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सोमवार, 29 अगस्त 2011

मुक्तिका: बने सादगी ही श्रृंगार.. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:
बने सादगी ही श्रृंगार..
संजीव 'सलिल'
*
हम खुद चुनते हैं सरकार.
फिर हो जाते है बेज़ार..

सपने बुनते हैं बेकार.
कभी न होते जो साकार.

नियम-कायदे माने अन्य.
लेकिन हम तोड़ें सौ बार..

कूद-फांद हम बढ़ जायें.
बाकी रहें लगायें कतार..

जनगण के जो प्रतिनिधि हैं.
चाहें हर सुविधा अधिकार..

फ़र्ज़ न किंचित याद रहा.
हक के सब हैं दावेदार..

लोकपाल क्या कर लेगा?
सुधरे नेता अगर न यार..

सुख-सुविधा बिन प्रतिनिधि हों
बने सादगी ही श्रृंगार..

मतदाता से दूर रहें
तो न मौन रह, दो धिक्कार..

अन्ना बच्चा-बच्चा हो.
'सलिल' तभी हो नैया पार..
*********************
Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com

आकलन:अन्ना आन्दोलन भारतीय लोकतंत्र की समस्या और समाधान: -- संजीव 'सलिल'

आकलन:अन्ना आन्दोलन

भारतीय लोकतंत्र की समस्या और समाधान:

संजीव 'सलिल'
*
अब जब अन्ना का आन्दोलन थम गया है, उनके प्राणों पर से संकट टल गया है यह समय समस्या को सही-सही पहचानने और उसका निदान खोजने का है.

सोचिये हमारा लक्ष्य जनतंत्र, प्रजातंत्र या लोकतंत्र था किन्तु हम सत्तातंत्र, दलतंत्र और प्रशासन तंत्र में उलझकर मूल लक्ष्य से दूर नहीं हो गये हैं क्या? यदि हाँ तो समस्या का निदान आमूल-चूल परिवर्तन ही है. कैंसर का उपचार घाव पर पट्टी लपेटने से नहीं होगा.

मेरा नम्र निवेदन है कि अन्ना भ्रष्टाचार की पहचान और निदान दोनों गलत दिशा में कर रहे हैं. देश की दुर्दशा के जिम्मेदार और सुख-सुविधा-अधिकारों के भोक्ता आई.ए.एस., आई.पी.एस. ही अन्ना के साथ हैं. न्यायपालिका भी सुख-सुविधा और अधिकारों के व्यामोह में राह भटक रही है. वकील न्याय दिलाने का माध्यम नहीं दलाल की भूमिका में है. अधिकारों का केन्द्रीकरण इन्हीं में है. नेता तो बदलता है किन्तु प्रशासनिक अधिकारी सेवाकाल में ही नहीं, सेवा निवृत्ति पर्यंत ऐश करता है.

सबसे पहला कदम इन अधिकारियों और सांसदों के वेतन, भत्ते, सुविधाएँ और अधिकार कम करना हो तभी राहत होगी.

जन प्रतिनिधियों को स्वतंत्रता के तत्काल बाद की तरह जेब से धन खर्च कर राजनीति  करना पड़े तो सिर्फ सही लोग शेष रहेंगे.

चुनाव दलगत न हों तो चंदा देने की जरूरत ही न होगी. कोई उम्मीदवार ही न हो, न कोई दल हो. ऐसी स्थिति में चुनाव प्रचार या प्रलोभन की जरूरत न होगी. अधिकृत मतपत्र केवल कोरा कागज़ हो जिस पर मतदाता अपनी पसंद के व्यक्ति का नाम लिख दे और मतपेटी में डाल दे. उम्मीदवार, दल, प्रचार न होने से मतदान केन्द्रों पर लूटपाट न होगी. कोई अपराधी चुनाव न लड़ सकेगा. कौन मतदाता किस का नाम लिखेगा कोई जन नहीं सकेगा. हो सकता है हजारों व्यक्तियों के नाम आयें. इससे कोई फर्क नहीं पड़ेगा. सब मतपत्रों की गणना कर सर्वाधिक मत पानेवाले को विजेता घोषित किया जाए. इससे चुनाव खर्च नगण्य होगा. कोई प्रचार नहीं होगा, न धनवान मतदान को प्रभावित कर सकेंगे.

चुने गये जन प्रतिनिधियों के जीवन काल का विवरण सभी प्रतिनिधियों को दिया जाए, वे इसी प्रकार अपने बीच में से मंत्री चुन लें. सदन में न सत्ता पक्ष होगा न विपक्ष, इनके स्थान पर कार्य कार्यकारी पक्ष और समर्थक पक्ष होंगे जो दलीय सिद्धांतों के स्थान पर राष्ट्रीय और मानवीय हित को ध्यान में रखकर नीति बनायेंगे और क्रियान्वित कराएँगे.

इसके लिये संविधान में संशोधन करना होगा. यह सब समस्याओं को मिटा देगा. हमारी असली समस्या दलतंत्र  है जिसके कारण विपक्ष सत्ता पक्ष की सही नीति का भी विरोध करता है और सत्ता पक्ष विपक्ष की सही बात को भी नहीं मानता.

भारत के संविधान में अल्प अवधि में दुनिया के किसी भी देश और संविधान की तुलना में सर्वाधिक संशोधन हो चुके हैं, तो एक और संशिधन करने में कोई कठिनाई नहीं है. नेता इसका विरोध करेंगे क्योकि उनके विशेषाधिकार समाप्त हो जायेंगे किन्तु जनमत का दबाब उन्हें स्वीकारने पर बाध्य कर सकता है. 

ऐसी जन-सरकार बनने पर कानूनों को कम करने की शुरुआत हो. हमारी मूल समस्या कानून न होना नहीं कानून न मानना है. राजनीति शास्त्र में 'लेसीज़ फेयर' सिद्धांत के अनुसार सर्वोत्तम सरकार न्यूनतम शासन करती है क्योंकि लोग आत्मानुशासित होते हैं. भारत में इतने कानून हैं कि कोई नहीं जनता, हर पाल आप किसी न किसी कानून का जने-अनजाने उल्लंघन कर रहे होते हैं. इससे कानून के अवहेलना की प्रवृत्ति उत्पन्न हो गयी है. इसका निदान केवल अत्यावश्यक कानून रखना, लोगों को आत्म विवेक के अनुसार कार्य करने की स्वतंत्रता देना तथा क्षतिपूर्ति अधिनियम (law of tort) को लागू करना है.

क्या अन्ना और अन्य नेता / विचारक इस पर विचार करेंगे?????????????...

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.कॉम

**********

अन्ना हज़ारे: अपनों ने भी ठगा? सतीशचन्द्र मिश्र

अन्ना हज़ारे: अपनों ने भी ठगा?

सतीशचन्द्र मिश्र
*
असली मदारी (यानि सरकार) का डमरू (मीडिया) जो कुछ दिनों के लिए नौसिखिये मदारियों (टीम अन्ना) को उधार दिया गया था अब अपने सही मदारी के पास वापस आ गया और देश की जनता को जीत के झूठे गीत सुनाने में व्यस्त हो गया है। नौसिखिये मदारियों ने भी इसके सुर में सुर मिलाने में ही भलाई समझी और जैसे तैसे अपनी जान बचाई है।


आप स्वयं विचार करिए ज़रा…. अन्ना टीम द्वारा 16 अगस्त का अनशन जिन मांगों को लेकर किया गया था। उन मांगों पर शनिवार को हुए समझौते में कौन हारा कौन जीता इसका फैसला करिए।




पहली मांग थी : सरकार अपना कमजोर बिल वापस ले। नतीजा : सरकार ने बिल वापस नहीं लिया।


दूसरी मांग थी : सरकार लोकपाल बिल के दायरे में प्रधान मंत्री को लाये। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।


तीसरी मांग थी : लोकपाल के दायरे में सांसद भी हों : नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र नहीं।


चौथी मांग थी : तीस अगस्त तक बिल संसद में पास हो। नतीजा : तीस अगस्त तो दूर सरकार ने कोई समय सीमा तक नहीं तय की कि वह बिल कब तक पास करवाएगी।


