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मंगलवार, 21 फ़रवरी 2017

laghukatha sangrah

विश्ववाणी हिंदी संस्थान 

समन्वयम २०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४ 
ऍफ़ २, वी ५ विनायक होम्स, मयूर विहार, अशोक गार्डन,भोपाल ४६२०२३ चलभाष: ९५७५४६५१४७  
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प्रतिनिधि भारतीय लघुकथाएँ  
शीर्षक से २५ लघुकथाकारों की १०-१० लघु कथाएँ १०-१० पृष्ठों पर चित्र, संक्षिप्त परिचय तथा संपर्क सूत्र सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित करने की योजना है। संकलन का आवरण बहुरंगी, जैकेट सहित पेपरबैक होगा। ्आवरण, कागज, मुद्रण तथा बंधाई अच्छा होगा। प्रत्येक सहभागी को मात्र ३०००/- का अंशदान, सभी सहयोगी जुटने तथा रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद भेजना होगा। प्रत्येक सहभागी को २० प्रतियाँ निशुल्क उपलब्ध कराई जाएँगी जिनका विक्रय या अन्य उपयोग करने हेतु वे स्वतंत्र होंगे।  इच्छुक लघुकथाकार  ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७ पर संयोजकों से बात कर सकते हैं। प्रत्येक सहभागी को प्रशस्तिपत्र, स्मृति चिन्ह से सम्मानित किया जायेगा। ग्रन्थ के आरंभ में लघुकथा विषयक शोधपरक लेख तथा अंत में परिशिष्ट में शोध छात्रों हेतु उपयोगी सूचनाएं और सामग्री संकलित की जाएगी। हिंदी के साथ अन्य भारतीय भाषाओँ की लघु कथाएं भी आमंत्रित हैं। सहमति व सामग्री भेजने हेतु ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com, roy. kanta@gmail.com .   

'सार्थक लघुकथाएँ' 

'सार्थक लघुकथाएँ' शीर्षक से १११ लघुकथाकारों की २-२ प्रतिनिधि लघु कथाएँ २ पृष्ठों पर चित्र, संक्षिप्त परिचय सहित सहयोगाधार पर प्रकाशित करने की जा रही हैं। लगभग २५० पृष्ठों का संकलन पेपरबैक होगा।  आवरण बहुरंगी, मुद्रण अच्छा होगा। प्रत्येक सहभागी को मात्र ३००/- का अंशदान रचनाएँ स्वीकृत होने के बाद भेजना होगा। प्रत्येक सहभागी को २-२ प्रतियाँ निशुल्क दी जाएँगी। इच्छुक लघुकथाकार  नीचे  टिप्पणी में नाम-पता, चलभाष (मोबाइल) क्रमांक अंकित कर सकते हैं अथवा ९४२५१८३२४४ पर बात कर सकते हैं। हमति व सामग्री भेजने हेतु ईमेल: salil.sanjiv@gmail.com, roy. kanta@gmail.com इच्छुक लघुकथाकार  ९४२५१८३२४४ या ९५७५४६५१४७ पर संयोजकों से बात कर सकते हैं।

narmada vandana



 





मुक्तक
कान्ति शुक्ला
*








गौरव पुनीत अविरल प्रवाह ।
निर्मित करती निज श्रेष्ठ राह ।
रेवा के विमल धवल जल में-
नूतन रस-सागर है अथाह.।
*
नीरव निसर्ग की मुखर प्राण ।
गुंजित कल-छल के मधुर गान ।
ऐश्वर्यमयी महिमा शालिनी-
चिर नवल नर्मदा लो प्रणाम ।
*
भक्ति हो भावुक जनों की ।
शक्ति हो साधक जनों की ।
विपुल वैभव से अलंकृत-
शांति सुख भौतिक जनों की ।
*
यह जयंती हो चिरंतन ।
स्वप्न रच लें नित्य नूतन ।
भूखंड की श्रृंगार तुम-
हो अलौकिक और पावन ।
***

गीत
कान्ति शुक्ला
*
शिवधाम अमरकंटक से आकर निर्बाधित बहना ।
नर्मदे तुम्हीं से सीखा भूतल पर जन ने रहना ।
*
तुम कोमल सी कल-कल में अपना इतिहास सुनातीं.।
कूलों की रोमावलियाँ सुन कर पुलकित हो जातीं ।
प्राणों की हर धड़कन में लहरों का गीत मचलना ।
*
नर्मदे तुम्हें देते हैं शीतल छाया निज तरुवर.।
आलिंगन नित करते हैं तव कंठहार बन गिरिवर ।
तुमने हर पल चाहा है मानव को पावन करना ।
*
चिर ऋणी देश है रेवा गरिमा से पूरित तुमसे ।
ऋषि-मुनियों सच्चे संतों की महिमा मंडित तुमसे।
उल्लसित धरणि है कहती, तुमसे सुख वैभव मिलना ।
*
पथ के पाहन छूने से पावन हो पूजे जाते।
जिस स्थल पर चरण पड़ें तव, वे घाट अमर हो जाते।
मोहक श्रद्धालु जनों का, है दीप समर्पित करना।
***








*

सोमवार, 20 फ़रवरी 2017

samiksha

पुस्तक चर्चा -
नियति निसर्ग : दोहा दुनिया का नया रत्न 
चर्चाकार- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' 
[पुस्तक परिचय- नियति निसर्ग, दोहा संग्रह, प्रो. श्यामलाल उपाध्याय, प्रथम संस्करण, २०१५, आकार २२.५ से.मी. x १४.५ से.मी., आवरण सजिल्द, जैकेट सहित, पृष्ठ १२६, मूल्य १३०/-, प्रकाशक भारतीय वांग्मय पीठ, लोकनाथ कुञ्ज, १२७/ए/८ ज्योतिष राय मार्ग, नया अलीपुर कोलकाता ७०००५३] 
                                 विश्व वाणी हिंदी के छंद कोष के सर्वाधिक प्रखर और मूल्यवान दोहा कक्ष को अलंकृत करते हुए श्रेष्ठ-ज्येष्ठ शारदा-सुत प्रो. श्यामलाल उपाध्याय ने अपने दोहा संकलन रूपी रत्न 'नियति निसर्ग' प्रदान किया है. नियति निसर्ग एक सामान्य दोहा संग्रह नहीं है, यह सोद्देश्य, सारगर्भित,सरस, लाक्षणिक अभिव्यन्जनात्मकता से सम्पन्न दोहों की ऐसी रसधार प्रवाहित का रहा है जिसका अपनी सामर्थ्य के अनुसार पान करने पर प्रगाढ़ रसानंद की अनुभूति होती है. 

