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गुरुवार, 30 अप्रैल 2009

संस्कृति चिन्तन: आइये! आर्य (श्रेष्ठ) बनें -सलिल

संस्कृति चिन्तन

॥ वृत्तेन आर्यो भवति ॥ आइये! आर्य (श्रेष्ठ) बनें

भारत की संस्कृति आदर्श प्रधान है. केवल भारत ही विश्व को आदर्शों को जीवंत और मूर्त करते हुए जीवन जीना सिखा सकता है. इस पुण्य भूमि पर हमेशा ही त्याग, बलिदान, निष्काम प्रेम, वैराग्य, समन्वय- सामंजस्य, ईश्वरानुराग, ज्ञान-विज्ञानं, तकनीक, धर्म एवं दर्शन का अध्ययन-अध्यापन और विविध प्रयोग होते रहे हैं

प्राणभूतञ्च यत्तत्त्वं सारभूतं तथैव च । संस्कृतौ भारतस्यास्य तन्मे यच्छतु संस्कृतम् ॥


"संस्कृत भारत भूमि की प्राणभूत व सारभूत भाषा है; संस्कृत के बिना भारत की भव्य संस्कृति, नीतिमूल्यों, और जीवनमूल्यों को यथास्वरुप समझना संभव नहीं ।


दुर्योगवश मानव सभ्यता का यह स्वर्णिम पृष्ठ देव भाषा संस्कृत में लिखा गया जिससे वर्तमान में जन सामान्य और विश्व लगभग अपरिचित है। वैदिक ऋचाओं, श्लोकों, सुभाषितों, बोध शास्त्रों, भाष्यों, पुराणों, उपनिषदों, नाट्य, इतिहास आदि श्रुति-स्मृति के सहारे संस्कृत वांग्मय (वेद, वेदांग, उपांग) अंततः अपने उद्गम ॐकार में विलीन हो जाता है. 'संस्कृत' रुपी राजमार्ग निसर्ग, विद्या, कला, धर्म, ईश्वर, और कर्मयोग ऐसे विविध स्वरुप लेते हुए अंतिमतः श्रुति (वेद, वेदांग और उपांग) और ॐकार में विलीन या व्याप्त हो जाता है. विश्व के अन्य भागों में सभ्यताओं के उदय से सदियों पूर्व भारत में ज्ञान-विज्ञानं के अद्वितीय साहित्य का सृजन हुआ. सुव्यवस्थित शासन प्रणाली के बिना यह कैसे संभव है? साहित्य साम्प्रत समाज का प्रतिबिम्ब ही नहीं मार्गदर्शक भी होता है किंतु समय के सत्य को न पहचानने, इतिहास से सीख न लेने, साहित्य के सनातन मूल्यों की अनदेखी कर निजी स्वार्थ को वरीयता देने से आगत अपने विनाश के बीज बोता है. त्रेता और द्वापर के समय और उसके बाद भारत में भी यही हुआ. मध्यकाल की पराजयों और सहस्र वर्षों की गुलामी से उपजी आत्म्हींत की मनोवृत्ति और वर्तमान भोग प्रधान क्षणजीवी जीवन पद्धति ने संस्कृति एवं संस्कृत की गरिमा को नष्ट:करने का प्रयत्न किया है किन्तु, भूतकाल में रौंदी गयी ज्ञान-भाषा को हमेशा दबाया या मिटाया नहीं जा सकता. 'संस्कृत' का सुसंस्कार हर भारतीय के हृदय में राख से ढँकी चिंगारी की तरह सुप्त होने से लुप्त होने का भ्रम पैदा करता है किंतु इस गुप्त चित्र के प्रगट होने में देर नहीं लगेगी यदि हम विवेकी जन संस्कृति और साहित्य का न केवल स्वयं अवगाहन करें अपितु अन्य जनों को भी प्रेरित कर सहायक बनें.

अग्रतः संस्कृतं मेऽस्तु पुरतो मेऽस्तु संस्कृतम् ।

संस्कृतं हृदये मेऽस्तु विश्वमध्येऽस्तु संस्कृतम् ॥

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भजन: गिरिजा पूजन... -स्व. शान्तिदेवी वर्मा.

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सिया फुलबगिया आई हैं

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

कमर करधनी, पांव पैजनिया, चाल सुहाई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

कुसुम चुनरी की शोभा लख, रति लजाई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

चंदन रोली हल्दी अक्षत माल चढाई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

दत्तचित्त हो जग जननी की आरती गाई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

फल मेवा मिष्ठान्न भोग को नारियल लाई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

लताकुंज से प्रगट भए लछमन रघुराई हैं।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

मोहनी मूरत देख 'शान्ति' सुध-बुध बिसराई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...

विधना की न्यारी लीला लख मति चकराई है।

गिरिजा पूजन सखियों संग सिया फुलबगिया आई हैं...


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गज़ल: मनु बेतखल्लुस, दिल्ली.

असर दिखला रहा है खूब, मुझ पे गुलबदन मेरा,

उसी के रंग जैसा हो चला है, पैराहन मेरा।

कोई मूरत कहीं देखी, वहीं सर झुक गया अपना

मुझे काफ़िर कहो बेशक, यही है पर चलन मेरा।

हजारों बोझ हैं रूह पर, मेरे बेहिस गुनाहों के,

तेरे अहसां से लेकिन दब रहा है, तन-बदन मेरा।

उस इक कूचे में मत देना बुलावे मेरी मय्यत के,

शहादत की वजह ज़ाहिर न कर डाले कफ़न मेरा।

मैं इस आख़िर के मिसरे में, जरा रद्दो-बदल कर लूँ

ख़फा वो हो ना बैठे, खूब समझे है सुखन मेरा।

मुझे हर गाम पर लूटा है, मेरे रहनुमाओं ने,

ज़रा देखूं के ढाए क्या सितम, अब राहजन मेरा।

यहाँ शोहरत-परस्ती है, हुनर का अस्ल पैमाना

इन्हीं राहों पे शर्मिंदा रहा है, मुझसे फन मेरा।

कभी आ जाए शायद हौसला, परबत से भिड़ने का,

ज़रा तुम नाम तो रख कर के देखो, कोहकन मेरा

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लघु कथा: चुनाव प्रचार - आभा झा

चुनाव प्रचार का माहौल गर्म था। सभी दलों के कार्यकर्ता अपने-अपने कार्य में जुटे थे।
किसी दल के कार्यकर्ता दूर-दराज़ के एक गाँव में पहुंचे और लोगों को समझाने लगे- 'आप लोग हमारा साथ दीजिये। इसी निशान का बटन दबाइए।
भीड़ में खड़े हुए एक वृद्ध ने निशान को गौर से देखा और कहा- ''का! ये चिह्न वाले बाई ला सरकार हा आत्तेक दिन म् घल्प नौकरी नहीं देइस। ये दे हर त केऊ बेर हमर मेर हाथ-पाँव जोड़े बर आए रहिस।
हमन हमन हर बार ईहीच मा अपन बटन दबा के ओला बोट दे रहें. आज एते फेर अपन चिन्हा ला भेज देइस. आखिर का बात ए. घेरी-बेरी ये हर हमन तीर नौकरी मांगे बर आते? (छतीसगढी)
अर्थात- क्यों भाई! इस चिन्हवाली महिला को सरकार ने इतने दिनों में भी कोई नौकरी नहीं दी? ये तो कई बार मेरे हाथ-पैर पड़ने आ चुकी है। मैंने हर बार इसी को बटन दबा कर मत दिया। आज फिर से इसने अपने चिन्ह भेज दिया। आखिर क्या बात है? ये बार-बार नौकरी मँगाने क्यों आती है?
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सूक्ति कोष: कोवार्ड- कायर प्रो. बी.प. मिश्र 'निआज़' / सलिल

विश्व वाणी हिन्दी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद तथा चिन्तक नियाज़ जी द्वारा इस स्तम्भ में विविध आंग्ल साहित्यकारों के साहित्य का मंथन कर प्राप्त सूक्ति रत्न पाठको को भेंट किए जा रहे हैं। संस्कृत में कहा गया है- 'कोषस्तु महीपानाम् कोशाश्च विदुषामपि' अर्थात कोष या तो राजाओं के पास होता है या विद्वानों के।


इन सूक्तियों के हिन्दी अनुवाद मूल की तरह प्रभावी हैं। डॉ। अम्बाशंकर नागर के अनुसार 'अनुवाद के लिए कहा जाता है कि वह प्रामाणिक होता है तो सुंदर नहीं होता, और सुंदर होता है तो प्रामाणिक नहीं होता किंतु मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इन सूक्तियों का अनुवाद प्रामाणिक भी है और सुंदर भी।'


'नियाज़' जी कहते हैं- 'साहित्य उतना ही सनातन है जितना कि मानव, देश और काल की सीमायें उसे बाँध नहीं सकतीं। उसके सत्य में एक ऐसी सत्ता के दर्शन होते हैं जिससे अभिभूत होकर न जाने कितने युग-द्रष्टाओं ने अमर स्वरों में उसका गान किया है।


प्रांजल विचार संचरण के बिना श्रेष्ठ नव साहित्य का निर्माण असंभव है।' आंग्ल साहित्य के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों के साहित्य का मंथन कर नियाज़ जी ने प्राप्त सूक्ति रत्न बटोरे हैं जिन्हें वे पाठकों के साथ साँझा कर रहे हैं। सूक्तियों का हिन्दी काव्यानुवाद कर रहे हैं आचार्य संजीव 'सलिल' । सूक्तियाँ शेक्सपिअर के साहित्य से-


Coward कायर :

'Cowards die many times before their deaths,

The valient never taste of death but once.


मरण पूर्व ही बार-बार, हैं कायर मरते / शूर एक ही बार, मृत्यु आलिंगन करते।

मरण-पूर्व कायर मरे, जाने कितनी बार।
वीर न जाने mrityu वह, हो शहीद इक बार॥
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शब्द-यात्रा: सब्ज़ -अजित वडनेरकर

हिन्दी में आमतौर पर प्रचलित सब्जी और तरकारी लफ्ज फारसी के हैं और बरास्ता उर्दू ये हिन्दी में प्रचलित हो गए। मोटे तौर पर देखा जाए तो तरकारी और सब्जी के मायने एक ही समझे जाते हैं यानी सागभाजी। मगर अर्थ एक होने के बावजूद भाव दोनों का अलग-अलग है। हालांकि तरकारी शब्द संस्कृत मूल से निकला है। मगर पहले बात सब्जी की।फारसी का एक शब्द है सब्ज: यानी सब्जा जिसका मतलब है हरी घास, हरियाली, हरे रंग का या सांवला। इसी से बना सब्जी लफ्ज जिसका मतलब है साग भाजी, तरकारी, हरे पत्ते, हरियालापन या भांग आदि। जाहिर है कि सब्ज यानी हरे रंग से संबंधित होने की वजह से सब्जी का मूल अर्थ हरे पत्तों से ही था यानी पालक, बथुआ, मेथी, चौलाई जैसी तरकारी जिनका सब्जी के अर्थ में प्रयोग एकदम सटीक है । मगर अब तो सब्जी का मतलब सिर्फ तरकारी भर रह गया है। हालत सब्ज: यानी सब्जा जिसका मतलब है हरी घास, हरियाली, हरे रंग का या सांवलाये है कि अब आलू गोभी समेत पीले रंग का कद्दू, लाल रंग का टमाटर बैंगनी बैंगन, या सफेद मूली सब कुछ सामान्य सब्जी है और पालक मेथी ,बथुआ और पत्तों वाली सब्ज़ियां हरी सब्जी कहलाती हैं। गौरतलब है कि हरा रंग सुख समृद्धि का प्रतीक है जिसमें खुशहाली, सौभाग्य के साफ संकेत हैं। साधारण जीवनस्तर का संकेत अक्सर खान पान के जरिये भी दिया जाता है मसलन दाल रोटी खाकर गुजारा करना। इसका साफ मतलब है कि सब्जी खाना समृद्धि की निशानी है और यह आम आदमी को आसानी से मयस्सर नहीं है। प्रकृति विभिन्न रंगों में अपने भाव प्रकट करती है। जीव जगत के लिए जो रंग सर्वाधिक अनुकूल है वह है हरा रंग क्योंकि सभी प्रकार के जीवों का मुख्य आहार है वनस्पतियां जो हरे रंग की ही होती हैं। इसीलिए मनुष्य ने हरे रंग को सौभाग्य और मंगलकारी माना है। सब्जः से बने कुछ और भी शब्द हैं जो उर्दू में ज्यादा प्रचलित हैं जैसे सब्जरू यानी जिसकी दाढ़ी-मूछें उग रही हों, सब्जकार यानी जो कुशलता से काम करे। सब्जबख्त यानी सौभाग्य शाली। खुशहाली और अच्छे दिनों के लिए कहा जाता है हराभरा होना। मोटे तौर पर सब्जीखोर शब्द के मायने होंगे वह शख्स जो तरकारी यानी सब्जी ज्यादा खाता हो। मगर फारसी में इसका सही मतलब होता है शाकाहारी। हरितिमा, हराभरा या हरियाली से भरपूर माहौल को सब्जख़ेज कहा जाता है। अब बात तरकारी की। यह शब्द बना है फ़ारसी के तर: से जिसका मतलब है सागभाजी। इसी तरह फ़ारसी का ही एक शब्द है तर जिसका मतलब है नया, आर्द्र यानी गीला, एकदम ताजा, लथपथ , संतुष्ट वगैरह। जाहिर है पानी से भीगा होना और एकदम ताजा होना ही साग सब्जी की खासियत है। यह तर बना है संस्कृत की तृप् धातु से जिससे बने तृप्त-परितृप्त शब्द का अर्थ भी यही है यानी प्रसन्न, संतुष्ट। इससे बने तर से हिन्दी उर्दू में कई शब्द आम हैं जैसे तरबतर, खूबतर और तरमाल आदि। अब बात साग-भाजी की। साग शब्द संस्कृत के शाक: या शाकम् से बना है जिसका अर्थ है भोजन के लिए उपयोग में आने वाले हरे पत्ते या कंद, मूल, फल आदि। इस साग-भाजी को कहीं-कहीं साक या शाक भी कहते हैं। रूखे-सूखे भोजन के किये साग-पात शब्द भी चलता है।

बुधवार, 29 अप्रैल 2009

गीत: मानसरोवर तज... संजीव 'सलिल'

गीत
कागा आया है
जयकार करो,
जीवन के हर दिन
सौ बार मरो...

राजहंस को
बगुले सिखा रहे
मानसरोवर तज
पोखर उतरो...

सेवा पर
मेवा को वरीयता
नित उपदेशो
मत आचरण करो...

तुलसी त्यागो
कैक्टस अपनाओ
बोनसाई बन
अपनी जड़ कुतरो...

स्वार्थ पूर्ति हित
कहो गधे को बाप
निज थूका चाटो
नेता चतुरों...

कंकर में शंकर
हमने देखा
शंकर को कंकर
कर दो ससुरों...

मात-पिता मांगे
प्रभु से लडके
भूल फ़र्ज़, हक
लड़के लो पुतरों...
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राम भजन : स्व. शान्ति देवी

सुनो री गुइयाँ

सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ, राज कुंवर दो आए।

सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

कौन के कुंवर?, कहाँ से आए?, कौन काज से आए?


