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मंगलवार, 30 अप्रैल 2013

अतीत का आइना:


RARE PHOTOGRAPHS: 

भारत स्वतंत्र हुआ: १५-८-१९४७

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स्टालिन, लेनिन, ट्राटस्की 


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अपूर्ण हावडा पुल १९३५ 

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निर्माणाधीन हावड़ा पुल १९४२


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नेताजी सुभाष चंद्र  बोस : गिरफ्तारी 


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बा - बापू 

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गाँधी जी, नेता जी, पटेल १९३२

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सुभाष चन्द्र बोस अपनी पत्नी के साथ 

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नेहरू जी, डॉ राजेंद्र प्रसाद जी, भूला भाई देसाई 


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कविन्द्र रविन्द्रनाथ ठाकुर 

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शरतचंद्र - सुरेन्द्र नाथ 

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रामकृष्ण परम हंस देव - विवेकानंद 
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माँ शारदा 

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critic: aamacho bastar novel -sanjiv verma 'salil'

कृति चर्चा:
अबूझे को बूझता स्वर : ''आमचो बस्तर''
आचार्य संजीव वर्मा 'सलिल'
*
(कृति विवरण: आमचो बस्तर, उपन्यास, राजीव रंजन प्रसाद, डिमाई आकार, बहुरंगा पेपरबैक  आवरण, पृष्ठ ४१४, २९५ रु., यश पब्लिकेशन्स, दिल्ली)
*
Rajeev Ranjan Prasad's profile photo                  

                  आमचो बस्तर देश के उस भाग के गतागत पर केन्द्रित औपन्यासिक कृति है जिसे  बस्तर कहा जाता है, जिसका एक भाग अबूझमाड़ आज भी सहजगम्य नहीं है और जो नक्सलवाद की विभीषिका से सतत जूझ रहा है। रूढ़ अर्थों में इसे उपन्यास कहने से परहेज किया जा सकता है क्योंकि यह उपन्यास के कलेवर में अतीत का आकलन, वर्त्तमान का निर्माण तथा भावी के नियोजन की त्रिमुखी यात्रा एक साथ कराता है। इस कृति में उपन्यास, कहानियां, लघुकथाएं, वार्ता प्रसंग, रिपोर्ताज, यात्रा वृत्त, लोकजीवन, जन संस्कृति  तथा चिंतन के ९ पक्ष इस तरह सम्मिलित हैं कि पाठक पूरी तरह कथा का पात्र हो जाता है। हमारे पुराण साहित्य की तरह यह ग्रन्थ भी वास्तविकताओं का व्यक्तिपरक या घटनापरक वर्णन करते समय मानव मूल्यों, आदर्शों, भूलों आदि का तटस्थ भाव से आकलन ही नहीं करता है अपितु अँधेरे की सघनता से भयभीत हुए बिना प्रकाश की प्राप्ति के प्रति आश्वस्ति का भाव भी जगाता है।

छत्तीसगढ़ राज्य के निर्माण के पश्चात् बस्तर तथा छत्तीसगढ़ के अन्य अंचलों के बारे में लिखने की होड़ सी लग गयी है। अधिकांश कृतियों में अपुष्ट अतिरेकी भावनात्मक लिजलिजाहट से बोझिल अपचनीय कथ्य, अप्रामाणिक तथ्य, विधा की न्यून समझ तथा भाषा की त्रुटियों से उन्हें पढ़ना किसी सजा की तरह लगता रहा है। आमचो बस्तर का वाचन पूर्वानुभवों के सर्वथा विपरीत प्रामाणिकता, रोचकता, मौलिकता, उद्देश्यपरकता तथा नव दृष्टि से परिपूर्ण होने के कारण सुखद ही नहीं अपनत्व से भरा भी लगा।

लगभग ४० वर्ष पूर्व इस अंचल को देखने-घूमने की सुखद स्मृतियों के श्यामल-उज्जवल पक्ष कुछ पूर्व विदित होने पर भी यथेष्ठ नयी जानकारियाँ मिलीं। देखे जा चुके स्थलों को उपन्यासकार की नवोन्मेषी दृष्टि से देखने पर पुनः देखने की इच्छा जागृत होना कृति की सफलता है। अतीत के गौरव-गान के साथ-साथ त्रासदियों के कारकों का विश्लेषण, आम आदमी के नज़रिए से घटनाओं को समझने और चक्रव्यूहों को बूझने का लेखकीय कौशल राजीव रंजन का वैशिष्ट्य है।




राजतन्त्र से प्रजातंत्र तक की यात्रा में लोकमानस के साथ सत्ताधीशों के खिलवाड़, पद-मोह के कारण देश के हितों की अदेखी, मूल निवासियों का सतत शोषण, कुंठित और आक्रोशित जन-मन के विद्रोह को बगावत कह कर कुचलने के कुप्रयास, भूलों से कुछ न सीखने की जिद, अपनों की तुलना में परायों पर भरोसा, अपनों द्वारा विश्वासघात और सबसे ऊपर आमजनों की लोक हितैषी कालजयी जिजीविषा - राजीव जी की नवोन्मेषी दृष्टि इन तानों-बानों से ऐसा कथा सूत्र बुनते हैं जो पाठक को सिर्फ बाँधे नहीं रखता अपितु प्रत्यक्षदर्शी की तरह घटनाओं का सहभागी होने की प्रतीति कराते हैं।

बस्तर में नक्सलवाद का नासूर पैदा करनेवाले राजनेताओं और प्रशासकों को यह कृति परोक्षतः ही सही कटघरे में खड़ा करती है। पद-मद में लोकनायक प्रवीरचंद्र भंजदेव को गोलियों से भून्जकर जन-आस्था का क़त्ल करनेवाले काल की अदालत में दोषी हैं- इस प्रसंग में उल्लेखनीय है कि देश की आजादी के समय हैदराबाद और कुछ अन्य रियासतें अपना भारत में सम्मिलन के विरोध में थीं। प्रवीरचंद्र जी को बस्तर को स्वतंत्र राष्ट्र का दर्ज मांगने के लिए मनाने का प्रयास किया गया। उनहोंने न केवल प्रस्ताव ठुकराया अपितु अपने मित्र प्रसिद्ध  साहित्यकार  स्व. रामानुज लाल श्रीवास्तव 'ऊँट बिलाहरीवी' के माध्यम से द्वारिका प्रसाद मिश्र को सन्देश भिजवाया ताकि नेहरु-पटेल आदि को अवगत कराया जा सके। फलतः राजाओं का कुचक्र विफल हुआ। यही मिश्र मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री हुए तो भंजदेव को अकारण राजनैतिक स्वार्थ वश गोलियों का शिकार बनवा दिया। केर-बेर का संग यह की कलेक्टर के रूप में भंजदेव की लोकमान्यता को अपने अहंकार पर चोट माननेवाले नरोन्हा ने कमिश्नर के रूप में सरकार को भ्रामक और गलत जानकारियां देकर गुमराह किया। जनश्रुति यह भी है कि इस षड्यंत्र में सहभागी निम्नताम से उच्चतम पदों पर आसीन हर एक को कुछ समय के भीतर नियति ने दण्डित किया, कोई भी सुखी नहीं रह सका।