पांचवीं मांग थी : बिल को स्टैंडिंग कमेटी में नहीं भेजा जाए। नतीजा : स्टैंडिंग कमिटी के पास एक की बजाए पांच बिल भेजे गए हैं।


छठी मांग थी : लोकपाल की नियुक्ति कमेटी में सरकारी हस्तक्षेप न्यूनतम हो। नतीजा : सरकार ने आज ऐसा कोई वायदा तक नहीं किया। अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में भी इसका कोई जिक्र तक नहीं।


सातवीं मांग : जनलोकपाल बिल पर संसद में चर्चा नियम 184 के तहत करा कर उसके पक्ष और विपक्ष में बाकायदा वोटिंग करायी जाए। नतीजा : चर्चा 184 के तहत नहीं हुई, ना ही वोटिंग हुई।


उपरोक्त के अतिरिक्त तीन अन्य वह मांगें जिनका जिक्र सरकार ने अन्ना को दिए गए समझौते के पत्र में किया है वह हैं।
(1)सिटिज़न चार्टर लागू करना,
(2)निचले तबके के सरकारी कर्मचारियों को लोकपाल के दायरे में लाना,
(3)राज्यों में लोकायुक्तों की नियुक्ति करना। प्रणब मुखर्जी द्वारा इस संदर्भ में आज शाम संसद में दिए गए बयान (जिसे भांड न्यूज चैनल प्रस्ताव कह रहे हैं ) में स्पष्ट कहा गया कि इन तीनों मांगों के सन्दर्भ में सदन के सदस्यों की भावनाओं से अवगत कराते हुए लोकपाल बिल में संविधान कि सीमाओं के अंदर इन तीन मांगों को शामिल करने पर विचार हेतु आप (लोकसभा अध्यक्ष) इसे स्टैंडिंग कमेटी के पास भेजें। कौन जीता…? कैसी जीत…? किसकी जीत…?
देश 8 अप्रैल को जहां खड़ा था आज टीम अन्ना द्वारा किए गए कुटिल और कायर समझौते ने देश को उसी बिंदु पर लाकर खड़ा कर दिया है। जनता के विश्वास की सनसनीखेज सरेआम लूट को विजय के शर्मनाक शातिर नारों की आड़ में छुपाया जा रहा है….. फैसला आप करें। मेरा तो सिर्फ यही कहना है कि रात को दिन कैसे कह दूं…..?

रविवार, 28 अगस्त 2011

समीक्षात्मक आलेख: समय का साक्षी रचनाकार नवीन चतुर्वेदी -- संजीव 'सलिल'

समीक्षात्मक आलेख:
समय का साक्षी रचनाकार नवीन चतुर्वेदी
संजीव 'सलिल'
*








शिक्षा के प्रचार-प्रसार के साथ सृजनधर्मिता का बढ़ना स्वाभाविक है| कोई भी व्यक्ति अपनी अनुभूतियों को शब्दों में ढाल कर प्रस्तुत करने के लिये स्वतंत्र है किन्तु इस प्रस्तुतिकरण का उद्देश्य अन्यों तक अपनी बात पहुँचाना और उनकी प्रतिक्रिया प्राप्त करना हो तो व्यक्ति को भाषा और काव्य शास्त्र के नियमों को जानकर सही तरीके से अपनी बात कहनी होती है|

आज का दौर आपाधापी का दौर है. किसी के पास समय नहीं है| सर्वाधिक पुरानी संस्कृति का यह देश एक बाज़ार मात्र रह गया है| पुरातन के अवमूल्यन और नये के अवस्थापन के इस संक्रमण काल में जिन सजग कलमों से सामना हुआ है उनमें भाई नवीन चतुर्वेदी भी हैं| नवीन के नाम के साथ 'जी' लगाकर मैं अपनी और उनकी अभिन्नता के मध्य औपचारिकता को प्रवेश नहीं करने दे सकता. उन्हें उनके नाम से पुकारूँ यह मेरा अधिकार है. नवीन में सीखने की इच्छा बहुत प्रबल है| जब जहाँ से जैसे भी कुछ अच्छा मिले वे सीख कर आपने खजाने में सम्मिलित कर लेते हैं|


वे जो जितना जानते हैं उसका दिखावा नहीं करते, आपने आप औरों पर थोपते नहीं किन्तु पूछने पर संकोच के साथ जानकारी साँझा करते हैं| 'थोथा चना बाजे घना' की असलियत से वे पूरी तरह परिचित हैं| अपनी ग़ज़ल के बारे में कही निम्न पंक्तियाँ उन पर भी बखूबी लागू होती हैं|  

जितना पूछोगे इनसे, बस उतना ही बतलायेंगी |
ना मालुम, जाने ऐसा क्या ख़ास मेरी ग़ज़लों में है ||

नवीन के लिये कविता करना शगल नहीं मजबूरी है-

ग़ज़ल जब भी कही कुछ ख़ास ऐसा वाक़या गुज़रा| 

कभी मुझसे नदी गुज़री कभी तूफ़ान सा गुज़रा|| 


आपने चारों तरफ के मंज़र देखकर उनका भावप्रवण मन जब आहत या तरंगित होता है तब उनकी कलाम अंतर्मन की अभिव्यक्ति करने में पीछे नहीं रहती. निम्न पंक्तियाँ उनकी आकलन क्षमता और अभिव्यक्ति क्षमता की बानगी पेश करती हैं:

पहले घर, घर होते थे, दफ़्तर, दफ़्तर|

अब दफ़्तर-दफ़्तर  घर; घर-घर दफ़्तर है||
*
प्यास के बाज़ार में, इक चीज़ बन के रह गये|
जिस्म प्यासा, रूह प्यासी, छटपटाती सूरतें||
*
सभी दिखें  नाखुश, सबका दिल टूटा लगता है|
*
नयों को हौसला भी दो, न ढूँढो ग़लतियाँ केवल|
बड़े शाइर का भी, हर इक शिअर, आला नहीं होता|| 


बेशक़ मज़े  लूटो, मगर, आहिस्ता आहिस्ता|
आखिर, हया ओ शर्म अपने दरमियाँ भी हैं||
*
नवीन की जिन रचनाओं ने मेरे दिल को छुआ है उनमें रचनाकार की संवेदनशील दृष्टि मुखर हुई है-

तनहाई का चेहरा, अक्सर, सच्चा लगता है|

खुद से मिलना, बातें करना, अच्छा लगता है||

दुनिया  ने, उस को ही, माँ कह कर इज़्ज़त बख़्शी|
जिसको, अपना बच्चा, हरदम, बच्चा लगता है||
*
ये किस तरह की राजनीति है, न हमसे पूछिये|

ना राज है, ना नीति है, उपहास है जनतंत्र का||
*
चेहरे बदलने  थे, मगर, बस आइने बदले गये|

इन्साँ  बदलने थे, मगर, बस कायदे बदले गये|| 

हर गाँव, हर चौपाल,  हर घर का अहाता कह रहा|
मंज़िल बदलनी  थी, मगर, बस रासते बदले गये||

अब भी गबन, चोरी, छलावे हो रहे हैं रात दिन|
तब्दीलियों  के नाम पर, बस दायरे बदले गये||

जिन मामलों के, फ़ैसलों के, मामले सुलझे नहीं|
उन मामलों के, फ़ैसलों के, फ़ैसले बदले गये||
*
जब से  रब, इन्सान के भीतर से, गायब हो गया|
तब से, पूजा-पाठ वाले चोचले बढ़ने लगे|| 
*
दूसरों  की ग़लतियाँ, शर्मिंदगी अपनी|

इससे कुछ  ज्यादा कहानी, है- न थी अपनी||

नवीन की एक खासियत और है- वह रचनाओं में विराम चिन्हों का सार्थक प्रयोग करते हैं| छंद और विराम चिन्हों से अपरिचित पीढ़ी को नवीन की रचनाएँ पढ़ने से ही पर्याप्त अभ्यास हो सकता है|