कहो री गुइयाँ, कहो री गुइयाँ...

दशरथ-कुंवर, अवध से आए, स्वयम्वर देखे आए।


सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

का पहने हैं?, का धारे हैं?, कैसे कहो सुहाए?


कहो री गुइयाँ, कहो री गुइयाँ...

पट पीताम्बर, कांध जनेऊ, श्याम-गौर मन भये।


सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

शौर्य-पराक्रम भी है कछु या कोरी बात बनायें?


कहो री गुइयाँ, कहो री गुइयाँ...

राघव-लाघव, लखन शौर्य से मार ताड़का आए।


सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

चार कुंअरि हैं जनकपुरी में, कौन को जे मन भाए?


कहो री गुइयाँ, कहो री गुइयाँ...

अवधपुरी में चार कुंअर, जे सिया-उर्मिला भाए।


सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

विधि सहाय हों, कठिन परिच्छा रजा जनक लगाये।


कहो री गुइयाँ, कहो री गुइयाँ...

तोड़ सके रघुवर पिनाक को, सिया गिरिजा से मनाएं।


सुनो री गुइयाँ, सुनो री गुइयाँ...

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अंगरेजी ग़ज़ल- हिन्दी काव्यानुवाद: प्रो. अनिल जैन -डॉ. बाबु जोसेफ

My heart sink deep with fading light. --------------------- ढलती शाम की शमा में मेरा दिल डूबता है।
When Sun goes down and Moon is bright. ----------------सूरज जब अलविदा कहता चाँद चमकता है॥

Do not make noise, the session going on. ------------------------आवाज न करो वह काम चल रहा है।
They gathered here to get scriptures cite. ---------------------इकट्ठे हुए यहाँ वे कलाम दोहराते हैं॥

The term is coming to an end. ----------------------------------वह सत्र तो अब ख़त्म हुआ जाता है।
Again the walls are there to write. ----------------------------दीवारें खडीं फ़िर से लिखने के लिए हैं॥

A lamb is killed in the forest. ------------------------------जंगल में एक मासूम मेमना मारा जाता है।
Each one stood to take a bite. ----------------------------------सभी खड़े वहाँ हिस्सा लेने के लिए हैं॥

The darker gets the deepar you go. ---------------------------गहराई में जाओगे तो अँधेरा बढेगा ही।
The darkness always claad in white. -------------------------वह अँधेरा सफेदी का जामा ओढे हुए है॥

My place is said to be peaceful one. ---------------------------मेरा रुतबा तो अमन के परवाने का है।
I got my share, why should I fight? ------------------जब मिल गया हिस्सा ज़रूरत क्यों लड़ने की है?

Wrong is wrong till they out. ----------------------------गलत तो गलत है जब तक वे नहीं शामिल।
Take them in the wrong is wright. --------------------------शामिल करो उन्हें तो ग़लत भी सही है॥

Find some means to keep them busy. ---------------------उन्हें मसरूफ रखने का जरिया खोजना है।
Dangef lies in moments of respite। --------------------------आराम के लम्हों में ही खतरा मंडराता है॥

Never mind when it barks. ----------------------------------नजर अंदाज़ कर दो जो भी भौंकता है।
Throw him peace and dog is quiet. ----------------------------टुकडा डालो कुत्ता चुप होने के लिए है॥

Your love only abode of peace. ---------------------------------तुम्हारा प्यार ही अमन का चमन है।
Where day dawns after night. ----------------------------------जहाँ रात गुजरने पर सवेरा होता है॥

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लघु कथा सलिला: प्रार्थना -कुँवर प्रेमिल

स्वरूप संपत रोज़गार के लिए बहुत घूमा। कई जोड़े जूते-चप्पलें घिस गयीं। मायूस होकर उसने आत्महत्या की बात सोचना प्रारम्भ कर दी।

मरने से पहले उसने अपने इष्ट की याद कर लेना उचित समझा। प्रार्थना करते हुए वह मन ही मन में बुदबुदाया: 'हे इष्ट देव! अगली बार यदि जन्म देना तो किसी आरक्षित वर्ग में ही देना, नहीं तो इस मनुष्य तन का फायदा ही क्या है?' ऐसे ही चप्पलें तब भी घिसनी पड़ेंगी और ऐसी ही कायरता तब भी करना पड़ेगी। मैं बार-बार ऐसा नहीं करना चाहता हूँ। भगवान जी! मेरी लाज रखना।
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सूक्ति कोष प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' / सलिल


विश्व वाणी हिन्दी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद तथा चिन्तक नियाज़ जी द्वारा इस स्तम्भ में विविध आंग्ल साहित्यकारों के साहित्य का मंथन कर प्राप्त सूक्ति रत्न पाठको को भेंट किए जा रहे हैं। संस्कृत में कहा गया है- 'कोषस्तु महीपानाम् कोशाश्च विदुषामपि' अर्थात कोष या तो राजाओं के पास होता है या विद्वानों के।

इन सूक्तियों के हिन्दी अनुवाद मूल की तरह प्रभावी हैं। डॉ। अम्बाशंकर नागर के अनुसार 'अनुवाद के लिए कहा जाता है कि वह प्रामाणिक होता है तो सुंदर नहीं होता, और सुंदर होता है तो प्रामाणिक नहीं होता किंतु मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इन सूक्तियों का अनुवाद प्रामाणिक भी है और सुंदर भी।'


'नियाज़' जी कहते हैं- 'साहित्य उतना ही सनातन है जितना कि मानव, देश और काल की सीमायें उसे बाँध नहीं सकतीं। उसके सत्य में एक ऐसी सत्ता के दर्शन होते हैं जिससे अभिभूत होकर न जाने कितने युग-द्रष्टाओं ने अमर स्वरों में उसका गान किया है।


प्रांजल विचार संचरण के बिना श्रेष्ठ नव साहित्य का निर्माण असंभव है।' आंग्ल साहित्य के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों के साहित्य का मंथन कर नियाज़ जी ने प्राप्त सूक्ति रत्न बटोरे हैं जिन्हें वे पाठकों के साथ साँझा कर रहे हैं। सूक्तियों का हिन्दी काव्यानुवाद कर रहे हैं आचार्य संजीव 'सलिल' ।
सूक्तियाँ शेक्सपिअर के साहित्य से-


कंटेंट santosh:


'Poor and content is rich and rich enough.'


दीनता में भी जिसे संतोष है। / सत्य ही निस्सीम उसका कोष है।


जो दरिद्रता को रहे, कृपा देव की मान।

धनी न उनसे अधिक है, अन्य 'सलिल' ले मान।

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शब्द यात्रा: कछुआ - अजित वडनेरकर

सु सुस्त रफ्तार के लिए कछुआ-चाल kachhua मुहावरा प्रसिद्ध है। कछुआ एक प्रसिद्ध उभयचर है जो जल और धरती दोनो पर रह सकता है। इसका शरीर कवच से ढका होता है। अत्यंत छोटे पैरों और स्थूल आकार के चलते इसकी रफ्तार बेहद धीमी होती है। धीमी गति से काम करनेवाले व्यक्ति के लिए जहां कछुआ चाल मुहावरा उलाहने के तौर पर इस्तेमाल होता है वहीं कछुआ-खरगोश की प्रसिद्ध कथा कछुए के बारे में अलग ही संदेश देती है। यह नीतिकथा कछुए को ध्येयनिष्ठ और लगनशील साबित करती है जो अपनी धीमी गति के बावजूद खरगोश से दौड़ में जीत जाता है जबकि इस कथा में चंचल, चपल और तेज रफ्तार खरगोश को अति चातुरी और दंभ की वजह से हार का मुंह देखना पड़ा था। कछुआ जलतत्व का प्रतीक भी है। कुछ विशिष्ट बसाहटों का संबंध भी कछुए से है। कछुआ शब्द की व्युत्पत्ति संस्कृत के कच्छप से मानी जाती है। कच्छप kachhap शब्द बना है कक्ष+कः+प के मेल से जिसका मतलब होता है कक्ष में रहनेवाला। गौरतलब है कि कछुए की बाहरी सतह एक मोटी-कठोर खोल से ढकी होती है। संस्कृत कक्षः का अर्थ होता है प्रकोष्ठ, कंदरा , कुटीर का भाव है। हिन्दी में कमरे के लिए कक्ष प्रचलित शब्द है। खास बात यह कि आश्रय के संदर्भ में कक्ष में आंतरिक या भीतरी होने का भाव भी विद्यमान है। मोटे तौर पर कक्ष किसी भवन के भीतरी कमरे को ही कहा जाता है। कक्षा का जन्म हुआ है कष् धातु से जिसमें कुरेदने, घिसने, खुरचने, मसलने आदि का भाव है। किसी भी आश्रय के निर्माण की आदिम क्रिया खुरचने, कुरेदने से ही जुड़ी हुई है। कछुआ बेहद शर्मीला और सुस्त प्राणी है। प्रकृति ने इसे अपनी रक्षा के लिए एक विशाल खोल प्रदान किया है। दरअसल यह एक कक्ष की तरह ही है। आपात्काल को भांप कर कछुआ अपने शरीर को इस खोल में सिकोड़ लेता है जिससे यह हिंस्त्र जीवों से अपनी ऱक्षा कर पाता है। कछुए के अनेक रूप हिन्दी में प्रचलित हैं जैसे कच्छवो, कच्छू, कछऊं, काछिम, कश्यप आदि। मराठी में इसे कासव कहते हैं। कछुआ शब्द की व्युत्पत्ति कश्यप kashyap से भी जोड़ी जाती है। पुराणों में कश्यप नाम के ऋषि भी थे जो ब्रह्मा के पुत्र मरीचि की संतान थे। एक पौराणिक प्रसंग में वे स्वयं अपने कश्यप नाम का अर्थ बताते हुए कहते हैं कि कश्य का अर्थ है शरीर। जो उसको पाले अर्थात रक्षा करे वह हुआ कश्यप। गौर करें कि अपनी मोटी खाल के भीतर कछुआ अपने शरीर की बड़ी कुशलता से रक्षा करता है अतः यहां कश्यप से व्युत्पत्ति भी तार्किक है। उत्तर भारत में सोनकच्छ sonkachh नाम के एकाधिक कस्बे मिलेंगें। यह ठीक वैसा ही है जेसे राजगढ़ या उज्जयिनी नाम की एक से अधिक आबादियां होना। कछुआ जल संस्कृति से जुड़ा हुआ है। गौर करें भारतीय संस्कृति में जल को ही जीवन कहा गया है। जल से जुड़े समस्त प्रतीक भी मांगलिक और कछुआ अपने शरीर की रक्षा मोटी खाल में कुशलता से करता है… समृद्धि के द्योतक हैं। चाहे जिनमें मत्स्य, मीन, शंकु, अमृतमंथन में निकल चौदह रत्नों समेत कछुआ भी शामिल है। प्राचीनकाल मे कई तरह के प्रयासों और संस्कारों की सहभागिता से जलसंकट से मुक्ति पायी जाती थी। जल का प्रतीक होने के चलते कश्छप को अत्यंत पवित्र माना जाता रहा है। जिस स्थान को कुआं या तालाब का निर्माण होना होता था, सर्वप्रथम उस स्थान की भूमि पूजा कर खुदाई आरंभ की जाती थी। जब जलाशय या कुएं का निर्माण परा हो जाता तब इस कामना के साथ उसकी तलहटी में स्वर्ण-कच्छप अर्थात कछुए की सोने से बनी आकृति स्थापित कर दी जाती थी। अगर उ जल की भरपूर उपलब्धता बनी रहती तो उस स्थान के साथ स्वर्ण कच्छप का नाम जुड़ जाता। इस उल्लेख की आवृत्ति इतनी ज्यादा होती कि कई बार उस स्थान का नाम ही सोनकच्छ हो जाता। भोपाल से इंदौर और भोपाल से जयपुर जाने के रास्ते में क्रमशः सौ किमी और सोलह किमी की दूरी पर इसी नाम के दो कस्बे हैं। कछुए के लिए संस्कृत में एक और शब्द है कूर्मः । समुद्रमंथन के प्रसिद्ध प्रसंग में जब मंदार पर्वत को देव-दानवों ने मथानी बनाया तब भगवान विष्णु ने कछुए का रूप धारण कर उसे आधार प्रदान किया था जिसे कूर्मावतार भी कहा जाता है। उत्तर भारत का एक स्थान प्राचीनकाल में कूर्मांचल कहलाता था जो आज उत्तराखंड प्रांत में है और कुमाऊं नाम से प्रसिद्ध है। बताया जाता है कि यहां कूर्म पर्वत है। पौराणिक कथा के अनुसार इस पर्वत पर प्रभु विष्णु ने कूर्मावतार में तपस्या की थी इसीलिए इसका नाम कूर्मपर्वत पड़ा और यह क्षेत्र कूर्मांचल कहलाया। यहां के निवासियों की आजीविका के लिए अथक श्रमजीवी-वृत्ति अर्थात कमाऊं से ध्वनिसाम्य करते हुए भी कई लोग कुमाऊं की व्युत्पत्ति मानते हैं। मगर इसे बहुत गंभीरता से नहीं लिया जा सकता।

मंगलवार, 28 अप्रैल 2009

वेब पत्रकारिता पर शोध :

प्रश्न उठे उत्तर हैं शेष, पाठक करिए इन्हें अशेष।

आत्मीय!

'परहित सरिस धरम नहीं भाई ! किसी का हित करने का ऐसा अवसर मिले की आपकी गाँठ से कौडी भी न जाए तो धर्म करने का यह अवसर कौन चूकना चाहेगा?

आपके सामने एक ऐसा ही अवसर है। आप जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर में पत्रकारिता एंव जनसंचार विभाग की द्वितीय वर्ष की छात्रा निहारिका श्रीवास्तव के कुछ प्रश्नों के उत्तर देकर उसके लघु शोध कार्य में सहायक हो सकते हैं।

स्नातकोत्तर चतुर्थ सत्र में उसके लघु शोध पत्र का विषय है - 'बेव पत्रकारिता का बिकास एंव संभावनाये' ।

प्रश्न निम्न है--

प्रश्न १ : ई न्यूज पेपर क्या है?

प्रश्न 2 : पोर्टल क्या है?

प्रश्न 3 : डाॅट इन, डाॅट काम, डाॅट ओ। आर। जी। तथा अन्य सबंधित शब्दों के अर्थ एवं बेव पत्रकारिता में उनकी भूमिका?

प्रश्न 4 : भारत में बेव पत्रकारिता का प्रचलन कैसा है एंव मुख पोर्टल कौन कौन से है?

प्रश्न 5: वेब पत्रकारिता के विभिन्न स्वरूप एंव उनके समक्ष आने वाली चुनौतिया क्या ?

दिव्य नर्मदा के पाठक / दर्शक इन प्रश्नों के उत्तर देकर इस लधु शोध पत्र के लिए संजीवनी बूटी के समान सहायक सिद्ध हों। इन प्रश्नों के अतिरिक्त उक्त शोध पत्र से संबधित अन्य कोई जानकारी रखते है तो आप निहारिका को अपने ज्ञान से अनुगृहित करें।

निहारिका का ee मेल पता mailto:---naina7786@%3Cspan%20title= डाक का पता : निहारिका श्रीवास्तव, जनसंचार एंव पत्रकारिता अध्ययन केन्द्र, जीवाजी विश्वविद्यालय ग्वालियर (मध्य प्रदेश)
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आंग्ल काव्य सलिला: भारत माता : सलिल

POETRY :

BHARAT MATA

Salil

She is lovely,

She is brave .