प्रशंसनीय है कि लेखक व्यक्तिगत सोच को परे रखकर निष्पक्ष-तटस्थ भाव से कथा कहा सका है। बस्तर निवासी होने पर भी वे पूर्वाग्रह या दुराग्रह से मुक्त होकर पूरी सहजता से कथ्य को सामने ला सके हैं। वस्तुतः युवा उपन्यासकार अपनी प्रौढ़ दृष्टि और संतुलित विवेचन के लिए साधुवाद का पात्र है।

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२०४ विजय अपार्टमेंट, नेपियर टाउन, जबलपुर ४८२००१, चलभाष: ९४२५१ ८३२४४  

Forms of Poetry In English 4 : deepti gupta - sanjiv verma

अँग्रेज़ी काव्य विधाएँ-4

Blank Verse

deepti gupta - sanjiv verma 
*
       मीटर के बिना लिखी जाने वाली कविता Blank verse  कविता  कहलाती है. विलियम शेक्सपियर ने  अपने  अधिकतर नाटकों में इसका प्रयोग किया है.
Example:

From Macbeth by William Shakespeare

Tomorrow, and tomorrow, and tomorrow,

Creeps in this petty pace from day to day, 

To the last syllable of recorded time; 
And all our yesterdays have lighted fools 
The way to dusty death. Out, out, brief candle! 
Life's but a walking shadow, a poor player 
That struts and frets his hour upon the stage 
And then is heard no more: it is a tale 
Told by an idiot, full of sound and fury, 
Signifying nothing.
*
हिंदी साहित्य में छान्दस काव्य में सामान्यतः पंक्तियों का पदभार समान होता है। ब्लेंक वर्स अर्थात 

अतुकांत कविता में पद संख्या, पद भार (मात्राओं / वर्णों की सामान संख्या) अथवा समान तुक का 

बंधन नहीं होता। 


उदाहरण :



सुख - दुःख
*

सुख 

आदमी को बाँटता  है। 

मगरूर बनाता है, 

परिवेश से काटता है।

दुःख 

आदमी को 

आदमी से जोड़ता है।

दिल से मिलने को 

दिल दौड़ता है।

फिर क्यों? 

क्यों हम दुःख से दूर भागते हैं? 

क्यों हमेशा ही 

सुख की भीख मंगाते हैं?

काश! हम सुख को भी 

दुःख की तरह बाँट पाते।

दुःख को भी 

सुख की तरह चाह पाते। 

सच मानो तब 

अपने ही नहीं, 

औरों के भी आंसू पी पाते। 

आदमी से 

इंसान बनकर जी पाते। 


                                                

lalit nibandh : Alsaye din -Indira Pratap

ललित निबन्ध :

अलसाए दिन


इन्दिरा प्रताप 
*
                     
आए अलसाए दिन !

                    
पृथ्वी पर छाए ऋतुराज वसंत ने अपने पंख न जाने कब धीरे से समेट लिए हैं | शीत ऋतु की मंद शीतल समीर अनियंत्रित हो इधर उधर भटकती सी बह रही है | इसी के साथ झर रहे हैं वृक्षों के पीले पात , एक अलसाई बेचैनी से जैसे झरता हो मन का उल्लास ----- लो फिर हुआ ऋतु का परिवर्तन और आ गए दिन तन्द्रिल अलसाए | थिरकें अब कैसे ये दिन ,ये तो हैं ग्रीष्म के आतप से सहमें – सहमें ,बहके – बहके अलसाए – अलसाए | 

                    
वसंत 
अभी अपनी रंग – बिरंगी चूनर समेत भी नहीं पाया था कि पतझड़ की रुनझुन ने हौले से ग्रीष्म को गीत गा बुलाया | ऋतुओं का यह चक्र जिससे इस देश के लोगों के प्राण स्पंदित होते हैं भारतीय सांस्कृतिक , सामाजिक ,धार्मिक परंपरा को सनातनता प्रदान करता है | हर ऋतु का अपना एक अलग सौन्दर्य है इसी से यह भारतीय महाकाव्यों का एक विशिष्ट अंग बना | कोई भी भारतीय महाकाव्य ऋतु वर्णन के बिना अधूरा है |

                    
ऋतुओं के साथ यहाँ का प्राणी एकात्म भाव से जीता है ,उसका साहित्य,दर्शन उसके समस्त क्रिया – कलाप यहाँ तक कि उसकी सम्पूर्ण अस्मिता इन्ही ऋतुओं से प्रभावित होती है | प्रकृति और मनुष्य का ऐसा अटूट सम्बन्ध केवल यहाँ ही देखा जा सकता है |

                    
ग्रीष्म ऋतु का आगमन सूर्य के उत्तरायण होने के साथ ही माना जाता है | प्रकृति अपना रूप बदलने लगती है इसका अनूठा वर्णन हमें श्रीधर पाठक के इस सवैये में मिलता है ------

जेठ के दारुण आतप से , तप के जगती तल जावै जला ,
नभ मंडल छाया मरुस्थल सा ,दल बाँध के अंधड़ आवै चला ,
जलहीन जलाशय , व्याकुल हैं पशु – पक्षी , प्रचंड है भानु कला ,
किसी कानन कुञ्ज के धाम में प्यारे ,करै बिसीराम चलौ तो भला |