सामाजिक विसंगतियों पर नवीन की कलम तत्काल प्रहार करती है|


नभ में  उड़ने वाले नेता, बातें तो कर सकते हैं|
सड़क पे चलाने वाला जाने, सड़क के गड्ढों का मतलब|| 
*
राजा हो या रंक, सभी को रोटी खाते देखा है|

रंक ने ही समझा है, पर, रोटी के टुकडों का मतलब||
*
जब 'तज़ुर्बे' औ 'डिग्री' का दंगल हुआ|
क़ामयाबी, बगल झाँकती रह गयी|| 
*
गाँव की 'आरज़ू' - शहरी 'महबूब' का|

डाकिये  से पता पूछती रह गयी||

नवीन की रचनाओं में हिंदी के पिंगल के कई पाठ हैं. काव्यशास्त्री यमुना प्रसाद चतुर्वेदी 'प्रीतम' के इस सुयोग्य शिष्य ने रसों और अलंकारों से अपनी रचनाओं को संपन्न बनाया है| उक्त और निम्न पंक्तियों में अनुप्रास की छटा देखिये-

अनुपम, अमित,  अविरल, अगम,  अभिनव, अकथ,  अनिवार्य सा|
अमि-रस भरा,  यहु प्रेम-पथ,  न चलें यहाँ  कडुवाहटें||
*
सु-मनन  करें,  सु-जतन करें,  अभिनव गढ़ें,  अनुपम कहें|

वसुधा सवाल उठा रही,  क्यूँ न फिर से ग़ालिब-ओ-गंग हों||
*
नवीन के प्रतीकों और बिम्बों की मौलिकता और उपयुक्तता का एक उदाहरण देखें-

है कहीं, मिश्री से भी मीठा, अगर |
तो कहीं, कडवा करेला आदमी ||
*
नवीन की संतुलित दृष्टि हर नये की आलोचना नहीं करती, छिद्रान्वेषण के शौकीनों से वे कहते हैं-

उजालों  से शिकायत है जिन्हें, जा कर कहो उनसे|

कभी तो रोशनी  को,  तीरगी की दृष्टि से देखें||

ये अच्छा  है - बुरा है वो, ये मेरा है - पराया वो|
कभी तो आदमी को, आदमी की दृष्टि से देखें||

रिदम्, ट्यूनिंग, खनकते बोल सब कुछ ठीक है लेकिन|
कभी तो शायरी  को शाइरी की दृष्टि से देखें||

ज़िंदगी  में करुण और श्रृंगार रस का कोष जितना अधिक होगा कविता उतनी ही अधिक समृद्ध होगी| नवीन की रचनाओं में पारिस्थितिक वैषम्यजनित करुणा विद्रोह का आव्हान करती आलोचना का रूप ले लेती है किन्तु श्रृंगार की उत्कट अभिव्यक्ति अकृत्रिम है-

उलफ़त का मुहूरत देख नहीं,
मत खेल  मेरे अरमानों से|
आँखों को करने दे सजनी,
आँखों की बातें आँखों से||
*
फूलों सा नरम, मखमल सा गरम,
शरबत सा मधुर, मेघों सा मदिर|
तेरा यौवन  मधुशाला है,
मेरी अभिलाषा  साक़ी है||
*
तेरी नज़रों के तीर देखे हैं| 
तेरे दिल का गुलाब देखेंगे|| 
*
ताब में हम कहाँ हैं बिन तेरे| 
क्या है तू भी बेताब, देखेंगे|४|
*
कई दिनों  बाद फिर क़रार मिला| 
ख़्वाब में दिलरुबा का प्यार मिला|| 
*
सिर्फ इक बार ही मिला लेकिन| 
ऐसा लगता है बार-बार मिला||
*
नवीन की कविताओं की भाषा आज की पीढ़ी की भाषा है| वे अंग्रेजी, उर्दू और अन्य लोक भाषाओँ के शब्दों का प्रयोग उन्मुक्तता से करते हैं| मेरा मत है कि अभारतीय भाषाओँ के शब्द तभी प्रयोग करने चाहिए जब हिंदी या अन्य भारतीय लोक भाषाओँ में उस अभिव्यक्ति के लिये कोई शब्द न हो| नवीन मुझसे आंशिक सन्मति आंशिक असहमति रखते हैं और उसे छिपाते नहीं. उदाहरणार्थ 'वर्ल्ड  बैंक' को 'विश्व बैंक' लिखने का सुझाव उन्हें नहीं रुचता|

नवीन सिर्फ वर्तमान की आलोचना नहीं करते, वे गुत्थियों को सुलझाने के नुस्खे भी बताते हैं-

सुलझा लें  गुत्थी,  सदियों से,  अनसुलझी हैं बहुतेरी|
आज नहीं,  तो कभी नहीं,  कल फिर हो जायेगी देरी||
*
तुम जो कहो तो, अब के बरस हम, ऐसे मनाएँ पर्वों को| 
साल महीने, सारा जहाँ, ना सौदा करे हथियारों का|

नवीन का काव्य संस्कार संस्कृत पिंगल, हिंदी काव्य शास्त्र, उर्दू ग़ज़ल, लोकभाषिक तथा अंग्रेजी शब्दों का ऐसा गुलदस्ता है जिसकी खूबसूरती और सुगंध दोनों को जल्दी भुलाया नहीं जा सकता| अंतरजाल पर हिंदी भाषा के शब्द भंडार को समृद्ध करने, व्याकरण और काव्य शास्त्र को नयी पीढ़ी तक पहुँचाकर काव्य रूपों (छंदों) को युवाओं में लोकप्रिय बनाने के अभियान में नवीन ने मेरे साथ भरपूर परिश्रम किया है| उनका साथ मेरे लिये संबल भी है और प्रेरणा भी|


उनका समीक्ष्य अंतर्जालिक काव्य संकलन 'कुछ अपना कुछ औरों का अहसास' पाठकों को रुचना चाहिए. टंकण और मात्रा की चंद त्रुटियाँ असावधानी से हुई हैं उनके लिये मुझे खेद है| मुझे मालूम है नवीन अभी आसमाँ की बुलंदियों पर नहीं पहुँचा है किन्तु इसकी योग्यता उसमें है, आवश्यकता लगातार चलते रहने  की है मंजिल खुद-ब-खुद उसे खोज लेगी.
*
Acharya Sanjiv Salil

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एक गीत: जीवन को महकाता चल -- उदयभानु तिवारी 'मधुकर'


  • एक गीत:
    जीवन को महकाता चल
    उदयभानु तिवारी 'मधुकर'
    *

  • जीवन को महकाता चल...
    *
    हँसता  चल हँसाता चल गुलशन के सुमन सजाता चल
    जग पर्वत के कंटक पथ पर अपनी धुन में गाता चल...

    चाहे आतप की दुपहर हो चाहे शीतल छाँव हो
    मंजिल तक है तुम्हें पहुँचना धीमे पड़ें न पाँव हो
    पग-पग पर अँगार दहकते डगर-डगर भटकाव हो
    दर्द न बाँटे जग में कोई रखो छिपाकर घाव हो

    क्रोध के कड़वे घूँट निगल मुस्कान अधर बिखराता चल...
    चाहे ग्रहण लगा हो सूरज सरसिज भी कुम्हलाया हो ;
    घोर अँधेरी रात का चाहे सूनापन भी छाया हो 
    असह वेदना ने आँखों में अश्रु-बिंदु छलकाया हो;
    दृढ संकल्प कभी ना डोले चाहे तन मुरझाया हो

    प्यार की गागर से बगिया में जीवन रस बरसाता चल...
    *
    घबरानामत कभी धार में यदि छूटे पतवार हो 
    साहस भुजा समेट भँवर में धीरज से उस पार हो
    नाव पुरानी इक दिन डूबे नश्वर यह संसार हो
    क्या जाने जग में कब होगा फिर दूजा अवतार हो

    निजकार्मों से इस धरती पर जीवन को महकाता चल..
    *

दोहा सलिला: दोहा के रंग यमक के सँग ---संजीव 'सलिल'