She is gentle,

As river wave.

She is the ocean,

She is the sky.

She is the faith,

Never asks why?

Always do right

Never feels fear,

Call him by heart

And find very near।

She is power

the SHAKTI.

She is devotion

the BHAKTI.

She is donor

the DATA.

Not merely the land

But BHARAT MATA.

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ग़ज़ल सलिला: मनु बतखल्लुस

जुनूने-गिरिया का ऐसा असर भी, मुझ पे होता है

कि जब तकिया नहीं मिलता, तो दिल कागज़ पे रोता है

अबस आवारगी का लुत्फ़ भी, क्या खूब है यारों,

मगर जो ढूँढते हैं, वो सुकूं बस घर पे होता है

तू बुत है, या खुदा है, क्या बला है, कुछ इशारा दे,

हमेशा क्यूँ मेरा सिजदा, तेरी चौखट पे होता है

अजब अंदाज़ हैं कुदरत, तेरी नेमत-नवाजी के

कोई पानी में बह जाता, कोई बंजर पे रोता है

दखल इतना भी, तेरा न मेरा उसकी खुदाई में

कि दिल कुछ चाहता है, और कुछ इस दिल पे होता है
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भजन सलिला: बाजे अवध बधैया -स्व शान्ति देवी

बाजे अवध बधैया

बाजे अवध बधैया, हाँ हाँ बाजे अवध बधैया...

मोद मगन नर-नारी नाचें, नाचें तीनों मैया।

हाँ-हाँ नाचें तीनों मैया, बाजे अवध बधैया..

मातु कौशल्या जनें रामजी, दानव मार भगैया

हाँ हाँ दानव मार भगैया बाजे अवध बधैया...

मातु कैकेई जाए भरत जी, भारत भार हरैया

हाँ हाँ भारत भार हरैया, बाजे अवध बधैया...

जाए सुमित्रा लखन-शत्रुघन, राम-भारत की छैयां

हाँ हाँ राम-भारत की छैयां, बाजे अवध बधैया...

नृप दशरथ ने गाय दान दी, सोना सींग मढ़ईया

हाँ हाँ सोना सींग मढ़ईया, बाजे अवध बधैया...

रानी कौशल्या मोहर लुटाती, कैकेई हार-मुंदरिया

हाँ हाँ कैकेई हार-मुंदरिया, बाजे अवध बधैया...

रानी सुमित्रा वस्त्र लुटाएं, साडी कोट रजैया

हाँ हाँ साडी कोट रजैया, बाजे अवध बधैया...

विधि-हर हरि-दर्शन को आए, दान मिले कुछ मैयाहाँ

हाँ हाँ दान मिले कुछ मैया, बाजे अवध बधैया...

'शान्ति'-सखी मिल सोहर गावें, प्रभु की लेनी बलैंयाँ

हाँ हाँ प्रभु की लेनी बलैंयाँ, बाजे अवध बधैया...

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सूक्ति कोष : प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' / सलिल


सूक्ति कोष


प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'

विश्व वाणी हिन्दी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद तथा चिन्तक नियाज़ जी द्वारा इस स्तम्भ में विविध आंग्ल साहित्यकारों के साहित्य का मंथन कर प्राप्त सूक्ति रत्न पाठको को भेंट किए जा रहे हैं।
संस्कृत में कहा गया है- 'कोषस्तु महीपानाम् कोशाश्च विदुषामपि' अर्थात कोष या तो राजाओं के पास होता है या विद्वानों के।

इन सूक्तियों के हिन्दी अनुवाद मूल की तरह प्रभावी हैं। डॉ. अम्बाशंकर नागर के अनुसार 'अनुवाद के लिए कहा जाता है कि वह प्रामाणिक होता है तो सुंदर नहीं होता, और सुंदर होता है तो प्रामाणिक नहीं होता किंतु मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इन सूक्तियों का अनुवाद प्रामाणिक भी है और सुंदर भी।'

'नियाज़' जी कहते हैं- 'साहित्य उतना ही सनातन है जितना कि मानव, देश और काल की सीमायें उसे बाँध नहीं सकतीं। उसके सत्य में एक ऐसी सत्ता के दर्शन होते हैं जिससे अभिभूत होकर न जाने कितने युग-द्रष्टाओं ने अमर स्वरों में उसका गान किया है।


प्रांजल विचार संचरण के बिना श्रेष्ठ नव साहित्य का निर्माण असंभव है।' आंग्ल साहित्य के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों के साहित्य का मंथन कर नियाज़ जी ने प्राप्त सूक्ति रत्न बटोरे हैं जिन्हें वे पाठकों के साथ साँझा कर रहे हैं। सूक्तियों का हिन्दी काव्यानुवाद कर रहे हैं आचार्य संजीव 'सलिल' ।

सूक्तियाँ शेक्सपिअर के साहित्य से-

Consistancy स्थिरता :



'Constant s the northern star,Of whose true fixed and resting quality.There is no fellow in the firmament.'



अखंड ब्रम्हांड में ध्रुव के सामान दृढ और अचल और कुछ नहीं है.



नहीं अखिल ब्रम्हांड में,अचल-अटल कुछ और.

'सलिल' मात्र ध्रुव है अचल, दृढ़ता का सिरमौर.


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लघुकथा सलिला: भिखारी - गुरुनाम सिंह 'रीहल'

मन्दिर के पास ही भिखारी की आवाज़ सुनकर वह रुका...'मालिक! कुछ देते जाइए. दो दिनों का भूखा हूँ. ईश्वर आपकी मुराद जरूर पूरी करेगा.'

'जा, जा बड़ा आया दुआ देनेवाला...पहले खुद खा-पी ले. भला-चंगा है, मुस्टंडा महीन का..क्या तुमसे काम-धाम नहीं होता? इस प्रकार भीख माँगने में शर्म नहीं आती तुमको? -बडबडाते हुए वह मंदिर की ओर बढ़ गया.

भगवान की मूर्ति के सामने उसने सर झुकाया और क़तर स्वर में गिडगिडाया- 'प्रभु! तुम ही मेरे सहारे हो। मैं तुमसे कृपा की भीख मांगता हूँ। मेरा भाग्योदय तुम्हारे ही हाथ में है। इस बार मुझे टिकिट मिल ही जानी चाहिए। पिछले दो चुनाव यूं ही हाथ से निकल गए और मैं अपनी बदकिस्मती पर आँसू बहता रह गया. तुम दाता हो, मैं भिखारी. जब तुम्हारी कृपा से कंगले की लाटरी खुल सकती है तो मैंने तुम्हारा क्या बिगाडा है? तुम्हें पार्टी अध्यक्ष का ह्रदय परिवर्तन करना होगा और विधायक बनाकर मेरी नैया पार लगनी होगी' - यह कहते-कहते वह भगवान की मूर्ति के पैरों से लिपट गया.
भिखारी कौन यह या वह? सोच रही थीं मंदिर की दीवारें.

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शब्द-यात्रा: घास - अजित वडनेरकर

कु छ काम न करने अथवा निरर्थक कामों में जुटे रहने के संदर्भ में अक्सर घास खोदना मुहावरा बोला जाता है। रुखो-सूखे भोजन को भी अक्सर घास-पात की संज्ञा दी जाती है। ये हीन भावार्थ जाहिर करते हैं कि घास चाहे पशु आहार के रूप में अत्यावश्यक हो मगर मनुष्य के स्वार्थी नज़रिये से यह उपेक्षणीय ही है। यूं प्रकृति के लैंडस्केप से अगर घास गायब कर दी जाए तो शायद यह धरती उतनी खूबसूरत नज़र न आए। कभी हरी और कभी पीली चूनर ओढ़े जो धरा हमें नजर आती है वे रंग घास के ही हैं। घास के लिए अंग्रेजी में ग्रास शब्द है जो मूलतः प्रोटो इंडो-यूरोपीय भाषा परिवार की धातु ghre से उत्पन्न शब्द है। इस धातु में बढ़ने का भाव है। घास की जितनी भी प्रजातियां हैं वे सब तेजी से वृद्धि करती हैं। किसी भी किस्म की भूमि पर बहुत तेज बढ़वार ही घास का प्रकृति प्रदत्त विशिष्ट गुण है। अंग्रेजी में इस धातु से ग्रो grow नामक क्रिया बनी है जिसमें वृद्धि का भाव है। इससे कई शब्द बने हैं जो रोजमर्रा में बोले-सुने जाते हैं जैसे ग्रोथ यानी विकास या तरक्की। बढ़वार के अर्थ में घास के लिए ग्रास के मायने स्पष्ट है। ग्रासकोर्ट, ग्रासरूट जैसे शब्द समाचार माध्यमों के जरिये रोज पढ़ने-सुनने को मिलते हैं जो इसी श्रंखला के हैं। खुशहाली का कोई रंग होता है? प्रकृति हमें खुशहाल तभी नज़र आती है जब चारों तरफ हरियाली हो। साफ है कि हरा रंग समृद्धि और विकास का प्रतीक है। हरितिमा के साथ पीले रंग का मेल भी मांगलिक होता है। जब मन प्रसन्नचित्त होता है तो कहा जाता है कि तबीयत हरीभरी हो गई। हरे रंग को अंग्रेजी में ग्रीन green कहते हैं जो इसी श्रंखला का शब्द है। प्राकृतिक उत्पाद के तौर पर मनुष्य सबसे पहले वनस्पति से ही परिचित हुआ। पेड़-पौधों में उसने स्वतः वद्धि का भाव देखा। वनस्पतियों ने खुद ब खुद वृद्धि कर प्रकृति के खजाने को समृद्ध किया। समृ्द्धि में ही वृद्धि छुपी है यानी सम+वृद्धि=समृद्धि। इंडो-ईरानी परिवार में घास शब्द के कई मिलते जुलते रूप प्रचलित हैं। हिन्दी का घास बना है संस्कृत की घस् धातु से जिसका मतलब है निगलना, खाना। खास बात यह कि भारोपीय धातु ghre का वृद्धि वाला भाव इंडो-ईरानी परिवार में आहार के अर्थ में बदल रहा है। ghre से मिलती जुलती धातु संस्कृत में है ग्रस् जिसका मतलब होता है निगलना। घस् इसका ही अगला रूप है जिसका अर्थ खाना, निगलना है जिससे बने घासः शब्द का अर्थ आहार, चारा, घास आदि है। घस् या ग्रस् धातु में आहार की अर्थवत्ता बाद में स्थापित हुई होगी पशुपालक आर्यों ने निरंतर बढ़नेवाली घास को देखा-परखा तो उसका प्रयोग पशु आहार के लिये भी हुआ। कौर के लिए ग्रास शब्द हिन्दी में भी प्रचलित है। मराठी में तो कौर को घास ही कहते हैं। प्राकृत, खरोष्ठी, अवेस्ता में इसके यही रूप हैं। आर्मीनियाई में इसका खस् रूप प्रचलित है जिसका मतलब घास ही होता है। इसक अलावा इससे गास, गस् जैसे रूप भी हैं। कौर के लिए गस्सा शब्द भी प्रचलित है।घास उगाने में चूंकि मानवश्रम का निवेश नहीं होता है लिहाजा़ उसे काटने का काम भी निम्न श्रेणी का माना जाता है। इसे करने में किसी कौशल की भी ज़रूरत नहीं होती है, क्योंकि यह उत्पादन से जुड़ा श्रम नहीं है। घास काटनेवाले को घसियारा कहा जाता है। यह बना है घास+कारकः से। घसियारा बनने का क्रम यूं रहा-घासकारकः > घस्सआरक > घसियारा। किसी व्यक्ति के द्वारा फूहड़ तरीके से काम करने पर उसे घसियारा कह कर उलाहना दिया जाता है जिसके पीछे आशय यही रहता है कि उसने कुशलता से काम नहीं किया। जल्दी जल्द, टालू अंदाज में, बेमन से काम निपटाने को घास काटना कहा जाता है। भाव यही है कि जिस तरह ...घास काटना बेकार का काम माना जाता है...इसीलिए अकुशल कार्मिक को अक्सर घसियारा कहा जाता है… घास काटी जाती है, उसी तरह से किया गया काम। दुनियाभर में घास के हजारों प्रकार होते हैं। घास की कई किस्में सजावटी होती हैं जो लॉन, मैदान, आंगन, बाग-बागीचों की शोभा बढ़ाती हैं जैसे कारपेट ग्रास। घास की कई किस्में पशुआहार के काम आती हैं और कई किस्मों का प्रयोग औषधि के तौर पर भी होता है जैसे लैमन ग्रास। हिन्दुओं में धार्मिक कर्मकांड में घास की कुछ किस्मों का बड़ा महत्व है जैस कुशा, दूब जिसे दुर्वा या दर्भ भी कहते हैं। घास की कई हानिकारक किस्में हैं हिन्दी में इनके लिए खरपतवार शब्द है जिसमें सभी अपने आप उगनेवाली सभी हानिकारक वनस्पतियां शामिल हैं। गाजर घास ऐसी ही एक खरपतवार है जिसे कांग्रेस ग्रास भी कहा जाता है। आजादी के बाद अमेरिका से आए मैक्सिकन गेहूं के साथ खरपतवार की यह किस्म भारत आई और इसने देश की कृषि को बुरी तरह प्रभावित किया। यह बीमारी कांग्रेस शासन की देन होने की वजह से इसे कांग्रेसग्रास कहा जाने लगा, ऐसा भी कहा जाता है। वैसे समूह में उगने की वजह से भी इसे कांग्रेस ग्रास कहा जाता है। इसकी पत्तियों का रूपाकार गाजर की पत्तियों जैसा होता है इसलिए इसका प्रचलित नाम गाजर घास है।

सोमवार, 27 अप्रैल 2009

लघुकथा : असली तीर्थ -मो. मोइनुद्दीन 'अतहर'

क्यों भैया! क्या तीरथ करने गए थे? बहुत दिनों बाद दिखाई दिए हो.

पुराने जूतों की मरम्मत करते हुए वह शांत भाव से बोला: 'नईं तो, बऊ!मोरी तकदीर मन कहाँ धरो तीरथ-बरत. बो तो पैसेवालों को काम आय.'

फिर जूते की एडी में कील ठोंकते हुए बोला- 'मोरो तो जेई तीरथ है. '

उसकी आँखों में आँसू छलछला आये थे.

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भाषा सेतु: प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़' / सलिल

सूक्ति कोष

प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'


विश्व वाणी हिन्दी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद तथा चिन्तक नियाज़ जी द्वारा इस स्तम्भ में विविध आंग्ल साहित्यकारों के साहित्य का मंथन कर प्राप्त सूक्ति रत्न पाठको को भेंट किए जा रहे हैं।

संस्कृत में कहा गया है- 'कोषस्तु महीपानाम् कोशाश्च विदुषामपि' अर्थात कोष या तो राजाओं के पास होता है या विद्वानों के.