                    
ग्रीष्म का ऐसा सजीव चित्रण दुर्लभ ही मिलता है | सूर्य की तीव्र रश्मियों से तप्त धरती तवे के समान गर्म हो उठती है | आकाश मंडल भी विस्तृत मरुस्थल सा लगता है मानो समस्त ब्रह्माण्ड प्राणहीन हो मृत्यु की छाया में कहीं सो गया हो बस केवल धूल भरी आँधी का ही अस्तित्व चारों ओर दृष्टिगोचर होता है | सूर्य की प्रचंड किरणों से जल भी भाप बन उड़ गया है ,बचे हैं तो केवल जलहीन जलाशय और सूखी 
नदियाँ ,ऐसे में पशु पक्षी भी प्यास से व्याकुल हो थके – मांदे इधर – उधर घूम रहे हैं |

                    
प्रकृति का ऐसा रूप नायक – नायिका के मन में भी आलस्य भर देता है और वह भी किसी कुञ्ज में विश्राम करना चाहते हैं | फिर साधारण मनुष्यों की तो बात ही क्या | प्रकृति का ऐसा मृत सा रूप मनुष्यों के कार्य व्यापार पर भी असर डालता है शायद इसीलिए हमारे मनीषियों ने प्रकृति के विभिन्न रूपों को ईश्वर मानकर पूजा था, क्योंकि प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष रूप से प्रकृति ही हमारे जीवन का आधार है
, उसके बिना मानव जीवन संभव नहीं है | सूर्यस्य तेज : हमारी जीवनी शक्ति है | जल विकास है ,वायु प्राण है तो वनस्पति हमारा पोषण करती है |

                    
ग्रीष्म ऋतु में जल के अभाव में वनस्पति का मुरझाया रूप मनुष्यों को हतप्रभ और हत प्राण बना देता है ,ऐसे में सूर्य का प्रखर तेज रस विहीन हो पृथ्वी को अपनी ऊष्मा से जला देता है और हँसती, गाती, खिलखिलाती पृथ्वी शांत निश्चल सी अलसा जाती है ,लगता है जीवन की गति रुक गई हो पर जीवन तो बहने का नाम है, अविराम बिना रुके बह रही है और उसके साथ बह रहे हैं ग्रीष्म के अलसाए दिन – प्रतीक्षा में- 
कब आएँ आकाश में आषाढ़ के मेघ, -कब बरसे जल धार , कब सरसे हरे – भरे पात , कब जल पूरित हों ताल | सभी कुछ तो देन है ऋतुओं की भारत भू को |

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Gazal: anand pathak

ग़ज़ल :

चौक पे कन्दील जब ....
 
आनन्द पाठक,जयपुर
*
चौक पे कन्दील जब जलने लगी
तब सियासत मन ही मन डरने लगी
 
आदिलों की कुर्सियाँ ख़ामोश हैं
भीड़ ही अब फ़ैसला करने लगी
 
क़ातिलों की बात तो आई गई
कत्ल पे ही ’पुलिस’ शक करने लगी
 
ख़ून के रिश्ते फ़क़त पानी हुए
’मां’ भी बँटवारे में है बँटने लगी
 
जानता हूं ये चुनावी दौर है
फिर से सत्ता दम मिरा भरने लगी
 
तुम बुझाने तो गये थे आग ,पर
क्या किया जो आग फिर बढ़ने लगी
 
इस शहर का हाल क्या ’आनन’ कहूँ
क्या वहाँ भी धुन्ध सी घिरने लगी ?
 
चौक = India gate
आदिल = न्यायाधीश
 
 

sanskrit quote:

संस्कृत सुभाषित :


"एतेषु तरुणमारुत दूयमान 
 दावानलैः कवलितेषु महीरुहेषु।
 अम्भो न चेज्जलद नमुंचसि मा विमुंच
 वज्रं पुनः क्षिपसि निर्दय कस्य हेतो: ॥"

दावानल में जलाती वृक्ष, वायु भरपूर।
दे-मत दे जल, गिरा मत, बिजली बादल क्रूर!    

तेज़ हवा चलने से दावानल में वृक्ष जलते जा रहे हैं। उन पर पानी नहीं बरसाना हो तो न बरसा। किन्तु हे निर्दय बादल, तू उन पर बिजली किस हेतु गिरा रहा है?

आङ्ग्ल कविता विजय निकोर

English Poetry:


OF TRAILING PAIN

Vijay Nikore
*
Not long after we met
I had an ominous feeling
that it was not going to last
that we
             had to part ...

The child in me suspicious
and yet hoping against hope
as if
there will be a day
a miracle will show
and you will hurt me no more...
        waiting, waiting, ...waiting!

Yes, not long after we met
I knew
we had to go our separate ways,
but
        did you have to be so cruel? ...

Especially knowing
that there is a child in me?

               ------
                               .... Vijay Nikore

hindi story: doosara faisla - s.n.sharma 'kamal'

 कहानी :

                                                  ' दूसरा  फैसला '

एस. एन. शर्मा 'कमल'
*
         रायबरेली शहर से  सटे गाँव के एक साधारण परिवार में ममता  तीन बहनों में सबसे बड़ी थी । अपनी प्रतिभा व मेहनत के बल पर उसने  इसी वर्ष बी० ए० की परीक्षा पास की थी । पास के ही एक  मकान में उन्हीं दिनों एक युवा मास्टर किराये का एक कमरा ले कर रहने लगा था । धीरे-धीरे उसका  आना-जाना  ममता के  परिवार में होने लगा। कुछ समय वह  उसकी बहनों को पढ़ाने के बहाने वहाँ देर तक ठहरने लगा  और  ममता   से वार्तालाप में रूचि लेने लगा ।  उसने  परिवार की स्थिति भाँप ममता  को स्कूल में अध्यापिका की नौकरी लगवा देने का आश्वासन भी दे डाला। समीपता बढ़ने से मास्टर नवीन और ममता  के बीच अंतरंगता  पनपी और प्यार पेंगें मारने लगा।

        माँ-बाप को भनक लगी  तो उन्होंने नवीन का आना-जाना बंद  करा दिया पर इश्क का भूत जब सवार होता है तो सारा  विवेक और रोक-टोक धरी रह जाती है । पिता ने टंटा ख़त्म करने की  गरज से ममता की शादी पक्की कर  दी । आग में  घी पड़ा और एक दिन चुपके से दोनों भाग निकले । अपनी सीमित हैसियत के कारण उन  लोगों ने पुलिस में रिपोर्ट नहीं की व व्यक्तिगत स्तर पर थोड़ी बहुत खोजबीन के बाद मन मार कर  चुप बैठ गए । 