दोहा सलिला:
दोहा के रंग यमक के सँग
संजीव 'सलिल'
*
मत सकाम- निष्काम कर, आपने सारे काम.
मत सब धर्मों का यही, अधिक न अच्छा काम..
*
सालों सालों से रहे, जीजा लेते माल.
सालों सालों-भगिनी ने, घर में किया धमाल..
*
हमने फूल कहा उन्हें, समझ रहे वे फूल.
दिन दूने निशि चौगुने, नित्य रहे वे फूल..
*
मद न चढ़े पद का तनिक, मदन न मोहे मीत.
हम दन-दन दुश्मन कुचल, रचें देश पर गीत..
*
घूस खोखली नींव कर, देती गिरा मकान.
घूस खोखली नींव कर, मिटा रही इंसान..
*
हमने पूछा: बतायें, है कैसा आकार?
तुरत बताने वे लगे, हमें निकट आ कार..
*
पिया पिया है प्रेम का, अमृत हुई मैं धन्य.
क्या तुम भी कर सके हो, मुझसे प्रीति अनन्य?
*
Acharya Sanjiv Salil

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शनिवार, 27 अगस्त 2011

हास्य कुण्डली: साली महिमा --संजीव 'सलिल'

हास्य कुण्डली:
साली महिमा
संजीव 'सलिल'
*
साली जी गुणवान हैं, जीजा जी हैं फैन..
साली जी रस-खान हैं, जीजा सिर्फ कुनैन..
जीजा सिर्फ कुनैन, फ़िदा हैं जीजी जी पर.
सुबह-शाम करते सलाम उनको जी-जी कर..
बीबी जी पायी हैं मधु-रस की प्याली जी.
बोनस में स्नेह लुटाती हैं साली जी.
*
साली की महिमा बड़ी, कभी न भूलें आप.
हरि के पहले कीजिये साली जी का जाप..
साली जी का जाप करें उपवासे रहकर.
बीबी रहे प्रसन्न, भाव-सलिला में बहकर..
सुने प्रार्थना बीबी, दस दिश हो खुशहाली..
सुने वंदना जिस जीजा से प्रतिदिन साली.
*
जिसकी साली हो नहीं, उसका चैन हराम.
नीरस हो जीवन सकल, बिगड़ें सारे काम..
बिगड़ें सारे काम, रहें गृह लक्ष्मी गुमसुम.
बिन संज्ञा के सर्वनाम नाकारा हो तुम.
कहे 'सलिल' साली-वंदन से  किस्मत चमकी.
उसका गृह हो स्वर्ग, खूब हो साली जिसकी..
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मुक्तिका: ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की. संजीव 'सलिल'

मुक्तिका:

ये शायरी जबां है किसी बेजुबान की.
संजीव 'सलिल'
*
ये शायरी जुबां है किसी बेजुबान की.
इसमें बसी है खुशबू जिगर के उफान की..

महलों में सांस ले न सके, झोपडी में खुश. 
ये शायरी फसल है जमीं की, जुबान की..

उनको है फ़िक्र कलश की, हमको है नींव की.
हम रोटियों की चाह में वो पानदान की..

सड़कों पे दीनो-धर्म के दंगे जो कर रहे.
क्या फ़िक्र है उन्हें तनिक भी आसमान की?

नेता को पाठ एक सियासत ने यह दिया.
रहने न देना खैरियत तुम पायदान की.

इंसान की गुहार करें 'सलिल' अनसुनी.
क्यों कर उन्हें है याद आरती-अजान की..
*

दोहा सलिला: यमक का रंग दोहे के संग- अधर बनें श्री-वान... --- संजीव 'सलिल'


*
मत लब पर मुस्कान रख, जब मतलब हो यार.
हित-अनहित देखे बिना, कर ले सच्चा प्यार..
*
अमरस, बतरस, काव्यरस, नित करते जो पान.
पान मान का ग्रहणकर, अधर बनें श्री-वान..
*
आ राधा ने कृष्ण को, आराधा दिन-रैन.
अ-धर अधर पर बाँसुरी, कृष्ण हुए बेचैन..
*
जल सा घर कोई नहीं, कहें पुलककर मीन.
जलसा-घर को खोजते, मनुज नगर में दीन..
*
खुश बू से होते नहीं, खुशबू सबकी चाह.
मिले काव्य पर वाह- कर, श्रोता की परवाह..
*
छतरी पानी से बचा, भीगें वसन न आज.
छत री मत चू आ रही, प्रिया बचा ले लाज..
*
हम दम लेते किस तरह?, हमदम जब बेचैन.
उन्हें मनायें किस तरह, आये हम बे-चैन..
*

शुक्रवार, 26 अगस्त 2011

गीत: रेडिओ नहीं है यंत्र मात्र -- संजीव 'सलिल'

गीत:                                                                     
रेडिओ नहीं है यंत्र मात्र
संजीव 'सलिल'
*
*hifi-ssb-audio.gif
रेडिओ नहीं है यंत्र मात्र
यह जनगण-मन की वाणी है...
*
radio.gif
यह सुख-दुःख का साथी सच्चा.
चाहे हर वृद्ध, युवा, बच्चा.
जो इसे सुन रहे, गुनते भी-
तुम समझो इन्हें नहीं कच्चा.
चेतना भरे सबके मन में
यह यंत्र नहीं पाषाणी है...
*
radiotower2.jpg
इसमें गीतों की खान भरी.
नाटक-प्रहसन से हँसी झरी.
कर ताक-झाँक दादी पूछें-
'जो गाती इसमें कहाँ परी?'
प्रातः गूँजे आरती-भजन
सुर-राग सभी कल्याणी है..
*
radio.jpg
कृषि, शिक्षा, स्वास्थ्य सिखाता है.
उत्तम बातें बतलाता है.
क्या-कहाँ हो रहा सही-गलत?
दर्पण बन सच दिखलाता है.
पीड़ितों हेतु रहता तत्पर
दुःख-मुक्ति कराता त्राणी है...
**************

Acharya Sanjiv Salil

http://divyanarmada.blogspot.com


सोनिया गाँधी का सच

विशेष आलेख:

सोनिया गाँधी का सच

कांग्रेस पार्टी और खुद सोनिया गांधी अपनी पृष्ठभूमि के बारे में जो बताते हैं , वो तीन झूठों पर टिका हुआ है। पहला ये है कि उनका असली नाम अंतोनिया है न की सोनिया। यह बात इटली के राजदूत ने नई दिल्ली में 27 अप्रैल 1973 को गृह मंत्रालय को लिखे एक पत्र में जिसे कभी सार्वजनिक नहीं किया जाहिर की थी। इसके अनुसार सोनिया का असली नाम अंतोनिया ही उनके जन्म प्रमाणपत्र के अनुसार सही है। सोनिया ने इसी तरह अपने पिता का नाम स्टेफनो मैनो बताया था। स्टेफनो नाजी आर्मी के वालिंटियर सदस्य तथा दूसरे विश्व युद्ध के समय रूस में युद्ध बंदी थे। कई इतालवी फासिस्टों ने ऐसा ही किया था। सोनिया दरअसल इतालवी नहीं बल्कि रूसी नाम है।


सोनिया के पिता रूसी जेलों में दो साल बिताने के बाद रूस समर्थक हो गये थे। अमेरिकी सेनाओं ने इटली में सभी फासिस्टों की संपत्ति को तहस-नहस कर दिया था। सोनिया ओरबासानो में पैदा नहीं हुईं , जैसा कि सांसद  बनने पर उनके द्वारा प्रस्तुत बायोडाटा में लिखा गया है। उनका जन्म लुसियाना में हुआ था । वह  सचयह इसलिए छिपाने की कोशिश करती हैं ताकि उनके पिता के नाजी और मुसोलिनी संपर्कों का पता न चले साथ ही  उनके परिवार के संपर्क इटली के भूमिगत हो चुके नाजी फासिस्टों से द्वितीय विश्वयुद्ध समाप्त होने तक बने रहने का सच सबको ज्ञात न हो जाए लुसियाना इटली-स्विस सीमा पर नाजी फासिस्ट नेटवर्क का मुख्यालय था । 
तीसरा सोनिया गांधी ने हाईस्कूल से आगे की पढ़ाई कभी की ही नहीं, लेकिन उन्होंने 2004 के लोकसभा चुनावों के दौरान रायबरेली में चुनाव लड़ने के दौरान रिटर्निंग ऑफिसर के सम्मुख अपने चुनाव नामांकन पत्र में उन्होंने झूठा हलफनामा दायर किया कि वे कैम्ब्रिज यूनिवर्सिटी से अंग्रेजी में डिप्लोमाधारी हैं। इससे पहले 1989 में लोकसभा में अपने बायोग्राफिकल में भी उन्होंने अपने हस्ताक्षर के साथ यही बात लोकसभा के सचिवालय के सम्मुख पेश की थी। बाद में लोकसभा स्पीकर को लिखे पत्र में उन्होंने इसे मानते हुए इसे टाइपिंग की गलती बताया। 
 