इन सूक्तियों के हिन्दी अनुवाद मूल की तरह प्रभावी हैं। डॉ. अम्बाशंकर नागर के अनुसार 'अनुवाद के लिए कहा जाता है की वन प्रामाणिक होता है तो सुंदर नहीं होता, और सुंदर होता है तो प्रामाणिक नहीं होता किंतु मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इन सूक्तियों का अनुवाद प्रामाणिक भी है और सुंदर भी।'

जी कहते हैं- 'साहित्य उतना hee सनातन है जितना कि मानव, देश और काल की सीमायें उसे बाँध नहीं सकतीं। उसके सत्य में एक ऐसी सत्ता के दर्शन होते हैं जिससे अभिभूत होकर न जाने कितने युग-द्रष्टाओं ने अमर स्वरों में उसका गान किया है।

..प्रांजल विचार संचरण के बिना श्रेष्ठ नव साहित्य का निर्माण असंभव है।' आंग्ल साहित्य के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों के साहित्य का मंथन कर नियाज़ जी ने प्राप्त सूक्ति रत्न बटोरे हैं जिन्हें वे पाठकों के साथ साँझा कर रहे हैं। सूक्तियों का हिन्दी काव्यानुवाद कर रहे हैं आचार्य संजीव 'सलिल' ।

सूक्तियाँ शेक्सपिअर के साहित्य से-

begger आकृति:


'Well, whiles I am a begger, I will rail
And say there is no sin but to rich;
And being rich, my virtue then shall be
To say there is no vice but beggary. .'


जब तक मैं भिक्षुक हूँ, मेरी दृष्टि में संपत्ति अर्जन से बढ़कर कोइ पाप नहीं, और धनी हो जाने पर दरिद्रता और भिक्षा मेरे जीवन का सबसे बड़ा अभिशाप है.


दोहानुवाद :
पाप, भिक्षु की द्रष्टि में, है- होना धनवान.

उसे गरीबी शाप हो, जब हो सम्पतिवान..

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Origin of Bhagvan Chitragupt and Kayasthas

Hindu Mythology believes that the entire universe was created by paratpar param brmha who is nirakar (shapeless), anadi (without begining), anant (endless), ajar (never become old), amar (never dies), akshar (never detoriates), amit (can't be quantified) and ajit (none can win). The yogees concentrates on it and gets parampad. They always hear 'anahad naad' (divine sound). Modern science conferms that the begining of universe is from sound waves having highest frequency and highly densed having the same characteristics as described above. As the sound waves are shapeless, it is not possible to draw their picture (chitr) or the chitr was gupt. It is depicted by the letter 'om'. On dooj the kayasthas worship lord chitrgupt by drawing this 'om' without knowing it's reality.

Later on these sound waves converted into tiny particles revolving on their axis as well as in an orbit with an unimaginable great speed and generating a devine light. Number less particles were generating new particles (ekoham bahusyam) and were immerging into other particles. This cycle was on for crores and crores thousand years. This phenomenon was nothing but convertion of nirakar oorja (shapeless energy) to sakar (shapes). In other words we can say that paratpar param bramh was showing or creating it's gupt chitr (secrete shape) or Lord chitrgupt appeared in space with his devine powers to create universe. on dooj poojn kayasthas make an 'om' on plane paper and draw a human body on it to indicate the process of creation of universe by their isht chitrgupt.

Later on numberless tiny electronically charged particles developed the particles having opposite charge and some without charge. inside the tiny speedily revolving particles an vaccum took place with exterme darkness. any thing coming near to the black whole was sollowed by it. Gradually with the arrival of new particles and expansion of the orbits crores of milky way came into existance. Science confirms the above concept. Nirakar Paratpar param bramh bhgvan after world, as we know it, was created by LORD BRAMHA, the Creator. Lord Bramha first created 16 Sons from various parts of his own body. Shri Chitragupt Ji, his 17th creation, is believed to be the creation from Lord Bramha's Mind & Soul.
Shri Chitragupt Ji is divine incarnation in human form called Kayastha since he is the only creation of Lord Bramha, created in entirety [KAYA] from the lords body, unlike the other 16 sons who were created only from various parts of the body. Shri Chitragupt Ji (& hence the Kayastha's) were accorded a dual caste status, namely KSHATRITYA [Warrior] and BRAHMIN [The Learned].
The primary duty awarded to Shri Chitragupt Ji was to create LOG of the lives of all living beings, judge their lives based on good-deeds and misdoing, and decide, upon ones death, whether they will attain NIRVANA [Completion of their LIFE CYCLE & redemption from all worldly troubles] or, receive punishment for their misdoing in another life form, till they attain NIRVANA.
The Kayastha Parivar believes in WORLD PEACE, JUSTICE, KNOWLEDGE and LITERACY, the four primary virtues depicted by the form of Shree Chitraguptjee. The community, world-wide, strives to attain these virtues and promote the same, in line with the teachings of their supreme lord. Empowered with powerful traits such as SELF RESPECT, SELF ESTEEM, INTELLIGENCE, COMMONSENSE & PRESENCE OF MIND, AESTHETIC SENSE, BENEVOLENCE, Kayastha's are PROGRESSIVE & ADAPTIVE. Over the centuries, the community established excellence in ACADEMICS, ADMINISTRATION, LEGAL JUSTICE, SCIENCE & FINE-ARTS.
The Kayastha Community is religiously inclined & very close-knit. They strive to fight social injustice in society. They instill values of religion & culture. Academics has a very important place in the life of a Kayastha. Sincerity & Hard Work are always respected and awarded. Social reform through adoption of economically backward families from within the community, and hence their emancipation, is a known way of KAYASTHA service to their community.
Chitragupt Ji Family - Kayastha Parivar
This is an argumental fact that different sub castes of Kayastha are named on the basis their residential places. After the analysis of different facts the following features are observed.
Kulshrestha: The eldest son of Shri Chitragupt form Iravati, Chitragupt was settled in old Panchal state contemporary Panchal state was from central west of U.P. to north of Shivalik range. This lies in present Rohilkhand part of U.P.. Later in this area was also pronounced as North Panchal. The capital of above Panch is Ahishera and the local residence are called as "Ahigad" as the time progresses their senenations are also name as Ahigad Kaystha. Because of the eldest among all sons Ahigad Kayastha also called theselves "Kulshrestha".
Mathur: Born from Irawati another son name Charan was settled in the coutryb of Saursen Kings and handled the ports of different ministerial and administrative cadre. The ancesto of Shri Krishna, King Yayati has ministers form the generation of Charan. The capital of Saursen was Mathura that’s why they later called as Mathurs. They are normally resides in Matura, Agra and adjoining distincts.
Gaur: Another son name Sucharu setteled in Gaur kingdom and gained the porst of minister. This Gaur kingdom has large area form Padma River of Bangal province.To Vardman Area in west. The other castes which are also residing in some area are also termed as Gaur an the provincial basis.
Bhatnagar: In the ancient time there was a kingdom in East Panjab area having capital Bhatner. The son of Shri Chitragupta named Chitra was working as minister in this kingdom and start residing there in Bhatner. Later on their generations where also transferred in different parts of Haryana, Panjab, North East of Rajasthan and west Uttar Pradesh. Because of having birth place in Bhatner later on they were called as Bhatnagar.
Saxena: In ancient time there was a kingdom named Gandhar which was spread over the area of west of Sindhu River (Present Afganistan) .The capital of Gandhar was Takshshila later on Pushkawali(Present Peshawar). The son of Shri Chitragupta named Matimaan hold the post of minister in Gandhar Kingdom. The generations of Matimaan establishes the city named "Kayasthinvash" which was presently the capital of Afganistan named Kabul. In Puran the residents of Sakun Kingdom they comes into two phases, the persons of first phase are called as Khare and that of second phase are Dusare.
Ambasta: In the ancient time there was a kingdom named Ambast which was in between ChandraBahga (Present Chenab river) and Airawart (Present Ravi river). The discussion of Ambast Kingdom was also mentioned in BrahmnaPuran. The residents of this Kingdom was called as Ambasta. Padini was also called the residents of Southeast region of Kashmir as Ambasta. The son of Shri Chitragupta named Himvaan had hold the post of minister there and their generations are also settled there. There people are very brave and fight along with Kauravs in Mahabharath. Because of the residents of Ambast Kingdom they are called as Ambasta.
Valmik: In the central part of the plains of Ganga and Yamuna there was a kingdom named Panchal having capital Kampil which was situated in the south of Ganga. In ancient South Panchal there was Ashram of Valmiki. The Kayastha residents of this kingdom was start staying in the adjoining areas of this Ashram and was great followers of Saint Valmiki. Because of this later on the residents of this kingdom was called as valmeek Kayastha.
Nigam: Another son of Shri Chitragupta named Antarvendreya was of very religious nature. He spends lots of his time in the reading of Veds. He deployed his sons in the study of Veds or Nigam .This results that their generations are further named as Nigams.
Suryadhvaj: The son of Shri Chitragupta and Dakshina ,Vibahu get settled in the ancient Kashmir. On that time Kashmir province was situated north west of Himalaya which was also mentioned in Shakti Sagar Tantra. On that place the generation of Vibhanu was very powerful. Majority of them played their role in finances and judiciary sector, because of that local Brahmin feels jealous for them. Once they had also established their own kingdom. Since mother of Vibhanu is the daughter of Surya so generations of Vibhanu place sign of Sun on their flags. Because of this they are further called as Suryadhvaj.
Asthana: The son Veerbhanu of Shri Chitragupta ji was settled in Brahmavat Kingdom. In Hindu era the capital of Brahmavart was Sthaneshwar. When Harshawardhan merges the Kingdom of his sister in his Kingdom Kannauj had became his second capital. To handle the administration and system the persons of sub caste were settled there .Since they had the background of Sthaneshwer so they are called as Asthana .Before Mughals they are linked with different administrative jobs for Sharki Sultans. Raja Todarmal minister of Mughal emperor Akbar is also from Asthana family. In Mughal period as the influence of Avadh increases, Asthanas shifts towards Lucknow. Presently they are residing in the adjoining areas of Lucknow as Sitapur, Hardoi etc.
Srivastava: Bhanu son of Shri Chitragupta ji and Dakshina settled in the Kushal Kingdom of ancient India. Their generations hold the posts at different administrative level in that Kingdom. Minister of King Dashreth ( Father of Lord Ram ) Sumant belongs to the family of Bhanu Later on Lord Ram divided his Kingdom in between Lav and Kush in the form of north and south Kaushal. According to Valmeek the capital of north Kaushal is Shravasti. So attached with Shravasti they are called as Srivastava. Some myth are also existed that because being migrated from Srinagar they are also called as Srivastava. Some have the prediction that they are also residing on the banks of Saraswati River that is why they are called as Srivastava. According to famous writer Dr Rangyay Raghav the suffix of Srivastava is "Vastava" shows that they are very good architect (Vaastu Kala). That is why they had built Hastinapur, Ahichha and Sravasti. After analyzing the above views it is concluded that major density of this sub caste of Kayastha is in the Uttar Pradesh near Gonda district was the ancient Sravasti and this important subcast of kayastha was named on the basis of this.
Karna: Another son of Shri Chitragupta ji Vishvabhanu was settled in the south Bihar in ancient Magadh. Ancient Kaleshwar (Present Kashi) to Tapta Kund (Present Sita Kund in Munger ) all the area comes into Magadh Kingdom. Its capital was Rajgarh (Present Rajgir) In the period of Mahabharat Duryodhaon had presented the western part of this are to his friend Karna (Ang Desh). Later on residents of these areas are called as Karna. Kayastha from Gupta Era to Rajput Era they all are worked at different ministerial and administrative levels. In Khujraho the capital of Chandel Kingdom a minister named Yashovarman build a big temple.

भजन सलिला : दरश को आये शंकर जी -स्व. शांति देवी वर्मा


अवध में जन्में हैं श्री राम
अवध में जन्में हैं श्री राम, दरश को आए शंकरजी...

कौन गा रहे?, कौन नाचते?, कौन बजाएं करताल?

दरश को आए शंकरजी...

ऋषि-मुनि गाते, देव नाचते, भक्त बजाएं करताल.
दरश को आए शंकरजी...

अंगना मोतियन चौक है, द्वारे हीरक बन्दनवार.
दरश को आए शंकरजी...

मलिन-ग्वालिन सोहर गायें, नाचें डे-डे ताल.
दरश को आए शंकरजी...

मैया लाईं थाल भर मोहरें, लो दे दो आशीष.

दरश को आए शंकरजी...

नाग त्रिशूल भभूत जाता लाख, डरे न मेरो लाल
दरश को आए शंकरजी...

बिन दर्शन हम कहूं न जैहें, बैठे धुनी रमाय.
दरश को आए शंकरजी...

अलख जगाये द्वार पर भोला, डमरू रहे बजाय.
दरश को आए शंकरजी...

रघुवर गोदी लिए कौशल्या, माथ डिठौना लगाय.
दरश को आए शंकरजी...

जग-जग जिए लाल माँ तेरो, शम्भू करें जयकार.
दरश को आए शंकरजी...

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गीत :अम्ब विमल मति दे -सलिल

अम्ब विमल मति दे

हे हंस वाहिनी! ज्ञानदायिनी!!
अम्ब विमल मति दे.....

नन्दन कानन हो यह धरती।
पाप-ताप जीवन का हरती।
हरियाली विकसे.....

बहे नीर अमृत सा पावन।
मलयज शीतल शुद्ध सुहावन।
अरुण निरख विहसे.....

कंकर से शंकर गढ़ पायें।
हिमगिरि के ऊपर चढ़ जाएँ।
वह बल-विक्रम दे.....

हरा-भरा हो सावन-फागुन।
रम्य ललित त्रैलोक्य लुभावन।
सुख-समृद्धि सरसे.....

नेह-प्रेम से राष्ट्र सँवारें।
स्नेह समन्वय मन्त्र उचारें।
'सलिल' विमल प्रवहे.....