                                 प्रो. उपाध्याय विश्ववाणी हिंदी के साहित्योद्यान में ऐसे वट-वृक्ष हैं जिनकी छाँव में गणित जिज्ञासु रचनाशील अपनी शंकाओं का संधान और सृजन हेतु मार्गदर्शन पाते हैं. वे ऐसी संजीवनी हैं जिनके दर्शन मात्र से माँ भारती के प्रति प्रगाढ़ अनुराग और समर्पण का भाव उत्पन्न होता है. वे ऐसे साहित्य-ऋषि हैं जिनके दर्शन मात्र से श्नाकों का संधान होने लगता है. उनकी ओजस्वी वाणी अज्ञान-तिमिर का भेदन कर ज्ञान सूर्य की रश्मियों से साक्षात् कराती है. 

                                 नियति निसर्ग का श्री गणेश माँ शारदा की सारस्वत वन्दना से होना स्वाभाविक है. इस वन्दना में सरस्वती जी के जिस उदात्त रूप की अवधारणा ही, वह अन्यत्र दुर्लभ है. यहाँ सरस्वती मानवीय ज्ञान की अधिष्ठात्री या कला-संगीत की आदि शक्ति इला ही नहीं हैं अपितु वे सकल विश्व, अंतरिक्ष, स्वर्ग और ब्रम्ह-लोक में भी व्याप्त ब्रम्हाणी हैं. कवि उन्हें अभिव्यक्ति की देवी कहकर नमन करता है. 
'विश्वपटल पर है इला, अन्तरिक्ष में वाणि 
कहीं भारती स्वर्ग में, ब्रम्ह-लोक ब्रम्हाणि' 

                                 'घर की शोभा' धन से नहीं कर्म से होती है. 'कर्मण्ये वाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन' की विरासत नयी पीढ़ी के लिए श्लाघ्य है- 
'लक्ष्मी बसती कर्म में, कर्म बनता भाग्य 
भाग्य-कर्म संयोग से, बन जाता सौभाग्य' 

                                 माता-पिता के प्रति, शिशु के प्रति, बाल विकास, अवसर की खोज, पाठ के गुण विशेष, शिक्षक के गुण, नेता के गुण, व्यक्तित्व की परख जैसे शीर्षकों के अंतर्गत वर्णित दोहे आम आदमी विशेषकर युवा, तरुण, किशोर तथा बाल पाठकों को उनकी विशिष्टता और महत्त्व का भान कराने के साथ-साथ कर्तव्य और अधिकारों की प्रतीति भी कराते हैं. दोहाकार केवल मनोरंजन को साहित्य सृजन का लक्ष्य नहीं मानता अपितु कर्तव्य बोध और कर्म प्रेरणा देते साहित्य को सार्थक मानता है. 

                                 राष्ट्रीयता को साम्प्रदायिकता मानने के वर्तमान दौर में कवि-ऋषि राष्ट्र-चिंतन, राष्ट्र-धर्म, राष्ट्र की नियति, राष्ट्र देवो भव, राष्ट्रयता अखंडता, राष्ट्रभाषा हिंदी का वर्चस्व, देवनागरी लिपि आदि शीर्षकों से राष्ट्रीय की ओजस्वी भावधारा प्रवाहित कर पाठकों को अवगाहन करने का सुअवसर उपलब्ध कराते हैं. वे सकल संतापों का निवारण का एकमात्र मार्ग राष्ट्र की सुरक्षा में देखते हैं. 
आदि-व्याधि विपदा बचें, रखें सुरक्षित आप 
सदा सुरक्षा देश की, हरे सकल संताप 

                                 हिंदी की विशेषता को लक्षित करते हुए कवि-ऋषि कहते हैं- 
हिंदी जैसे बोलते, वैसे लिखते आप 
सहज रूप में जानते, मिटते मन के ताप 

हिंदी के जो शब्द हैं, रखते अपने अर्थ 
सहज अर्थ वे दे चलें, जिनसे हो न अनर्थ 

बस हिंदी माध्यम बने, हिंदी का हो राज 
हिंदी पथ-दर्शन करे, हिंदी हो अधिराज 

हिंदी वैज्ञानिक सहज, लिपि वैज्ञानिक रूप 
इसको सदा सहेजिए, सुंदर स्निग्ध स्वरूप

तकनीकी सम्पन्न हों, माध्यम हिंदी रंग 
हिंदी पाठी कुशल हों, रंग न होए भंग  

                                 देवनागरी लिपि शीर्षक से दिए दोहे भारत के इतिहास में हिंदी के विकास को शब्दित करते हैं. इस अध्याय में हिंसी सेवियों के अवदान का स्मरण करते हुए ऐसे दोहे रचे गए हैं जो नयी पीढ़ी का विगत से साक्षात् कराते हैं. 

                                 संत कबीर, महाबली कर्ण, कविवर रहीम, आचार्य महावीर प्रसाद द्विवेदी, मौनी बाबा तथा श्रीकृष्ण पर केन्द्रित दोहे इन महान विभूतियों को स्मरण मात्र नहीं करते अपितु उनके अवदान का उल्लेख कर प्रेरणा जगाने का काम भी करते हैं. 
कबीर का गुरु एक है, राम नाम से ख्यात 
निराकार निर्गुण रहा, साई से प्रख्यात 

जब तक स्थापित रश्मि है, गंगा जल है शांत 
रश्मिरथी का यश रहे, जग में सदा प्रशांत 

ऐसा कवि पायें विभो, हो रहीम सा धीर 
ज्ञानी दानी वुगी हो, युद्ध क्षेत्र का वीर 

महावीर आचार्य हैं, क्या द्विवेद प्रसाद 
शेरश जागरण काल के, विषय रहा आल्हाद 

मौनी बाबा धन्य हैं, धन्य आप वरदान 
जनमानस सुख से रहे, यही बड़ा अवदान 

                                 भारत कर्म प्रधान देश है. यहाँ शक्ति की भक्ति का विधान सनातन काल से है. गीता का कर्मयोग भारत ही नहीं, सकल विश्व में हर काल में चर्चित और अर्चित रहा है. सकल कर्म प्रभु को अर्पित कर निष्काम भाव से संपादित करना ही श्लाघ्य है- 
सौंपे सरे काज प्रभु, सहज हुए बस जान 
सारे संकट हर लिए, रख मान तो मान 

