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मंगलवार, 26 अप्रैल 2011

मुक्तिका : माँ ______- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
माँ
संजीव 'सलिल'
*
बेटों के दिल पर है माँ का राज अभी तक.
माँ के आशिष का है सिर पर ताज अभी तक..

प्रभू दयालु हों इसी तरह हर एक बेटे पर
श्री वास्तव में माँ है, है अंदाज़ अभी तक..

बेटे जो स्वर-सरगम जीवन भर गुंजाते.
सत्य कहूँ माँ ही है उसका साज अभी तक..

बेटे के बिन माँ का कोई काम न रुकता.
माँ बिन बेटों का रुकता हर काज अभी तक..

नहीं रही माँ जैसे ही बेटा सुनता है.
बेटे के दिल पर गिरती है गाज अभी तक..

माँ गौरैया के डैने, ममता की छाया.
पा बेटे हो जाते हैं शहबाज़ अभी तक..

कोई गलती हो जाये तो आँख न उठती.
माँ से आती 'सलिल' सुतों को लाज अभी तक..

नानी तो बन गयी, कभी दादी बन जाऊँ.
माँ भरती है 'सलिल' यही परवाज़ अभी तक..

********

हिंदी काव्य का अमर छंद रोला ------ नवीन चतुर्वेदी

हिंदी काव्य का अमर छंद रोला

नवीन चतुर्वेदी
*
रोला छंद की विशेषताएं निम्न हैं:

१. चार पंक्तियों वाला होता है रोला छंद.
२. रोला छन्द की हर पंक्ति दो भागों में विभक्त होती है.
३. रोला छन्द की हर पंक्ति के पहले भाग में ११ मात्राएँ अंत में गुरु-लघु [२१] या लघु-लघु-लघु [१११] अपेक्षित हैं.
४. रोला छन्द की हर पंक्ति के दूसरे भाग में १३ मात्रा अंत में गुरु-गुरु [२२] / लघु-लघु-गुरु [११२] या लघु-लघु-लघु-लघु [११११] अपेक्षित है. कई विद्वानों का मत है क़ि रोला में पंक्ति के अंत में गुरु-गुरु [२२] से ही हो.
५. रोला छन्द की किसी भी पंक्ति की शुरुआत में लघु-गुरु-लघु [१२१] के प्रयोग से बचना चाहिए, इस से लय में व्यवधान उत्पन्न होता है|

रोला छन्द के कुछ उदाहरण:-

हिंद युग्म - दोहा गाथा सनातन से साभार:-:-

नीलाम्बर परिधान, हरित पट पर सुन्दर है.
२२११ ११२१=११ / १११ ११ ११ २११२ = १३
सूर्य-चन्द्र युग-मुकुट, मेखला रत्नाकर है.
२१२१ ११ १११=११ / २१२ २२११२ = १३
नदियाँ प्रेम-प्रवाह, फूल तारा-मंडल हैं
११२ २१ १२१=११ / २१ २२ २११२ = १३
बंदीजन खगवृन्द, शेष-फन सिंहासन है.
२२११ ११२१ =११ / २१११ २२११२ = १३


शिवकाव्य.कोम से साभार:-

अतल शून्य का मौन, तोड़ते - कौन कहाँ तुम.
१११ २१ २ २१ = ११ / २१२ २१ १२ ११ = १३
दया करो कुछ और, न होना मौन यहाँ तुम..
१२ १२ ११ २१ = ११ / १ २२ २१ १२ ११ = १३
नव जीवन संचार, करो , फिर से तो बोलो.
११ २११ २२१ = ११ / १२ ११ २ २ २२ = १३
तृषित युगों से श्रवण, अहा अमरित फिर घोलो..
१११ १२ २ १११ = ११ / १२ १११११ ११ २२ = १३

रूपचंद्र शास्त्री मयंक जी के ब्लॉग उच्चारण से साभार:-

समझो आदि न अंत, खिलेंगे सुमन मनोहर.
११२ २१ १ २१ = ११ / १२२ १११ १२११ = १३
रखना इसे सँभाल, प्यार अनमोल धरोहर..
११२ १२ १२१ = ११ / २१ ११२१ १२११ = १३


कवि श्रेष्ठ श्री मैथिली शरण गुप्त जी द्वारा रचित साकेत का द्वादश सर्ग तो रोला छन्द में ही है और उस की शुरुआती पंक्तियों पर भी एक नज़र डालते हैं:-

ढाल लेखनी सफल, अंत में मसि भी तेरी.
२१ २१२ १११ = ११ / २१ २ ११ २ २२ = १२
तनिक और हो जाय, असित यह निशा अँधेरी..
१११ २१ २ २१ = ११ / १११ ११ १२ १२२ = १३

इसी रोला छंद की तीसरी और चौथी पंक्तियाँ खास ध्यान देने योग्य हैं:-
ठहर तभी, कृष्णाभिसारिके, कण्टक कढ़ जा.
१११ १२ २२१२१२ = १६ / २११ ११ २ = ८
बढ़ संजीवनि आज, मृत्यु के गढ़ पर चढ़ जा..
११ २२११ २१ = ११ / २१ २ ११ ११ ११ २ = १३

तीसरी पंक्ति में यति को प्रधान्यता दी जाए तो यति आ रही है १६ मात्रा के बाद| कुल मात्रा १६+८=२४ ही हैं| परंतु यदि हम 'कृष्णाभिसारिके' शब्द का संधि विच्छेद करते हुए पढ़ें तो यूँ पाते हैं:-

ठहर तभी कृष्णाभि+सारिके कण्टक कढ़ जा
१११ १२ २२१ = ११ / २१२ २११ ११ २ = १३

अब कुछ अपने मन से : छंद रचना को ले कर लोगों में फिर से जागरूकता बढ़ान हमारा उद्देश्य है | हम में से कई बहुत सफलता से ग़ज़ल कह रहे हैं, उनकी तख्तियों को आसानी से समझ रहे हैं|  नीचे दिए गये पदभार (वज्न) भी रोला छंद लिखने में मदद कर सकते है, यथा:-

अपना तो है काम, छंद की बातें करना
फइलातुन फइलात फाइलातुन फइलातुन
२२२ २२१ = ११ / २१२२ २२२ = १३

भाषा का सौंदर्य, सदा सर चढ़ के बोले
फाईलुन मफऊलु / फईलुन फइलुन फइलुन
२२२ २२१ = ११ / १२२ २२ २२ = १३

रोला छन्द संबन्धित कुछ अन्य उदाहरण :- 
१.  पाक दिल जीत घर गया
तेंदुलकर, सहवाग, कोहली, गौतम, माही|
रैना सँग युवराज, कामयाबी के राही|
नहरा और मुनाफ़, इक दफ़ा फिर से चमके|
भज्जी संग जहीर, खेल दिखलाया जम के|१|

हारा मेच परन्तु, पाक दिल जीत घर गया|
एक अनोखा काम, इस दफ़ा पाक कर गया|
नफ़रत का हो अंत, प्यार वाली हो बिगिनिंग|
शाहिद ने ये बोल, बिगिन कर दी न्यू ईनिंग|२|

अब अंतिम है मेच, दिल धड़कता है पल छिन|
सब के सब बेताब, हो रहे घड़ियाँ गिन गिन|
कैसा होगा मेच, सोचते हैं ये ही सब|
बोल रहे कुछ लोग, जो नहीं अब, तो फिर कब|३|

तेंदुलकर तुम श्रेष्ठ, मानता है जग सारा|
आशा तुमसे चूँकि, खास अंदाज तुम्हारा|
तुम हो क्यूँ जग-श्रेष्ठ, आज फिर से बतला दो|
मारो सौवाँ शतक, झूमने का मौका दो|४|

भारत में किरकेट, बोलता है सर चढ़ के|
सब ने किया क़ुबूल, प्रशंसा भी की बढ़ के|
अपनी तो ये राय, हार हो या फिर विक्ट्री|
खेलें ऐसा खेल, जो क़ि बन जाए हिस्ट्री|५|

छन्द : रोला
विधान ११+१३=२४ मात्रा
२. भद्रजनों की रीत नहीं ये संगाकारा
हार गए जो टॉस, किसलिए उसे नकारा|
भद्रजनों की रीत, नहीं ये संगाकारा|
देखी जब ये तुच्छ, आपकी आँख मिचौनी|
चौंक हुए स्तब्ध, जेफ क्रो, शास्त्री, धोनी|१|

तेंदुलकर, सहवाग, ना चले, फर्क पड़ा ना|
गौतम और विराट, खेल खेले मर्दाना|
धोनी लंगर डाल, क्रीज़ से चिपके डट के|
समय समय पर दर्शनीय, फटकारे फटके|२|

जब सर चढ़े जुनून, ख्वाब पूरे होते हैं|
सब के सम्मुख वीर, बालकों से रोते हैं|
दिल से लें जो ठान, फिर किसी की ना मानें|
हार मिले या जीत, धुरंधर लड़ना जानें|३|

त्र्यासी वाली बात, अब न कोई बोलेगा|
सोचेगा सौ बार, शब्द अपने तोलेगा|
अफ्रीका, इंगलेंड, पाक, औसी या लंका|
सब को दे के मात, बजाया हमने डंका|४|

तख्तियों के जानकार इस बारे में और भी बहुत कुछ हम लोगों से साझा कर सकते हैं|
 आभार: http://thalebaithe.blogspot.com/2011/04/blog-post_04.html
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सोमवार, 25 अप्रैल 2011