        ममता और नवीन दोनों इलाहाबाद जा कर रहने लगे । ममता नवीन पर शादी का जोर डालती रही  पर वह बहाने बनाता हुआ टालता रहा । नवीन ने कही अध्यापक की नौकरी करली । इसी   प्रकार लगभग छह  माह बीत गए। एक दिन जब  ममता  रसोई निपटा कर आराम करने बैठी ही थी कि  एक महिला साधारण सी मैली धोती पहने सर पर पल्ला डाले वहाँ आयी ।  उसने मनी  आर्डर फ़ार्म का एक तुड़ा मुडा  टुकड़ा ममता  की ओर बढ़ाते  हुए  पूछा- 

 ' ये यहाँ रहते हैं क्या ? ' 

        ममता ने पढ़ा तो पाया कि वह नवीन द्वारा चार-पांच माह पहले भेजे गए दो सौ रुपए के मनी  आर्डर की पावती का टुकड़ा था । ममता को कुछ खुटका हुआ और उत्सुकता भी पूछा-  'आप कौन हैं ?'

        वह कुछ हिचकते हुए बोली-  'ये मेरे पति हैं। शादी को एक साल हो गया।  वे शहर नौकरी के लिये गये तो अब  तक नहीं लौटे । कुछ महीने पहले यह पैसा भेजा था। अब माँ बहुत बीमार है  इसलिए उन्हें इस पते के बल पर ढूंढते यहाँ  आई हूँ ।'

        ममता के सामने सारा रहस्य प्रकट हो गया और उसके पैर तले से जमीन खिसक गयी। औरत की प्रश्नसूचक निगाहें ममता  पर टिकी हुई थीं । किसी प्रकार संयत हो कर ममता ने कहा-

        'हाँ बहन! वे यहीं  रहते हैं । आप बैठिये कहकर वह रसोई में गई और दो गिलास पानी पिया। फिर अगन्तुक के लिये एक प्लेट  में कुछ खुरमे और पानी लाकर बोली-

        'आप जलपान करें वे स्कूल से लौटते ही होंगे । '

        वह औरत बड़े पशोपेश में थी कुछ साफ़ साफ़ पूछने की हिम्मत नहीं हुई । दोनों के बीच अजीब सा सन्नाटा पसर गया । कुछ  देर बाद  नवीन ने दरवाजे से घुसते ही जो देखा उससे सन्न रह गया । पारा चढ़ गया बोला-

        'तुम यहाँ क्यों आई ?'

        वह  बोली- 'माँ बहुत बीमार हैं सो ढूंढती हुई यहाँ पहुँची हूँ । '

        नवीन ने  ममता की ओर  देखा जो एक ओर  चुप बैठी थी । कुछ बोलते  न  बना । वह  पत्नी को  कुछ उलटा-सीधा कहने लगा तभी  ममता  फट पड़ी- 
   
        'तुम इतने धूर्त होगे मैंने कभी कल्पना न की थी। अब चुपचाप पत्नी  के  साथ चले जाओ। '

        नवीन गुस्से में और जोर से बडबडाने लगा । ऊपर शोर सुन मकान मालकिन दौड़ी आयी। माजरा समझने के बाद उसने भी नवीन को खरी-खोटी सुनाई और कह दिया  तुम लोग अभी मकान खाली कर दो।नवीन को  वहाँ  से जाने में ही भलाई नजर आयी। ममता ने उसके साथ जाने से साफ़ इनकार कर दिया और वह पत्नी के साथ चुपचाप वहाँ से खिसक लिया । 

        नवीन के जाते ही ममता  फूट फूट कर रोने लगी । मकान मालकिन को दया आयी । वह उसे नीचे अपने कमरे में ले गई। वहाँ ममता ने रो-रो कर आप बीती उसे बता दी। मकान मालकिन ने उसे  समझाया कि वह वापस घर लौट जाए। ममता ने शंका जाहिर की कि घर में उसे शायद ही पनाह मिले। मालकिन ने आश्वस्त किया कि फिर मेरे पास आना कुछ जुगाड़ करूंगी।

        दूसरे  दिन ममता गाँव पहुँची तो पिता देखते ही उस पर बरस पड़े- 'अरी बेशरम! अब  यहाँ क्या मुंह ले कर लौटी है? कहीं डूब मरती । सारी बिरादरी और मोहल्ले में थुक्का-फजीहत करा चुकी यह न सोचा की दो बहनें और हैं उनका क्या होगा?'

       माँ ने कुछ बीच-बचाव की कोशिश की तो पिता ने साफ़ कह दिया- 'यह यहाँ नहीं रह सकती कहीं  भी  जाए, कहीं डूब मरे जा कर ।'

        ममता उलटे पाँव लौटपड़ी कि  अब वह जाकर संगम नगरी में डूब कर प्राण देगी।  रास्ते भर सोचती रही फिर उसने तय किया कि मरने से पहले एक बार मकान मालकिन से मिल ले जैसा  उसने कहा था। विचारों में उलझी वह मकान मालकिन  के पास पहुँची  और घर पर मिला व्यवहार बताया। मकान मालकिन सदय थी,  उसने  कहा- 'तुम यहाँ नहा धो लो भोजन करो,  देखो मैं तब तक कुछ जुगाड़  करती हूँ ।'

        मकान मालकिन ने अपनी पुरानी  सहेली इलाहाबाद की प्रसिद्ध अधिवक्ता करुणा सिंह को फोन मिलाकर उन्हें  ममता की आपबीती सुनाई । करुणा जी ने उन्हें शाम को ममता को साथ ला कर मिलने का समय दिया ।   

        निश्चित समय पर दोनों जा कर करुणा जी से मिले । सारा वृत्तांत सुन कर  करुणा जी ने कहा 'आप चाहें तो मुकदमा दायर कर अपने गुजारे के लिए भत्ता माँग सकती हैं।' ममता ने मुकदमा दायर कारने से इनकार कर दिया और अनुरोध किया कि  अगर उसके लिए कोई छोटी-मोटी नौकरी का प्रबंध हो सके तो भला । करुणा भांप चुकी थी  की लड़की शांत सरल और ईमानदार है।   उसने प्रस्ताव किया -