सत्य यह है कि श्रीमती सोनिया गांधी ने कभी किसी कालेज में पढाई की ही नहीं। वह पढ़ाई के लिए गिवानो के कैथोलिक नन्स द्वारा संचालित स्कूल मारिया आसीलेट्रिस गईं, जो उनके कस्बे ओरबासानों से 15 किलोमीटर दूर था। उन दिनों गरीबी के चलते इटली की लड़कियां इन मिशनरीज में जाती थीं और फिर किशोरवय में ब्रिटेन ताकि वहां वो कोई छोटी-मोटी नौकरी कर सकें। मैनो उन दिनों गरीब थे। सोनिया के पिता और माता की हैसियत बेहद मामूली थी और अब वो दो बिलियन पाउंड की अथाह संपत्ति के मालिक हैं। इस तरह सोनिया ने लोकसभा और हलफनामे के जरिए गलत जानकारी देकर आपराधिक काम किया है, जिसके तहत न केवल उन पर अपराध का मुकदमा चलाया जा सकता है बल्कि वो सांसद की सदस्यता से भी वंचित की जा सकती हैं। यह सुप्रीम कोर्ट की उस फैसले की भावना का भी उल्लंघन है कि सभी उम्मीदवारों को हलफनामे के जरिए अपनी सही पढ़ाई-लिखाई से संबंधित योग्यता को पेश करना जरूरी है। 
सोनिया गांधी ने इन तीन झूठों से सच छिपाने की कोशिश की। इसके पीछे उनके उद्देश्य कुछ अलग थे। सोनिया गांधी ने इतनी इंग्लिश सीख ली थी कि वो कैम्ब्रिज टाउन के यूनिवर्सिटी रेस्टोरेंट में वैट्रेस (महिला बैरा) बन सकीं। वे विद्यार्थी राजीव गांधी से पहली बार 1965 में तब मिली जब राजीव् रेस्टोरेंट में आये। राजीव लंबे समय तक अपनी पढ़ाई के साथ तालमेल नहीं बिठा पाये इसलिए उन्हें 1966 में लंदन भेज दिया गया , जहां उनका दाखिला इंपीरियल कालेज ऑफ इंजीनियरिंग में हुआ। उस समय सोनिया भी लंदन में थीं। उन्हें लाहौर के एक व्यवसायी सलमान तासिर के आउटफिट में नौकरी मिल गई। तासीर की एक्सपोर्ट-इम्पोर्ट कंपनी का मुख्यालय दुबई में था लेकिन वो अपना ज्यादा समय लंदन में बिताते थे। आईएसआई से जुडे होने के लिए उनकी ये प्रोफाइल जरूरी थी। 
राजीव माँ इंदिरा गांधी द्वारा भारत से भेजे गये पैसों से कहीं ज्यादा पैसे खर्च देते थे। सोनिया अपनी नौकरी से इतना पैसा कमा लेती थीं कि राजीव को लोन उधार दे सकें। इंदिरा ने राजीव की इस आदत पर 1965 में गुस्सा जाहिर किया था श्री पी. एन. लेखी द्वारा दिल्ली हाईकोर्ट में पेश किये गये राजीव के छोटे भाई संजय को लिखे गये पत्र में साफ तौर पर संकेत दिया गया है कि वह वित्तीय तौर पर सोनिया के काफी कर्जदार हो चुके थे और उन्होंने संजय से  जो उन दिनों खुद ब्रिटेन में थे और  खासा पैसा उड़ा कर कर्ज में डूबे हुए थे से मदद हेतु थे अनुरोध किया था। 
उन दिनों सोनिया केवल राजीव गांधी ही नहीं, बल्कि माधवराव सिंधिया  और स्टीगलर नाम का एक जर्मन युवक भी सोनिया के अच्छे मित्रों में थे। माधवराव की सोनिया से दोस्ती राजीव की सोनिया से शादी के बाद भी जारी रही। 1972 में  एकरात दो बजे माधवराव आई.आई.टी. दिल्ली के मुख्य गेट के पास एक एक्सीडेंट के शिकार हुए और उन्हें बुरी तरह चोटें आईं उसी समय आई.आई.टी. का एक छात्र बाहर था। उसने उन्हें कार से निकाल कर ऑटोरिक्शा में बिठाया और साथ में घायल सोनिया को श्रीमती इंदिरा गांधी के आवास पर भेजा जबकि माधवराव सिंधिया का पैर टूट चुका था और उन्हें इलाज की दरकार थी। दिल्ली पुलिस ने उन्हें हॉस्पिटल तक पहुंचाया। दिल्ली पुलिस वहां तब पहुंची जब सोनिया वहां से जा चुकी थीं। 
बाद के सालों में माधवराव सिंधिया व्यक्तिगत तौर पर सोनिया के बड़े आलोचक बन गये थे और उन्होंने अपने कुछ नजदीकी मित्रों से अपनी आशंकाओं के बारे में भी बताया था। कितना दुर्भाग्य है कि वो 2001 में एक विमान हादसे में मारे गये। मणिशंकर अय्यर और शीला दीक्षित भी उसी विमान से जाने वाले थे लेकिन उन्हें आखिरी क्षणों में फ्लाइट से न जाने को कहा गया। वो हालात भी विवादों से भरे हैं जब राजीव ने ओरबासानो के चर्च में सोनिया से शादी की थी , लेकिन ये प्राइवेट मसला है , इसका जिक्र करना ठीक नहीं होगा। इंदिरा गांधी शुरू में इस विवाह के सख्त खिलाफ थीं , उसके कुछ कारण भी थे जो उन्हें बताये जा चुके थे। वो इस शादी को हिन्दू रीतिरिवाजों से दिल्ली में पंजीकृत कराने की सहमति तब दी जब सोवियत समर्थक टी. एन. कौल ने इसके लिए उन्हें प्रेरित किया , उन्होंने सोवियत संघ के चाहने पर इंदिरा जी से कहा कि यह शादी भारत-सोवियत दोस्ती के वृहद सम्बन्ध में बेहतर कदम साबित हो सकती है। 
आभार: राजनामा 
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दोहा सलिला- यमक का रंग दोहे के सँग: घट ना जाए मूल -- संजीव 'सलिल'


*
घट ना फूटे सम्हल जा, घट ना जाए मूल.
घटना जब घट जाए तो, चुभती शूल बबूल..
घट= घड़ा, कम हो, काम होना. 
*
चमक कैमरे ले रहे, जहाँ-तहाँ तस्वीर.
दुर्घटना में कै मरे?, फ़िक्र न कर धर धीर..
कैमरे=चित्र उतरने का यंत्र, कितने मरे.
*
मिले अजनबी पर नहीं, रहे अजनबी मीत.
सब सज-धज तज अज नबी, गाते प्रभु के गीत..
अजनबी=अपरिचित, अज=अजन्मा, ईश, नबी=ईश्वर का दूत.
*
तिल-तिलकर जलता रहा, तिल भर सका न त्याग.
तिल-घृत की चिंताग्नि की, सहे सुयोधन आग..
तिल=अल्प, एक खाद्यान्न.
*
माँग भरें वर माँगकर, गौरा हुईं प्रसन्न..
बौरा पूरी माँगकर, हुए अधीन न खिन्न..
माँग=विवाहित स्त्रियों के केशों के मध्य रेखा, इच्छा.
*
टाँग न सकती टाँग को, हर खूँटी बेकाम.
टाँगा टाँगा ही नहीं, लेकिन पाया नाम..
टाँग=पैर, टाँगना. टाँगा=टाँग लिया, घोड़े द्वारा खींचे जानेवाला वाहन.
*
नाम न पूछें नाम से, जाना जाता व्यक्ति.
बिना नाम का काम कर, तजें मोह-आसक्ति..
नाम=व्यक्ति का संबोधन, यश, श्रेय.
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Acharya Sanjiv Salil