कर्म कराता धर्म है, धर्म दिलाता अर्थ 
अर्थ चले बहु काम ले, यह जीवन का मर्म 

                                 जातीय छुआछूत ने देश की बहुत हानि की है. कविगुरु कर्माधारित वर्ण व्यवस्था के समर्थक हैं जिसका उद्घोष गीत में श्रीकृष्ण 'चातुर्वर्ण्य माया सृष्टं गुण-कर्म विभागश:' कहकर करते हैं. 
वर्ण व्यवस्था थी बनी, गुणवत्ता के काज 
कुलीनता के अहं ने, अपना किया अकाज 

घृणा जन्म देती घृणा, प्रेम बढ़ाता प्रेम 
इसीलिए तुम प्रेम से, करो प्रेम का नेम 

                                 सर्वधर्म समभाव के विचार की विवेचना करते हुए काव्य-ऋषि धर्म और संप्रदाय को सटीकता से परिभाषित करते हैं- 
होता धर्म उदार है, संप्रदाय संकीर्ण 
धर्म सदा अमृत सदृश, संप्रदाय विष-जीर्ण 

                                 कृषि प्रधान देश भारत में उद्योग्व्र्धक और कृषि विरोधी प्रशासनिक नीतियों का दुष्परिणाम किसानों को फसल का समुचित मूल्य न मिलने और किसानों द्वारा आत्म हत्या के रूप में सामने आ रहा है. कवी गुरु ने कृषकों की समस्या का जिम्मेदार शासन-प्रशासन को ही माना है-
नेता खेलें भूमि से, भूमिग्रहण व्यापार
रोके इसको संहिता, चाँद लगाये चार 

रोटी के लाले पड़े, कृषक भूमि से हीन 
तडपे रक्षा प्राण को, जल अभाव में मीन 

                                 दोहे गोशाला के भी ग्रामीण अर्थव्यवस्था और किसान की दुर्दशा को बताते हैं. कवी गौ और गोशाला की महत्ता प्रतिपादित करते हैं-
गो में बसते प्राण हैं, आशा औ' विश्वास 
जहाँ कृष्ण गोपाल हैं, करनी किसकी आस 

गोवध अनुचित सर्वथा, औ संस्कृति से दूर 
कर्म त्याज्य अग्राह्य है, दुर्मत कुत्सित क्रूर 

                                 राष्ट्र के प्रति कर्तव्य, स्वाधीनता की नियति, मादक द्रव्यों के दुष्प्रभाव, चिंता, दुःख की निरंतरता, आत्मबोध तत्व, परमतत्व बोध, आशीर्वचन, संस्कार, रक्षाबंधन, शिवरात्रि, श्रीकृष्ण जन्माष्टमी आदि शीर्षकों के अंतर्गत दिए गए दोहे पाठकों का पाठ प्रदर्शन करने क साथ शासन-प्रशासन को भी दिशा दिखाते हैं. पुस्तकांत में 'प्रबुद्ध भारत का प्रारूप' शीर्षक से कविगुरु ने अपने चिंतन का सार तत्व तथा भविष्य के प्रति चिंतन-मंथन क नवनीत प्रस्तुत किया है- 
सत्य सदा विजयी रहा, सदा सत्य की जीत 
नहीं सत्य सम कुछ जगत, सत्य देश का गीत 

सभी पन्थ हैं एक सम, आत्म सन्निकट जान
आत्म सुगंध पसरते, ईश्वर अंश समान

बड़ी सोच औ काम से, बनता व्यक्ति महान 
       चिंतन औ आचार हैं, बस उनके मन जान   
    
                                 किसी कृति का मूल्याङ्कन विविध आधारों पर किया जाता है. काव्यकृति का सर्वाधिक महत्वपूर्ण पक्ष उसका कथ्य होता है. विवेच्य ८६ वर्षीय कवि-चिन्तक के जीवनानुभवों का निचोड़ है. रचनाकार आरंभ में कटी के शिल्प के प्रति अत्यधिक सजग होता है क्योंकि शिल्पगत त्रुटियाँ उसे कमजोर रचनाकार सिद्ध करती हैं. जैसे-जैसे परिपक्वता आती है, भाषिक अलंकरण के प्रति मोह क्रमश: कम होता जाता है. अंतत: 'सहज पके सो मीठा होय' की उक्ति के अनुसार कवि कथ्य को सरलतम रूप में प्रस्तुत करने लगता है. शिल्प के प्रति असावधानता यत्र-तत्र दिखने पर भी कथ्य का महत्व, विचारों की मौलिकता और भाषिक प्रवाह की सरलता कविगुरु के संदेश को सीधे पाठक के मन-मस्तिष्क तक पहुँचाती है. यह कृति सामान्य पाठक, विद्वज्जनों, प्रशासकों, शासकों, नीति निर्धारकों तथा बच्चों के लिए समान रूप से उपयोगी है. यही इसका वैशिष्ट्य है. 
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-समन्वयम 204 विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, सुभद्रा वार्ड, जबलपुर ४८२००१ 
चलभाष: ९४२५१८३२४४, salil.sanjiv@gmail.com
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रविवार, 19 फ़रवरी 2017

doha

दोहा सलिला
*
मधुशाला है यह जगत, मधुबाला है श्वास
वैलेंटाइन साधना, जीवन है मधुमास
*
धूप सुयश मिथलेश का, धूप सिया का रूप
याचक रघुवर दान पा, हर्षित हो हैं भूप
*