विशेष लेख: निश्छल आराधना की अमर देवी महादेवी -- प्रभात कुमार राय

विशेष लेख:
निश्छल आराधना की अमर देवी महादेवी
प्रभात कुमार राय
*
       आराधना की वेदी पर अपनी हर एक सांस को न्यौछावर कर देने के लिए आतुर महिमायमयी महादेवी की जिंदगी विलक्षण रही। वह प्यार, करूणा, मैत्री और अविरल स्नेह की कवियत्री रही। मधुर मधुर जलने वाली ज्योति जैसी रही प्रतिपल युगयुग तक प्रियतम का पथ आलोकित करने के लिए आकुल रही। अपनी जिंदगी को दीपशिखा के समान प्रज्लवलित करके युग की देहरी पर ऐसे रख दिया कि मन के बाहर और भीतर उजियाला बिखर गया। महादेवी की रहस्यवादी अभिव्यक्ति को निरुपित करते हुए कवि शिवमंगल सिंह सुमन ने कहा था कि उन्होने वेदांत के अद्वैत की छाया ग्रहण की, लौकिक प्रेम की तेजी अपनायी इनको दोनों को एकाकार करके एक निराले ही संबंध को सृजित कर डाला। ऐसा निराला संबंध जोकि मानव मन को आलंबन प्रदान करे और इसे पार्थिव प्रेम से कहीं उपर उठा सके।
      20 वीं सदी की छायावादी हिंदी कविता के चार सर्वश्रेष्ठ कवियों में महादेवी वर्मा को स्थान प्राप्त हुआ । इस श्रंखला के अन्य तीन कवि हैं सूर्यकांत त्रिपाठी निराला, जयशंकर प्रसाद और सुमित्रानंदन पंत। महादेवी वर्मा को उनकी साहित्यिक रचनाओं के लिए बहुत से पुरुस्कार प्रदान किए गए। इनमे सबसे अधिक उल्लेखनीय रहा सन् 1935 में इंदौर में अखिल भरतीय हिंदी सम्मेलन मे महात्मा गांधी द्वारा प्रदान किया गया ,मंगला प्रसाद पुरुस्कार। सन् 1982 में महादेवी को प्रदान किया गया ज्ञानपीठ पुरुस्कार तथा पद्म भूषण सम्मान। 1983 में तत्कालिन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी भारत भारती पुरुस्कार जिसे ग्रहण करते हुए महादेवी ने कहा था कि महात्मा गांधी के हाथों पुरुस्कार पाने के बाद किसी अन्य पुरुस्कार की आकांक्षा नहीं रह गयी थी अतएव उनकी पावन स्मृति में कृतज्ञतापूर्वक यह पुरुस्कार मैं न्यास को समर्पित करती हूं। महादेवी वर्मा एक सतत स्वातंत्रय योद्धा रही। महात्मा गांधी के सशक्त प्रभाव के कारण जीवन पर्यन्त खादी के वस्त्र ही धारण करती रही।
      होली के दिन सन् 1907 में महादेवी का जन्म एक कायस्थ परिवार में हुआ। पिता गोविंद प्रसाद वर्मा अंग्रेजी के प्रोफेसर थे। मां आध्यात्मिक स्वभाव की महिला थी, जोकि भक्ति आंदोलन के संतो की रचनाओं को प्रायः गाया गुनगुनाया करती थी। महादेवी ने पिता से तीक्ष्ण सजग मेधा पाई तो अपनी मां से संवेदनशील संस्कार ग्रहण किया। इलाहबाद विश्वविद्यालय से संस्कृत में एम. ए. किया और प्रयाग महिला विद्यापीठ से संबद्ध हो गई। जहां प्रारम्भ में  एक अध्यापक के रूप में और बाद में प्रिंसिपल के तौर पर 30 वर्षों तक कार्यरत रही।
      अपनी काव्य एवं गद्य रचनाओं के अतिरिक्त महादेवी ने प्राचीन भारत के संस्कृत कवियों वाल्मिकी, कालीदास, अश्वघोष, त्यागराज, और जयदेव की कृतियों का हिंदी में पद्यानुवाद भी किया जोकि सप्तपर्ण शीषर्क से प्रकाशित हुआ । महादेवी की संपूर्ण साहित्य साधना वस्तुतः आस्था, उपासना, और उत्सर्ग से लबरेज है। उनकी काव्य रचनाएं नीहारिका, नीरजा, सांध्यगीत और दीपशिखा उनकी मंगलमय काव्य यात्रा के ज्योर्तिमय पग चिन्ह है और स्मृति की रेखाएं एवं अतीत के चलचित्र प्रमुख गद्य रचनाएं।

महादेवी की सबसे पहली काव्य रचना उस पार है । जिसमें उनकी अभिव्यक्ति है...
 विसर्जन ही है कर्णधार
  वही पंहुचा देगा उसपार....
   चाहता है ये पागल प्यार
     अनोखा एक नया संसार ....
       जीवन की अनुभूति तुला पर अरमानों की तोल
         यह अबोध मन मूक व्यथा से ले पागलपन अनमोल
          करे दृग आंसू को व्यापार
            अनोखा एक नया संसार...

   नीहार की काव्य रचनाएं सन् 1924 से 1928 के मध्य की हैं

अपने उर पर सोने से लिख कर प्रेम कहानी
 सहते हैं रोते बादल तूफानों की मनमानी

 नीहार की एक और रचना है
  शूंय से टकरा कर सुकुमार करेगी पीड़ा हाहाकार ...
   विश्व होगा पीड़ा का राग निराशा होगी वरदान
    साथ लेकर मुरझाई साध बिखर जाएगें प्यासे प्राण...

 महादेवी के गीतों में सृष्टि के कण कण में व्याप्त संवेदन की यह प्रतीति अपनी सूक्ष्मता एवं सुकुमारता में मर्मस्पर्शी हो उठी है ....

जहां विष देता है अमरत्व जहां पीड़ा है प्यारी मीत
 अश्रु हैं नैनों का श्रंगार जहां ज्वाला बनती नवनीत
  जहां बनता पतझार बसंत जहां जागृति बनती उन्माद
   जहां मदिरा बनती चैतन्य  भूलना बनता मीठी याद

      साधारणतया समीक्षकों ने महादेवी वर्मा को आधुनिक मीरा के तौर पर अभिहित किया गया है। एक ओर उनकी अगाध संवेदनशीलता बुद्ध की करुणा से अनुप्राणित है तो दूसरी तरफ उनकी वाणी में ऋचाओं की पवित्रता और स्वरों में समगान का सम्मोहन निहित है। उनके इस स्वरुप पर मुग्ध होकर ही महाकवि सूर्यकांत त्रिपाठी निराला ने  महादेवी के विषय में कहा था...

 हिंदी के विशाल मंदिर की वीणा वाणी
  स्फूर्ति चेतना रचना की प्रतिमा कल्याणी

 विमुग्ध विभावरी भावना की तीव्रता और गेयता की दृष्टि से महादेवी ने गीतिकाव्य का शिल्प बहुत सुंदर संवारा है

मैं नीर भरी दुख की बदली
 विस्तृत नभ का कोई कोना
  मेरा पग पग संगीत भरा
   श्वासों से स्वप्न पराग भरा
    नभ के नवरंग बुनते दुकूल
     छाया में मलय वयार वली ...
      मेरा न कोई अपना होना
       परिचय इतना इतिहास यही
         उमड़ी कल थी मिट आज चली ...

      उनकी कविता में रहस्यात्मक अनभूति के साथ करुण वेदना,विरह, मिलन का चित्रण होता रहा। यह कहना कठिन है कि कब उनकी तूलिका से छंद संवर जाते हैं और कब उन ठंदों से रंग बिखर जाते हैं।

मैं कंपन हूं तू करुण राग
 मैं आंसू हूं तू है विषाद
  मैं मदिरा हूं तू है खुमार
   मैं छाया हूं तू उसका आधार
    मेरे भारत मेरे विशाल
      मुझको कह लेने दो उदार
       फिर एक बार बस एक बार...
         कहता है जिसका व्यथित मौन
           हम सा निष्फल है आज कौन....

   महादेवी के की काव्य धारा में एक अनंत आशावाद समाया है

सजल है कितना सवेरा
 गहन तम में जो कथा इसकी न भूला
   अश्रु उस नभ के चढा़ शिर फूल फूला
     झूम झूक झूक कह रहा हर श्वास तेरा


   महादेवी वर्मा ने अप्रहित आराधना की वेदी पर अपनी प्रत्येक सांस को न्यौछावर कर दिया। वह साहित्य साधना करते करते  स्वयं ही भाव लोक की चलती फिरती संस्कृति बन गई थी। अपने बाल्यकाल से ही महात्मा बुद्ध की करुणा से वह बहुत अधिक प्रभावित रही। उनकी आत्मा पर बुद्ध के दुःखवाद की अमिट छाप सदैव अंकित रही।
*******

आर्यव के लिए -- संजीव 'सलिल'

आर्यव के लिए

संजीव 'सलिल'
*
है फूलों सा कोमल बच्चा, आर्यव इसका नाम.
माँ की आँखों का तारा है, यह नन्हा गुलफाम..

स्वागत करो सभी जन मिलकर नाचो झूमो गाओ
इस धरती पर लेकर आया खुशियों का पैगाम.

उड़नतश्तरी के कंधे पर बैठ करेगा सैर.
इसकी सेवा से ज्यादा कुछ नहीं जरूरी काम..

जिसने इसकी बात न मानी उस पर कर दे सुस्सू.
जिससे खुश उसके संग घूमे गुपचुप उँगली थाम..

'सलिल' विश्व मानव यह सच्चा, बच्चा प्रतिभा पुंज.
बब्बा सिर्फ समीर उठे यह बन तूफ़ान ललाम..

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प्रयोगात्मक मुक्तिका: जमीं के प्यार में... --संजीव 'सलिल'

प्रयोगात्मक मुक्तिका:
जमीं के प्यार में...
संजीव 'सलिल'
*
जमीं के प्यार में सूरज को नित आना भी होता था.
हटाकर मेघ की चिलमन दरश पाना भी होता था..

उषा के हाथ दे पैगाम कब तक सब्र रवि करता?
जले दिल की तपिश से भू को तप जाना भी होता था..

हया की हरी चादर ओढ़, धरती लाज से सिमटी.
हुआ जो हाले-दिल संध्या से कह जाना भी होता था..

बराती थे सितारे, चाँद सहबाला बना नाचा. 
पिता बादल को रो-रोकर बरस जाना भी होता था..

हुए साकार सपने गैर अपने हो गए पल में.
जो पाया वही अपना, मन को समझाना भी होता था..

नहीं जो संग उनके संग को कर याद खुश रहकर.
'सलिल' नातों के धागों को यूँ सुलझाना भी होता था..