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एक ग़ज़ल : मनु बेतखल्लुस

आग में डूबा समंदर, नहीं तो फ़िर क्या है,
ज़ीस्त आहों का बवंडर, नहीं तो फ़िर क्या है

तू भी खोया है सनम, माज़ी की रानाईयों में,
आँख में तेरी, वो मंज़र, नहीं तो फ़िर क्या है

मौत की हर अदा, तकलीफ़-ज़दा हो शायद
ज़िन्दगी भी गमे-महशर, नहीं तो फ़िर क्या है

आज आमादा है तू क्यूँ, इसे ढहाने पे
अब मेरा दिल तेरा मन्दिर, नहीं तो फ़िर क्या है

न उजाडो, के हजारों निगाहें रो देंगी,
शज़र, परिंदों का इक घर, नहीं तो फ़िर क्या है

हर शै अरजां है, उस आतिश-निगाह के आगे
हर अदा गोया इक शरर, नहीं तो फ़िर क्या है

शब्द-यात्रा : चाट -अजित वडनेरकर

चा टवाले खोमचों पर सबसे ज्यादा खपत पानीपूरी की होती है जिसे गोलगप्पा भी कहते हैं। मैदे की लोई को जब छोटे आकार में बेला जाता है तो तलने पर ये फूल कर कुप्पा हो जाती हैं इसीलिए इन्हें गोलगप्पा भी कहते हैं। इन्हें पानी पताशा, पानी पतासा भी कहते हैं जो शुद्ध रूप में पानी बताशा है मगर मुख-सुख के सिद्धांत पर पानी के साथ पताशा शब्द चल पड़ा। मुंबई की चौपाटी पर भेलपुरी प्रसिद्ध है। मज़े की बात यह कि भेलपूरी में खस्ता पूरी को कुचल कर परोसा जाता है। मध्यप्रदेश के बुंदेलखंड अंचल में इन्हें फुलकियां भी कहा जाता है।
पूरने की क्रिया से बनी कचौरी और पूरी ही पानीपूरी में भी समायी है, अलबत्ता पानीपूरी का आकार काफी छोटा होता है। कचौरी और पूरी बने हैं संस्कृत के पूरिका से। यह शब्द बना है पूर् धातु से जिसमें कुछ भरने, समाने और संतुष्टि का भाव है। कचौरी और पूरी दोनों में ही दाल भरी जाती है। यहां पानीपूरी के साथ थोड़ा उलटा मामला है। पानी पूरी को भी पूरा जाता है अर्थात इसमें भी स्टफिंग होती है मगर पकाने से पहले नहीं बल्कि इसे खाने के वक्त। इसकी खास स्टफिंग है पानी। इसे फोड़ कर इसमें पानी भरा जाता है। कुछ उबले आलू-बूंदी का नाम मात्र का मसाला भी साथ में होता है। असल भरावन पानी की होती है जो खट्टा-तीखा, खट्ठा-मीठा या सिर्फ मीठा हो सकता है। इसीलिए इसे पानीपूरी कहा जाता है। पानी पूरी के लिए सबसे मुफीद नाम गोलगप्पा ही है और काफी मशहूर भी।
पानीपूरी, फुलकी या पानी पताशा जैसे नाम इलाकाई पहचान रखते हैं मगर इस स्वादिष्ट खोमचा पक्वान्न के गोलगप्पा नाम को अखिल भारतीय सर्वस्वीकार्यता मिली हुई है। इसकी छोटी छोटी पूरियों के गोल-मटोल आकार की वजह से गोल शब्द तो एकदम सार्थक है। संस्कृत की गुडः धातु का अर्थ होता है पिंड। गोलः शब्द इससे ही बना है जिसका अर्थ होता है गोल, मंडलाकार वस्तु। मगर गप्पा का क्या अर्थ हुआ? आमतौर पर मुंह के रास्ते किसी चीज़ को निगलने के लिए गप् शब्द का प्रयोग होता है। इसे देशज शब्द बता कर इसकी व्युत्पत्ति को अज्ञात खाते में डाला जाता रहा है। मगर ऐसा नहीं है।
गप् शब्द पर गौर करें तो किसी स्वादिष्ट पदार्थ को समूचा या मीठे बताशेऔर ये पानी बताशे…पानी पूरी की छोटी छोटी फुलकियों को हवा से भरी पूरी के अर्थ में बताशा कहना तार्किक है… निवाले में एकबारगी उदरस्थ करने का भाव है। मराठी में एक मुहावरा है ‘गप्प’ यानी एकदम खामोश। हिन्दी में गुपचुप शब्द का जो भाव है वही मराठी के गप्प में है। खामोशी का अर्थ है अस्तित्व का पता न चलना। अस्तित्व का बोध करानेवाला महत्वपूर्ण तत्व ध्वनि है। यह गप्प या गुपचुप दरअसल संस्कृत की गुप् धातु से आ रहा है जिससे ही हिन्दी का गुप्त शब्द बना है जिसका अभिप्राय होता है छुपना, छुपाना, ढकना। पसंदीदा खाद्यपदार्थ को झटपट रसना का स्पर्श कराए बिना सीधे पेट में उतारने की प्रक्रिया पर गौर करें तो पता चलेगा कि किस तरह देखते ही देखते एक स्वाद-लोलुप स्वादिष्ट पदार्थ को ‘गुप्त’ कर देता है। गुप्त से ही बना है गुप शब्द जिसका चुप के साथ मेल होकर गुपचुप जैसा समास बनता है। साफ़ है कि गुप्त के ग़ायबाना अंदाज़ में ही छुपा है गोलगप्पा के गप्पा का राज़। एक स्वादिष्ट गोल पूरी को गप से खा जाने का भाव ही इसमें प्रमुख है। य़ूं भी हिन्दुस्तानी समाज में नाज़नीनों और पर्दानशीनों के गुपचुप गोलगप्पे खाने की अदाओं और तरीकों से कौन वाकिफ नहीं है। गोलगप्पे गुपचुप खाने की चीज़ ही तो हैं!!!
अब आते हैं पानी पताशा पर। यह बना है बताशा शब्द से जिससे सब परिचित है। बताशा एक ऐसी खुश्क मिठाई है जो शकर से बनती है। जॉन प्लैट्स के कोश में बताशा की व्युत्पत्ति वात+आस+कः बताई गई है। स्पष्ट है कि वाताशकः>वाताशअ>वाताशा होते हुए बताशा शब्द बन गया। इसका अर्थ हुआ ऐसा पदार्थ जिसके अंदर वात यानी हवा भरी गई हो। इसे बनाने की प्रक्रिया के तहत इसमें हवा रखी जाती है। बताशा अंदर से खोखला होता है और चारों और शकर की गोल पतली परत होती है। बताशा मुंह में रखते ही घुल जाता है इसलिए बताशा सा घुलना एक मुहावरा भी बन गया है। सबमें जल्दी घुलने-मिलने के अर्थ में इसका प्रयोग होता है। प्रायः हर भारतीय तीज-त्योहार-पर्व पर भोग सामग्री का महत्वपूर्ण अंग है इसीलिए रोज उत्सवी ठाठ दिखाने वाले लोगों के लिए बताशे फोड़ना जैसा मुहावरा भी चल पड़ा है। इस तरह से पानी पूरी की छोटी छोटी फुलकियों को हवा से भरी पूरी के अर्थ में बताशा कहना तार्किक है। इसके लिए फुलकी शब्द इसीलिए प्रचलित हुआ क्योंकि ये फूली रहती हैं। गोलमटोल फूली हुई रोटी फुलका कहलाती है तो उसका छोटा रूप हुआ फुलकी।

रविवार, 26 अप्रैल 2009

हिन्दी में ब्लॉग लेखन की विधा : संजय बेंगाणी

हिन्दी में ब्लॉग लेखन की विधा, इसकी तकनीक और इसके प्रभाव से लेकर हिन्दी ब्लॉग लेखन को आप कैसे अपने कैरियर में बदल सकते हैं, इन सभी विषयों पर प्रस्तुत है यह रोचक और शोधपूर्ण आलेख।

ब्लॉग को आप अपनी ऑन लाइन डायरी कह सकते है। आपके आसपास की कोई घटना हो या गतिविधि, या कोई दिल को छूने वाली कोई बात, आप अपनी बात किसी कविता के माध्यम से कहना चाहते हों या किसी भी समसामयिक विषय पर अपनी टिप्पणी लिखना चाहते हों, इसके लिए आपको अब अखबारों के संपादक या प्रकाशक की मेहरबानी की ज़रुरत नहीं। आज के दौर में अपनी बात को अपरिचितों से लेकर हजारों-लाखों अनजान लोगों तक पहुँचाने का सस्ता, सुलभ और असरकारी साधन है, आपका चिट्ठा यानी ब्लॉग। समाचारपत्र या पत्रिकाओं में प्रकाशित आपकी बात को कहने को तो बहुत लोग पढ़ते हैं मगर ये पढ़ने वाले वो लोग होते हैं जनको न तो आपसे और न आपके लिखे हुए से कोई लेना-देना होता है, और अगर कोई पाठक आपसे जुड़ना चाहे तो वह आपसे संपर्क भी नहीं कर सकता है। जबकि ब्लॉग पर लिखी गई आपकी बात हमेशा हर समय मौजूद रहती है इसके माध्यम से दुनिया के किसी भी कोने में बैठा कोई भी व्यक्ति आपसे तत्काल संपर्क कर सकता है। अगर आपकी बात किसी को पसंद आ जाए तो आपको उस विषय पर लिखने के लिए प्रस्ताव भी मिल सकता है और आप घर बैठे अपने लिखने का शौक पूरा करते हुए खूब पैसा कमा सकते है। यानी ब्लॉग पर लिखना, लिखने का शौक ही पूरा नहीं करता बल्कि आपके शौक के बदले में कमाई का जरिया भी बन सकता है। अगर आपके मन में लिखते हुए पैसा कमाने के बारे में किसी भी प्रकार की जिज्ञासा, हिचक या अड़चन है तो हमसे तत्काल संपर्क करें, हिन्दी मीडिया आपको ऐसे लोगों से जोड़ने की कोशिश करेंगे जिनको आप जैसे लोगों की जरुरत है।

हिन्दी ब्लॉग का इतिहास

हिन्दी ब्लॉग लेखन का इतिहास ज्यादा पुराना नहीं है। पहले पहल ज्ञात हिन्दी ब्लॉग आलोक व विनय द्वारा लिखे गये थे। तब से लेकर अब तक एक लम्बा सफर तय हो चुका है। आज हजारों हिन्दी ब्लॉगर सक्रिय है। तकनीकी समस्याएं भी अब काफी हद तक दूर हो गई है। यूनिकोड ने पहले ही हिन्दी की राह आसान बना दी थी, मगर शुरुआती दौर में हिन्दी लिखने के औजारों से लेकर अनेक समस्याएं थी, जिन्हे हिन्दी को नेट पर एक सम्मानित स्थान दिलाने को कृतसंकल्प तकनीक से सुसज्ज लोगो ने रात दिन एक कर सुलझाया और आज भी 24 घंटे सहायता के लिए उपलब्ध रहते है। हिन्दी ब्लॉगरी के इतिहास के बारे में सरस विवरण जाने-माने हिन्दी ब्लॉगर जितेन्द्र चौधरी के शब्दों में यहाँ पढ़ा जा सकता है। विभिन्न स्थलो पर लिखे जा रहे हिन्दी ब्लॉगो को एक ही स्थान पर अद्यतित होते तथा उनकी कड़ियों को नारद , चिट्ठाजगत तथा ब्लॉगवाणी पर देख सकते है।

ब्लॉग कहाँ लिखे जाते है?

ब्लॉग लेखन के लिए वर्डप्रेस, ब्लॉगर, लाइव जनरल जैसे स्थल मुफ्त सेवा प्रदान करते है। इसके अलावा निजी डोमेन पर भी ब्लॉग लिखे जा रहे है। अब हिन्दी मीडिया ने भी ब्लॉग लेखन की सुविधा प्रदान की है। इसके लिए आपको हिन्दी मीडिया की साइट पर लॉग इन (सत्रारम्भ) करना होगा, फिर "ब्लॉग लिखें" लिंक (कड़ी) पर जा कर आप अपना ब्लॉग लिखना शुरु कर सकते हैं।

जानें ब्लॉग की भाषा

ब्लॉग लेखन की शुरूआत अंग्रेजी में हुई वहीं नेट पर भी अंग्रेजी का अधिपत्य है, ऐसे में ब्लॉग लिखने से संबंधित अधिकांश शब्द अंग्रेजी के ही है, लेकिन ये तकनीकी शब्द हैं और आसानी से समझ में आने वाले हैं। वहीं किसी चीज के लिए पहले से ही उपलब्ध हिन्दी के शब्दों का प्रयोग करने से भी न बचे, क्योंकि हिन्दी का अपना सौन्दर्य है, शैली है। एक ब्लॉगर के रूप में अपने ब्लॉग को आम बोलचाल की सीधी-साधी भाषा में लिखें और तकनीकी शब्दों को बजाय हिन्दी का कोई भौंडा अनुवाद लिखने के उनको मूल अंग्रेजी में ही लिखें।

यहाँ कुछ ऐसे हिन्दी शब्दों की सूची है जो हजारों हिन्दी ब्लॉगर और उनसे कई गुना ज्यादा उनके पाठक भी मजे से उपयोग में ले रहे है, ये वे शब्द है जो आप हिन्दी ब्लॉग लिखते समय ध्यान में रखें तो एक दो दिन में ये परिचित से लगेंगे और अंग्रेजी के बेवजह प्रयोग से भी बच जायेंगे और हमारी हिन्दी भाषा भी विकृत होने से बचेगी।

ARE YOU REALLY AN ENGINEER: Jaddish Jain

`CHECK; ARE YOU REALLY AN ENGINEER...?'



* A person with specific identity must know the meaning of that word. For example an engineer must know the meaning of the word Engineer.

* In practice or in common men's language the two words engineer and technocrat appears to be identical, but it is not so.

* Word engineer appears to be derived from word engine=in+gine = इन अर्थात अन्दर जिन अर्थात विजेता, यानि जिसके अन्दर विजेता हो।

* By adding ‘er' it becomes living noun. B.E. means Bachelor of Engineering अर्थात अन्दर की विजेता शक्ति को कार्य मे परिणीत करने वाला स्नातक। a man with most of the below listed qualities must be defined or designated as an engineer. Engineer means a man with:
+Ingenuousness = चतुराई
+Ingenuity = निपुणता
+Freedom = स्वतन्त्र, बन्धन रहित
+Ingenuous = कल्पना शक्ति युक्त
+Frank = स्पष्ट वक्ता, शुद्ध भाव युक्त
+Honorable = सम्माननीय, आदरणीय
+Free from deception = मिथ्या/ प्रपंच रहित
+Genius = प्रतिभाशाली
+Turn of mind = अपूर्व बुद्धि

* He will always be sincere, honest and can not be over ruled by any body else.

* Technocrat or technologist means a tactful man. B.Tech means Bachelor of Technology or in true sense Bachelor of Tactics or Tricks अर्थात तिकड़मबाजी का स्नातक.
+Tactics= व्यूह रचना, तिकड़मबाजी
+Tricks= माया युक्त, प्रपंच युक्त, मायावी

* One can be trained as a technologist but never as an engineer. Engineer is by birth and the qualities are god gifted. Engineer is always a man of constructive attitude.

* Human errors are unavoidable. One can minimize errors by honesty/sincerity. मानवीय त्रुटियां निष्ठापूर्वक कार्य करने से न्यूनतम की जा सकती हैं.

* The only person who does not make mistakes is who does nothing. केवल वही मनुष्य त्रुटि नहीं करता है, जो कुछ नहीं करता है.

* It is easy to find mistakes but to make corrections is a difficult task. त्रुटियां निकालना/इंगित करना कठिन नहीं है, त्रुटियों का निराकरण करना कठिन है.

* It is not enough to make progress. It is more important to make it in the right direction. प्रगति करना ही पर्याप्त नहीं है। प्रगति की दिशा सही होना अधिक महत्वपूर्ण है.

* A technologist is not supposed to remember all the data's; he is supposed to know how a problem is to be tackled.

* An Engineer will always discharge his duties judiciously.

* The judicious man always adopts the path of sincerity which is the path of least time and travel. He learns till death and thus enjoys his life. 2+2=4 is right and one can answer within no time, but if 2+2=4 is not allowed then one can never answer it and his whole life will go to waste.

* Working of an Engineer is always quality based. He always remebers the following lines:

(1)

सुखस्य मूलं धर्मः

धर्मस्य मूलं अर्थः

अर्थस्य मूलं वाणिज्यं

वाणिजस्य मूलं स्वराज्यः

स्वराज्यस्य मूलं चारित्रयं



(2)

`HONESTY'

The person,

Who is patriot?

