसिंहपुर नाम.
अब हर नर कर रहा है, नित सियार सा काम..
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बैठ डाल पर काटता, व्यर्थ रहा तू डाल.
मत उनको मत डाल तू, जिन्हें रहा मत डाल..
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करने कन्यादान जो, चाह रहे वरदान.
करें नहीं वर-दान तो, मत कर कन्यादान..
*
खान-पान कर संतुलित, खा अजवाइन-पान.
सात्विक शुद्ध विचार रख, बन सद्गुण की खान..
*
खिला, न दे तू सुपारी, मीत न करना भीत.
खेली जिसने सु-पारी, उसने पाई जीत..
खिला = खिला दे, खेलने दे -श्लेष.
सुपारी = खाद्य पदार्थ, हत्या हेतु अग्रिम राशि- श्लेष.
सु-पारी = अच्छी पारी.
*
लीक पीटते रह गये, तजी न किंचित लीक.
चक्र प्रगति का थम गया, हवा हवा हुई लीक..
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धर उधार अधार में, मिलती बिन आधार.
वही धार मंझधार के, मध्य मिली साधार..
*
आम लेट हरदम नहीं, खास नहीं पाबंद.
आमलेट खा रहे हैं, दोनों ले आनंद..
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भेद रहे दे भेद जो, सकल सुरक्षा चक्र.
छेड़ बंद कर छेड़ दें, उनको जो हैं वक्र..
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तनखा को तन खा गया, लेकिन मिटी  न भूख.
सूख रहा आनन पिचक, कैसे रहे रसूख..
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शुक्रवार, 23 सितम्बर 2011

दोहा सलिला: दोहा के सँग यमक का रंग- संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा के सँग यमक का रंग-
संजीव 'सलिल'
*
मटकी तो मटकी गिरी,चित छाये चितचोर.
दधि बेचा सिक्के गिने,खन-खन बाँधे कोर.
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बेदिल हैं बेदिल नहीं,सार्थक हुआ न नाम.
फेंक रहे दिल हर तरफ, कमा रहे हैं नाम..
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वामा हो वामा अगर, मिट जाता सुख-चैन.
नैन मिले लड़ नैन से, जागे सारी रैन..
*
किस मिस का किस मिस किया, किस मिस कहिये आप?
किसमिस खाकर कीजिये, चिंतन अब चुपचाप..
*
बात करी बेबात तो, बढ़ी बात में बात.
प्रीत-पात पलमें झरे, बिखर गये नगमात..
*
नृत्य-गान आनंद दे, साध रखें सुर-ताल.
जीवन नदिया स्वच्छ रख, विमल रखे सर-ताल..
*
बिना माल पहने नहीं, जो दूल्हा वर-माल.
उसे पराजय दे 'सलिल', कंठ पड़ी जय-माल..
*
हाल पूछते, बतायें, कैसे हैं फिल-हाल?
हाल चू रहा, रह रहे, हँस फिर भी हर हाल..
*
खाल ओढ़कर शे'र की, करता हुआ सियार.
खाल खिंच गयी, दुम दबा, भागा मुआ सियार..
*
हाल-चाल सुधरे नहीं, बिना सुधारे चाल.
जब पड़ती बेभाव तो, लगे हुआ भूचाल..
*
टाल नहीं, तू टाल जा, ले आ बीजा-साल.
बीजा बो इस साल हो, फसल खूब दे माल..
*
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

बृहस्पतिवार, 22 सितम्बर 2011

दोहा सलिला: गले मिले दोहा-यमक --संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
गले मिले दोहा-यमक
संजीव 'सलिल'
*
गले मिले दोहा-यमक, भूले सारे भेद.
भेद न कहिये किसी, हो जीवन भर खेद..
*
कवितांजलि स्वीकारातीं, माँ शारद उपहार.
कवितांजलि कविगुरु करें, जग को बंदनवार..
*
कहें नीर जा मत कभी, मिट न सकेगी प्यास.
मिले नीरजा जब कभी, अधरों छाये प्यास..
*
चकमक घिस पैदा करे, अब न कोई जन आग.
चकमक देखे सब जगत, मन में भर अनुराग..
*
तुला न मन से मन 'सलिल', तौल सके तो तौल.
बात पचाना सीखिए, पड़े न मन में खौल..
*
जान न जाती जान सँग, जान न हो बेजान.
'सलिल' कौन अनजान है, कहिये कौन सुजान??
*
समर अमर होता नहीं,स-मर सकल संसार.
भ्रमर 'सलिल' से बच रहें, करे भ्रमर गुंजार..
*
हल की जब से पहेली, हलकी तबियत मीत.
मल मल मलमल धो पहन, यही जगत की रीत..
*
कर संग्रह कर ने किया, फैलाकर कर आज.
चाकर ने जाकर कहा:,आकर पहनें ताज..
*
सर ने सर को सर नवा, माँगा यह आशीष.
अवसर पा सर कर सकूँ, भव-बाधा जगदीश..
*
नीरज से रजनी कहे:, तात! अमर हैं गीत.
नीरज पा सजनी कहे, शतदल सी हो प्रीत..
*
Acharya Sanjiv Salil

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नर्मदा तट पर चौंसठ योगिनी मंदिर भेड़ाघाट जबलपुर