न यादों से भरे मन उसको भरमाना भी होता था.
छिपाकर आँख के आँसू 'सलिल' गाना भी होता था..

हरेक आबाद घर में एक वीराना भी होता था.
जहाँ खुद से मिले खुद 'सलिल' अफसाना भी होता था..
****

मुक्तिका: दीवाना भी होता था. ----- संजीव 'सलिल'

मुक्तिका
दीवाना भी होता था.
संजीव 'सलिल'
*
हजारों आदमी में एक दीवाना भी होता था.
खुदाई रौशनी का एक परवाना भी होता था..

सियासत की वजह से हो गये हैं गैर अपने भी.
वगर्ना कहो तो क्या कोई बेगाना भी होता था??

लहू अपना लहू है, और का है खून भी पानी. 
गया वो वक्त जब बस एक पैमाना भी होता था..

निकाली भाई कहकर दुशमनी दिलवर के भाई ने.
कलेजे में छिपाए दर्द मुस्काना भी होता था..

मिली थी साफ़ चादर पर सहेजी थी नहीं हमने.
बिसारा था कि ज्यों की त्यों ही धर जाना भी होता था.. 

सिया जूता, बुना कपड़ा तो इसमें क्या बुराई है?
महल हो या कुटी मिट्टी में मिल जाना ही होता था..

सिया को भेज वन सीखा अवध ने पाठ यह सच्चा 
हर इक आबाद घर में एक वीराना भी होता था..

नहाकर स्नेह सलिला में, बहाकर प्रेम की गंगा.
'सलिल' मरघट में सबको एक हो जाना ही होता था
..
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रविवार, 24 अप्रैल 2011

षटपदियाँ : संजीव 'सलिल'

षटपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*
लोक-लाज, शालीनता, शर्म, हया, मर्याद.
संयम अनुशासन भुला, नव पीढ़ी बर्बाद..
नव पीढ़ी बर्बाद, प्रथाओं को कुरीति कह.
हुई बड़ों से दूर, सके ना लीक सही गह..
मैकाले की नीति सफल हुई, यही शोक है.
लोकतंत्र में हुआ तंत्र से दूर लोक है..
*
तिमिर मिटाकर कर रहा, उजियारे का दान.
सारे जग में श्रेष्ठ है, भारत देश महान..
भारत देश महान, न इस सा देश अन्य है.
सत-शिव -सुंदर का आराधक, सच अनन्य है..
सत-चित-आनंद नित वरता, तम सकल हटाकर.
सूर्य उगाता नील गगन से तिमिर हटाकर..
*
छले दूरदर्शन, रहे निकट देख ले सूर.
करा देह-दर्शन रहा, बेशर्मी भरपूर.
बेशर्मी भरपूर, मौज-मस्ती में डूबा.
पथ भूला है युवा, तन्त्र से अपने ऊबा..
कहे 'सलिल' परदेश युवाओं को है भाता?
दूर देश से भटक, धुनें सिर फिर पछताता..
*

मुक्तिका: आँख का पानी संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
आँख का पानी
संजीव 'सलिल'
*
खो गया खोजो कहाँ-कब आँख का पानी?
बो गया निर्माण की फसलें ये वरदानी..

काटकर जंगल, पहाड़ों को मिटाते लोग.
नासमझ है मनुज या है दनुज अभिमानी?

मिटी कल-कल, हुई किल-किल, घटा जब से नीर.
सुन न जन की पीर, करता तंत्र मनमानी..

लिये चुल्लू में तनिक जल, जल रहा जग आज.
'यही जल जीवन' नहीं यह बात अनजानी..

'सत्य-शिव-सुन्दर' न पानी बिन सकोगे साध.
जल-रहित यह सृष्टि होगी 'सलिल' शमशानी..
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मुक्तिका: हर इक आबाद घर में ------ संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
संजीव 'सलिल'
*
हर इक आबाद घर में एक वीराना भी होता था.
मिलें खुशियाँ या गम आबाद मयखाना भी होता था..

न थे  तनहा कभी हम-तुम, नहीं थी गैर यह दुनिया. 
जो अपने थे उन्हीं में कोई बेगाना भी होता था.

किया था कौल सच बोलेंगे पर मालूम था हमको
चुपाना हो अगर बच्चा तो बहलाना भी होता था..

वरा सत-शिव का पथ, सुन्दर बनाने यह धरा शिव ने. 
जो अमृत दे उसको ज़हर पाना भी होता था..

फ़ना वो दिन हुए जब तबस्सुम में कँवल खिलते थे.
'सलिल' होते रहे सदके औ' नजराना भी होता था..

शमा यादों की बिन पूछे भी अक्सर पूछती है यह
कहाँ है शख्स वो जो 'सलिल' परवाना भी होता था..

रहे जो जान के दुश्मन, किया जीना सदा मुश्किल.
अचम्भा है उन्हीं से 'सलिल' याराना भी होता था..

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IF LION goes on-site -- vijay kaushal

  HI all, 

IF LION goes on-site.............read it too good
 
In a poor zoo of India, a lion was frustrated as he was offered not more than 1 kg meat a day.
The lion thought its prayers were answered when one US Zoo Manager visited the zoo and requested the zoo management to shift the lion to the US Zoo.
 The lion was so happy and started thinking of a central A/c environment, a goat or two every day and a US Green Card also. On its first day after arrival, the lion was offered a big bag, sealed very nicely for breakfast.
The lion opened it quickly but was shocked to see that it contained few bananas. Then the lion thought that may be they cared too much for him as they were worried about his stomach as he had recently shifted from India .
  The next day the same thing happened. On the third day again the same food bag of bananas was delivered.
The lion was so furious, it stopped the delivery boy and blasted at him, 'Don't you know I am the lion...king of the Jungle..., what's wrong with your management?, what nonsense is this?, why are you delivering bananas to me?'
The delivery boy politely said, 'Sir, I know you are the king of the jungle but .. did you know that you have been brought here on a monkey's visa!!!
Moral of Story : Better to be a Lion in India than a Monkey elsewhere!!!!!

एक षटपदी : भारत के गुण गाइए ---संजीव 'सलिल'

एक षटपदी :



संजीव 'सलिल'
*
भारत के गुण गाइए, ध्वजा तिरंगी थाम.
सब जग पर छा जाइये, बढ़े देख का नाम ..
बढ़े देख का नाम प्रगति का चक्र चलायें.
दंड थाम उद्दंड शत्रु को पथ पढ़ायें..
बलिदानी केसरिया की जयकार करें शत.
हरियाली सुख, शांति श्वेत, मुस्काए भारत..


********

A Mirror or a 2-Way Glass? -- vijay kaushal.

 interesting:

A Mirror or a 2-Way Glass?

-- vijay kaushal.
 
How can you tell when you are in a room, restroom,
Motel etc. With a mirror or a 2-way glass?

Here's how: I thought it was quite interesting! And I
Know in about 30 seconds you're going to do what I did
And find the nearest mirror.

Do you know how to determine if a mirror is 2-way or
Not? A policewoman who travels all over the US and
Gives seminars and techniques for businesswomen passed
This on.
When we visit toilets, bathrooms, hotel rooms,
Changing rooms, etc., how many of you know for sure
That the seemingly ordinary mirror hanging on the wall
Is a real mirror, or actually a 2-way mirror (I.e.,
They can see you, but you can't see them)? There have
Been many cases of people installing 2-way mirrors in
Female changing rooms . It is very difficult to
Positively identify the surface by looking at it.


So, how do we determine with any amount of certainty
What type of mirror we are looking at?

Just conduct this simple test: Place the tip of your
Fingernail against the reflective surface and if there
Is a GAP between your fingernail and the image of the
Nail, then it is GENUINE mirror.

 
MIRROR  IMAGE
clip_image004




However, if your Fingernail DIRECTLY TOUCHES the image of your nail,
Then BEWARE! IT IS A 2-WAY MIRROR!
2 - WAY GLASS  IMAGE
clip_image002

"No Space, Leave the Place" So remember, every time
You see a mirror, do the "fingernail test." It doesn't
Cost you anything.
REMEMBER. No Space, Leave the Place:
Ladies: Share this with your girlfriends, sisters,
Daughters, etc.

Men: Share this with your wives, daughters,
Daughters-in-law, mothers, girlfriends and/or friends.

३० अप्रैल को नई दिल्ली में हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान समारोह

३० अप्रैल को नई दिल्ली में हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान समारोह



हर ब्लॉगर की अपनी एक अलग पहचान है , कोई साहित्यकार है तो कोई पत्रकार , कोई समाजसेवी है तो कोई संस्कृतिकर्मी , कोई कार्टूनिस्ट है तो कोई कलाकार । हर ब्लॉगर के सोचने का अपना एक अलग अंदाज़ है , एक अलग ढंग है प्रस्तुत करने का । अलग-अलग नियम है , अलग-अलग चलन किन्तु फिर भी एक सद्भाव है जो आपस में सभी को जोड़ता है । नि:संदेह इसकी जड़ों में सहिष्णुता की भारतीय मर्यादा है, जो हमें सद्भावना की शिक्षा देती है।  इन्हीं उद्देश्यों के दृष्टिगत परिकल्पना समूह के संचालक-समन्वयक और हिंदी के मुख्य ब्लॉग विश्लेषक लखनऊ निवासी रवीन्द्र प्रभात ने अपने छ: सहयोगियों क्रमश: अविनाश वाचस्पति, रश्मि प्रभा, जाकिर अली रजनीश, रणधीर सिंह सुमन,विनय प्रजापति और ललित शर्मा के साथ मिलकर अंतरजाल पर विगत वर्ष -२०१० को ब्लॉगोंत्सव मनाने का फैसला कर इस उत्सव को नाम दिया "परिकल्पना ब्लॉग उत्सव-२०१०"

इस उत्सव का नारा था - " अनेक ब्लॉग नेक हृदय "