        'देखो बेटी मैं  यहाँ बिलकुल अकेली रहती हूँ।  पति का स्वर्गवास हुए पांच साल हो  गये, निःसंतान हूँ । तुम चाहो तो मेरे साथ रह कर घर के काम में हाथ बंटा सकती हो।' इस बीच हम तुम्हारी नौकरी के लिए भी  प्रयास करेंगे  । 

        ममता को यह सुझाव पसंद आया और उसने तुरंत स्वीकार कर लिया । तब से ममता वहाँ रहकर  अधिवक्ता के साथ काम में हाथ बँटाती उनकी कानून की  पुस्तकें  केस-फाइलें करीने से रखती और समय मिलता तो  उन्हें पढ़ती तथा कभी-कभी  तो करुणा जी से उन पर विचार  करती। करुणा ने यह देखा तो उन्हें लगा इसे ला-कालेज में भर्ती  करा कर वकील क्यों न  बनाया  जाए? बी० ए० तो  वह थी  ही सो ला-कालेज  में दाखिला  हो गया और ममता तन्मयता से पढ़ाई में जुट गई । उसने आनर्स के साथ परीक्षा पास की । अब वह करुणा जी के साथ वकालत भी करने लगी । शीघ्र ही उसकी प्रतिभा की ख्याति फैलने लगी और अधिवक्ता समुदाय में सबसे  योग्य सिद्धांत की पक्की और कानूनविद समझी  जाने लगी । 

           अधिवक्ता बने पाँच साल से अधिक समय बीत गया। उसकी प्रखर बुद्धि और क़ानून पर पकड़ से प्रभावित होकर सरकार  ने  उसे इलाहाबाद उच्च न्यालय का जज  बना दिया । करुणा जी को फिर भी वह अपना गुरु और आश्रयदाता का मान  देती रही और जब-तब पुरानी मकान मालकिन से भी मिलने जाती। सभी उसके स्वभाव से गदगद थे। समय मजे में गुजरने लगा। 

        एक दिन अदालत में उसके सामने एक मुकदमा पेश  हुआ जिसमें अपप्राधी को बलात्कार और नृशंस ह्त्या के अपराध में लोअर-कोर्ट से फांसी की सजा मिल चुकी थी। याचिका उच्च न्यायालय में पुनर्विचार हेतु प्रस्तुत हुई थी। अपराधी को कटघरे में ला खडा किया गया। यह क्या  यह तो वही नवीन-मास्टर था। फ़ाइल में नाम देखा और अवाक रह गई। नवीन की उस पर नजर  पडी तो लज्जा से गड़ गया और आँखें न मिला सका। सर झुकाए खड़ा रहा। कार्यवाही चलती रही। अगली पेशियाँ पड़ती रहीं।दोनों ओर के वकीलों की बहस हुई। सबूत पेश हुए। अंतिम पेशी पर बहस समाप्त हुई। जज ने अगले दो दिन बाद फैसला सुनाने  की तारीख दे दी ।  
  
        निवास पर पहुँचते ही उसे मकान मालकिन का फोन मिला कि वे उससे कुछ जरूरी वार्तालाप  करना चाहती हैं । वह तुरन्त  जाकर उनसे मिली। वहाँ नवीन की पत्नी और उसकी दो लड़कियाँ एक पांच साल, एक सात साल की पहले  से मौजूद थीं। उसने रोते-गिडगिडाते हुए  उससे दया की भीख मांगनी शुरू कर दी। मकान मालकिन ने भी सिफारिश की कि दो बच्चियों और परिवार की हालत देख कर नवीन पर रहम किया जाए। मालकिन ने बताया की उसने करुणा से भी फोन पर बात की पर उसने यह कह कर बीच में पड़ने से इनकार कर दिया कि मुकदमें पर वह किसी की  सिफारिश नहीं  सुनेगी। अस्तु, उसने सीधे ममता से ही बात करने का निर्णय लिया।  
    
        ममता बोली- 'बहन! न्याय की देवी की आँख पर पट्टी बँधी है। वहाँ मानवीय  संवेदना का कोई स्थान नहीं। परसों  फैसला सुनाने के  बाद  आप से फिर मिलूंगी। बात वहीं ख़त्म हो गयी। उन लोगों को फिर भी भरोसा था कि शायद कुछ रहम मिले। 

        नियत दिन जज ने  फैसला सुनाया कि सारे हालात, गवाहों के बयान  और  पोस्टमार्टम  रिपोर्ट के आधार पर अपराध असंदिग्द्ध रूप से सिद्ध  होता है । अतः, मुलजिम की फांसी की सजा का फैसला यह अदालत बरकरार रखते हुए दायर  याचिका खारिज करती है । 

        वायदे के अनुसार  शाम जब वह मकान मालकिन से मिली तो वे और वहाँ मौजूद नवीन का परिवार  उदास और बेहद दुखी था। ममता की आँख में भी  आंसू थे बोली-

        'बहन न्याय की कुर्सी पर बैठ कर पक्षपात करने और न्याय को धोखा देना मेरे लिये महापाप है। अस्तु, वहाँ क़ानून ने अपना फैसला सुनाया। मानवीय संवेदना के आधार पर मैं यहाँ अपना दूसरा फैसला लेकर आयी हूँ कि नवीन की पत्नी और उसकी दोनों पुत्रियों के पालन-पोषण का  भार  आज से मुझ पर होगा।'

        पत्नी और बच्चियों ने रोते-रोते ममता के पैर पकड़ उन पर मस्तक धर दिया । 

          
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सोमवार, 29 अप्रैल 2013


सम्भोग से समाधि तक



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संभोग
एक शब्द
या एक स्थिति
या कोई मंतव्य
विचारणीय है .........