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एक गीत : अमराई कर दो... -- संजीव 'सलिल'

एक गीत-
अमराई कर दो...
संजीव 'सलिल'
*
कागा की बोली सुनने को
तुम कान लगाकर मत बैठो.
कोयल की बोली में कूको,
इस घर को  अमराई कर दो...
*
तुमसे मकान घर लगता है,
तुम बिन न कहीं कुछ फबता है..
राखी, होली या दीवाली
हर पर्व तुम्हीं से सजता है..
वंदना आरती स्तुति तुम
अल्पना चौक बंदनवारा.
सब त्रुटियों-कमियों की पल में
मुस्काकर भरपाई कर दो...
*
तुम शक्ति, बुद्धि, श्री समता हो.
तुम दृढ़ विनम्र शुचि ममता हो..
रह भेदभाव से दूर सदा-
निस्वार्थ भावमय समता हो..
वातायन, आँगन, मर्यादा
पूजा, रसोई, तुलसी चौरा.
तुम साँस-साँस को दोहा कर
आसों को चौपाई कर दो...
*
जल उथला सदा मचलता है.
मृदु मन ही शीघ्र पिघलता है..
दृढ़ चोटें सहता चुप रहता-
गिरि-नभ ना कभी उछलता है..
शैशव, बचपन, कैशौर्य, तरुण
तुम अठखेली, तुम अंगड़ाई-
जीवन के हर अभाव की तुम
पल भर में भरपाई कर दो..
*****
Acharya Sanjiv Salil

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दोहा सलिला:
दोहा का रंग यमक के संग
संजीव 'सलिल'
*
ठाकुर जी को सर झुका, ठाकुर करें प्रणाम. 
कारिंदे मुस्का रहे, पड़ा आज फिर काम.. 
*
नम न हुए कर नमन तो, समझो होती भूल.
न मन न तन हों समन्वित, तो चुभता है शूल..
*
बख्शी को बख्शी गयी, जैसे ही जागीर.
थे फ़कीर कहला रहे, खुद को  खुदी अमीर..
*
गये दवाखाना तभी, पाया यह सन्देश.
'भूल दवा खाना गये', झट खा लें आदेश..
*
नाहक हक ना त्याग तू, ना हक-पीछे  भाग.
ना ज्यादा अनुराग रख, ना ज्यादा वैराग..
*


मंगलवार, 23 अगस्त 2011

कजगांव (टेढ़वां बाजार) का ऐतिहासिक कजरी मेला

कजगांव (टेढ़वां बाजार) का ऐतिहासिक कजरी मेला

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जफराबाद क्षेत्र के कजगांव (टेढ़वां बाजार) की ऐतिहासिक कजरी जो क्षेत्रीय बुजुर्गां के अनुसार लगभग 85 वर्षों से लगती चली आ रही है जिसमें टेढ़वां के लोग राजेपुर गांव में शादी करने का दावा पेश करते हैं और राजेपुर गांव के लोग टेढ़वां में शादी करने का सपना संजोकर बारात लेकर आते हैं। बाजार के अन्त में दोनों गांव के बीच स्थित पोखरे पर राजेपुर की बारात पूर्वी छोर और कजगांव की बारात पश्चिमी छोर पर बाराती, हाथी, घोड़ा, ऊंट तथा दूल्हे के साथ द्वार पूजा के लिये खड़ी हो जाती है। एक-दूसरे पर दोनों तरफ से मनोविनोदी आवाज में जोर-जोर बाराती और कभी-कभी दूल्हा भी चिल्लाने लगता है कि दूल्हन दे दो, हम लेकर जायेंगे। यह क्रम घण्टों चलता है। यदि बीच में पोखरा न हो तो शायद आपस में भिड़ंत भी हो सकती है लेकिन 85 वर्षों में कभी भी ऐसी कोई बात नहीं हुई।
महीनों पहले से जहां एक गांव के नागरिक दूसरे गांव के लोगां से मजाक शुरू कर देते हैं, वहीं कजरी मेला समाप्त होने के बाद मजाक एक वर्ष के लिये बंद होकर अगले वर्ष तक के लिये समाप्त सा रहता है। मेला में जहां एक ओर दोनों गांव के बाराती एक-दूसरे से मजकिया लहजे में जोर-जोर से वार्ता करते हैं, वहीं दूसरी ओर गांव ही नहीं, जिले के विभिन्न क्षेत्रों से आये लोग इस काल्पनिक बारात में शामिल होकर मेला का आनन्द लेते हैं जहां खाद्य पदार्थों के अलावा घरेलू सामानों की जमकर खरीददारी भी की जाती है।
    मेले में सुरक्षा की दृष्टि से भारी संख्या में पीएसी व पुलिस के जवानों के अलावा तमाम थानाध्यक्ष भी डटे रहे तथा सिविल डेªस में भी पुलिसकर्मी चक्रमण करते नजर आये। कुल मिलाकर यह मेला पूरी तरह आपसी सौहार्द एवं परम्परागत ढंग से सम्पन्न हो गया और दोनों तरफ के दूल्हे इस वर्ष भी शादी न करने में असफल रहने का मलाल लेकर बगैर दूल्हन अगले वर्ष की आस लिये लौट गये।

kajri melaलगभग 85 वर्षों का इतिहास संजोये जफराबाद क्षेत्र के कजगांव (टेढ़वां बाजार) स्थित पोखरे पर राजेपुर और कजगांव की ऐतिहासिक बारातें आयीं जिसमें हाथी, घोड़े, ऊंट पर सवार बैण्ड-बाजे की धुन पर बाराती घण्टों जमकर थिरके लेकिन इस वर्ष 18 अगस्त २०११ को भी दोनों गांव से आये दूल्हों की इच्छा पूरी नहीं हो सकी और बारात बगैर शादी एवं दूल्हन के बैरंग वापस चली गयी।




आभार : हमारा जौनपुर.

सोमवार, 22 अगस्त 2011

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर दोहा सलिला- बजा कर्म की बाँसुरी: --संजीव 'सलिल'

श्री कृष्ण जन्माष्टमी पर दोहा सलिला-                                             
बजा कर्म की बाँसुरी:
संजीव 'सलिल'
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बजा कर्म की बाँसुरी, रचा आस सँग रास.
मर्म धर्म का समझ ले, 'सलिल' मिटे संत्रास..
*
मीरां सी दीवानगी, राधा जैसी प्रीत.
द्रुपदसुता सी नेह की, थाती परम पुनीत..
*
चार पोर की बाँसुरी, तन-चारों पुरुषार्थ.
फूँक जोर से साँस री, दस दिश हो परमार्थ..
*
श्वास-बाँसुरी पर गुँजा, लास-हास के गीत.
रास- काम निशाकाम कर, पाल ईश से प्रीत..
*
प्रभु अर्पित हो पार्थ सम, बनें आप सब काम.
त्याग वासना-कामना, भुला कर्म-परिणाम..
*
श्वास किशन, है राधिका आस, जिंदगी रास.
प्यास मिटा नवनीत दे, जब हो सतत प्रयास..
*
मन मीरां तन राधिका, नटनागर संकल्प.
पार्थ प्रबल पुरुषार्थ का, यश गाते शत कल्प..
*
मनमोहन मुरली बजा, छेड़ें मधुमय तान.
कन्दुक क्रीड़ा कर किया, वश में कालिय नाग..
*
दुर्योधन से दिन कठिन, दु:शासन सी रात.
संध्या है धृतराष्ट्र सी, गांधारी सा प्रात..
*
करें मित्रता कृष्ण सी, श्रीदामा सा स्नेह.
अंतर्मन से एक हों, बिसरा तन-धन-गेह..
*
आत्म-राधिका ध्यान में, कृष्णचन्द्र के लीन.
किंचित ओझल हों किशन, तड़पे जल बिन मीन..
*
बाल कृष्ण को देखते, सूरदास बिन नैन.
नैनावाले आँधरे, तड़प रहे दिन-रैन..
*
श्री की सार्थकता तभी, साथ रहें श्रीनाथ.
नाथ रहित श्री मोह मन, करती आत्म-अनाथ..
*
'सलिल' न सम्यक आचरण, जब करता इंसान.
नियति महाभारत रचे, जग बनता शमशान..
*
शांति नगर हो विश्व यदि, संजय-विदुर प्रधान.
सेवक पांडवगण रहें, रक्षक भीष्म प्रधान..
*
सच से आँखें मूँद लीं, आया निकट विनाश.
नाश न होता देखती, गांधारी सच काश..
*
श्रवण, भीष्म, श्री राम की, पितृ-भक्ति अनमोल.
तीन लोक की सम्पदा, सके न किंचित तोल..
*
दिशा बोध दायित्व जब, लगा द्रोण के हाथ.
एकलव्य-राधेय का, झुका जीतकर माथ..
*
नेत्रहीन धृतराष्ट्र को, दिशा दिखाये कौन?
बांधे पट्टी आँख पर, गांधारी यदि मौन..
*
भृष्टाचारी कंस को, अन्ना कृष्ण समान.
हुई सोनिया पूतना, दिल्ली कुरु-मैदान..
*
Acharya Sanjiv Salil