इस उत्सव में अनेकानेक कालजयी रचनाएँ , विगत दो वर्षों में प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण ब्लॉग पोस्ट , ब्लॉग लेखन से जुड़े अनुभवों पर वरिष्ठ चिट्ठाकारों की टिप्पणियाँ ,साक्षात्कार , मंतव्य आदि का भव्यता के साथ प्रकाशन हुआ ।

वर्ष-२००९ में ब्लॉग पर प्रकाशित कुछ महत्वपूर्ण कवितायें, गज़लें , गीत, लघुकथाएं , व्यंग्य , रिपोर्ताज, कार्टून आदि का चयन करते हुए उन्हें प्रमुखता के साथ ब्लॉग उत्सव के दौरान प्रकाशित किये गए । कुछ महत्वपूर्ण चिट्ठाकारों की रचनाओं को स्वर देने वाले पुरुष या महिला ब्लोगर के द्वारा प्रेषित ऑडियो/वीडियो भी प्रसारित किये गए । उत्सव के दौरान प्रकाशित हर विधा से एक-एक ब्लॉगर का चयन कर , गायन प्रस्तुत करने वाले एक गायक अथवा गायिका का चयन कर तथा उत्सव के दौरान सकारात्मक सुझाव /टिपण्णी देने वाले श्रेष्ठ टिप्पणीकार का चयन कर उन्हें सम्मानित करने का निर्णय लिया गया । साथ ही हिन्दी की सेवा करने वाले कुछ सकारात्मक चिट्ठाकारों को विशेष रूप से सम्मानित किये जाने की भी योजना बनायी गयी ।

यह उत्सव १५ अप्रैल-२०१० से १५ जून-२०१० तक अर्थात दो महीने तक परिकल्पना पर निर्बाध रूप से चला और हिंदी ब्लॉगजगत में एक नए इतिहास के सृजन का साक्षी बना ! परिकल्पना के इस पहल पर लखनऊ से प्रकाशित दैनिक जनसंदेश टाईम्स ने अपने ब्लॉग वाणी स्तंभ के अंतर्गत दिनांक ०१ मार्च-२०११ को कहा कि "रवीन्‍द्र प्रभात ब्‍लॉग जगत में सिर्फ एक कुशल रचनाकार के ही रूप में नहीं जाने जाते हैं, उन्‍होंने ब्‍लॉगिंग के क्षेत्र में कुछ विशिष्‍ट कार्य भी किये हैं। वर्ष २००७ में उन्‍होंने ब्‍लॉगिंग में एक नया प्रयोग प्रारम्‍भ किया और ‘ब्‍लॉग विश्‍लेषण’ के द्वारा ब्‍लॉग जगत में बिखरे अनमोल मोतियों से पाठकों को परिचित करने का बीड़ा उठाया। २००७ में पद्यात्‍मक रूप में प्रारम्‍भ हुई यह कड़ी २००८ में गद्यात्‍मक हो चली और ११ खण्‍डों के रूप में सामने आई। वर्ष २००९ में उन्‍होंने इस विश्‍लेषण को और ज्‍यादा व्‍यापक रूप प्रदान किया और विभिन्‍न प्रकार के वर्गीकरणों के द्वारा २५ खण्‍डों में एक वर्ष के दौरान लिखे जाने वाले प्रमुख ब्‍लागों का लेखा-जोखा प्रस्‍तुत किया। इसी प्रकार वर्ष २०१० में भी यह अनुष्‍ठान उन्‍होंने पूरी निष्‍ठा के साथ सम्‍पन्‍न किया और २१ कडियों में ब्‍लॉग जगत की वार्षिक रिपोर्ट को प्रस्‍तुत करके एक तरह से ब्‍लॉग इतिहास लेखन का सूत्रपात किया।

ब्‍लॉग जगत की सकारात्‍मक प्रवृत्तियों को रेखांकित करने के उद्देश्‍य से अभी तक जितने भी प्रयास किये गये हैं, उनमें ‘ब्‍लॉगोत्‍सव’ एक अहम प्रयोग है। अपनी मौलिक सोच के द्वारा रवीन्‍द्र प्रभात ने इस आयोजन के माध्‍यम से पहली बार ब्‍लॉग जगत के लगभग सभी प्रमुख रचनाकारों को एक मंच पर प्रस्‍तुत किया और गैर ब्‍लॉगर रचनाकारों को भी इससे जोड़कर समाज में एक सकारात्‍मक संदेश का प्रसार किया।"

ब्लॉग पर इस उत्सव को प्रायोजित किया बाराबंकी से प्रकाशित लोकसंघर्ष पत्रिका ने और इसमें उद्घोषित ५१ ब्लॉगर्स को दिनांक ३० अप्रैल-२०११ को हिंदी भवन दिल्ली में सारस्वत सम्मान देने का निर्णय लिया है देश के एक बड़े प्रकाशन संस्थान हिंदी साहित्य निकेतन बिजनौर ने , साथ ही १३ और ब्लॉगर्स को हिंदी ब्लॉग जगत में उल्लेखनीय योगदान के लिए नुक्कड़ डोट कॉम द्वारा इस अवसर पर सम्मानित किया जाएगा, साथ ही देश का प्रमुख प्रकाशन संस्थान हिंदी साहित्य निकेतन अपने ५० वर्षों की विकास यात्रा को भी इस अवसर पर प्रस्तुत करेगा, जिसका लाईव वेबकास्ट जबलपुर के गिरीश बिल्लोरे मुकुल और दिल्ली के पद्म सिंह के द्वारा पूरी दुनिया में प्रकाशित किया जाएगा ! इस अवसर पर अविनाश वाचस्पति और रवीन्द्र प्रभात के संपादन में प्रकाशित पुस्तक : हिंदी ब्लॉगिंग अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति , रवीन्द्र प्रभात का उपन्यास " ताकि बचा रहे लोकतंत्र " और रश्मि प्रभा के संपादन में प्रकाशित परिकल्पना समूह की त्रैमासिक पत्रिका " वटवृक्ष" का भी लोकार्पण होगा !

उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगिंग के उत्‍थान में अविस्मरणीय योगदान हेतु उपस्थित ५१  ब्लॉगरों को हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-२०१० के अंतर्गत मोमेंटो, सम्मान पत्र, पुस्तकें, शॉल और एक निश्चित धनराशि के साथ सम्मानित करने किया जाना है ,सम्मानित किये जाने वाले ब्लॉगरों का विवरण इस प्रकार है -

१. वर्ष का श्रेष्ठ नन्हा ब्लॉगर - अक्षिता पाखी, पोर्टब्लेयर
२. वर्ष के श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट - श्री काजल कुमार, दिल्ली
३. वर्ष की श्रेष्ठ कथा लेखिका - श्रीमती निर्मला कपिला, नांगल (पंजाब)
४. वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक - डॉ. अरविन्द मिश्र, वाराणसी
५. वर्ष की श्रेष्ठ संस्मरण लेखिका - श्रीमती सरस्वती प्रसाद, पुणे
६. वर्ष के श्रेष्ठ लेखक - श्री रवि रतलामी, भोपाल
७. वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका (यात्रा वृतान्त) - श्रीमती शिखा वार्ष्णेय, लंदन
८. वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (यात्रा वृतान्त) - श्री मनोज कुमार, कोलकाता
९. वर्ष के श्रेष्ठ चित्रकार - श्रीमती अल्पना देशपांडे, रायपुर
१०. वर्ष के श्रेष्ठ हिन्दी प्रचारक - श्री शास्त्री जे.सी. फिलिप, कोच्ची, केरल
११. वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री - श्रीमती रश्मि प्रभा, पुणे
१२. वर्ष के श्रेष्ठ कवि - श्री दिवि‍क रमेश, दिल्ली
१३. वर्ष की श्रेष्ठ सह लेखिका - सुश्री शमा कश्यप, पुणे
१४. वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार - श्री अविनाश वाचस्पति, दिल्ली
१५. वर्ष की श्रेष्ठ युवा गायिका - सुश्री मालविका, बैंगलोर
१६. वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय लेखक - श्री संजीव तिवारी, दुर्ग (म. प्र. )
१७. वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय कवि - श्री एम. वर्मा, वाराणसी
१८. वर्ष के श्रेष्ठ गजलकार - श्री दिगम्बर नासवा, दुबई
१९. वर्ष के श्रेष्ठ कवि (वाचन) - श्री अनुराग शर्मा, पिट्सबर्ग अमेरिका
२०. वर्ष की श्रेष्ठ परिचर्चा लेखिका - श्रीमती प्रीति मेहता, सूरत
२१. वर्ष के श्रेष्ठ परिचर्चा लेखक - श्री दीपक मशाल, लंदन
२२. वर्ष की श्रेष्ठ महिला टिप्पणीकार - श्रीमती संगीता स्वरूप, दिल्ली
२३. वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार - श्री हिमांशु पाण्डेय, सकलडीहा (यू.पी.)
२४-२५-२६. वर्ष की श्रेष्ठ उदीयमान गायिका – खुशबू/अपराजिता/इशिता, पटना (संयुक्त रूप से)
२७. वर्ष के श्रेष्ठ बाल साहित्यकार - श्री जाकिर अली 'रजनीश', लखनऊ
२८. वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार (आंचलिक) - श्री ललित शर्मा, रायपुर
२९. वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार (गायन) - श्री राजेन्द्र स्वर्णकार, बीकानेर, राजस्थान
३०-३१. वर्ष के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार - डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक', खटीमा एवं आचार्य संजीव वर्मा सलिल, भोपाल (संयुक्त रूप से)
३२. वर्ष की श्रेष्ठ देशभक्ति पोस्ट - कारगिल के शहीदों के प्रति ( श्री पवन चंदन)
३३. वर्ष की श्रेष्ठ व्यंग्य पोस्ट - झोलाछाप डॉक्टर (श्री राजीव तनेजा)
३४. वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि - श्री ओम आर्य, सीतामढ़ी बिहार
३५. वर्ष के श्रेष्ठ विचारक - श्री जी.के. अवधिया, रायपुर
३६. वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक - श्री गिरीश पंकज, रायपुर
३७. वर्ष की श्रेष्ठ महिला चिन्तक - श्रीमती नीलम प्रभा, पटना
३८. वर्ष के श्रेष्ठ सहयोगी - श्री रणधीर सिंह सुमन, बाराबंकी
३९. वर्ष के श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (पुरूष) – डॉ. सुभाष राय, लखनऊ (उ0प्र0)
४०. वर्ष की श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (महिला) - श्रीमती संगीता पुरी, धनबाद
४१. वर्ष के श्रेष्ठ तकनीकी ब्लॉगर - श्री विनय प्रजापति, अहमदाबाद
४२. वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लॉगर - श्री खुशदीप सहगल, दिल्ली
४३. वर्ष के श्रेष्ठ नवोदित ब्लॉगर - श्री राम त्यागी, शिकागो अमेरिका
४४. वर्ष के श्रेष्ठ युवा पत्रकार - श्री मुकेश चन्द्र, दिल्ली
४५. वर्ष के श्रेष्ठ आदर्श ब्लॉगर - श्री ज्ञानदत्त पांडेय, इलाहाबाद
४६. वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग शुभचिंतक - श्री सुमन सिन्हा, पटना
४७. वर्ष की श्रेष्ठ महिला ब्लॉगर - श्रीमती स्वप्न मंजूषा 'अदा', अटोरियो कनाडा
४८. वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉगर - श्री समीर लाल 'समीर', टोरंटो कनाडा
४९. वर्ष की श्रेष्ठ विज्ञान पोस्ट - भविष्य का यथार्थ (लेखक - जिशान हैदर जैदी)
५०. वर्ष की श्रेष्ठ प्रस्तुति - कैप्टन मृगांक नंदन एण्ड टीम, पुणे
५१. वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (हिन्दी चिट्ठाकारी विषयक पोस्ट) - श्री प्रमोद ताम्बट, भोपाल