शनिवार, 18 फ़रवरी 2017

doha

दोहा दुनिया
*
राजनीति है बेरहम, सगा न कोई गैर
कुर्सी जिसके हाथ में, मात्र उसी की खैर
*
कुर्सी पर काबिज़ हुए, चेन्नम्मा के खास
चारों खाने चित हुए, अम्मा जी के दास
*
दोहा देहरादून में, मिला मचाता धूम
जितने मतदाता बने, सब है अफलातून
*
वाह वाह क्या बात है?, केर-बेर का संग
खाट नहीं बाकी बची, हुई साइकिल तंग
*
आया भाषणवीर है, छाया भाषणवीर
किसी काम का है नहीं, छोड़े भाषण-तीर
*
मत मत का सौदा करो, मत हो मत नीलाम
कीमत मत की समझ लो, तभी बनेगा काम
*
एक मरा दूजा बना, तीजा था तैयार
जेल हुई चौथा बढ़ा, दो कुर्सी-गल हार
*
१८-२- २०१७

shubhra saxena

स्कूटी से घूमकर महिला DM ने जगाई ऐसी अलख कि UP में अमरोहा ने तोड़ा मतदान का रिकॉर्ड

शुभ्रा सक्सेना का कमाल-  अमरोहा में रिकॉर्ड मतदान  

अमरोहा। जिलों में लीक से हटकर काम करने के लिए हमेशा शासन से शाबासी पाने वालीं यूपी की आईएएस डीएम शुभ्रा सक्सेना ने विधानसभा चुनाव में भी अनूठा काम कर दिखाया। अमरोहा जैसे जिले में मतदान के लिए गजब की जागरूकता पैदा की। कई दिन सुबह-शाम स्कूटी लेकर जागरूकता रैलियां निकालीं। प्रशासनिक अमले के साथ कस्बों से लेकर गांव तक पहुंचीं। लोगों को उनके एक वोट की कीमत समझाकर हर हाल में मतदान के लिए राजी किया। नतीजा रहा कि जब दूसरे चरण का मतदान हुआ तो अमरोहा ने यूपी में सबको पीछे छोड़ दिया। रिकॉर्ड 72 प्रतिशत मतदान हुआ। जबकि पहले और दूसरे चरण के बाकी जिलों में 70 फीसदी से कम मतदान हुआ। हालांकि पिछले चुनाव की तुलना में इस बार सभी जिलों में औसतन पांच प्रतिशत मतदान में इजाफा हुआ है। यूपी में शुभ्रा सक्सेना उन आईआईएस में शुमार हैं, जो कि हमेशा अपने तैनाती वाले जिलों में इनोवेशन के लिए चर्चा में रहते हैं। शाहजहांपुर में प्राथमिक शिक्षा के सुधार सहित कई प्रोग्राम चलाने को लेकर शुभ्रा सुर्खियों में रहीं।
महिलाओं ने पुरुषों को पीछे छोड़ दिया
डीएम शुभ्रा सक्सेना ने रिकॉर्ड मतदान पर खुशी जाहिर की। कहा कि यह बताते हुए और खुशी हो रही है कि जिले की महिलाओं ने वोटिंग में पुरुषों को पीछे छोड़ दिया। महिलाओं ने जहां 73.94 प्रतिशत मतदान किया वहीं पुरुषों ने 70.99। जिले का औसत मतदान 72.28 प्रतिशत रहा। नौगांव विधानसभा में 77 प्रतिशत महिलाओं ने मताधिकार का प्रयोग किया। इसी तरह धनौरा, , अमरोहा, हसनपुर में भी जमकर मतदान हुआ।

शुभ्रा का मॉडल आयोग ने अपनाया
पोलिंग पार्टियों की रवानगी से लेकर ईवीएम जमा करने की व्यवस्था को सुचारु और आसान करने के लिए शुभ्रा सक्सेना ने मॉडल प्लान तैयार किया था। इसमें एक हेल्प डेस्क से सभी मतदान कार्मिकों को हर जानकारी मिलने की व्यवस्था रही तो ईवीएम मशीन सहित सभी चुनाव सामग्री के लिए अलग-अलग काउंटर खोले गए। जहां एलईडी स्क्रीन पर टोकन नंबर की व्यवस्था रखी गई। ताकि पोलिंग पार्टियां बिना धक्का-मुक्की के निर्वाचन सामग्री प्राप्त कर सकें। यह मॉडल आयोग ने अपनाते हुए सभी जिलों को लागू करने को कहा।
आईआईटियन शुभ्रा सक्सेना रहीं हैं आईएएस टॉपर
शुभ्रा सक्सेना अपने आप में एक मिसाल हैं। आईआईटी रुड़की से बीटेक करने के बाद शुभ्रा सक्सेना को मल्टीनेशनल कंपनी में मोटे पैकेज पर जॉब मिल गई। मगर शुभ्रा को लगा कि इंजीनियर होने के बाद भी जिंदगी में कुछ मिस कर रहीं हैं। फिर अचाकन से प्रशासनिक अफसर बनने का ख्याल आया। इस बीच शुभ्रा की शादी हो गई। नौकरी और शादी के बाद घर-गृहस्थी बस जाने के बाद भी शुभ्रा सक्सेना ने अपने अंदर के स्टूडेंट की भावना खत्म नहीं होने दी। फिर से सिविल सर्विसेज की तैयारी में जुट गईं। 2009 में शुभ्रा ने कमाल कर दिया। जब परीक्षा परिणाम आया तो शुभ्रा ने पूरे देश में टॉप कर दिया।
पहले चरण की पोलिंग का हाल- हापुड़: 69.8%, आगरा: 63.94%, एटा: 68%, अलीगढ: 65%, हाथरस: 61%, गाजियाबाद: 57%, मथुरा: 68.30%, मेरठ: 65%, शामली: 62%, बुलंदशहर: 64%, फिरोजाबाद: 61%, कासगंज: 64%, बागपत: 65%, नोएडा: 60%, मुजफ्फरनगर: 65%
दूसरा चरण- अमरोहा-72.28 %, बिजनौर: 72.28.00%, मुरादाबाद: 64.30%, सहारनपुर: 71.00%, शाहजहांपुर: 59.47%, बरेली: 62.17%, रामपुर: 61.5%, लखीमपुर: 62.25%, पीलीभीत: 65.62%, अमरोहा: 69.00%, संभल: 65.00%, बदायूं: 60.00%