सम + भोग
समान भोग हो जहाँ
अर्थात
बराबरी के स्तर पर उपयोग करना
अर्थात दो का होना
और फिर
समान स्तर पर समाहित होना
समान रूप से मिलन होना
भाव की समानीकृत अवस्था का होना
वो ही तो सम्भोग का सही अर्थ हुआ
फिर चाहे सृष्टि हो
वस्तु हो , मानव हो या दृष्टि हो
जहाँ भी दो का मिलन
वो ही सम्भोग की अवस्था हुयी

समाधि
सम + धी (बुद्धि )
समान हो जाये जहाँ बुद्धि
बुद्धि में कोई भेद न रहे
कोई दोष दृष्टि न हो
निर्विकारता का भाव जहाँ स्थित हो
बुद्धि शून्य में स्थित हो जाये
आस पास की घटित घटनाओं से उन्मुख हो जाये
अपना- पराया
मेरा -तेरा ,राग- द्वेष
अहंता ,ममता का
जहाँ निर्लेप हो
एक चित्त
एक मन
एक बुद्धि का जहाँ
स्तर समान हो
वो ही तो है समाधि की अवस्था

सम्भोग से समाधि कहना
कितना आसान है
जिसे सबने जाना सिर्फ
स्त्री पुरुष
या प्रकृति और पुरुष के सन्दर्भ में ही
उससे इतर
न देखना चाहा न जानना
गहन अर्थों की दीवारों को
भेदने के लिए जरूरी नहीं
शस्त्रों का ही प्रयोग किया जाए
कभी कभी कुछ शास्त्राध्ययन
भी जरूरी हो जाता है
कभी कभी कुछ अपने अन्दर
झांकना भी जरूरी हो जाता है
क्योंकि किवाड़ हमेशा अन्दर की ओर ही खुलते हैं
बशर्ते खोलने का प्रयास किया जाए

जब जीव का परमात्मा से मिलन हो जाये
या जब अपनी खोज संपूर्ण हो जाए
जहाँ मैं का लोप हो जाए
जब आत्मरति से परमात्म रति की और मुड जाए
या कहिये
जीव रुपी बीज को
उचित खाद पानी रुपी
परमात्म तत्व मिल जाए
और दोनों का मिलन हो जाए
वो ही तो सम्भोग है
वो ही तो मिलन है
और फिर उस मिलन से
जो सुगन्धित पुष्प खिले
और अपनी महक से
वातावरण को सुवासित कर जाए
या कहिये
जब सम्भोग अर्थात
मिलन हो जाये
तब मैं और तू का ना भान रहे
एक अनिर्वचनीय सुख में तल्लीन हो जाए
आत्म तत्व को भी भूल जाए
बस आनंद के सागर में सराबोर हो जाए
वो ही तो समाधि की स्थिति है
जीव और ब्रह्म का सम्भोग से समाधि तक का
तात्विक अर्थ तो
यही है
यही है
यही है

काया के माया रुपी वस्त्र को हटाना
आत्मा का आत्मा से मिलन
एकीकृत होकर
काया को विस्मृत करने की प्रक्रिया
और अपनी दृष्टि का विलास ,विस्तार ही तो
वास्तविक सम्भोग से समाधि तक की अवस्था है
मगर आम जन तो
अर्थ का अनर्थ करता है
बस स्त्री और पुरुष
या प्रकृति और पुरुष की दृष्टि से ही
सम्भोग और समाधि को देखता है
जबकि दृष्टि के बदलते
बदलती सृष्टि ही
सम्भोग से समाधि की अवस्था है

ब्रह्म और जीव का परस्पर मिलन
और आनंद के महासागर में
स्वयं का लोप कर देना ही
सम्भोग से समाधि की अवस्था है
गर देह के गणित से ऊपर उठ सको
तो करना प्रयास
सम्भोग से समाधि की अवस्था तक पहुंचने का
तन के साथ मन का मोक्ष
यही है
यही है
यही है

जब धर्म जाति , मैं , स्त्री पुरुष
या आत्म तत्व का भान मिट जाएगा
सिर्फ आनंद ही आनंद रह जायेगा
वो ही सम्भोग से समाधि की अवस्था हुयी

जीव रुपी यमुना का
ब्रह्म रुपी गंगा के साथ
सम्भोग उर्फ़ संगम होने पर
सरस्वती में लय हो जाना ही
आनंद या समाधि है
और यही
जीव , ब्रह्म और आनंद की
त्रिवेणी का संगम ही तो
शीतलता है
मुक्ति है
मोक्ष है


सम्भोग से समाधि तक के
अर्थ बहुत गहन हैं
सूक्ष्म हैं
मगर हम मानव
न उन अर्थों को समझ पाते हैं
और सम्भोग को सिर्फ
वासनात्मक दृष्टि से ही देखते हैं
जबकि सम्भोग तो
वो उच्च स्तरीय अवस्था है
जहाँ न वासना का प्रवेश हो सकता है
गर कभी खंगालोगे ग्रंथों को
सुनोगे ऋषियों मुनियों की वाणी को
करोगे तर्क वितर्क
तभी तो जानोगे इन लफ़्ज़ों के वास्तविक अर्थ
यूं ही गुरुकुल या पाठशालाएं नहीं हुआ करतीं
गहन प्रश्नो को बूझने के लिए
सूत्र लगाये जाते हैं जैसे
वैसे ही गहन अर्थों को समझने के लिए
जीवन की पाठशाला में अध्यात्मिक प्रवेश जरूरी होता है
तभी तो सूत्र का सही प्रतिपादन होता है
और मुक्ति का द्वार खुलता है
यूँ ही नहीं सम्भोग से समाधि तक कहना आसान होता है


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doha chhand men yamak alankar : sanjiv 'salil'

अभिनव प्रयोग: 

शब्द-शब्द दोहा यमक :

संजीव 
*
भिन्न अर्थ में शब्द का, जब होता दोहराव।

अलंकार हो तब यमक, हो न अर्थ खनकाव।।
*
दाम न दामन का लगा, होता पाक पवित्र।

सुर नर असुर सभी पले, इसमें सत्य विचित्र।।
*
लड़के लड़ के माँगते हक, न करें कर्त्तव्य।

माता-पिता मना रहे, उज्जवल हो भवितव्य।।
*
तीर नजर के चीरकर, चीर न पाए चीर।

दिल सागर के तीर पर, गिरे न खोना धीर।।
*
चाट रहे हैं उंगलियाँ, जी भर खाकर चाट।

खाट खड़ी हो गयी पा, खटमलवाली खाट।।
*
मन मथुरा तन द्वारका, नहीं द्वार का काम।

क्या जाने कब प्रगट हों, जीवन धन घनश्याम।।
*
खैर जान की मांगतीं, मातु जानकी मौन।

वनादेश दे अवधपति, मरे जिलाए कौन?