तथा हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान-२०११ के अंतर्गत तेरह और ब्लॉगरों के नाम तय किये गए , जिन्हें हिंदी ब्लॉगिंग में दिए जा रहे विशेष योगदान के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान प्रदान किया जाएगा : -
(१) श्री श्रीश शर्मा (ई-पंडित), तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर (हरियाणा)
(२) श्री कनिष्क कश्यप, संचालक ब्लॉगप्रहरी, दिल्ली
(३) श्री शाहनवाज़ सिद्दिकी, तकनीकी संपादक, हमारीवाणी, दिल्ली
(४) श्री जय कुमार झा, सामाजिक जन चेतना को ब्लॉगिंग से जोड़ने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(५) श्री सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी, महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
(६) श्री अजय कुमार झा, मीडिया चर्चा से रूबरू कराने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(७) श्री रविन्द्र पुंज, तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर (हरियाणा)
(८) श्री रतन सिंह शेखावत, तकनीकी विशेषज्ञ, फरीदाबाद (हरियाणा )
(९) श्री गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल', वेबकास्ट एवं पॉडकास्‍ट विशेषज्ञ, जबलपुर
(१०) श्री पद्म सिंह, तकनीकी विशेषज्ञ, दिल्ली
(११) सुश्री गीताश्री, नारी विषयक लेखिका, दि‍ल्ली
(१२) श्री बी एस पावला,ब्लॉग संरक्षक, भिलाई (म.प्र.)
(१३) श्री अरविन्द श्रीवास्तव, समालोचना, मधेपुरा (बिहार)
उल्लेखनीय है कि हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में इनके योगदान को चिन्हित करने के लिए हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन,परिकल्पना डॉट कॉम और नुक्‍कड़ डॉट कॉम की ओर से यह वृहद् सम्‍मान योजना आरंभ की गयी है।

समस्त ब्लॉगरों का सम्मान दिनांक ३०.०४.२०११ दिन शनिवार को दिल्ली के स्थानीय हिंदी भवन में इस प्रकार आयोजित होगी :

सायं ४ - ६ बजे  (प्रथम सत्र ) :

हिंदी साहित्य निकेतन की विकास -यात्रा पर चर्चा , ताकि बचा रहे लोकतंत्र (रवीन्द्र प्रभात का उपन्यास ) और वटवृक्ष
( परिकल्पना समूह की त्रैमासिक पत्रिका ) का लोकार्पण तथा हिंदी ब्लॉगर्स का सारस्वत सम्मान

प्रथम सत्र में सान्निध्य :
श्री रमेश पोखरियाल "निशंक" मुख्य मंत्री, उत्तराखंड के द्वारा समारोह का उदघाटन
डा. रामदरश मिश्र ( मुख्य अतिथि )
श्री अशोक चक्रधर की अध्यक्षता
श्री अशोक बजाज, चेयर मैन छतीसगढ़ भंडारण निगम (विशिष्ट अतिथि )
श्री प्रेम जन्मेजय, व्यंग्यकार
श्री विश्व बन्धु गुप्ता, पूर्व इनकम टेक्स कमिश्नर और चर्चित सामाजिक कार्यकर्ता

सायं ६ – 6.३० बजे : चाय

सायं ६.३० – ८.०० (द्वितीय सत्र) :
देश को जागरूक करने में न्यू मीडिया की भूमिका पर संगोष्ठी तथा हिंदी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नयी क्रान्ति ( संपादक : अविनाश वाचस्पति/ रवीन्द्र प्रभात ) का लोकार्पण, साथ ही नेशनल स्कूल ऑफ ड्रामा की लघु नाट्य प्रस्तुति

द्वितीय सत्र में सान्निध्य :
श्री प्रभाकर श्रीत्रिय ( अध्यक्ष )
श्री पुण्य प्रसून बाजपेयी ( मुख्य अतिथि )
श्री उदय प्रकाश ( विशिष्ट अतिथि )
सुश्री मनीषा कुलश्रेष्ठ
श्री अजीत अंजुम
श्री देवेन्द्र देवेश
८.३० से रात्रि भोज्

आने वाले दिनों में निश्चित रूप से यह कार्यक्रम हिंदी ब्लॉगिंग को ऊँचाई प्रदान करने में सहायक सिद्ध होगा, ऐसी आशा है !

(बाराबंकी से रणधीर सिंह सुमन की रपट )

मंगलवार, 19 अप्रैल 2011

षटपदियाँ : संजीव 'सलिल'

षटपदियाँ :
संजीव 'सलिल'
*
इनके छंद विधान में अंतर को देखें. प्रथम अमृत ध्वनि है, शेष कुण्डलिनी
भारत के गुण गाइए, मतभेदों को भूल.
*
फूलों सम मुस्काइये, तज भेदों के शूल..
तज भेदों के, शूल अनवरत, रहें सृजनरत.
मिलें अंगुलिका, बनें मुष्टिका, दुश्मन गारत..
तरसें लेनें. जन्म देवता, विमल विनयरत.
'सलिल' पखारे, पग नित पूजे, माता भारत..
*
कंप्यूटर कलिकाल का, यंत्र बहुत मतिमान.
हुए पराजित पलों में, कोटि-कोटि विद्वान..
कोटि-कोटि विद्वान, कहें- मानव किंचित डर.
तुझे बना ले, दास अगर हो, हावी तुझ पर..
जीव श्रेष्ठ, निर्जीव हेय, सच है यह अंतर.
'सलिल' न मानव से बेहतर कोई कंप्यूटर..  
*
सुंदरियाँ घातक; सलिल' पल में लें दिल जीत.
घायल करें कटाक्ष से, जब बनतीं मन-मीत.
जब बनतीं मन-मीत, मिटे अंतर से अंतर.
बिछुड़ें तो अवढरदानी  भी हों प्रलयंकर.
असुर-ससुर तज सुर पर ही रीझें किन्नरियाँ.
नीर-क्षीर बन, जीवन पूर्ण करें सुंदरियाँ..
*

एक चतुष्पदी : संजीव 'सलिल'

एक चतुष्पदी :

संजीव 'सलिल'
*
हार मिलीं अनगिन मैंने जयहार समझ उनको पहना.
जग-जीवन ने अपमान दिया मैंने मना उसको गहना..
प्रभु से माँगा 'जो जब देना, मुझको सिखला देना सहना-
आखिर में साँसों-आसों की चादर को सीख सकूँ तहना..
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

शनिवार, 16 अप्रैल 2011

कुछ द्विपदियाँ : संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला-
संजीव 'सलिल'
वक्-संगति में भी तनिक, गरिमा सके न त्याग.
राजहंस पहचान लें, 'सलिल' आप ही आप..      
*
चाहे कोयल-नीड़ में, निज अंडे दे काग.
शिशु न मधुर स्वर बोलता, गए कर्कश राग..
*
रहें गृहस्थों बीच पर, अपना सके न भोग.
रामदेव बाबा 'सलिल', नित करते हैं योग..
*
मैकदे में बैठकर, प्याले पे प्याले पी गये.
'सलिल' फिर भी होश में रह, हाय! हम तो जी गए..
*
खूब आरक्षण दिया है, खूब बाँटी राहतें.
झुग्गियों में जो बसे, सुधरी नहीं उनकी गतें..
*
थक गए उपदेश देकर, संत मुल्ला पादरी.
सुन रहे प्रवचन मगर, छोड़ें नहीं श्रोता लतें.
*

हिंदी छंद : अमृतध्वनि संजीव 'सलिल'

हिंदी छंद : अमृतध्वनि 
संजीव 'सलिल'

*
अमृतध्वनि भी कुण्डलिनी का तरह षट्पदी (६ पंक्ति का) छंद है. इसमें प्रत्येक पंक्ति को ८-८ मात्राओं के ३ भागों में बाँटा जाता है. इसमें यमक और अनुप्रास का प्रयोग बहुधा होने पर एक विशिष्ट नाद (ध्वनि) सौन्दर्य उत्पन्न होने से इसका नाम अमृतध्वनि हुआ.
रचना विधान:
१. पहली दो पंक्तियाँ दोहा: १३-११ पर लघु के साथ यति.
२. शेष ४ पंक्तियाँ: २४ मात्राएँ ८, ८, ८ पर लघु के साथ यति.
३. दोहा का अंतिम पद तृतीय पंक्ति का प्रथम पद.
४. दोहा का प्रथम शब्द (शब्द समूह नहीं) छ्न्द का अंतिम शब्द हो.
नवीन चन्द्र चतुर्वेदी :
उन्नत धारा प्रेम की, बहे अगर दिन रैन|