गुरुवार, 16 फ़रवरी 2017

muktika, upendra vajra

मुक्तिका
वार्णिक छंद उपेन्द्रवज्रा –
मापनी- १२१ २२१ १२१ २२
सूत्र- जगण तगण जगण दो गुरु
तुकांत गुरु, पदांत गुरु गुरु
*
पलाश आकाश तले खड़ा है
उदास-खो हास, नहीं झुका है

हजार वादे कर आप भूले
नहीं निभाए, जुमला कहा है

सियासती है मनुआ हमारा
चचा न भाए, कर में छुरा है

पड़ोस में ही पलते रहे हो
मिलो न साँपों, अब मारना है

तुम्हें दई सौं, अब तो बताओ
बसंत में कंत कहाँ छिपा है
*

subhramar doha

सुभ्रामर दोहा 
[२७ वर्ण, ६ लघु, २१ गुरु]
*
छोटी मात्रा छै रहें, दोहा ले जी जीत
सुभ्रामर बोलें इसे, जैसे मन का मीत
*
मैया राधा द्रौपदी, हेरें-टेरें खूब
आता जाता सताता, बजा बाँसुरी खूब
*
दादा दादी से कहें, पोते हैं नादान
दादी बोलीं- 'पोतियाँ, शील-गुणों की खान
*
कृष्णा सी मानी नहीं, दानी कर्ण समान
मीरा सी साध्वी कहाँ, कान्हा सी संतान
*
क्या लाया?, ले जाय क्या?, क्यों जोड़ा है व्यर्थ?
ज्यों का त्यों है छोड़ना, तो क्यों किया अनर्थ??
*
पाना खोना दें भुला, देख रहा अज्ञेय
हा-हा ही-ही ही नहीं, है साँसों का ध्येय
*
टोटा है क्यों टकों का, टकसालों में आज?
छोटा-खोटा मूँड़ पे, बैठा पाए राज
*
भोला-भाला देव है, भोला-भाला भक्त
दोनों दोनों से कहें, मैं तुझसे संयुक्त
*
देवी देवी पूजती, 'माँगो' माँगे माँग
क्या माँगे कोई कहे?, भरी हुई है माँग
*
माँ की माँ से माँ मिली, माँ से पाया लाड़
लाड़ो की लाड़ो लड़ी, कौन लड़ाए लाड़?
***

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2017

bhramar doha

दोहा सलिला
*
[भ्रमर दोहा- २६ वर्ण, ४ लघु, २२ गुरु]

मात्राएँ हों दीर्घ ही,  दोहा में बाईस
भौंरे की गुंजार से, हो भौंरी को टीस
*
फैलुं फैलुं फायलुं, फैलुं फैलुं फाय
चोखा दोहा भ्रामरी, गुं-गुं-गुं गुंजाय
*
श्वासें श्वासों में समा, दो हो पूरा काज, 
मेरी ही तो हो सखे, क्यों आती है लाज?
*
जीते-हारे क्यों कहो?, पूछें कृष्णा नैन
पाँचों बैठे मौन हो, क्या बोलें बेचैन?
*
तोलो-बोलो ही सही, सीधी सच्ची रीत
पाया-खोने से नहीं, होते हीरो भीत
*
नेता देता है सदा, वादों की सौगात
भूले से माने नहीं, जो बोली थी बात
*
शीशा देखे सुंदरी, रीझे-खीझे मुग्ध
सैंया हेरे दूर से, अंगारे सा दग्ध
*
बोले कैसे बींदड़ी, पाती पाई आज
सिंदूरी हो गाल ने, खोला सारा राज
*
चच्चा को गच्चा दिया, बच्चा ऐंठा खूब
सच्ची लुच्चा हो गया, बप्पा बैठा डूब
*
बुन्देली आल्हा सुनो, फागें भी विख्यात
राई का सानी नहीं, गाओ जी सें तात
*

valentine


लघु कथा
वैलेंटाइन
*
'तुझे कितना समझाती हूँ, सुनता ही नहीं. उस छोरी को किसी न किसी बहाने कुछ न कुछ देता रहता है. इतने दिनों में तो बात आगे बढ़ी नहीं. अब तो उसका पीछा करना छोड़ दे'
"क्यों छोड़ दूँ? तेरे कहने से रोज सूर्य को जल देता हूँ न? फिर कैसे छोड़ दूँ?" 'सूर्य को जल देने से इसका क्या संबंध?'
"हैं न, देख सूर्य धरती को धूप की गिफ्ट देकर प्रोपोज करता हैं न? धरती माने या न माने सूरज धूप देना बंद तो नहीं करता. मैं सूरज की रोज पूजा करूँ और उससे इतनी सी सीख भी न लूँ कि किसी को चाहो तो बदले में कुछ न चाहो, तो रोज जल चढ़ाना व्यर्थ हो जायेगा न? सूरज और धरती की तरह मुझे भी मनाते रहना है वैलेंटाइन."
***

सोमवार, 13 फ़रवरी 2017

samaroh

अखिल भारतीय गीतिका काव्योत्सव् एवं सम्मान समारोह








भोपाल २१२-२-२०१७. स्वराज भवन भोपाल में अखिल भारतीय गीतिका काव्योत्सव् एवं सम्मान समारोह के प्रथम सत्र में संक्षिप्त वक्तव्य के साथ तुरंत रची मुक्तिका का मुक्तक का पाठ किया-

