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बुधवार, 30 जुलाई 2014

doha salila: teej sanjiv

दोहा सलिलाः
संजीव
*
नेह वॄष्टि नभ ने करी, धरा-मन गया भींज
हरियायी भू लाज से, 'सलिल' मन गयी तीज
*
हिना सजी ले हथेली, हरी चूड़ियाँ संग
हरी चुनरिया ने हरी, शान्ति पिया मन दंग
*
तंग गली है प्रीति की, तंग प्रियतमा भाग
आँखें चार न हो कहें, जो न कहा अनुराग
*

राष्ट्र्भाषा हिन्दी

समाचारः बाड़्मेर में अखिल भारतीय राजस्थानी भाषा मान्यता समिति की बैठक में राजस्थानी को हिंदी से अधिक पुरानी भाषा होने के आधार पर राष्ट्र्भाषा बनाने की माँग की गयी है. मेरा नजरिया निम्न है. आप भी अपनी बात कहें-

१. राजस्थानी, कन्नौजी, बॄज, अवधी, मगही, भोजपुरी, अंगिका, बज्जिका और अन्य शताधिक भाषायें आधुनिक हिंदी के पहले प्रचलित रही हैं. क्या इन सबको राष्ट्र्भाषा बनाया जा सकता है?
२. राजस्थानी कौन सी भाषा है? राजस्थान में मारवाड़ी, मेवाड़ी, शेखावाटी, हाड़ौती आदि सौ से अधिक भाषायें बोली जा रही हैं. क्या इन सबका मिश्रित रूप राजस्थानी है?
३. हिंदी ने कभी किसी भाषा का विरोध नहीं किया. अंग्रेजी का भी नहीं. हिन्दी की अपनी विशेषतायें हैं. राजस्थानी को हिंदी का स्थान दिया जाए तो क्या देश के अन्य राज्य उसे मान लेंगे? क्या विश्व स्तर पर राजस्थानी भारत की भाषा के तौर पर स्वीकार्य होगी?
जैसे घर में दादी सास, चाची सास, सास आदि के रहने पर भी बहू अधिक सक्रिय होती है वैसे ही हिन्दी अपने पहले की सब भाषाओं का सम्मान करते हुए भी व्यवहार में अधिक लायी जा रही है.
४. निस्संदेह हिन्दी ने शब्द संपदा सभी पूर्व भाषाओं से ग्रहण की
है.
५. आज आवश्यकता हिन्दी में सभी भाषाओं के साहित्य को जोड़्ने की है.
६. म. गांधी ने क्रमशः भारत की सभी भाषाओं को देवनागरी में लिखे जाने का सुझाव दिया था. राजनीतिक स्वार्थों ने उनके निधन की बाद ऐसा नहीं होने दिया और भाषाई विवाद पैदा किये. अब भी ऐसा हो सके तो सभी भारतीय भाषायें संस्कृत की प्रृष्ठ भूमि और समान शब्द संपदा के कारण समझी जा सकेंगी.