तब मानव मन को मिले, मन-माफिक सुख चैन||
मन-माफिक सुख चैन, अबाधित होंय अनन्‍दित|
भाव सुवासित, जन हित लक्षित, मोद मढें नित|
रंज न किंचित, कोई न वंचित, मिटे अदावत|
रहें इहाँ-तित, सब जन रक्षित, सदा समुन्नत||

पं. रामसेवक पाठक 'हरिकिंकर' :
आया नाज़ुक समय अब, पतित हुआ नर आज.
करता निन्दित कर्म सब, कभी न आता बाज..
कभी न आता, बाज बेशरम, सत भी छोड़ा.
परहित भूला, फिरता फूला, डाले रोड़ा..
जग-दुःख छाया, अमन गँवाया, चैन न पाया.
हर्षित पुलकित, प्रमुदित हुआ न, कुसमय आया..
मनोहर शर्मा 'माया' :
पावस है वरदान सम, देती नीर अपार.
हर्षित होते कृषक गण, फसलों की भरमार..
झर-झर पानी, करे किसानी, कीचड़ सानी.
वारिद गरजे, चपला चमके, टप-टप पानी..
धान निरावे, कजरी गावे, बीते 'मावस.
हर्षित हर तन, पुलकित हर मन, आई पावस..
(दोहे का अंतिम चरण तीसरी पंक्ति का प्रथम चरण नहीं है, क्या इसे अमृतध्वनि कहेंगे?)
संजीव वर्मा 'सलिल'
जलकर भी तम हर रहे, चुप रह मृतिका-दीप.
मोती पाले गर्भ में, बिना कुछ कहे सीप.
सीप-दीप से, हम मनुज तनिक, न लेते सीख.
इसीलिए तो, स्वार्थ में लीन, पड़ रहे दीख.
दीप पर्व पर, हों संकल्पित, रह हिल-मिलकर.
दें उजियारा, आत्म-दीप बन, निश-दिन जलकर.
(दोहे का अंतिम चरण तीसरी पंक्ति का प्रथम चरण नहीं है, किन्तु दोहे का अंतिम शब्द तीसरी पंक्ति का प्रथम शब्द है, क्या इसे अमृतध्वनि कहेंगे?)
****************
समस्यापूर्ति:
१. कम्प्यूटर
२. सुन्दरियाँ
३. भारत

मंगलवार, 12 अप्रैल 2011

राम नवमी पर विशेष लोक भजन : स्व. शांति देवी वर्मा

राम नवमी पर विशेष लोक भजन : स्व. शांति देवी वर्मा
अवध में जन्में हैं श्री राम
अवध में जन्में हैं श्री राम, दरश को आए शंकरजी...
*
कौन गा रहे?, कौन नाचते?, कौन बजाएं करताल?
दरश को आए शंकरजी...
*
ऋषि-मुनि गाते, देव नाचते, भक्त बजाएं करताल.
दरश को आए शंकरजी...
*
अंगना मोतियन चौक है, द्वारे हीरक बन्दनवार.
दरश को आए शंकरजी...
*
मलिन-ग्वालिन सोहर गायें, नाचें डे-डे ताल.
दरश को आए शंकरजी...
*
मैया लाईं थाल भर मोहरें, लो दे दो आशीष.
दरश को आए शंकरजी...
*
नाग त्रिशूल भभूत जाता लाख, डरे न मेरो लाल
दरश को आए शंकरजी...
*
बिन दर्शन हम कहूं न जैहें, बैठे धुनी रमाय.
दरश को आए शंकरजी...
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अलख जगाये द्वार पर भोला, डमरू रहे बजाय.
दरश को आए शंकरजी...
*
रघुवर गोदी लिए कौशल्या, माथ डिठौना लगाय.
दरश को आए शंकरजी...
जग-जग जिए लाल माँ तेरो, शम्भू करें जयकार.
दरश को आए शंकरजी...
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बाजे अवध बधैया
बाजे अवध बधैया, हाँ हाँ बाजे अवध बधैया...
मोद मगन नर-नारी नाचें, नाचें तीनों मैया.
हाँ-हाँ नाचें तीनों मैया, बाजे अवध बधैया..
मातु कौशल्या जनें रामजी, दानव मार भगैया
हाँ हाँ दानव मार भगैया बाजे अवध बधैया...
मातु कैकेई जाए भरत जी, भारत भार हरैया
हाँ हाँ भारत भार हरैया, बाजे अवध बधैया...
जाए सुमित्रा लखन-शत्रुघन, राम-भारत की छैयां
हाँ हाँ राम-भारत की छैयां, बाजे अवध बधैया...
नृप दशरथ ने गाय दान दी, सोना सींग मढ़ईया
हाँ हाँ सोना सींग मढ़ईया, बाजे अवध बधैया...
रानी कौशल्या मोहर लुटाती, कैकेई हार-मुंदरिया
हाँ हाँ कैकेई हार-मुंदरिया, बाजे अवध बधैया...
रानी सुमित्रा वस्त्र लुटाएं, साडी कोट रजैया
हाँ हाँ साडी कोट रजैया, बाजे अवध बधैया...
विधि-हर हरि-दर्शन को आए, दान मिले कुछ मैया
हाँ हाँ दान मिले कुछ मैया, बाजे अवध बधैया...
'शान्ति'-सखी मिल सोहर गावें, प्रभु की लेनी बलैंयाँ 
हाँ हाँ प्रभु की लेनी बलैंयाँ, बाजे अवध बधैया...
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आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के निधन से हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति

शुक्रवार, ८ अप्रैल २०११

महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शास्त्री जी के निधन से हिंदी जगत की अपूरणीय क्षति 

मुजफ्फरपुर सुनसान लागि रहल ये जिम्हर देखियो उम्हरे शोक आ शंताप के माहौल ये। अनाथ भए गेल सोंसे देश कियाकि महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शाश्त्री जी के निधन भए गेल। शुक्रवार के हुनकर सम्मान में शोकसभाएं आयोजित कए के श्रदांजलि दए वाला के ताँता लागल रहय।साथ ही साथ सरकार से ओ महाकवि के देशरत्ना से विभूषित करय के मांग जोर पकड़य लागल ये।'ऊपर-ऊपर पी जाते हैं, जो पीने वाले होतें हैं जेइसन अमर पंक्ति से समाज के वंचित लोगेन के प्रति अपन वेदना के उड़ेलइ वाला महाकवि के निधन से भारतीय साहित्य के बहुत पैघ क्षति पहुंचल ये।
[055[4].jpg]हुनकर दिवंगत आत्मा के चिरशांति आ दुःख के ई घडी में हुनकर परिजन के धैर्य धारण करय के क्षमता प्रदान करय के लेल इश्वर से प्रार्थना करल गेल।महाकवि के आत्मा के शांति के लेल कैकटा विद्वान् आ नेता हुनकर घोर पहुंचल। महाकवि आचार्य जानकीवल्लभ शाश्त्री जी जन्म 5 जनवरी सन 1916 के औरंगाबाद के मैगरा गाम मे भेल छलन्हि. करीब सत्तर साल पहिने मुजफ्फरपुर अएला के बाद एहिठाम बसि गेलखिन्ह. एहिठाम रामदयालु सिंह कॉलेज,आरडीएस कॉलेज हिन्दी के विभागाध्यक्ष सेहो रहलखिन्ह। हुनकर निधन से सोंसे साहित्य जगत अनाथ भए गेल ये,मुदा उम्र के तकाजा कहियो आ होनी जिनकर बुलावा आबय छैक हुनका जाय से कियो नै रोकि सकय अछि।
हिनकर रचना हिनकर प्रसिद्ध रचना मे मेघगीत,अवन्तिका,राधा,श्यामासंगीत,एक किरण: सौ झाइयां,दो तिनकों का घोंसला,इरावती,कालीदास,अशोक वन, सत्यकाम..आदि प्रसिद्ध अछि।
साहित्य जगत हुनकर निधन से अनाथ ते भए ही गेल ये साथ ही साथ हुनकर कमी के साहित्य जगत कहियो पूरा कए सकत की नै ई एकता सोचनिये विषय अछि।

रविवार, 10 अप्रैल 2011

हिन्‍दी ब्‍लॉगर सम्मान दिल्‍ली के हिन्‍दी भवन में

हिन्‍दी ब्‍लॉगरों, प्रेमियों, साहित्‍यकारों : 30 अप्रैल 2011 को दिल्‍ली के हिन्‍दी भवन में मिल रहे हैं

सहर्ष सूचित किया जा रहा है कि देश का विशिष्ट प्रकाशन संस्थान हिन्दी साहित्य निकेतन 50 वर्षों की अपनी विकास-यात्रा और गतिविधियों को आपके समक्ष प्रस्तुत करने के लिए 30 अप्रैल २०११ दिन शनिवार   को दिल्ली के हिंदी भवन में एक दिवसीय भव्य आयोजन कर रहा है। इस अवसर पर देश और विदेश में रहने वाले लगभग 400 ब्लॉगरों का सम्मेलन आयोजित किया जा रहा है, जिसमें परिकल्‍पना समूह के तत्‍वावधान में इतिहास में पहली बार आयोजित ब्लॉगोत्‍सव 2010 के अंतर्गत चयनित 51 ब्लॉगरों का ‘सारस्‍वत सम्मान’ भी किया जाएगा।