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रविवार, 21 अगस्त 2011

एक रचना: काल --संजीव 'सलिल'

एक रचना:                                                                                
काल
--संजीव 'सलिल'

*
काल की यों करते परवाह...
*
काल ना सदय ना निर्दय है.
काल ना भीत ना निर्भय है.
काल ना अमर ना क्षणभंगुर-
काल ना अजर ना अक्षय है.
काल पल-पल का साथी है
काल का सहा न जाए दाह...
*
काल ना शत्रु नहीं है मीत.
काल ना घृणा नहीं है प्रीत.
काल ना संग नहीं निस्संग-
काल की हार न होती जीत.
काल है आह कभी है वाह...
*
काल माने ना राजा-रंक.
एक हैं सूरज गगन मयंक.
काल है दीपक तिमिर उजास-
काल है शंका, काल निश्शंक.
काल अनचाही पलती चाह...
*
काल को नयन मूँदकर देख.
काल है फलक खींच दे रेख.
भाल को छूकर ले तू जान-
काल का अमित लिखा है लेख.
काल ही पग, बाधा है राह...
*
काल का कोई न पारावार.
काल बिन कोई न हो व्यापार.
काल इकरार, काल इसरार-
काल इंकार, काल स्वीकार.
काल की कोई न पाये थाह...
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Acharya Sanjiv Salil

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शुक्रवार, 19 अगस्त 2011

राष्ट्रीय गीत : गायिका लता मंगेशकर जी


http://www.youtube.com/watch?v=z0WxLYDbqdY&feature=player_embedded#t=४५५स


रमजान पर विशेष: पाक़ क़ुरआन

रमजान पर विशेष:  पाक़ क़ुरआन

क़ुरआन का शब्दशः अर्थ है प्रदर्शन अथवा अभिव्यक्ति। क़ुरआन, ईश्वर के शब्द है जिन्हें सातवी शताब्दी में पैगम्बर मोहम्मद के द्वारा अभिव्यक्ति मिली। अपने तीसवे वर्ष के दौरान, पैगम्बर मोहम्मद को स्वप्नादि में दृष्टांत होने लगे। इसके पश्चात आपने एकांत में साधना की व आध्यात्मिक जागृति की गरज से आप हीरा नामक पहाड़ी, जो कि मक्का के बाहरी इलाके में थी, वहाँ जाना शुरु किया। वे अपने साथ जीवन यापन का सामान लिये हुए, एक गुफा में एकांतवास कर ध्यान धारणा में लीन रहा करते थे। अपने जीवन के चालीसवे वर्ष में एक परी ने उनके समक्ष दृष्टांत दिया और आदेश दिया, ''सुनाओ" मोहम्मद ने जवाब दिया, ''मै सुनाने वाला नही हूँ"।
तब उस परी ने मोहम्मद को अपने पाश में आबद्घ किया, इस अनुभव में मोहम्मद अपनी सीमाओं से पार जा पहुँचे। ऐसा दो बार पुनः हुआ। तीसरी बार जब परी ने उन्हे मुक्त किया, तब उन्होंने कहा :
اقرا باسم ربك الذي خلق
خلق الانسان من علق
اقرا و ربك الاكرم
الذي علم بالقلم
علم الانسان ما لم يعلم
मै सुनाता हूँ! तुम्हारे ईश्वर और आनन्द प्रदाता के नाम पर,
जिसने एक खून के कतरे से इन्सान को बनाया,
मै सुनाता हूँ!
और आपका ईश्वर सर्वव्यापी है
वह जिसने तुम्हे आंतरिक शब्दों को जीना सिखाया
तुम्हे वह सिखाया जो अज्ञात था
(96 : 1-5)
पैगम्बर मोहम्मद ने इन शब्दों को परी के समक्ष दोहराया और तेज़ी से पहाड़ी से नीचे आए। बीच रास्ते में ही, आपने एक आवाज़ सुनी,
''हे मोहम्मद! तुम अल्लाह के संदेशवाहक हो और मै गॅब्रियेल हूँ।"
पैगम्बर ऊपर दृष्टि किये हुए स्तब्ध खड़े रहे और उन्होंने देखा कि क्षितिज के पार तक उस परी का अस्तित्व है।
इस संदेश के साथ ही एक और संदेश प्रस्तुत हुआ और इसे व्यक्तिगत रुप से मोहम्मद को कहा गया :
ن و القلم و ما يسطرون
ما انت بنعمة ربك بمجنون
و ان لك لاجرا غير ممنون
و انك لعلى خلق عظيم
नुन (एक संक्षिप्त अक्षर)
आंतरिक पुस्तक के गुह्य व स्पष्ट ज्ञान से
और उसके तत्वरुप में रुपांतरण से
आप मात्र आपके ईश्वर की इच्छा से
भले, बुरे अथवा प्राप्ति अप्राप्ति
एवं उच्च चरित्र के आदर्श
(68 : 1-4)
कुछ अंतराल के लिये, वहाँ कोई संदेश नही थे, फिर वे प्रकट हुए और पैगम्बर के पूरे जीवनकाल तक समय समय पर, लगभग 25 वर्षों तक उनके समक्ष रहे।
ये संदेश प्रथमतः कहीं दूर से आती हुई मधुर घंटियों के आवाज़ के समान और आगे मुखर होती हुई एक आवाज़ के समान थे। इन संदेशों को ग्रहण करते समय मोहम्मद साहब की अवस्था प्राकृतिक रुप से बदल जाती थी। इन संदेशों को उनके अनुयायियों द्वारा याद रखा गया और उन्हे हड्डि.यों, पेड़ की छाल, पत्तियों व अन्य इस प्रकार की वस्तुओं पर उन्हे अंकित किया गया। पैगम्बर मोहम्मद (अल्लाह उन्हे शांति में रखे) ने क़ुरआन को एकमात्र चमत्कार माना है जो ईश्वर द्वारा उनके माध्यम से किया गया और इसे आपने ''ईश्वरीय चमत्कार" कहा है।"