गीतिका उतारती है भारती की आरती
नर्मदा है नेह की जो विश्व को है तारती

वास है 'कैलाश' पे 'उमेंश' को नमन करें
'दीपक' दें बाल 'कांति' शांति-दीप धारती

'शुक्ल विश्वम्भर' 'अरुण' के तरुण शब्द
दृगों में समंदर है गीतिका पुकारती

मुक्तिका मनोरम है शोभा 'मुख पुस्तक' की
घनश्याम अभिराम हो अखंड भारती

गीतिका है मापनी से युक्त-मुक्त दोनों ही
छवि है बसंत की अनंत जो सँवारती
*
मुक्तक
अपनी जड़ों से टूटकर मत अधर में लटकें कभी
गोद माँ की छोड़कर परिवेश में भटकें नहीं
जो हित सहित है सर्व के साहित्य है केवल वही
रच कल्पना में अल्पना रस-भाव-लय का संतुलन
*
मुख पुस्तक पर पढ़ रहे, मन के अंतर्भाव
रच-पढ़-बढ़ते जो सतत, रखकर मन में चाव
वे कण-कण को जोड़ते, सन्नाटे को तोड़
क्षर हो अक्षर का करे, पूजन 'सलिल' सुभाव
***
टीप- श्री कैलाश चंद्र पंत मंत्री राष्ट्र भाषा प्रचार समिति विशेष अतिथि, डॉ. उमेश सिंह अध्यक्ष साहित्य अकादमी म. प्र. मुख्य अतिथि, डॉ. देवेन्द्र दीपक निदेशक निराला सर्जन पीठ अध्यक्ष , डॉ. कांति शुक्ल प्रदेश अध्यक्ष मुक्तिका लोक, डॉ. विश्वम्भर शुक्ल संयोजक मुक्तक लोक, अरुण अर्णव खरे संयोजक, घनश्याम मैथिल 'अमृत', अखंड भारती संचालक, बसंत शर्मा अतिथि कवि.
***

भोपाल २१२-२-२०१७. स्वराज भवन भोपाल में अखिल भारतीय गीतिका काव्योत्सव् एवं सम्मान समारोह के द्वितीय सत्र की अध्यक्षता की. लगभग ३५ कवियों द्वारा काव्य पाठ में निर्धारित से अधिक समय लेने का मोह न छोड़ने और सभागार रिक्त करने की बाध्यता के कारण अध्यक्षीय वक्तव्य न देकर तुरंत रची मुक्तिका का पाठ किया. क्या कविगण निर्धारित से अधिक समय लेने की लत छोड़ेंगे???
गीतिका है मनोरम सभी के लिये 
दृग में है रस समुंदर सभी के लिए

सत्य, शिव और सुंदर सृजन नित करें 
नव सृजन मंत्र है यह सभी के लिए

छंद की गंधवाही मलय हिन्दवी 
भाव-रस-लय सुवासित सभी के लिए

बिम्ब-प्रतिबिम्ब हों हम सुनयने सदा 
साध्य है, साधना है, सभी के लिए
भाव ना भावना, काम ना कामना 
तालियाँ अनगिनत गीतिका के लिए
गीत गा गीतिका मु क्तिका से कहे 
तेवरी, नव गजल है सभी के लिए 
 ***

शुक्रवार, 10 फ़रवरी 2017

gyarah matrik chhand


ग्यारह मात्रिक छंद
१. पदादि यगण
यही चाहा हमने
नहीं टूटें सपने
शहीदी विरासतें
न भूलें खुद अपने
*
२. पदादि मगण
आओ! लें गले मिल
भाओ तो मिले दिल
सीचेंगे चमन मिल
फूलों सम खिलें दिल
*
३. पदादि तगण
सच्चा बतायें जो
झूठा मिटायें जो
चाहें मिलें नेता
वादे निभायें जो
*
४. पदादि रगण
आपकी चाहों में
आपकी बाँहों में
जिंदगी है पूजा
आपकी राहों में
*
५. पदादि जगण
कहीं नहीं हैवान
कहीं नहीं भगवान
दिखा ह्रदय में झाँक
वहीँ बसा इंसान
*
६. पदादि भगण
आपस में बात हो
रोज मुलाकात हो
संसद में दूरियाँ
व्यर्थ न बेबात हों
*
७. पदादि नगण
सब अधरों पर हास
अब न हँसेंगे ख़ास
हर जन होगा आम
विनत रचें इतिहास

*
८. पदादि सगण
करना मत बहाना
तजना मत ठिकाना
जब तक वयस्क न हो
बिटिया मत बिहाना
*
९. पदांत यगण
हरदम हम बुलाएँ
या आप खुद आयें
कोई न फर्क मानें
१०. पदांत मगण
आस जय बोलेगी
रास रस घोलेगी
प्यास बुझ जाएगी
श्वास चुप हो लेगी
.
मीत! आ जाओ ना
प्रीत! भा जाओ ना
चैन मिल जायेगा
गीत गा जाओ ना
*
११. पदांत तगण
रंगपंचमी पर्व
धूम मचाते सर्व
दीन न कोई जान
भूल, भुला दें गर्व
.
हो मस्ती में लीन
नाच बज रही बीन
वेणी-नागिन झूम
नयन हो रहे मीन
.
बाँके भुज तलवार
करते नहीं प्रहार
सविनय माँगें दान
सुमुखी-भुजा का हार
.
मिले हार हो जीत
मिले प्रीत को प्रीत
द्वैत बने अद्वैत
बजे श्वास संगीत
*
१२. पदांत रगण
गीत प्रीत के सुना
गीत मीत के सुना
      हार में न हार हो
      जीत में न जीत हो
      शुभ अतीत के सुना
      गीत रीत के सुना
यार हो, जुहार हो
प्यार हो, विहार हो
नव प्रतीति के सुना
गीत नीति के सुना
      हाथ नहीं जोड़ना
      साथ नहीं छोड़ना
      बातचीत के सुना
      गीत जीत के सुना
*
१३. पदांत जगण
जनगण की सरकार
जन संसद दरबार
रीती-नीति-सहयोग
जनसेवा दरकार
देशभक्ति कर आप
रखें स्वच्छ घर-द्वार
पर्यावरण न भूल
पौधारोपण प्यार
धुआँ-शोर अभिशाप
बहे विमल जल-धार
इस पल में इनकार
उस पल में इकरार
नकली है तकरार
कर असली इज़हार
*
१४. पदांत भगण
जिंदगी जलसा घर
बन्दगी जल सा घर
प्रार्थना कर, ना कर
साधना कर ही कर
अर्चना नित प्रति कर
वन्दना हो सस्वर
भावना यदि पवन
कामना से मत डर
कल्पना नवल अगर
मान ले अजरामर
*
१५. पदांत नगण
नटनागर हों सदय
कर दें पल में अभय
शंका हर जग-जनक
कर दें मन को अजय
.
पान कर सकें गरल
हो स्वभाव निज सरल
दान कर सकें अमिय
जग-जीवन हो विमल
.
नेह नर्मदा अमर
जय कट जीवन समर
करे द्वेष अहरण
भरे प्रीत चिर अमर
*
१६. पदांत सगण
पत्थर को फोड़ लें
ईंटों को जोड़ लें
छोड़ें मत राह को
कदमों को मोड़ लें
नाहक क्यों होड़ लें?
मंजिल क्यों छोड़ दें?
डरकर संघर्ष से
मन को क्यों तोड़ लें?
       .
सत्य जो हो कहिए
झूठ को मत तहिए
घाट पर रुकिए मत
नर्मदा बन बहिए
रीत नित नव गढ़िए
नीत-पथ पर बढ़िए
सीढ़ियाँ मिल चढ़िए
प्रणय-पोथी पढ़िए
*
१७. पदादि-पदांत यगण
उसे गीत सुनाना
उसे मीत बनाना
तुझे चाह रहा जो
उसे प्रीत जताना
.
सुनें गीत सुनाएँ
नयी नीत बनायें
नहीं दर्द जरा हो
लुटा दें सुख पायें
*
१८. पदादि यगण, पदांत मगण
हमें ही है आना
हमें ही है छाना
बताता है नेता
सताता है नेता
*
१९. पदादि मगण पदांत यगण
चाहेंगे तुम्हें ही
वादा है हमारा
भाए हैं तुम्हें भी
स्वप्नों में पुकारा
*
२०. पदादि मगण पदांत तगण
सारे-नारे याद
नेता-प्यादे याद
वोटों का है खेल
वोटर-वादे याद