इस अवसर पर लगभग 400 पृष्ठों की पुस्तक ( हिंदी ब्लॉगिंग : अभिव्यक्ति की नई क्रान्ति), हिंदी साहित्य निकेतन की द्विमासिक पत्रिका  ‘शोध दिशा’ का विशेष अंक ( इसमें ब्लॉगोत्सव -२०१० में प्रकाशित सभी प्रमुख  रचनाओं को शामिल किया गया है) मेरा हिंदी उपन्यास (ताकि बचा रहे गणतंत्र ), रश्मि प्रभा के संपादन में प्रकाशित त्रैमासिक पत्रिका (वटवृक्ष ) के प्रवेशांक के साथ-साथ और कई महत्वपूर्ण किताबों का लोकार्पण होना है !इस कार्यक्रम में विमर्श,परिचर्चाएँ एवं सांस्कृतिक कार्यक्रम आकर्षण का केंद्र होंगे। पूरे कार्यक्रम का जीवंत प्रसारण इंटरनेट के माध्यम से पूरे विश्व में किया जाएगा। आप इस कार्यक्रम का आनंद अपने इंटरनेट भी उस दिन ले पायेंगे। जिसकी रिकार्डिंग बाद में भी नेट पर ही मौजूद रहेगी। इंटरनेट पर उपस्थिति को भी आपकी मौजूदगी माना जायेगा। पर यह गिनती दिल्‍ली-एनसीआर और देश से बाहर वालों के लिए ही लागू होगी।  कार्यक्रम का विवरण निम्नवत हैः
दिन व समयः शनिवार 30 अप्रैल 2011, दोपहर 3 बजे से रात्रि‍ 8.30 बजे तक।
रात्रि‍ 8 .30 बजे भोजन।
स्थानः हिंदी भवन , विष्‍णु दिगम्‍बर मार्ग, नई दिल्ली-110002

हिंदी साहित्य निकेतन परिकल्पना सम्मान-२०१०


उल्लेखनीय है कि इस अवसर पर हिन्दी ब्लॉगिंग के उत्‍थान में अविस्मरणीय योगदान हेतु उपस्थित 51 ब्लॉगरों को मोमेंटो, सम्मान पत्र, पुस्तकें, शॉल और एक निश्चित धनराशि के साथ सम्मानित करने की योजना है।

सम्मानित किये जाने वाले ब्लॉगरों का विवरण -

1.         वर्ष का श्रेष्ठ नन्हा ब्लॉगर - अक्षिता पाखी, पोर्टब्लेयर
2.         वर्ष के श्रेष्ठ कार्टूनिस्ट - श्री काजल कुमार, दिल्ली
3.         वर्ष की श्रेष्ठ कथा लेखिका - श्रीमती निर्मला कपिला, नांगल (पंजाब)
4.         वर्ष के श्रेष्ठ विज्ञान कथा लेखक - डॉ. अरविन्द मिश्र, वाराणसी
5.         वर्ष की श्रेष्ठ संस्मरण लेखिका - श्रीमती सरस्वती प्रसाद, पुणे
6.         वर्ष के श्रेष्ठ लेखक - श्री रवि रतलामी, भोपाल
7.         वर्ष की श्रेष्ठ लेखिका (यात्रा वृतान्त) - श्रीमती शिखा वार्ष्णेय, लंदन
8.         वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (यात्रा वृतान्त) - श्री मनोज कुमार, कोलकाता
9.         वर्ष के श्रेष्ठ चित्रकार - श्रीमती अल्पना देशपांडे, रायपुर
10.       वर्ष के श्रेष्ठ हिन्दी प्रचारक - श्री शास्त्री जे.सी. फिलिप, कोच्ची, केरल
11.       वर्ष की श्रेष्ठ कवयित्री - श्रीमती रश्मि प्रभा, पुणे
12.       वर्ष के श्रेष्ठ कवि - श्री दिवि‍क रमेश, दिल्ली
13.       वर्ष की श्रेष्ठ सह लेखिका - सुश्री शमा कश्यप, पुणे
14.       वर्ष के श्रेष्ठ व्यंग्यकार - श्री अविनाश वाचस्पति, दिल्ली
15.       वर्ष की श्रेष्ठ युवा गायिका - सुश्री मालविका, बैंगलोर
16.       वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय लेखक - श्री संजीव तिवारी, दुर्ग (म. प्र. )
17.       वर्ष के श्रेष्ठ क्षेत्रीय कवि - श्री एम. वर्मा, वाराणसी
18.       वर्ष के श्रेष्ठ गजलकार - श्री दिगम्बर नासवा, दुबई
19.       वर्ष के श्रेष्ठ कवि (वाचन) - श्री अनुराग शर्मा, पिट्सबर्ग अमेरिका
20.       वर्ष की श्रेष्ठ परिचर्चा लेखिका - श्रीमती प्रीति मेहता, सूरत
21.       वर्ष के श्रेष्ठ परिचर्चा लेखक - श्री दीपक मशाल, लंदन
22.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला टिप्पणीकार - श्रीमती संगीता स्वरूप, दिल्ली
23.       वर्ष के श्रेष्ठ टिप्पणीकार - श्री हिमांशु पाण्डेय, सकलडीहा (यू.पी.)
24-25-26.  वर्ष की श्रेष्ठ उदीयमान गायिका – खुशबू/अपराजिता/इशिता, पटना (संयुक्त रूप से)
27.       वर्ष के श्रेष्ठ बाल साहित्यकार - श्री जाकिर अली 'रजनीश', लखनऊ
28.       वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार  (आंचलिक) - श्री ललित शर्मा, रायपुर
29.       वर्ष के श्रेष्ठ गीतकार (गायन) - श्री राजेन्द्र स्वर्णकार, बीकानेर, राजस्थान
30-31.  वर्ष के श्रेष्ठ उत्सवी गीतकार - डॉ. रूपचंद्र शास्त्री 'मयंक', खटीमा एवं आचार्य संजीव वर्मा सलिल,       भोपाल (संयुक्त रूप से)
32.       वर्ष की श्रेष्ठ देशभक्ति पोस्ट - कारगिल के शहीदों के प्रति ( श्री पवन चंदन)
33.       वर्ष की श्रेष्ठ व्यंग्य पोस्ट - झोलाछाप डॉक्टर (श्री राजीव तनेजा)
34.       वर्ष के श्रेष्ठ युवा कवि - श्री ओम आर्य, सीतामढ़ी बिहार
35.       वर्ष के श्रेष्ठ विचारक - श्री जी.के. अवधिया, रायपुर
36.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग विचारक - श्री गिरीश पंकज, रायपुर
37.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला चिन्तक - श्रीमती नीलम प्रभा, पटना
38.       वर्ष के श्रेष्ठ सहयोगी - श्री रणधीर सिंह सुमन, बाराबंकी
39.       वर्ष के श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (पुरूष) – डॉ. सुभाष राय, लखनऊ  (उ0प्र0)
40.       वर्ष की श्रेष्ठ सकारात्मक ब्लॉगर (महिला) - श्रीमती संगीता पुरी, धनबाद
41.       वर्ष के श्रेष्ठ तकनीकी ब्लॉगर - श्री विनय प्रजापति, अहमदाबाद
42.       वर्ष के चर्चित उदीयमान ब्लॉगर - श्री खुशदीप सहगल, दिल्ली
43.       वर्ष के श्रेष्ठ नवोदित ब्लॉगर - श्री राम त्यागी, शिकागो अमेरिका
44.       वर्ष के श्रेष्ठ युवा पत्रकार - श्री मुकेश चन्द्र, दिल्ली
45.       वर्ष के श्रेष्ठ आदर्श ब्लॉगर - श्री ज्ञानदत्त पांडेय, इलाहाबाद
46.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉग शुभचिंतक - श्री सुमन सिन्हा, पटना
47.       वर्ष की श्रेष्ठ महिला ब्लॉगर - श्रीमती स्वप्न मंजूषा 'अदा', अटोरियो कनाडा
48.       वर्ष के श्रेष्ठ ब्लॉगर - श्री समीर लाल 'समीर', टोरंटो कनाडा
49.       वर्ष की श्रेष्ठ विज्ञान पोस्ट - भविष्य का यथार्थ (लेखक - जिशान हैदर जैदी)
50.       वर्ष की श्रेष्ठ प्रस्तुति - कैप्टन मृगांक नंदन एण्ड टीम, पुणे
51.       वर्ष के श्रेष्ठ लेखक (हिन्दी चिट्ठाकारी विषयक पोस्ट) - श्री प्रमोद ताम्बट, भोपाल 


हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान-२०११

इसके अंतर्गत ग्यारह ब्लॉगरों के नाम तय किये गए हैं , जिन्हें हिंदी ब्लॉगिंग में
दिए जा रहे विशेष योगदान के लिए हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान प्रदान किया जायेगा : -

(१)     श्री श्रीश शर्मा (ई-पंडित), तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर  (हरियाणा)
(२)   श्री कनिष्क कश्यप, संचालक ब्लॉगप्रहरी, दिल्ली
(३)   श्री शाहनवाज़ सिद्दिकी, तकनीकी संपादक, हमारीवाणी, दिल्ली
(४)   श्री जय कुमार झा, सामाजिक जन चेतना को ब्लॉगिंग से जोड़ने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(५)   श्री सिद्दार्थ शंकर त्रिपाठी, महात्मा गांधी हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा
(६)   श्री अजय कुमार झा, मीडिया चर्चा से रूबरू कराने वाले ब्लॉगर, दिल्ली
(७)   श्री रविन्द्र पुंज, तकनीकी विशेषज्ञ, यमुनानगर (हरियाणा)
(८)   श्री रतन सिंह शेखावत, तकनीकी विशेषज्ञ, फरीदाबाद (हरियाणा )
(९)   श्री गिरीश बिल्लौरे 'मुकुल', वेबकास्ट एवं पॉडकास्‍ट विशेषज्ञ, जबलपुर
(१०) श्री पद्म सिंह, तकनीकी विशेषज्ञ, दिल्ली
(११) सुश्री गीताश्री, नारी विषयक लेखिका, दि‍ल्ली

हिन्‍दी ब्‍लॉग जगत में इनके योगदान को चिन्हित करने के लिए हिन्‍दी साहित्‍य निकेतन और नुक्‍कड़ डॉट कॉम की ओर से हिन्‍दी ब्‍लॉग प्रतिभा सम्‍मान आरंभ किया गया है।
हिन्‍दी ब्लॉग की दुनिया के हस्ताक्षरों से मिलने और कार्यक्रमों का आनंद उठाने के लिए आपका स्‍वागत है 