ईद मुबारक

द्विपदियाँ

संजीव

*

जब समय के पार झाँकें, नयन तब देखें अदेखा
तुम न जानो ग्रह बतायें, कहाँ कैसी भाग्य रेखा?
*
चाँद जब उसको कहा, रूठ गयी वह मुझसे
दाग चेहरे पे नहीं मेरे, मैं न नेता हूँ..
*
चाँद से जब भी मिले, रजनी पूर्णिमा हो तभी
सफर का अन्त ही, शुरुआत नयी होती है.
*
जात मजहब धर्म बोली, चाँद अपनी कह जरा
पुज रहा तू ईद में भी, संग करवा चौथ के.
*
चाँद तनहा है ईद हो कैसे? चाँदनी उसकी मीत हो कैसे??
मेघ छाये घने दहेजों के, रेप पर उसकी जीत हो कैसे??
*
एक मुक्तक
कोशिशें करती रहो, बात बन ही जायेगी
जिन्दगी आज नहीं, कल तो मुस्कुरायेगी
हारते जो नहीं गिरने से, वो ही चल पाते-
मंजिलें आज नहीं कल तो रास आयेंगी.
*
संकलितः ईद मुबारक
रात कल ख्वाब में मुझको तेरी दीद हुई
ईद हो या कि ना हो ,मेरे लिए ईद हुई .
*
कमाल-ऐ-ज़ब्त मोहब्बत इसी को कहते है,
चाँद दिख भी गया और हम उसे अपना न कह सके.
*
जिनका चाँद वक़्त के आसमां में खो गया
उनके हाथों पे भी कभी कोई ईद रख ज़रा -अशोक जमनानी
*
ईद की सबको मुबारक ईद का त्योंहार है,
दोस्तों और दुश्मनों में आज देखो प्यार है,
ईद की पुरज़ोर ख़ुशियों का ये मंज़र देखिये,
हिन्दू-मुस्लिम एक हैं हाइल कहाँ दीवार है -नासिर ज़ैदी
*

साल भर के बाद आया दिन मुबारक ईद का,
भर के खुशियाँ साथ लाया दिन मुबारक ईद का। -प्रो. सरन घई
*
ईद वालों को ईद मुबारक, तीज वालों को तीज मुबारक
प्यार से नफरत हारे यादव', रोप दें ऐसे बीज मुबारक -रघुविन्द्र यादव
*
ईद मुबारक हो हर हाल मुबारक हो.
खुशियों से भरे झोली हर साल मुबारक हो| -प्रभुदयाल श्रीवस्तव
*
आज बधायां ईद री, सावण तीज सुहाय.
रळमिल रैवां माेकळा, रूं- रूं खिलताै जाय..- दीनदयाल शर्मा
*
छाेड़ पुरानी रंजिशें, ईद मनाएं साथ.
गले लगा ले आज ताे,सिर्फ मिला मत हाथ..- विजेन्द्र
*

ईद

एक मुक्तक
संजीव
*
कोशिशें करते रहो, बात बन ही जायेगी
जिन्दगी आज नहीं, कल तो मुस्कुरायेगी
हारते जो नहीं गिरने से, वो ही चल पाते-
मंजिलें आज नहीं कल तो रास आयेंगी.
***
दो द्विपदियाँ
जात मजहब धर्म बोली, चाँद अपनी कह जरा
पुज रहा तू ईद में भी, संग करवा चौथ के.
*
चाँद तनहा है ईद हो कैसे? चाँदनी उसकी मीत हो कैसे??
मेघ छाये घने दहेजों के, रेप पर उसकी जीत हो कैसे??
*

सोमवार, 28 जुलाई 2014

नजरिया अपना अपना

नजरिया अपना अपना
*
नन्दिता मेहता

मंजिल की मुझको तलब नहीं
मुझे रास्तों से ही प्यार है
न कुबूल मुझको वो ज़िन्दगी
जिसके सफ़र का सिरा भी है
*
संजीव वर्मा 'सलिल'

रास्तों से न प्यार कर, 
जाते कहीं न रास्ते
करते सफर पग तय सदा, 
बस मंजिलों के वास्ते.
***

चौपाल चर्चाः जाति और कायस्थ -्संजीव

चौपाल चर्चाः
अनुगूँजा सिन्हाः मैं आपके प्रति पूरे सम्मान के साथ आपको एक बात बताना चाहती हूँ कि मैं जाति में यकीन नही रखती हूँ और मैं कायस्थ नहीं हूँ।