muktak

मुक्तक
मुक्त मन से लिखें मुक्तक
सुप्त को दें जगा मुक्तक
तप्त को शीतल करेंगे
लुप्त को लें बुला मुक्तक
*

muktak

मुक्तक
मुझसे मेरे गीत न माँगो
प्रिय पहले सी प्रीत न माँगो
मन वीणा को झंकृत कर तुम
साँसों का संगीत न माँगो
*

गुरुवार, 9 फ़रवरी 2017

das matrik chhand

दस  मात्रिक छंद
२५. १० लघु मात्रा
हर दम छल मत कर
शुभ तज, अशुभ न वर
पथ पर बढ़,  मत रुक
नित नव करतब कर
.
'सलिल' प्रवह कलकल
सुख गहकर पल-पल
रुक मत कल रख चल
मनुज न बन अब कल
*
२६. ८ लघु, १ गुरु
नित नर्तित नटवर
गुरु गर्वित गिरिधर
चिर चर्चित चंचल
मन हरकर मनहर
*
२७. ६ लघु, २ गुरु
नित महकती कली
खिल चहकती भली
ललच भँवरे मिले
हँस, बहकती कली
राह फिसलन भरी
झट सँभलती कली
प्रीत कर मत अभी
बहुत सँकरी गली
संयमित रह सदा
सुरभि देकर ढली
*
२८. ४ लघु, ३ गुरु
धन्य-धन्य शंकर
वन्दन संकर्षण
भोले प्रलयंकर
दृढ़ हो आकर्षण
आओ! डमरूधर
शाश्वत संघर्षण
प्रगटे गुप्तेश्वर
करें कृपा-वर्षण
.
हमें साथ रहना
मिला हाथ रहना
सुख-दुःख हैं सांझा
उठा माथ कहना
*
२९. २ लघु, ४ गुरु
बोलो, सच बोलो
पोल नहीं खोलो
सँग तुम्हारे जो
तुम भी तो हो लो
.
तू क्यों है बेबस?
जागो-भागो हँस
कोई देगा न साथ
सोते-रोते नाथ?
*
३०. ५ गुरु
जो चाहो बोलो
बातों को तोलो
झूठों को छोड़ा
सच्चे तो हो लो
.
जो होना है हो
रोकोगे? रोको
पाया खो दोगे
खोया पा लोगे
*

बुधवार, 8 फ़रवरी 2017

muktika

एक मुक्तिका
छंद- यौगिक जातीय विद्या छंद
मापनी- २१२२ २१२२ २१२२ २१२२
बहर- फाइलातुन x ४
*
फूलने दो बाग़ में गुंचे मिलेगी खूब खुश्बू
गीत गायेंगे ख़ुशी से झूम भौंरे देख जादू

कौन बोलेगा न झूमो? कौन चाहेगा न गाओ?
राह में राही मिलेंगे, थाम लेना हाथ ही तू

उम्र का ही है तकाजा लोग मानें या न मानें
जोश में होता कहाँ है होश?, होता है न काबू

आप नेता हैं, नहीं तो आपका कोई न चर्चा
आपकी पीड़ा न पीड़ा, फेंक एसिड, मार चाकू

सांसदों को खूब भत्ते और भूखों को न दाना
वाह रे आजाद लोगो! है न आज़ादी गुड़ाखू
***

doha

क्रिकेट के दोहे 
*
चहल-पहल कर चहल ने, खड़ी करी है खाट 
क्म्गेंदें ज्यादा विकेट, मारा धोबीपाट 
*
धोनी ने धो ही दिया, सब अंग्रजी ठाठ 
बल्ले-बल्ले कर रहा, बल्ला पढ़ लो पाठ 
*
रैना चैना छीनकर, नैना रहा तरेर 
ढेर हो गए सर झुका, सब अंग्रेजी शेर
*
है विराट के नाम की, है विराट ही धाक   
कुक ने स्तीफा दिया, हाय कट गयी नाक 

अंग्रेजों से छिन गया, ट्वंटी का भी ताज 
गोरी बाला वर जयी, हुए विहँस युवराज 
*
नेहरा गहरा वार कर, पहरा देता खूब 
विकट नहीं या रन नहीं, गए विपक्षी डूब 
***