The person,

Who is honest?

His performance

Will be the best,

Behind him will be

The rest,

Don't need exam.

Don't need any test

Who is honest?

He will be the best.


(3)

`जननी जन्म भूमि'

जन्म भूमि की

माटी का ऋण,

कभी नहीं उतरता है,

जरा उसकी सोचिये,

जो देश के साथ भी

कुकर्म करता है,

ऐसा मनुष्य भले ही

खुशहाल दीखता हो

पर, अन्त समय,

सड़-सड़कर मरता है.

* Correct and character words are complementary. If a man is of character his doing will be correct, whatever he will deliver will be correct.

* Now one can easily check himself whether he is an Engineer or not....? If you are publicly known as an Engineer, please check it whether it is true or not.......?

Coutsey : Hindimedia।in

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REORGANIZATION of PUBLIC WORKS DEPARTMENTS IN INDIA

REORGANIZATION of PUBLIC WORKS DEPARTMENTS IN INDIA courtsey: hindi media

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MyBlog | Written by THE ROADS | शुक्रवार , 24 अप्रेल 2009

Public works departments in India whether central or states are mainly responsible for roads and buildings.

* Road network is backbone for socioeconomic development of a Nation.

* Healthy is backbone better will be out put. In any country condition of roads and the manners how travelers use them reflects about the whole system of that country.

* It is an indicator of SOBRIETY, DECENCY and PROSPERITY of a Nation.

* Every Government and public man will prefer to have better roads. Better Roads need better construction quality, better maintenance.



`SYSTEM'

In this universe all the happenings are performed under a system. No activity can be performed with out a system, whether it is related to living or non living or both. A system is said to be perfect if desired result is achieved economically i.e. on both the axis time and cost, and this is known as productivity. But if cost factor is not accounted and production is more, then it is production based result and productivity is not achieved.

Basically there are two components i.e. input, in carrying out any work or process and will result into out put. In absolute case these two components must be equal i.e. out must be equal to input, but it is not so. Because of some losses are unavoidable.

Thus if we further divide a system there will be total five components of a system:



`तन्त्र System'



I fact En+M+Ex must be equal to out put `O', but in spite of all care, precautions the three components can not be equal to out put. There will be some losses. These losses may be in terms of materials, labor, tolerance or quality. To minimize these losses on account of quality is known as quality assurance. If a job is carried with uttermost sincerity, honesty then one can achieve stipulated quality.

Here we aimed to discuss the departmental system. For better working the things should be well defined. And for that we need a prefect departmental set up.

The present system of P.W.Ds is out dated. It might be suitable for British who established this department. British were enough honest towards their duty and government. At that time this country was salve. But now a day this is not the position. So it was the primary duty of the government to organize not this but all the department of this country according to the need of an independent country. Not all at one time but step by step. We could not do it and the result is before us.

SMOSEY is a new organization with web site http://www.samoseyindia.com/. The samosey doesn't mean the delicious India dish.

This samosey mean: SOLUTION + MAKING + SAYSTEM (SMS).

And it our National language: स + मो + से = संकट + मोचन + सेवा.

Samosey will give you absolute solution of your problem.

Here we will give a brief for the Reorganization of Sate Public Works Departments



`सारांश'

किसी भी देश की शासन व्यवस्था के अनुसार ही उस देश की प्रशासन-प्रणाली होनी चाहिए अन्यथा देश को दुर्व्यवस्था का सामना करना पड़ता है, राजतन्त्र हो अथवा जनतन्त्र/ प्रजातन्त्र। शासन/ प्रशासन तीन प्रकार का होता हैः- (1) स्वतन्त्र (2) परतन्त्र (3) स्वच्छन्द। इनमें स्वतन्त्र शासन/ प्रशासन प्रणाली श्रेष्ठ एवं यथेष्ठ होती है, जो कि नैतिक जनों की आकांक्षाओं के अनुरूप होती है। स्वतन्त्र प्रणाली में शासन/ प्रशासन, कर्मियों/ जन साधारण के कर्तव्य व अधिकार में सन्तुलन होता है। निष्ठापूर्वक व सत्यवृत्ति से कार्य करने वाले जनों के बाहुल्य से स्वतन्त्र कार्य प्रणाली स्थापित होती है।

वर्तमान में इस देश के अंग्रेजों द्वारा परतन्त्र भारत की व्यवस्था के लिए बनाये गये विभाग व तत्कालीन प्रशासन प्रणाली लागू है। स्वतन्त्र भारत में उस प्रणाली में सुधार के नाम पर ‘मुफ्लिसी के काबः पर पैबन्द सीने (रखने) की तरह' संशोधन किये जाते रहते हैं। वस्तुतः परतन्त्रता की कार्यप्रणाली में आमूल-चूल परिवर्तन की आवश्यकता थी/ है।

इस लेख में स्वतन्त्रता के अनुरूप व्यवस्था के मौलिक विचारों को लिपिबद्ध किया गया है। और इसके लिए सर्वप्रथम ‘लोक निर्माण विभाग' को चुना गया है। इसी Outline पर अन्य विभागों का भी पुनर्गठन किया जा सकता है। इस पुनर्गठन लेख का उद्देश्य प्रतिभाजनों को, देश की प्रशासनिक व्यवस्था के विषय में सोचकर, राष्ट्रहित का एक समाधान सोचने के लिए प्रोत्साहित करना है. जिससे कि वर्तमान में व्याप्त बुराईयों का निराकरण होकर, अच्छाई का सूत्रपात हो, और इस देश को हो रही दुर्गति से उबारा जा सके।



विषय सूची

1.0 प्राक्कथन

2.0 लोक निर्माण विभाग, अतीत व वर्तमान पर एक दृष्टि

3.0 कार्य प्रणाली में परिवर्तन की आवश्यकता

4.0 परिवर्तन की रूपरेखा

5.0 विभिन्न पदों का वेतनमान व कार्य ढांचे में विवरण

5.1 तकनीकी पदों का विवरण व वेतनमान

5.2 लेखा वर्ग के पदों का विवरण

5.3 लिपिक वर्ग के पदों का विवरण

5.4 कम्प्यूटर प्रोग्रामर, भूमि अध्याप्ति, रेखाकार व मानचित्रकार आदि के पदों का विवरण

5.5 मार्गों व भवनों के निर्माण व अनुरक्षण के अन्तर्गत पदों का विवरण

5.6 कार्य ढांचे में कार्यालय व पदों का विवरण

6.0 नियुक्ति, पदोन्नति व अर्हता

6.1 (अ) नियुक्ति की प्रणाली

6.1 (ब) पदोन्नति की प्रणाली

6.2 अन्य पदों हेतु

7.0 वेतनमानों का ढ़ाँचा

7.1 तकनीकी पदों के वेतनमान

क- पदोन्नति वेतनमान

ख- क्रमशः वेतनमान

7.2 अन्य पदों हेतु वेतनमान

8.0 सेवाओं की प्रकार

9.0 कार्य दिवस व अवकाश

10.0 अनवरत शिक्षा-दीक्षा व अध्यापन

10.1 शिक्षा दीक्षा का उद्देश्य

10.2 शिक्षा दीक्षा के विषय

अ- तकनीकी पदधारियों हेतु

ब- अन्य कर्मियों हेतु

11.0 शोध व आविष्कार

12.0 डिजाइन, अन्वेषण व टैस्टिंग कार्य

13.0 अन्य महत्वपूर्ण बिन्द

13.1 स्वेच्छा से सेवा निवृत्ति

13.2 यात्रा भत्ता

13.3 राजकीय आवास

13.4 स्थानान्तरण

13.5 अधिष्ठान व्यय

14.0 कार्य सम्पादन सम्बन्धित व्यवस्थायें

14.1 शैडयूल आफ रेट का परिवद्र्दन

14.2 निविदाओं पर निर्णय

14.3 वित्तीय अधिकार

14.4 मार्गों/भवनों से होने वाली आय

14.5 मार्ग व यात्री

14.6 मार्ग/भवनों के अनुरक्षण हेतु श्रमिक दल

14.7 मशीनें

(1) जीप/स्टाफ कार

(2) वाहन खरीदने हेतु ऋण

(3) ट्रक व रोलर

(4) मिक्सर व वाईब्रेटर

14.8 कार्यालयों की स्टेशनरी, अन्य साज सज्जा व टेलीफोन आदि मद

14.9 अपव्यय

15.0 मार्गों पर अतिक्रमण यातायात नियंत्रण आदि के सम्बन्ध में

16.0 सम्पादित कार्यों की मापों को अंकित करना

1. उप इंजीनियर (Sub Engineer)

2. इकाई अभियन्ता (Unit Engineer)

3. उपमण्डल अधिकारी (Sub Divisional Officer)

17.0 सम्पादित कार्यों व सेवा का मूल्यांकन

18.0 कार्य प्रणाली को लागू करना

19.0 उपसंहार

20.0 साभार

REFERENCES



1.0 प्राक्कथन

जीवन में जड़ता की तुलना में गति/ परिवर्तन श्रेष्ठ होता है। लम्बे समय का ठहराव जीवन को नीरस बना देता है। एक ही व्यवस्था/ कार्य प्रणाली लम्बे समय तक यथावत बनी रहने पर चरमराने लगती है। ठीक उसी तरह जैसे उपयोगितावधि (Service life) पूरी हो जाने पर वाहन का उपयोग भी मितव्ययी (Economical) नहीं रह जाता है। इस प्रकार वाहन और कार्य प्रणाली दोनों ही समय से पूर्व खटारा हो जाती है। और तदन्तर अनुपयोगी व दुखःदायी हो जाती हैं। अधिकांश विभागों/ कार्य प्रणाली का सृजन अंग्रेजों ने परतन्त्र भारत के दोहन/ शोषण के लिए किया था। अंग्रेजों की बनायी वह प्रणाली स्वतन्त्र भारत के लिए अनुपयोगी थी, और हैं। इस देश को स्वतन्त्र भारत के अनुरूप प्रशासनिक/ अन्य विभागों के ढ़ाचों व तदानुसार ही उनकी कार्य प्रणाली की आवश्यकता थी. किन्तु ऐसा न हो सका, और ‘मुफ्लिसी‘ के काबः पर पैबन्द लगाने‘ की तरह परतन्त्रता की कार्य प्रणाली पर असंगत संशोधन के पैबन्द लगाते रहे/ रहते हैं।

परतन्त्र भारत के एक जनपद की प्रशासनिक व्यवस्था हेतु अंग्रेजों ने मुख्य रूप से जिलाधीश (Collector means a man who is responsible to collect the revenue) पुलिस अधीक्षक/ कप्तान व जिला जज (District Judge) तीन अधिकारियों की व्यवस्था की थी। अंग्रेजों का मुख्य उद्देश्य लगान वसूल करने (To collect the revenue), इस कार्य में व्यवधान डालने वालों को दंडित करने, स्वतन्त्रता के लिए प्रयासरत आजादी के अमर सैनानियों को हतोत्साहित करने, अर्थात लाठियों से पिटवाने, गोली मरवाने, जेल में डालने, फाँसी दिलवाने का था। इसलिए अंग्रेजों ने परतन्त्र भारत की प्रशासनिक व्यवस्था, अन्य विभागों की व्यवस्था अपने इस शोषण व दोहन के स्वार्थ को ध्यान में रखकर की थी। इन तीनों पदों पर उन्होंने अंग्रेज व अंग्रेजियत कृत भारतीयों को नियुक्त किया था। और इस प्रकार वें लम्बे समय तक भारत को परतन्त्र बनाये रखने में सफल रहे। अंग्रेजों द्वारा सृजित इस व्यवस्था को स्वतन्त्र देश की प्रशासनिक व्यवस्था के अनुरूप नहीं कहा जा सकता है। और इसमें क्या बुराईयाँ हैं, इसके लिए इस स्वतन्त्र देश की वर्तमान दुर्दशा इसका जीता-जागता साक्ष्य/ उदाहरण है। प्रशासन की तरह ही अन्य विभागों की व्यवस्था है। यहाँ सभी विभागों की प्रशासनिक व्यवस्था, कार्य प्रणाली का विवेचन एक साथ इस लेख में संभव नहीं है। यहाँ केवल लोक निर्माण विभाग को लक्ष्य कर विवेचना की गई है और उसे स्वतन्त्र देश के अनुरूप करने के सुझाव उपाय प्रस्तुत किये गये हैं। अन्य विभागों के लिये भी सुझाव दिये जा सकते हैं।

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ग़ज़ल : मनु बेतखल्लुस, दिल्ली.

बेखुदी, और इंतज़ार नहीं,
छोड़ आई नज़र क़रार कहीं

तेरी रहमत है, बेपनाह मगर
अपनी किस्मत पे ऐतबार नहीं

निभे अस्सी बरस, कि चार घड़ी
रूह का जिस्म से, क़रार नहीं

सख्त दो-इक, मुकाम और गुजरें,
फ़िर तो मुश्किल, ये रह्गुजार नहीं

काश! पहले से ये गुमाँ होता,
यूँ खिजाँ आती है, बहार नहीं

अपने टोटे-नफे के राग न गा,
उनकी महफिल, तेरा बाज़ार नहीं

जांनिसारी, कहो करें कैसे,
जां कहीं, और जांनिसार कहीं

लेख : भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र, 'सलिल'

आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल' / संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम
लेख :
भवन निर्माण संबन्धी वास्तु सूत्र
वास्तुमूर्तिः परमज्योतिः वास्तु देवो पराशिवः
वास्तुदेवेषु सर्वेषाम वास्तुदेव्यम नमाम्यहम्
समरांगण सूत्रधार, भवन निवेश
वास्तु मूर्ति (इमारत) परम ज्योति की तरह सबको सदा प्रकाशित करती है. वास्तुदेव चराचर का कल्याण करनेवाले सदाशिव हैं. वास्तुदेव ही सर्वस्व हैं वास्तुदेव को प्रणाम. सनातन भारतीय शिल्प विज्ञानं के अनुसार अपने मन में विविध कलात्मक रूपों की कल्पना कर उनका निर्माण इस प्रकार करना कि मानव तन और प्रकृति में उपस्थित पञ्च तत्वों का समुचित समन्वय व संतुलन इस प्रकार हो कि संरचना का उपयोग करनेवालों को सुख मिले, ही वास्तु विज्ञानं का उद्देश्य है.
मनुष्य और पशु-पक्षियों में एक प्रमुख अन्तर यह है कि मनुष्य अपने रहने के लिए ऐसा घर बनते हैं जो उनकी हर आवासीय जरूरत पूरी करता है ज्ब्म्क अन्य प्राणी घर या तो बनाते ही नहीं या उसमें केवल रात गुजारते हैं. मनुष्य अपने जीवन का अधिकांश समय इमारतों में ही व्यतीत करते हैं.
एक अच्छे भवन का परिरूपण कई तत्वों पर निर्भर करता है. यथा : भूखंड का आकार, स्थिति, ढाल, सड़क से सम्बन्ध, दिशा, सामने व आस-पास का परिवेश, मृदा का प्रकार, जल स्तर, भवन में प्रवेश कि दिशा, लम्बाई, चौडाई, ऊँचाई, दरवाजों-खिड़कियों की स्थिति, जल के स्रोत प्रवेश भंडारण प्रवाह व् निकासी की दिशा, अग्नि का स्थान आदि. हर भवन के लिए अलग-अलग वास्तु अध्ययन कर निष्कर्ष पर पहुचना अनिवार्य होते हुए भी कुछ सामान्य सूत्र प्रतिपादित किए जा सकते हैं जिन्हें ध्यान में रखने पर अप्रत्याशित हानि से बचकर सुखपूर्वक रहा जा सकता है.
* भवन में प्रवेश हेतु पूर्वोत्तर (ईशान) श्रेष्ठ है. उत्तर, पश्चिम, दक्षिण-पूर्व (आग्नेय) तथा पश्चिम-वायव्य दिशा भी अच्छी है किंतु दक्षिण-पश्चिम (नैऋत्य), पूर्व-आग्नेय, उत्तर-वायव्य तथा दक्षिण दिशा से प्रवेश यथासम्भव नहीं करना चाहिए. यदि वर्जित दिशा से प्रवेश अनिवार्य हो तो किसी वास्तुविद से सलाह लेकर उपचार करना आवश्यक है.
* भवन के मुख्या प्रवेश द्वार के सामने स्थाई अवरोध खम्बा, कुआँ, बड़ा वृक्ष, मोची मद्य mans आदि की दूकान, गैर कानूनी व्यवसाय आदि नहीं हो.
* मुखिया का कक्ष नैऋत्य दिशा में होना शुभ है.
* शयन कक्ष में मन्दिर न हो.
* वायव्य दिशा में कुंवारी कन्याओं का कक्ष, अतिथि कक्ष आदि हो. इस दिशा में वास करनेवाला अस्थिर होता है, उसका स्थान परिवर्तन होने की अधिक सम्भावना होती है.
* शयन कक्ष में दक्षिण की और पैर कर नहीं सोना चाहिए. मानव शरीर एक चुम्बक की तरह कार्य करता है जिसका उत्तर ध्रुव सिर होता है. मनुष्य तथा पृथ्वी का उत्तर ध्रुव एक दिशा में ऐसा तो उनसे निकलने वाली चुम्बकीय बल रेखाएं आपस में टकराने के कारण प्रगाढ़ निद्रा नहीं आयेगी. फलतः अनिद्रा के कारण रक्तचाप आदि रोग ऐसा सकते हैं. सोते समय पूर्व दिशा में सिर होने से उगते हुए सूर्य से निकलनेवाली किरणों के सकारात्मक प्रभाव से बुद्धि के विकास का अनुमान किया जाता है. पश्चिम दिशा में डूबते हुए सूर्य से निकलनेवाली नकारात्मक किरणों के दुष्प्रभाव के कारण सोते समय पश्चिम में सिर रखना मना है.

* भारी बीम या गर्डर के बिल्कुल नीचे सोना भी हानिकारक है.
* शयन तथा भंडार कक्ष सेट हुए न हों.
* शयन कक्ष में आइना रखें तो ईशान दिशा में ही रखें अन्यत्र नहीं.
* पूजा का स्थान पूर्व या ईशान दिशा में इस तरह ऐसा की पूजा करनेवाले का मुंह पूर्व दिशा की ओर तथा देवताओं का मुख पश्चिम की ओर रहे. बहुमंजिला भवनों में पूजा का स्थान भूतल पर होना आवश्यक है. पूजास्थल पर हवन कुण्ड या अग्नि कुण्ड आग्नेय दिशा में रखें.
* रसोई घर का द्वार मध्य भाग में इस तरह हो कि हर आनेवाले को चूल्हा न दिखे. चूल्हा आग्नेय दिशा में पूर्व या दक्षिण से लगभग ४'' स्थान छोड़कर रखें. रसोई, शौचालय एवं पूजा एक दूसरे से सटे न हों. रसोई में अलमारियां दक्षिण-पश्चिम दीवार तथा पानी ईशान में रखें.
* बैठक का द्वार उत्तर या पूर्व में हो. deevaron का रंग सफेद, पीला, हरा, नीला या गुलाबी हो पर लाल या काला न हो. युद्ध, हिंसक जानवरों, शोइकर, दुर्घटना या एनी भयानक दृश्यों के चित्र न हों. अधिकांश फर्नीचर आयताकार या वर्गाकार तथा दक्षिण एवं पश्चिम में हों.
* सीढियां दक्षिण, पश्चिम, आग्नेय, नैऋत्य या वायव्य में हो सकती हैं पर ईशान में न हों. सीढियों के नीचे शयन कक्ष, पूजा या तिजोरी न हो. सीढियों की संख्या विषम हो.
* कुआँ, पानी का बोर, हैण्ड पाइप, टंकी आदि ईशान में शुभ होता है, दक्षिण या नैऋत्य में अशुभ व नुकसानदायक है.
* स्नान गृह पूर्व में, धोने के लिए कपडे वायव्य में, आइना पूर्व या उत्तर में गीजर तथा स्विच बोर्ड आग्नेय में हों.
* शौचालय वायव्य या नैऋत्य में, नल ईशान पूव्र या उत्तर में, सेप्टिक टंकी, उत्तर या पूर्व में हो.
* मकान के केन्द्र (ब्रम्ह्स्थान) में गड्ढा, खम्बा, बीम आदि न हो. यह स्थान खुला, प्रकाशित व् सुगन्धित हो.
* घर के पश्चिम में ऊंची जमीन, वृक्ष या भवन शुभ होता है.
* घर में पूर्व व् उत्तर की दीवारें कम मोटी तथा दक्षिण व् पश्चिम कि दीवारें अधिक मोटी हों. तहखाना ईशान, या पूर्व में तथा १/४ हिस्सा जमीन के ऊपर हो. सूर्य किरंनें तहखाने तक पहुंचना चाहिए.
* मुख्य द्वार के सामने अन्य मकान का मुख्य द्वार, खम्बा, शिलाखंड, कचराघर आदि न हो.
* घर के उत्तर व पूर्व में अधिक खुली जगह यश, प्रसिद्धि एवं समृद्धि प्रदान करती है.
वराह मिहिर के अनुसार वास्तु का उद्देश्य 'इहलोक व परलोक दोनों की प्राप्ति है. नारद संहिता, अध्याय ३१, पृष्ठ २२० के अनुसार-
अनेन विधिनन समग्वास्तुपूजाम करोति यः
आरोग्यं पुत्रलाभं च धनं धन्यं लाभेन्नारह.
अर्थात इस तरह से जो व्यक्ति वास्तुदेव का सम्मान करता है वह आरोग्य, पुत्र धन - धन्यादी का लाभ प्राप्त करता है.
- आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
संजिव्सलिल.ब्लागस्पाट.कॉम / सलिल.संजीव@जीमेल.कॉम

Book Review: Showers to the Bowers : Poetry full of emotions- 'Salil'

Book Review

Showers to the Bowers : Poetry full of emotions

(Particulars of the book _ Showers to Bowers, poetry collection, N. Marthymayam 'Osho', pages 72, Price Rs 100, Multycolour Paperback covr, Amrit Prakashan Gwalior )

Poetry is the expression of inner most feelings of the poet. Every human being has emotions but the sestivity, depth and realization of a poet differs from others. that's why every one can'nt be a poet. Shri N. Marthimayam Osho is a mechanical engineer by profession but by heart he has a different metal in him. He finds the material world very attractive, beautiful and full of joy inspite of it's darkness and peshability. He has full faith in Almighty.

The poems published in this collection are ful of gratitudes and love, love to every one and all of us. In a poem titled 'Lending Labour' Osho says- ' Love is life's spirit / love is lamp which lit / Our onus pale room / Born all resplendor light / under grace, underpeace / It's time for Divine's room / who weave our soul bright. / Admire our Aur, Wafting breez.'

'Lord of love, / I love thy world / pure to cure, no sword / can scan of slain the word / The full of fragrance. I feel / so charming the wing along the wind/ carry my heart, wchih meet falt and blend' the poem ' We are one' expresses the the poet's viewpoint in the above quoted lines.

According to famous English poet Shelly ' Our sweetest songs are those that tell of saddest thought.' Osho's poetry is full of sweetness. He feels that to forgive & forget is the best policy in life. He is a worshiper of piece. In poem 'Purity to unity' the poet say's- 'Poems thine eternal verse / To serve and save the mind / Bringing new twilight to find / Pray for the soul's peace to acquire.'

Osho prays to God 'Light my life,/ Light my thought,/ WhichI sought.' 'Infinite light' is the prayer of each and every wise human being. The speciality of Osho's poetry is the flow of emotions, Words form a wave of feelings. Reader not only read it but becomes indifferent part of the poem. That's why Osho's feeliongs becomes the feelings of his reader.

Bliss Buddha, The Truth, High as heaven, Ode to nature, Journey to Gnesis, Flowing singing music, Ending ebbing etc. are the few of the remarkable poems included in this collection. Osho is fond of using proper words at proper place. He is more effective in shorter poems as they contain ocean of thoughts in drop of words. The eternal values of Indian philosophy are the inner most instict and spirit of Osho's poetry. The karmyoga of Geeta, Vasudhaiv kutumbakam, sarve bhavantu sukhinah, etc. can be easily seen at various places. The poet says- 'Beings are the owner of their action, heirs of their action" and 'O' eternal love to devine / Becomes the remedy.'

In brief the poems of this collection are apable of touching heart and take the reader in a delighted world of kindness and broadness. The poet prefers spirituality over materialism.

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Contact Acharya Sanjiv Verma 'Salil', email : salil.sanjiv@gmail.com / blog: sanjivsalil.blogspot.com

शब्द यात्रा : मार्कोपोलो -अजित वडनेरकर

वे लोग दस दिन बिना खाना खाए घुड़सवारी करते रहते थे और अपनी शारीरिक शक्ति बनाये रखने की लिए घोड़े की कोई नस खोल कर खून की धार को अपने मुंह मे छोड़ देते। मंगोल सैनिकों की इसी शारीरिक शक्ति ने उन्हें संसार का सबसे बड़ा अर्धांश जीतने में सहायता दी। असली मंगोल लोग इसी तरह की होते थे।
निरंतर सैन्य अभियानों में व्यस्त रहने वाले मंगोल सैनिकों की एक बानगी भर पेश करता है उपरोक्त वाक्य। वेनिस के इतिहास प्रसिद्ध यात्री ''मार्कोपोलो'' के यात्रा अनुभवों पर आधारित पुस्तक का ये अंश है और किताब बहुत रोचक है। ये पुस्तक 13वी सदी में मार्कोपोलो और उसके पिता की वेनिस से पीकींग तक की यात्रा का वर्णन करती है। मार्कोपोलो की पुस्तक का मूलपाठ मौले और पेलियट का अनुवाद है। इस पुस्तक के लेखक मॉरिस कॉलिस हैं और अनुवादक उदयकांत पाठक हैं। इसे सन्मार्ग प्रकाशन दिल्ली ने प्रकाशित किया है। इस पुस्तक में पोलो की चारित्रिक विशेषताओं को बताने के लिए यद्यपि काफी जानकारी नहीं है पर कम से कम उसकी बुद्धि की झलक तो मिल ही जाती है। वह अधिक पढ़ा लिखा नहीं था और उसकी पुस्तक की शैली में कुछ भी अनोखा या कलात्मक सा नहीं है मगर जो है, वह बांधे रखता है।
मार्कोपोलो की इस यात्रा का प्रारंभ 1271 में सत्रह वर्ष की उम्र में होता है। वेनिस से शुरू हुई उसकी यात्रा में वह कुस्तुन्तुनिया से वोल्गा तट, वहां से सीरिया, फारस, कराकोरम, कराकोरम से उत्तर की ओर बुखारा से होते हुए मध्य एशिया में स्टेपी के मैदानी से गुज़रकर पीकिंग पहुंचता है, जहां उसके पिता और चाचा कुबलाई खां के दरबार में अधिकारी हैं। इस पूरी यात्रा में साढ़े तीन वर्ष लग जाते हैं और इस अवधि में वह मंगोल भाषा सीख लेता है। पीकिंग में उसकी नियुक्ति मंगोल साम्राज्य की सिविल सेवा में हो जाती है। ऊपर की रूपरेखा में वर्णित सभी प्रदेश मंगोल साम्राज्य के अंतर्गत आते थे, जिसकी स्थापना 1206 में चंगेज खां ने मंगोल कबीलों की विकराल फौज की मदद से की थी। 1260 तक मंगोलों का उस समय ज्ञात विश्व के चार बटे पांच हिस्से पर अधिकार था, जिसकी सीमा चीन से लेकर जर्मनी तक और साइबेरिया से लेकर फारस तक थी। पोलो सिल्कमार्ग से होकर पीकिंग पहुंचता है और पंद्रह वर्ष तक वहां रहते हुए खाकान की निष्ठापूर्वक सेवा करता है और फिर यूरोप लौट जाता है।
इन पंद्रह वर्षों में वह एक बड़ा अधिकारी बन जाता है। वह कुबलाई खां के प्रतिनिधि के रूप में श्रीलंका, फारस, भारत और दक्षिण पूर्वी एशिया के अन्य देशों की की यात्रा करता है और यहां रहने वाले लोगों का वर्णन करता है। वह अंडमान निकोबार के आदिवासियों के बारे में भी बताता है और बर्मा के पैगोडा और श्रीलंका के बौद्ध मंदिरों की भी प्रशंसा करता है। 1295 में पोलो फिर वेनिस पहुंचता है और एक व्यापारिक युद्ध में जिनोआ(एक राज्य, कोलम्बस भी यहीं का निवासी था) द्वारा बंदी बना लिया जाता है, ... बुखारा में पोलो परिवार... जहां क़ैद में रहते हुए उसकी मुलाकात रस्तिशेलो नाम के व्यक्ति से होती है जो उसके एशिया के अनुभवों को कलमबद्ध करता है। यह पुस्तक उस काल के यूरोपियनों के लिए समझ से बाहर की चीज़ थी और उन्होंने एशिया की ज़्यादातर बातों पर यकीन करना काफी मुश्किल पाया। पोलो के मरते समय उसके कुछ मित्रों ने उसे पुस्तक में संशोधन करने के लिए कहा, लेकिन पोलो ने इनकार करते हुए कहा कि उसने जो देखा उसका आधा भी नहीं लिखा। उसकी पुस्तक जनसाधारण द्वारा समझी नहीं गई थी और विद्वानों ने उसे पसंद नहीं किया क्योंकि वे उसे उस समय के ज्ञान से संबंधित करने में असफल रहे थे। पोलो जब मरा तब वह सत्तर वर्ष का था और काफी धनी हो चुका था।

शनिवार, 25 अप्रैल 2009

गज़ल : स्व. नादाँ इलाहाबादी

कुछ तो दुनिया में रहे नादाँ की बाकी यादगार.
इसलिए पेशेनजर अदना सी ये सौगात है..

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होश मस्तों को है सागर का न पैमाने का.
फ़ैज़े-साकी से अजब रंग है मैखाने का..

अब उसे गम नहीं कुछ बज़्म में जल जाने का.
नाम तो शम'अ से रोशन रहा परवाने का..

अब तो मैं होश में भूले नहीं आने का.
अपने मुझको लकब दे दिया दीवाने का..