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bahar aur chhand : PRAN SHARMA



बहर और छंद [उर्दू ग़ज़ल बनाम हिंदी ग़ज़ल]

  प्राण शर्मा





जिस काव्य में वर्ण और मात्रा की गणना के अनुसार विराम, तुक आदि के नियम हों, वह छंद है। काव्य के लिए छंद उतना ही अनिवार्य है जितना भवन के निर्माण के लिए गारा पानी। चोली दामन का संबंध है दोनों में। यह अलग बात है कि आजकल अनेक कवियों की ऐसी जमात है जो इसकी अनिवार्यता को गौण समझती है। भले ही कोई छंद को महत्व न दे किन्तु इस बात को झुठलाया नहीं जा सकता कि इसके प्रयोग से शब्दों में, पंक्तियों में संगीत का अलौकिक रसयुक्त निर्झर बहने लगता है। सुर-लय छंद ही उत्पन्न करता है, गद्य नहीं। गद्य में पद्य हो तो उसके सौंदर्य में चार चाँद लग जाते हैं किंतु पद्य में गद्य हो तो उसका सौंदर्य कितना फीका लगता है, इस बात को काव्य-प्रेमी भली-भांति जानता है।



छंद के महत्व के बारे में कविवर रामधारीसिंह 'दिनकर' के विचार पठनीय हैं "छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे।" (हिंदी कविता और छंद)


छंद-स्पंदन समग्र सृष्टि में व्याप्त है। कला ही नहीं जीवन की प्रत्येक शिरा में यह स्पंदन एक नियम से चल रहा है। सूर्य, चंद्र गृहमंडल और विश्व की प्रगति मात्र में एक लय है जो समय की ताल पर यति लेती हुई अपना काम कर रही है। ऐसा लगता है कि सृष्टि के उस छंद-स्पंदनयुक्त आवेग की पहली मानवीय अभिव्यक्ति कविता और संगीत थे। - रामधारी सिंह ’दिनकर’


प्रथम छंदकार पिंगल ऋषि थे। उन्होंने छंद की कल्पना (रचना) कब की थी, इतिहास इस बारे में मौन है। किन्तु छंद उनके नाम से ऐसा जुड़ा कि वह उनके नाम का पर्याय बन गया। खलील-बिन-अहमद जो आठवीं सदी में ओमान में जन्मे थे; के अरूज़ छंद की खोज के बारे में कई जन श्रुतियां है। उनमें से एक है कि उन्होंने मक्का में खुदा से दुआ की कि उनको अद्भुत विद्या प्राप्त हो। क्योंकि उन्होंने दुआ सच्चे दिल से की थी, इसलिए वह कबूल की गई। एक दिन उन्होंने धोबी की दुकान से 'छुआ-छु, छुआ-छु’ की मधुर ध्वनि सुनी। उस मधुर ध्वनि से उन्होंने अरूज़ की विधि को ढूँढ निकाला। अरबी-फ़ारसी में इन्कलाब आ गया। वह पंद्रह बहरें खोजने में कामयाब हुए। उनके नाम हैं- हजज, रजज, रमल, कामिल, मुनसिरह, मुतकारिब, सरीअ, मुजारह, मुक़्तजब, मुदीद, रूफ़ीफ़, मुज़तस, बसीत, बाफ़िर और तबील। चार बहरें- मुतदारिक, करीब, मुशाकिल और ज़दीद कई सालों के बाद अबुल हसीन ने खोजी। हिंदी में असंख्य छंद है। प्रसिद्ध हैं - दोहा, चौपाई, सोरठा, ऊलाल, कुंडिलया, बरवै, कवित्त, रोला, सवैया, मालती, मालिनी, गीतिका, छप्पय, सारंग, राधिका, आर्या, भुजंगप्रयात, मत्तगयंद आदि।



राग-रागनियाँ भी छंद हैं। यहाँ यह बतलाना आवश्यक हो जाता है कि उर्दू अरू़ज में वर्णिक छंद ही होते हैं जबकि हिंदी में वर्णिक छंद के अतिरक्त मात्रिक छंद भी। वर्णिक छंद गणों द्वारा निर्धारित किए जाते हैं और मात्रिक छंद मात्राओं द्वारा।



गणों को उर्दू में अरकान कहते हैं। गण या अरकान लघु और गुरु वर्णों के मेल से बनते हैं। लघु वर्ण का चिह्न है - । (एक मात्रा) और गुरु वर्ण का- २ (दो मात्राएं) जैसे क्रमशः 'कि' और 'की'। गण आठ हैं- मगण (२२२), भगण (२।।), जगण (।२।) सगण(।।२) नगण (।।।) यगण (।२२) रगण (२।२) और तगण (२२।)।



उर्दू में दस अरकान हैं- फऊलन (।२।।), फाइलुन (२।-।।), मु़फाइलुन (12211), फाइलातुन (21211), मुसतफइलुन (1111111), मुतफाइलुन (112111), मफ़ाइलुन (।२।-।।।), फ़ाअलातुन ( २-।।), मफ़ऊलान (11221) और मसतफअलुन (।।।।-।-।।)। 


शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है।



"प्रथम दो अरकान - फऊलन क्रमश "सवेरा" या "संवरना" तथा "जागना" या "जागरण" पाँच मात्राओं के शब्दों के वज़नों में आते हैं और शेष आठ अरकान सात मात्राओं के शब्दों के वज़नों में; जैसे-सवेरा है, जागना है। ये गण और अरकान शेर में वज़न कैसे निर्धारित करते हैं इसको समझना आवश्यक है। हिन्दी में एकछंद ’भुजंग प्रयात’ की पंक्ति यूँ होगी- वर्णिक छंद है- भुजंग प्रयात। इसमें चार यगण आते हैं। हर यगण में पहले लघु और फिर दो गुरु होते हैं यानी- (१२२)। लघु की एक मात्रा होती है और गुरु की दो मात्राएँ होती हैं। चार यगणों के 

सवेरे सवेरे कहाँ जा रहे हो
१२२ १२२ १ २ २ १२ २
इन मात्राओं का जोड़ है =२०
लेकिन वर्णों का जोड़ है =१२



उर्दू में इस छंद को मुतकारिब कहते हैं लेकिन मुतकारिब और भुजंग प्रयात में थोड़ा अन्तर है। भुजंग प्रयात की प्रत्येक पंक्ति में वर्णों की संख्या १२ है और मात्राओं की २० लेकिन उर्दू मुतकारिब में वर्णों की संख्या १८ या २० भी हो सकती है। मसलन-