*

दिव्य प्रकाश

الله نور السماوات و الأرض مثل نوره كمشكواة فيها مصباح المصباح في زجاجة الزجاجة كأنها كوكب دري يوقد من شجرة مباركة زيتونة لا شرقية و لا غربية یکاد زيتها يضيئ و لو لم تمسسه نار نور على نور يهدي الله لنوره من يشاء و يضرب الله الأمثال للناس و الله بكل شيئ عليم.
'ईश्वर स्वर्ग व धरती का प्रकाश है। उसके प्रकाश की कथा है कि एक स्थान पर एक दिया है उसपर काँच का आवरण काँच, चमकते सितारे जैसा, फलित वृक्ष से जाज्वल्य जैतून! न पूर्व का न पश्चिम का जिसका तेल स्वयं प्रकाशित है जिसे अग्नि स्पर्श की आवश्यकता नही है। प्रकाश पर प्रकाश, कृपा! ईश्वरेच्छा ईश्वर मानव निर्मित कथाओं से आगे है ईश्वर सर्वज्ञ है।
(24:35)
ألر كتاب أنزلناه إليك لتخرج الناس من الظلمات إلى النور بإذن ربهم إلى صراط العزيز الحميد.
ए .एल .आर ., एक पुस्तक जिसे हमने आत्मसात किया, इस आशा से कि यह मानव मात्र को गहरे अज्ञान से बाहर निकाले,अंधेरे से प्रकाश की ओर ले जाए - उनके ईश्वर से, उसकी ओर, उच्च शक्ति की ओर, जो संपूर्ण भक्तिस्वरुप है!
(14:1)
सूफीवाद का लक्ष्य है आत्मज्ञान, अर्थात उस विधाता का ज्ञान। इस सत्य ज्ञान का फल होता है परम्‌ प्रकाश। प्रोफेसर सादेग अंघा हमें बताते है, ''अपने अंतर्मन के सम्राज्य में रहस्यमय व सत्य की अनुभूतियाँ पाओ और ये पूर्ण विश्वास रखो कि तुम उस परम्‌ प्रकाश को अवश्य पा सकोगे और इस प्रकाश के मार्गदर्शन में ही तुम उसके अतीन्द्र अस्तित्व को अनुभूत कर पाओगे और इस प्रकार से जो परम्‌ शांति तुम खोज रहे थे, अब तुम्हारी हो जाएगी। यह जान लो कि जो तुम्हारे बगैर अस्तित्व में है, वह सत्य नही है और जो तुममें निहित है वही सत्य है।  [1]
الله ولي اللذين آمنوا يخرجهم من الظلمات إلى النور.
अल्लाह उनका रक्षक है जिन्हे विश्वास है, गहराई से वह उन्हे अंधेरे से प्रकाश में ले जाता है।
(2:257)
يهدي به الله من اتبع رضوانه سبل السلام و يخرجهم من الظلمات إلى النور بإذنه و يهديهم إلى صراط مستقيم.
जहाँ भी अल्लाह का मार्गदर्शन है, उसका आनंद व सुरक्षा है और यही उन्हे अंधकार से, उसकी इच्छा के चलते प्रकाश में ले जाता है और इस पथ का प्रदर्शक बन जाता है।
(5:16)
सूफीवाद के अध्ययन का मुख्य आधार शब्द अथवा विचार नही है जो कि सत्य का आवरण हो। मात्र ईश्वरीय कृपा व पीर के मार्गदर्शन से ही साधक के मन में निर्विवाद रुप से वह अनमोल सत्य उजागर हो सकता है । पीर का मार्गदर्शन व परम्‌ प्रकाश, इस यात्रा के अवरोधों से बचाव हेतु आवश्यक है। आत्मज्ञान की इस यात्रा में, ''सत्य शब्द", शुद्घ हृदय, सही इरादे, ईमानदारी, कार्यनिष्ठा व सत्य समर्पण आवश्यक है, अतः ईश्वरीय कृपा व पैगम्बर के प्रति निरंतर समर्पण, वह अनमोल सत्य, साधक के अंतर्मन में जागृत होकर उसे समस्त प्रश्नों से परे कर देता है।" [2]
يأيها اللذين آمنوا اتقوا الله و ءامنوا برسوله يؤتيكم كفلين من رحمته و يجعل لكم نورا تمشون به و يغفر لكم و الله غفور رحيم.
और वह तुम पर दुगुनी कृपा करेगा, वह तुम्हे वह परम्‌ प्रकाश प्रदान करेगा जो पथप्रदर्शक है, और वह तुम्हे माफ कर देगा क्योंकि अल्लाह सबसे दयालु है।
(57:28)
_____________________________

1. Sadegh ANGHA, Hazrat Shah Maghsoud, The Light of Salvation, M.T.O. Publications, Tehran, Iran, 1975, p.99
2. Ibid, p.86
 *

स्थायी चमत्कार

पैगम्बर मोहम्मद के साथ संपन्न मुख्यतः सभी चमत्कार उनके आत्मतत्व तक ही सीमित थे और ये उस पीढ़ी के अनुयायियों तक ही सीमित रहे। क़ुरआन का चमत्कार पुनर्जन्म के समय तक ही रहा। ये चमत्कार प्राकृतिक अवस्था के उच्च स्तर व रहस्यात्मक कल्पनाओं को अभिव्यक्ति देने से संबंधित है। ऐसा कोई भी काल नही होगा जहाँ उसके संदेश उपस्थित नही होंगे। यह नियमित रुप से अपनी उपस्थिती की सार्थकता को सिद्घ करता रहेगा। अन्य शब्दों में, भौतिक क़ुरआन की उपस्थिति, क़ुरआन की वास्तविकता का सत्याभास मात्र है। [1]
क़ुरआन एक ब्रम्हांड के समान है जिसमें अनेक उड़न खतोलों के समान अस्तित्व व समझ के स्तर है... ये जान लेना महत्वपूर्ण है कि हम आत्मतत्व को आत्मसात कर ईश्वरीय कृपा के बगैर क़ुरआन के सही अर्थ को नही जान सकते। यदि हम क़ुरआन को सतही तौर पर देखें और इसके विचारों का उथला सा आकलन करें, हम सतह पर तैरते अस्तित्व के भावों को देखें और आंतरिक अस्तित्व से अछूते रहकर व्यवहार करेंगे तो क़ुरआन का अर्थ भी हमें मात्र सतही तौर पर समझ में आएगा। वह अपने रहस्यों को हमसे छुपा रखेगी और हम सत्य का साक्षात्कार नही कर पाएँगे। यह मात्र आध्यात्मिक जागृति से ही संभव है कि मानव पवित्र शब्दों के रहस्यात्मक अर्थ को समझ सके।
ज़लाल-अल-दीन रुमी जलालुद्‌दीन रुमी, फारसी रहस्यबोध के कवि, क़ुरआन व विश्वासक के संबंध को इस प्रकार से अभिव्यक्त करते है : ''कुछ व्यक्ति नवजात शिशुओं के समान शािब्दक अर्थ आत्मसात कर क़ुरआन को दुग्धपान के समान ग्रहण करते है। परंतु वे, जो अनुभवी है व ऊँची व परिपक्व सोच रखते है, वे ही सही समझदारी के साथ क़ुरआन के आंतरिक मर्म को समझते है।"
क़ुरआन के विद्यार्थी को आंतरिक व बाह्य, रहस्यात्मक व विश्लेष्णात्मक शिक्षण के प्रकारों के मध्य अंतर करना होता है।
रुमी द्वारा मसनवी के अंतर्गत, क़ुरआन के रहस्यों को इस प्रकार से अभिव्यक्त किया गया :
'क़ुरआन के शब्दों को जानना सरल है,
परंतु बाह्य स्वरुप में एक आंतरिक रहस्य है।
उस रहस्यमय अर्थ में ही तृतीय रुप में
उच्च विज्ञता शामिल है।
चौथा अर्थ किसी ने भी नही देखा।
रक्षा प्रभु! अतुलनीय, सर्वप्रदाता।
और वे आगे बढ़े, एक एक कर सात अर्थों तक
पैगम्बर के शब्दों के अनुसार, बिना किसी शक शुबहे के
मेरे पुत्र! मात्र ऊपरी अर्थ पर ही सीमित न रहो
यहाँ तक कि आदम के साथ के शैतान भी ऊपरी ही थे
ऊपरी अर्थ यानी शैतान का शरीर :
जिसका शरीर दृष्टिगत होता है परंतु आत्मा अदृश्य है।

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1. Kenneth Cragg and R. Marston Speight, Islam from Within: anthology of a Religion, Wadsworth Publishing Company, 1980, p.18
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आभार : MTO Islam Website