तालिबे-इश्क़ हूँ मज़हब से मुझे क्या मतलब?
मैं हूँ पाबन्द न काबे का न बुतखाने का..

मैं वो मैकश हूँ जहाँ शीश-ओ-सागर देखे.
आँख में खिंच गया नक्शा वहीं मैखाने का..

हो गयी पूरी तमन्ना तो मज़ा क्या 'नादाँ'.
ज़िन्दगी नाम है अरमां पे मिट जाने का..

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हिंदी के हित में ‘करो या मरो’

अंग्रेज़ी के विरुद्ध करो या न करो....किंतु

हिंदी के हित में ‘करो या मरो’

सु-समृद्ध संस्कृत की आत्मज – हिंदी की भारतीय जनमानस की वाणी के रूप में गौरवशाली परंपरा रही है । इसी कारण स्वतंत्र भारत के संविधान हिंदी के लिए उचित दर्जा मिला है । हिंदी बोलने, जानने वालों की आबादी के आधार पर भले ही उसके विश्व स्तर पर प्रथम स्थान पर होने के दावे पेश हो रहे हो, किंतु ‘विश्व भाषा’ के रूप में आज तक अपेक्षित मान्यता उसे नहीं मिल पाई है । ऐसी मान्यता दिलाने के लिए तथाकथित हिंदी-प्रेमियों द्वारा मांग किया जाना तथा मान्यता दिलाने की कोशिशें शुरू करने की घोषणाएँ सुनाई पड़ना सुखद समाचार है । ये मांगे भी अपनी जगह सही हैं, किंतु देश में हिंदी की समग्र स्थिति पर चिंतन एवं आत्ममंथन ज़रूरी है ।

हिंदी को अंतर राष्ट्रीय मान्यता दिलाने का जो प्रयास किया जो प्रयास किया जा रहा है, वह एक अर्थहीन पहल साबित हो रहा है । दरअसल भारत के भाल के बिंदी बनने से वंचित हिंदी को विश्व भाषा की संज्ञा देना ही कहीं अटपटा-सा लगता है । संविधान की मूल भावना को समझने, तदनुरूप अग्रसर होने से मुँह मोड़कर महज ‘हिंदी-प्रेम’ के आलाप में हम रुचि लेते रहे हैं । संवैधानिक दायित्व की पूर्ति महज आंकड़ों का मायाजाल साबित हो रहा है । शिक्षा, संचार, प्रशासन, विधि, चिकित्सा, अभियांत्रिकी आदि कई क्षेत्रों में निष्ठा पूर्वक हिंदी की प्रयोग वृद्धि के लिए अनुकूल शासकीय निर्णय लेना इन दिनों संभव होने की स्थिति नज़र नहीं आ रही है । हाँ, ऐसे एकाध निर्णय लिए भी गए हैं, जो या तो लंबित पड़े हैं या ‘धीरे धीरे रे मना.... ’ के अनुसरण में फँस गए हैं । जैसे कि स्पष्ट किया जा चुका है, यह कोई राज़ की बात नहीं है, सर्व विधित अराजकता है ।

लगता है कि तथाकथित हिंदी-प्रेम की उन्मत्तता से भी नेत्रोन्मीलन संभव नहीं हो पाया है । हिंदी संबंधी हमारी मानसिकता के संकुचित दायरों, संवैधानिक दायित्व-बोध से वंचित शासनिक क़दमों के कारण हिंदी की स्थिति आज बहुत ही नाज़ुक है । भूमंडलीकरण, निजीकरण, कंप्यूटरीकरण आदि हिंदी की गति की बुरी ढंग से प्रभावित करनेवाली घटनाएं साबित हो रही हैं ।

दुर्भाग्य से व्यवहार में भारतीय समाज की अधिमानित भाषा भी अंग्रेज़ी ही है । यहाँ किसी भी प्रकार की नौकरी पाने के लिए अंग्रेज़ी में प्रमाणपत्र की ज़रूरत पड़ेगा । पग-पग पर अंग्रज़ी ज्ञान की अपेक्षा करना, सामाजिक स्तर एवं सत्कार के लिए अंग्रेज़ी मोह - - ये सब आज की अनिवार्यताएँ साबित हो रही हैं । भारत में यत्र-तत्र-सर्वत्र अंग्रेज़ी का राज है, ऐसे में हम हिंदी को अंतर राष्ट्रीय मान्यता दिलाने के लिए लालायित हो रहे हैं । यह एक विडंबना है । हिंदी के समक्ष ऐसी कई विडंबनाएँ हैं । हिंदी रोजी-रोटी के साथ एक संकुचित अर्थ में जुड़ी है । संवैधानिक मान्यता मिलने के बावजूद ज्ञान के विभिन्न क्षेत्रों से संबंधित साहित्य हिंदी में आज तक उपलब्ध न हो पाने के बहाने हिंदी उच्च शिक्षा का माध्यम बनने से वंचित है । प्रचार से कतरानेवाली संस्थाओं को हिंदी प्रचार के नाम पर बड़ी मात्रा में अनुदान की राशियाँ मिल रहीं हैं, शायद इसी कारण हिंदी की अपेक्षाएँ भी पूरी नहीं हो रही हैं । हिंदी से कोई सरोकार न रखनेवाले आज हिंदी साम्राज्य के पदाधिकारी बन बैठे हैं । संवैधानिक अपेक्षाओं की खुलेआम की अवहेलना हो रही है ।

इधर एक आशा की किरण भी फूट रही है । आगामी जून, 2003 में सुरीनाम में सप्तम् विश्व हिंदी सम्मेलन आयोजित करने की तैयारियाँ शुरू हो चुकी हैं, जिसका विचाराधीन मुख्य विषय है – ‘विश्व हिंदी : नई शताब्दी की चुनौतियाँ’ । विगत विश्व हिंदी सम्मेलनों के संदर्भ में अध्ययन से यह बात स्पष्ट होती है कि ऐसे सम्मेलनों के बहाने बढ़ रहे भावावेश के अनुपात में हिंदी का हितवर्धन नहीं हो पा रहा है । अंग्रेज़ी का गढ़ ब्रिटेन साम्राज्य की राजधानी लंदन में संपन्न छठे विश्व हिंदी सम्मेलन का पटाक्षेप हिंदी को संयुक्त राष्ट्र संघ की मान्यता दिलाने की दिशा में प्रयास शुरू करने के निष्कर्ष के साथ हुआ था । लंदन में संपन्न सम्मेलन की तमाम विसंगतियों के संदर्भ में कई गण्य-मान्य हिंदी हितचिंतकों की आलोचनाओं से बचने की दिशा में अवश्य चिंतन करेंगे, ऐसी आशा है । स्वाधीनता प्राप्ति की आधी सदी के बाद भी भाषाई उपनिवेशवाद के शिकार होनेवाले भारत को हिंदीमय बनाने के लिए अपेक्षित भावभूमि तैयार करने की ओर सम्मेलन का ध्यान जाएगा तो अवश्य ही सम्मेलन की प्रासंगिकता बढ़ेगी ।

मौजूदा वास्तविकता को देखते हुए यह कहना अनुचित न होगा कि भारतीय मानसिकता व्यवहार के धरातल पर आज काफ़ी हद तक पराई भाषा के पक्ष में है । देश में अंग्रेज़ी के हित में काफ़ी कुछ किया जा रहा है । अब अंग्रेज़ी के विरुद्ध करने की भी कोई आवश्यकता नहीं है, किंतु हिंदी के हित में कार्य करने से वंचित रहने से बढ़कर कोई बड़ा ढोंग नहीं रह जाएगा । हिंदी के हित में ‘करो या मरो’ यही मूल भावना मनसा-वाचा-कर्मणा हिंदी के लिए हितवर्धक है ।

हिंदी का हितचिंतन : डा. सी. जय शंकर बाबु


हिंदी के विकास के लिए कई आयामों पर चिंतन के साथ-साथ पूरी निष्ठा के साथ हमें प्रयास करने की आवश्यकता है । देश में आज हिंदी की दुस्थिति को लेकर व्यथित एवं व्यग्र होकर संघर्षपूर्ण स्वर में कोसनेवालों की श्रेणी एक ओर, हिंदी को विश्वभाषा साबित करने की, संयुक्त राष्ट्र संघ से मान्यता दिलाने की मांग करनेवालों की श्रेणी दूसरी ओर है । बीच का रास्ता अपनाकर हिंदी के हितवर्धन हेतु अपने स्तर पर योग्य कार्य करनेवाले चंद हितैषी भी हैं । इन सबकी गति से सौ गुना अधिक तेजी से भारत में अंग्रेज़ी के दायरों का विस्तार होता जा रहा है । हिंदी की गति तभी बढ़ेगी जब हम जिम्मेदार एवं प्रभावशाली व्यक्तियों का ध्यान आकर्षित करने में सक्रिय रहेंगे तथा कर्तव्य निभाने के लिए उन्हें बाध्य करेंगे । भारतीय संविधान की मूल संकल्पना के अनुसार हिंदी को उचित दर्जा दिलाने हेतु उचित दिशा में संघर्ष करना आज हमारा कर्तव्य है ।

सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के परिप्रेक्ष्य में हिंदी की स्थिति के संदर्भ में भी हमें तुरंत सचेत होने की बड़ी आवश्यकता है । एक विडंबना है कि हम जानबूझकर कंप्यूटर में जिन चालन प्रणालियों (आपरेटिंग सिस्टम) को अपना चुके हैं उनका आधार अंग्रेज़ी भाषा है । हिंदी भाषा आधारित चालन प्रणालियों से युक्त कंप्यूटर उपलब्ध कराने के लिए हमने उत्पादकों को बाध्य नहीं किया है । सूचना प्रौद्योगिकी के विकास के परिप्रेक्ष्य में राजभाषा नीति के उल्लंघन का यह मूलबिंदु है ।

यहाँ एक और तथ्य पर हमें गौर करने की आवश्यकता है कि कंप्यूटर चालन प्रणालियों में आज सहजतः विश्वभर में मानक अंग्रेज़ी का एक फांट (अक्षर रूप) मिल जाता है । अंग्रेज़ी के अन्य फांट साफ्टवेयर के साथ इसका आदान-प्रदान (परिवर्तनीयता एवं पठनीयता) भी संभव है । हिंदी भाषा आधारित चालन प्रणाली का अभाव तो है ही, मानक हिंदी फांट भी आज कहीं उपलब्ध नहीं हैं जैसे कि अंग्रेज़ी में उबलब्ध हैं । आज भारतीय बाज़ार में हिंदी के कई साफ्टवेयर उपलब्ध हैं, जिनका प्रचार राजभाषा विभाग के तकनीकी कक्ष की ओर से भी किया जा रहा है । किंतु मानक फांट साफ्टवेयर के अभाव में हिंदी के हित से बढ़कर अहित ही अधिक हो रहा है । हिंदी जिस देश की राजभाषा है वहाँ हिंदी साफ्टवेयर खरीदना पड़ रहा है जब कि अंग्रेज़ी जहाँ की राजभाषा भी नहीं, वहाँ भी मानक अंग्रेज़ी फांट निःशुल्क उपलब्ध हो रहा है । सरकार को चाहिए कि वह एक मानक हिंदी साफ्टवेयर को विकसित कराएँ जिससे कहीं परिवर्तनीयता अथवा पठनीयता की समस्या उत्पन्न न हो । हिंदी के हित में यह आवश्यक है कि विश्वभर में एक मानक फांट साफ्टवेयर निःशुल्क उपलब्ध कराने के लिए प्रावधान रखें । हिंदी के विकास के मार्ग अपने आप खुलने की दिशा में यह भी एक अपेक्षित कदम है । समस्त हिंदी प्रेमी इक दिशा में सरकार को बाध्य करने के लिए आज ही सक्रिय हो जावें

अश'आर : दोस्त -सलिल

दोस्त जब मेहरबां हुए हम पर.
दुश्मनी में न फिर कसर छोडी.

ए 'सलिल'! दिल को कर मजबूत ले.
आ रहे हैं दोस्त मिलने के लिए.

शिकवा न दुश्मनों से मुझको रहा 'सलिल'.
हैरत है दोस्तों ने ही प्यार से मारा..

संबंधों के अनुबंधों में प्रतिबंधों की.
दम टूटी, जब मिला दोस्त सच्चा कोई भी..

जिस्म दो इक जां रहे जो.
दोस्त उनको जानिए.

दोस्त ने दोस्त से न कुछ चाहा.
हुई चाहत तो दोस्ती न रही.

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सूक्ति कोष: प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'

सूक्ति कोष

प्रो. भागवत प्रसाद मिश्र 'नियाज़'


विश्व वाणी हिन्दी के श्रेष्ठ-ज्येष्ठ साहित्यकार, शिक्षाविद तथा चिन्तक नियाज़ जी द्वारा इस स्तम्भ में विविध आंग्ल साहित्यकारों के साहित्य का मंथन कर प्राप्त सूक्ति रत्न पाठको को भेंट किए जा रहे हैं।

संस्कृत में कहा गया है- 'कोषस्तु महीपानाम् कोशाश्च विदुषामपि' अर्थात कोष या तो राजाओं के पास होता है या विद्वानों के.

इन सूक्तियों के हिन्दी अनुवाद मूल की तरह प्रभावी हैं। डॉ. अम्बाशंकर नागर के अनुसार 'अनुवाद के लिए कहा जाता है की वन प्रामाणिक होता है तो सुंदर नहीं होता, और सुंदर होता है तो प्रामाणिक नहीं होता किंतु मैं यह विश्वासपूर्वक कह सकता हूँ कि इन सूक्तियों का अनुवाद प्रामाणिक भी है और सुंदर भी।'

जी कहते हैं- 'साहित्य उतना hee सनातन है जितना कि मानव, देश और काल की सीमायें उसे बाँध नहीं सकतीं। उसके सत्य में एक ऐसी सत्ता के दर्शन होते हैं जिससे अभिभूत होकर न जाने कितने युग-द्रष्टाओं ने अमर स्वरों में उसका गान किया है।

..प्रांजल विचार संचरण के बिना श्रेष्ठ नव साहित्य का निर्माण असंभव है।' आंग्ल साहित्य के कुछ श्रेष्ठ रचनाकारों के साहित्य का मंथन कर नियाज़ जी ने प्राप्त सूक्ति रत्न बटोरे हैं जिन्हें वे पाठकों के साथ साँझा कर रहे हैं। सूक्तियों का हिन्दी काव्यानुवाद कर रहे हैं आचार्य संजीव 'सलिल' ।

सूक्तियाँ शेक्सपिअर के साहित्य से-

appearance आकृति:

one may smile and smile and be a villain.'

अधरों पर मुस्कान ह्रदय में पाप भरा है. / ऐसे कुटिलों से पूरित यह वसुंधरा है.

दोहानुवाद : मनमोहक मुस्कान पर, ज़हर ह्रदय में खूब.
कुटिलों से बचिए 'सलिल', नाव जायेगी डूब..

All that glitters is not gold, Gilded tombs do worms unfold.'

प्रत्येक चमक का आधार स्वर्ण नहीं है. स्वर्ण समाधि के खुलने पर भी कीटाणु ही मिलते हैं.

दोहानुवाद : जगमग-जगमग जो करे. कनक न उसको मान.
कनक-मकबरे में 'सलिल', मिले कीट-कृमि-खान..

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