इधर से उधर तक ,उधर से इधर तक -१८
या
इधर चल उधर चल ,उधर इधर चल - २०



यूँ तो उर्दू के छंद वर्णिक कहलाते हैं लेकिन ठहरते हैं मात्रिक ही। क्योंकि एक गुरु के स्थान पर दो लघु भी आ सकते हैं उसमें।



क्योंकि उर्दू गज़ल फ़ारसी से और हिन्दी गज़ल उर्दू से आई है, इसलिये फ़ारसी और उर्दू अरूज़ का प्रभाव हिन्दी गज़ल पर पड़ना स्वाभाविक था। इसके प्रभाव से भारतेंदु हरिश्चंद्र, नथुराम शर्मा शंकर, राम नरेश त्रिपाठी, सूर्यकान्त त्रिपाठी निराला आदि कवि भी अछूते नहीं रह सके। रामनरेश त्रिपाठी ने तो हिंदी-उर्दू छंदों व उससे संबद्ध विषयों पर 'काव्यकौमुदी' पुस्तक लिखकर अभूतपूर्व कार्य किया। कविवर शंकर और निराला के छंद के क्षेत्र में किए गए कार्यों के बारे में दिनकर जी लिखते हैं- 'हिन्दी कविता में छंदों के संबंध में शंकर की श्रुति-चेतना बड़ी ही सजीव थी। उन्होंने कितने ही हिंदी-उर्दू के छंदों के मिश्रण से नए छंद निकाले। अपनी लय-चेतना के बल पर बढ़ते हुए निराला ने तमाम हिंदी उर्दू-छंदों को ढूँढ डाला है और कितने ही ऐसे छंद रचे जो नवयुग की भावाभिव्यंजना के लिए बहुत समर्थ है। (हिन्दी कविता और छंद)



उस काल में एक ऐसे महान व्यक्ति का अवतरण हुआ जो अपने क्रांतिकारी व्यक्तित्व और प्रेरक कृतित्व से अन्यों के लिए अनुकरणीय बना। हिंदी और उर्दू के असंख्य कालजयी अशआर के रचयिता व छंद अरूज़ के ज्ञाता पं रामप्रसाद बिस्मिल के नाम को कौन विस्मरण कर सकता है? मन की गहराइयों तक उतरते हुए उनके अशआर की बानगी तथा बहरों की बानगी देखिए-

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है
देखना है ज़ोर कितना बाजुए कातिल में है। 


जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए। - मदनलाल वर्मा 'क्रांत'


शहीदों की चिताओं पर जुड़ेंगे हर बरस मेले

वतन पर मरने वालों का यही बाकी निशाँ होगा



वतन की गम शुमारी का कोई सामान पैदा कर

जिगर में जोश, दिल में दर्द, तन में जान पैदा कर



नए पौधे उगें, शाखें फलें-फूलें सभी बिस्मिल

घटा से प्रेम का अमृत अगर बरसे तो यूँ बरसे



मुझे हो प्रेम हिंदी से, पढूँ हिंदी, लिखूँ हिंदी

चलन हिंदी चलूँ, हिंदी पहनना ओढ़ना खाना



मदनलाल वर्मा 'क्रांत' ने 'सरफ़रोशी की तमन्ना' पुस्तक मे ठीक ही लिखा है, "जैसे कि गालिब के बारे में कहा जाता है कि 'गालिब का है अंदाज़-ए-बयाँ और' ठीक वैसे ही 'बिस्मिल' के बारे में भी यह कहा जा सकता है कि 'बिस्मिल' का भी अंदाजे-बयाँ शायरी के मामले में बेजोड़ है, उनका कोई सानी नहीं मिलता है। उनकी रचनाओं का प्रभाव अवश्य ही मिलता है; उन तमाम समकालीन शायरों पर जो उस ज़माने में इश्क-विश्क की कविताएं लिखना छोड़कर राष्ट्रभक्ति से ओत-प्रोत रचनाएं लिखने लगे थे। कितनी विचित्र बात है कि बिस्मिल के कुछ एक शेर तो ज्यों के त्यों अन्य शायरों ने भी अपना लिए और वे उनके नाम से मशहूर हो गए।"



शंकर, निराला, त्रिपाठी, बिस्मिल तथा अन्य कवि शायर छंदों की लय-ताल में जीते थे एवं उनको नित नई गति देते थे, किन्तु अब समस्या यह है कि अपने आप को उत्तम गज़लकार कहने वाले वतर्मान पीढ़ी के कई कवि छंद विधान को समझने में दिलचस्पी नहीं दिखाते हैं, उससे कतराते हैं। वे यह भूल जाते हैं कि भवन की भव्यता उसके अद्वितीय शिल्प से आँकी जाती है। कुछ साल पहले मुझको दिल्ली में एक कवि मिले जो गज़ल लिखने का नया-नया शौक पाल रहे थे। उनके एक-आध शेर में मैंने छंद-दोष पाया और उनको छंद अभ्यास करने की सलाह दी। वह बोले कि वह जनता के लिए लिखते हैं, जनता की परवाह करते हैं; छंद-वंद की नहीं। मैं मन ही मन हँसा कि यदि वह छंद-वंद की परवाह नहीं करते हैं तो क्या गज़ल लिखना ज़रूरी है उनका? गज़ल का मतलब है छंद की बंदिश को मानना, उसमें निपुण होना। गज़ल की इस बंदिश से नावाकिफ़ को उर्दू में खदेड़ दिया जाता है। मुझको एक वाक्या याद आता हैं। एक मुशायरे में एक शायर के कुछ एक अशआर पर जोश मलीहाबादी ने ऊँचे स्वर में बार-बार दाद दी। कुँवर महेन्द्र सिंह बेदी (जो उनके पास ही बैठे थे) ने उनको अपनी कुहनी मार कर कहा- 'जोश साहिब क्या कर रहे हैं आप? बेवज़्न अशआर पर दाद दे रहे हैं आप? कयामत मत ढाइए।' जोश साहिब जवाब में बोले- 'भाई मेरे दाद का ढंग तो देखिए।'



आधुनिक काव्य के लिए छंद भले ही अनिवार्य न समझा जाए किन्तु गज़ल के लिए है। इसके बिना तो गज़ल की कल्पना ही नहीं की जा सकती है। लेकिन हिंदी के कुछ ऐसे गज़लकार हैं जो छंदों से अनभिज्ञ हैं और कुछ ऐसे भी हैं जो उनसे भिज्ञ होते हुए भी अनभिज्ञ लगते हैं।