इस विशेष अवसर पर पधार कर हमें अनुगृहित करें ! सम्‍मानित जनों से  विनम्र निवेदन है कि अपने आने की स्वीकृति के साथ-साथ अन्य आवश्यक जानकारी निम्नलिखित ई-मेल पर देने का कष्ट करें, ताकि आपके आगमन पर अवस्थान का समुचित प्रबन्ध समय से किया जा सके।  अपनी सहमति के साथ अपना मोबाइल नम्बर और ई मेल पता अवश्‍य दें।

 
जानकारी निम्नलिखित ई-मेल पर देने का कष्ट करें
पासपोर्ट आकार के उचित गुणवत्‍ता वाले चित्र इस ई मेल पर दो दिन के अंदर अवश्‍य भिजवायें :-
  • डॉ. गिरिराजशरण अग्रवाल, सचिव, हिंदी साहित्य निकेतन, बिजनौर 


 साथ ही इसकी प्रतिलिपि निम्नलिखित ई-मेल पर भी देवें :
  • अविनाश वाचस्पति, मुख्य सलाहकार,ब्लॉगोत्सव-२०१०, दिल्ली

hindibloggar@gmail.com
  • रवीन्द्र प्रभात,संचालक-समन्वयक : परिकल्पना समूह,लखनऊ


विशेष अनुरोध :
सम्मानित किये जा रहे ब्लॉगर बंधुओं से निवेदन है कि वे अपने आने की स्वीकृति के साथ कृपया अपने पासपोर्ट आकार का एक उचित गुणवत्‍ता का चित्र भी संलग्न कर दो दिन के अंदर ई मेल पर प्रेषित करें ताकि सम्मान पत्र पर उसे प्रकाशित किया जा सके ! 


दी गई सूचना में यदि कोई त्रुटि दिखलाई दे रही हो तो उसकी सूचना तुरंत hindibloggar@gmail.com पर भिजवायें।

शनिवार, 9 अप्रैल 2011


Two Equations:

vijay kaushal.



Equation 1

Human = eat + sleep + work + enjoy
Donkey = eat + sleep

Therefore:
Human = Donkey + Work + enjoy

Therefore:
Human-enjoy = Donkey + Work

In other words,
A Human that doesn't know how to enjoy = Donkey that works.

Equation 2

Man = eat + sleep + earn money
Donkey = eat + sleep
< BR>Therefore:
Man = Donkey + earn money

Therefore:
Man-earn money = Donkey

In other words
Man who doesn't earn money = Donkey


Woman= eat + sleep + spend
Donkey = eat + sleep

Therefore:
Woman = Donkey + spend
Woman - spend = Donkey

In other words,
Woman who doesn't spend = Donkey

To Conclude:
From Equation 2 and Equation 3

Man who doesn't earn money = Woman who doesn't spend

So Man earns money not to let woman become a donkey!
And a woman spends not to let the man become a donkey!

So, We have:
Man + Woman = Donkey + earn money + Donkey + Spend money

Therefore from postulates 1 and 2, we can conclude


Man + Woman = 2 Donkeys that live happily together!

शुक्रवार, 8 अप्रैल 2011

नवगीत: समाचार है... संजीव 'सलिल'

नवगीत:                                                                                          
समाचार है...                                                                     
संजीव 'सलिल'
*
बैठ मुड़ेरे चिड़िया चहके'
समाचार है.
सोप-क्रीम से जवां दिख रही
दुष्प्रचार है...
*
बिन खोले- अख़बार जान लो,
कुछ अच्छा, कुछ बुरा मान लो.
फर्ज़ भुला, अधिकार माँगना-
यदि न मिले तो जिद्द ठान लो..

मुख्य शीर्षक अनाचार है.
और दूसरा दुराचार है.
सफे-सफे पर कदाचार है-
बना हाशिया सदाचार है....

पैठ घरों में टी. वी. दहके
मन निसार है...
*
अब भी धूप खिल रही उज्जवल.
श्यामल बादल, बरखा निर्मल.
वनचर-नभचर करते क्रंदन-
रोते पर्वत, सिसके जंगल..

घर-घर में फैला बजार है.
अवगुन का गाहक हजार है.
नहीं सत्य का चाहक कोई-
श्रम सिक्के का बिका चार है..

मस्ती, मौज-मजे का वाहक
असरदार है...
*
लाज-हया अब तलक लेश है.
चुका नहीं सब, बहुत शेष है.
मत निराश हो बढ़े चलो रे-
कोशिश अब करनी विशेष है..

अलस्सुबह शीतल बयार है.
खिलता मनहर हरसिंगार है.
मन दर्पण की धूल हटायें-
चेहरे-चेहरे पर निखार है..

एक साथ मिल मुष्टि बाँधकर
संकल्पित करना प्रहार है...
*

मंगलवार, 5 अप्रैल 2011

आज का गीत- श्वास-श्वास जीवन की कविता ----संजीव 'सलिल'



कविता दिवस के परिप्रेक्ष्य में:
 
आज का गीत-
श्वास-श्वास जीवन की कविता
संजीव 'सलिल'
*
श्वास-श्वास जीवन की कविता,
आस-आस जीवन की कविता
नहीं कोई भी पल कविता बिन-
 कोई एक दिवस कैसे हो?...
*
जन्में तो हम लय में रोये,
आँचल पा सपनों में खोये.
घुटनों चले ठुमककर विहँसे,
पैर जमकर सपने बोये.
धरती से नभ देख लगा यह-
प्यास-प्यास जीवन की कविता...
*
मैया, बहिना, भौजी, साली.
सरहज, समधन रस की प्याली.
अर्धांगिनी की बात करें क्या?-
आधार, कपोल, नयन की लाली.
पाया-खोया जब, तब पाया
लास-हास जीवन की कविता...
*
ले प्रयास की वेणु चला जब,
लक्ष्य राधिका को पाने मैं.
गोप-गोपियाँ साधक-बाधक
संग-साथ थे मुस्काने में.
गिरा-उठा-सम्हला, दौड़ा, रुक
पाया रास श्वास की कविता...
*

सोमवार, 4 अप्रैल 2011

आदि शक्ति वंदना संजीव वर्मा 'सलिल'

आदि शक्ति वंदना

संजीव वर्मा 'सलिल'
*
आदि शक्ति जगदम्बिके, विनत नवाऊँ शीश.
रमा-शारदा हों सदय, करें कृपा जगदीश....
*
पराप्रकृति जगदम्बे मैया, विनय करो स्वीकार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
अनुपम-अद्भुत रूप, दिव्य छवि, दर्शन कर जग धन्य.
कंकर से शंकर रचतीं माँ!, तुम सा कोई न अन्य..

परापरा, अणिमा-गरिमा, तुम ऋद्धि-सिद्धि शत रूप.
दिव्य-भव्य, नित नवल-विमल छवि, माया-छाया-धूप..

जन्म-जन्म से भटक रहा हूँ, माँ ! भव से दो तार.
चरण-शरण जग, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
नाद, ताल, स्वर, सरगम हो तुम. नेह नर्मदा-नाद.
भाव, भक्ति, ध्वनि, स्वर, अक्षर तुम, रस, प्रतीक, संवाद..

दीप्ति, तृप्ति, संतुष्टि, सुरुचि तुम, तुम विराग-अनुराग.
उषा-लालिमा, निशा-कालिमा, प्रतिभा-कीर्ति-पराग.

प्रगट तुम्हीं से होते तुम में लीन सभी आकार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....
*
वसुधा, कपिला, सलिलाओं में जननी तव शुभ बिम्ब.
क्षमा, दया, करुणा, ममता हैं मैया का प्रतिबिम्ब..

मंत्र, श्लोक, श्रुति, वेद-ऋचाएँ, करतीं महिमा गान-
करो कृपा माँ! जैसे भी हैं, हम तेरी संतान.

ढाई आखर का लाया हूँ,स्वीकारो माँ हार.
चरण-शरण शिशु, शुभाशीष दे, करो मातु उद्धार.....

**************

नव संवत्सर में... -- संजीव 'सलिल'

नव संवत्सर में...

संजीव 'सलिल'
*
मीत सत्य नारायण से पहचान करें नव संवत्सर में.
खिलें कमल से सलिल-धार में, आन करेंनव संवत्सर में..
काली तेरे घर में, लक्ष्मी मेरे घर में जन्मे क्योंकर?
सरस्वती जी विमल बुद्धि वरदान करें नव संवत्सर में..
*
शक्ति-पर्व पर आत्मशक्ति  खुद की पहचानें . 
नहीं किसी से कम हैं हम यह भी अनुमानें. 
मेहनत लगन परिश्रम की हम करें साधना- 
'सलिल' सकल जग की सेवा करना है- ठानें..
*
एक त्रिपदी : जनक छंद
*
हरी दूब सा मन हुआ
जब भी संकट ने छुआ
'सलिल' रहा मन अनछुआ..

रविवार, 3 अप्रैल 2011

एक रचना: बिन तुम्हारे... संजीव 'सलिल'

एक रचना:                                                                                                

बिन तुम्हारे...

संजीव 'सलिल'

*

बिन तुम्हारे सूर्य उगता, पर नहीं होता सवेरा.

चहचहाते पखेरू पर डालता कोई न डेरा.



उषा की अरुणाई मोहे, द्वार पर कुंडी खटकती.

भरम मन का जानकर भी, दृष्टि राहों पर अटकती..



अनमने मन चाय की ले चाह जगकर नहीं जगना.

दूध का गंजी में फटना या उफन गिरना-बिखरना..



साथियों से बिना कारण उलझना, कुछ भूल जाना.

अकेले में गीत कोई पुराना फिर गुनगुनाना..



साँझ बोझिल पाँव, तन का श्रांत, मन का क्लांत होना.

याद के बागों में कुछ कलमें लगाना, बीज बोना..



विगत पल्लव के तले, इस आज को फिर-फिर भुलाना.

कान बजना, कभी खुद पर खुद लुभाना-मुस्कुराना..



बि​न तुम्हारे निशा का लगता अँधेरा क्यों घनेरा?

बिन तुम्हारे सूर्य उगता, पर नहीं होता सवेरा.

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