das matik chhand

दस मात्रिक छंद
९. पदांत यगण
मनुआ! जग गा रे!
    प्राची रवि लाई
    ऊषा मुसकाई
    रहा टेर कागा
    पहुना सुधि आई
    विधना झट ला रे!
कुण्डी खटकाई
गोरी झट आई
अँखियाँ टकराईं
झुक-उठ शरमाईं
मुड़कर मात जारे!
    हुई मन मिलाई
    सुध-बुध बिसराई
    गयी खनक चूड़ी
ननदी झट आई
चट-पट छिप जा रे!
*
१०. पदांत मगण
मन क्यों आवारा?
जैसे बंजारा
हर दम चाहे हो
केवल पौबारा
*
११. पदांत तगण
ख्वाब में हैं आप
साथ में हैं आप
हम जहाँ मौजूद
न हों पर हैं आप
*
१२. पदांत रगण
बात जब कीजिए
साथ चल दीजिए
सच नहीं भी रुचे
तो नहीं खीजिए
कर मिलें, ना मिलें
मन मिला लीजिए
आँख से भी कभी
कुछ लगा पीजिए
नेह के नीर में
सँग नहा भीजिए
*
१३. पदांत जगण  ६+१२१
किसे कहें अनाथ?
सभी मनुज सनाथ
सबका ईश एक
झुकाएँ नित माथ
*
१४. पदांत भगण
लाया है सावन
त्यौहार सुपावन
मिल इसे मनायें
राखी मन भावन
.
सीमा पर दुर्जन
दें मार सैन्य जन
अरि के घर मातम
बोयेगा सावन
*
१५, पदांत नगण
जब से गए सजन
बेसुध सा तन-मन
दस दिश चहल-पहल
सूना मन-मधुवन
किया सतत सुमिरन
हर दिन, हर पल-छिन
पौधारोपण कर
जी पायें फिर वन
वह दिखता रहबर
हो न कहीं रहजन
*
१६. पदांत सगण
हमको है कहना
दूर नहीं रहना
चुप, कब तक पहनें
सुधियों का गहना?
मजबूरी अपनी
विरह व्यथा तहना
सलिला कब कहती
मुझे नहीं बहना?
मंगल मन रही
क्यों केवल बहना?
*
१७.  २ यगण
निहारो-निहारो
सितारों निहारो
सदा भारती की
करो आरती ही
हसीं चाँदनी को
धरा पर उतारो
सँवारो-सँवारो
धरा को सँवारो
१८. २ तगण
सीता वरें राम
सीता तजें राम
छोड़ें नहीं राग
सीता भजें राम
१९. २ रगण
आपसे काम ना
हो, यही कामना
गर्व का वास ना
हो, नहीं वासना
स्वार्थ को साध ना
छंद को साधना
माप की नाप ना
नाप ही नापना
उच्च हो भाव ना
शुद्ध हो भावना
*
२०. यगण तगण
कहीं है नीलाभ
कहीं है पीताभ
कपासी भी मेघ
कहीं क्यों रक्ताभ?
कड़े हो या नर्म
रहो जैसे डाभ  
सहेगा जो हानि
कमाएगा लाभ
२१. तगण यगण
वादा न निभाया
कर्जा न चुकाया
जोड़ा धन थोड़ा
मोहे मत माया
जो पुन्य कमाया
आ अंत भुनाया
ठानो न करोगे
जो काम न भाया
२१. यगण रगण
किये जाओ मजा
चली आती क़ज़ा
किया तो भोग भी
यही दैवी रजा
कहो तो स्वार्थ को
कभी क्या है तजा?
रही है सत्य की
सदा ऊँची ध्वजा
न बोले प्रेयसी
'मुझे क्या जा-न जा'
*
२२. रगण यगण
आपका सहारा
दे रहा इशारा
हैं यही मुरादें
साथ हो हमारा
दूर जा पुकारा
पास आ निहारा
याद है न वादा?
प्यार हो न कारा?
आँख में बसा है
रूप ये तुम्हारा
*
२३. तगण रगण २२१ २१२
आओ! कहीं चलें
बोलो कहाँ मिलें?
माँगें यही दुआ
कोई नहीं छले
*
२४. रगण तगण
आज का पैगाम
जीत पाए लाम
आपका सौभाग्य
आप आये काम
सोचते हैं लोग
है विधाता वाम
चाहिए क्यों पुण्य
कर्म है निष्काम
खूब पाया नाम
बात है ये ख़ास
प्रेरणा लें आम
*







दोहा

दोहा
रोज-प्रप्रोज पठा रहा, नाती कैसा काल?
पोता हो लव बर्ड तो, आ जाए भूचाल।।
*

maithily haiku

मैथिली हाइकु
*
स्नेह करब
हमर मंत्र अछि
गले लगबै
*

मंगलवार, 7 फ़रवरी 2017

mukatak, kundali, vimarsh

मुक्तक
मेटते रह गए कब मिटीं दूरियाँ?
पीटती ही रहीं, कब पिटी दूरियाँ?
द्वैत मिटता कहाँ, लाख अद्वैत हो
सच यही कुछ बढ़ीं, कुछ घटीं दूरियाँ
*
कुण्डलिया
जल-थल हो जब एक तो, कैसे करूँ निबाह
जल की, थल की मिल सके, कैसे-किसको थाह?
कैसे-किसको थाह?, सहायक अगर शारदे
संभव है पल भर में, भव से विहँस तार दे
कहत कवि संजीव, हरेक मुश्किल होती हल
करें देखकर पार, एक हो जब भी जल-थल
*
एक प्रश्न:
*
लिखता नहीं हूँ,
लिखाता है कोई
*
वियोगी होगा पहला कवि
आह से उपजा होगा गान
*
शब्द तो शोर हैं तमाशा हैं
भावना के सिंधु में बताशा हैं
मर्म की बात होंठ से न कहो
मौन ही भावना की भाषा है
*
हैं सबसे मधुर वो गीत जिन्हें हम दर्द के सुर में गाते हैं,
*
अवर स्वीटेस्ट सांग्स आर दोज विच टेल ऑफ़ सैडेस्ट थॉट.
*
जितने मुँह उतनी बातें के समान जितने कवि उतनी अभिव्यक्तियाँ
प्रश्न यह कि क्या मनुष्य का सृजन उसके विवाह अथवा प्रणय संबंधों से प्रभावित होता है? क्या अविवाहित, एकतरफा प्रणय, परस्पर प्रणय, वाग्दत्त (सम्बन्ध तय), सहजीवी (लिव इन), प्रेम में असफल, विवाहित, परित्यक्त, तलाकदाता, तलाकगृहीता, विधवा/विधुर, पुनर्विवाहित, बहुविवाहित, एक ही व्यक्ति से दोबारा विवाहित, निस्संतान, संतानवान जैसी स्थिति सृजन को प्रभावित करती है?
आपके विचारों का स्वागत और प्रतीक्षा है.