अनुगून्जा जी! 
आपसे सविनय निवेदन है कि- 
'जात' क्रिया (जना/जाया=जन्म दिया, जाया=जगजननी का एक नाम) से आशय 'जन्मना' होता है, जन्म देने की क्रिया को 'जातक कर्म', जन्म लिये बच्चे को 'जातक', जन्म देनेवाली को 'जच्चा' कह्ते हैं. जन्मे बच्चे के गुण-अवगुण उसकी जाति निर्धारित करते हैं. बुद्ध की जातक कथाओं में विविध योनियों में जन्म लिये बुद्ध के ईश्वरत्व की चर्चा है. जाति जन्मना नहीं कर्मणा होती है. जब कोई सज्जन दिखनेवाला व्यक्ति कुछ निम्न हर्कात कर दे तो बुंदेली में एक लोकोक्ति कही जाती है ' जात दिखा गया'. यहाँ भी जात का अर्थ उसकी असलियत या सच्चाई से है.सामान्यतः समान जाति का अर्थ समान गुणों, योग्यता या अभिरुचि से है.
आप ही नहीं हर जीव कायस्थ है. पुराणकार के अनुसार "कायास्थितः सः कायस्थः"
अर्थात वह (निराकार परम्ब्रम्ह) जब किसी काया का निर्माण कर अपने अन्शरूप (आत्मा) से उसमें स्थित होता है, तब कायस्थ कहा जाता है. व्यावहारिक अर्थ में जो इस सत्य को जानते-मानते हैं वे खुद को कायस्थ कहने लगे, शेष कायस्थ होते हुए भी खुद को अन्य जाति का कहते रहे. दुर्भाग्य से लंबे आपदा काल में कायस्थ भी इस सच को भूल गये या आचरण में नहीं ला सके. कंकर-कंकर में शंकर, कण-कण में भगवान, आत्मा सो परमात्मा आदि इसी सत्य की घोषणा करते हैं.
जातिवाद का वास्तविक अर्थ अपने गुणों-ग्यान आदि अन्यों को सिखाना है ताकि वह भी समान योग्यता या जाति का हो सके. समय और परिस्थितियों ने शब्दों के अर्थ भुला दिये, अर्थ का अनर्थ अज्ञानता के दौर में हुआ. अब ज्ञान सुलभ है, हम शब्दों को सही अर्थ में प्रयोग करें तो समरसता स्थापित करने में सहायक होंगे। दुर्भाग्य से जन प्रतिनिधि इसमें बाधक और दलीय स्वार्थों के साधक है. 

शुक्रवार, 25 जुलाई 2014

aawhaan gaan: sanjiv

आव्हान गान संजीव * जागो, जागो, जागो रे!
कायस्थों अब जागो रे!!
हम खुद से ही हारे हैं
अब मिल निज हक माँगो रे!!....
*
बारह रहो न, एक बनो
खूब मेहनती, नेक बनो.
जमा रखो धरती पर पैर
आसमान को फिर छू लो.
मिले मार्ग में जो बाधा
उससे डर मत भागो रे!!...
*
जो चाहोगे, पा सकते,
गीत शौर्य के गा सकते.
कोई हरा न पायेगा
हँस मंजिल तक जा सकते.
सूर्य, चंद्र्मा तारों को
ला आँगन में टाँगो रे!!...
*
चित्रगुप्त प्रभु जी संदेश,
कार्य न कोई छोटा लेश.
हर भाषा-विद्या सीखो
पहुँच शीर्ष पर हँसो हमेश.
कर्म कुशलता का झंडा
सब दुनिया पर गाड़ो रे!!...
*

दोह सलिलाः -संजीव

दोहा सलिलाः
संजीव
*
प्राची पर आभा दिखी, हुआ तिमिर का अन्त
अन्तर्मन जागृत करें, सन्त बन सकें सन्त
*
आशा पर आकाश टंगा है, कहते हैं सब लोग
आशा जीवन श्वास है, ईश्वर हो न वियोग
*
जो न उषा को चाह्ता, उसके फूटे भाग
कौन सुबह आकर कहे, उससे जल्दी जाग
*
लाल-गुलाबी जब दिखें, मनुआ प्राची-गाल
सेज छोड़कर नमन कर, फेर कर्म की माल
*

गाल टमाटर की तरह, अब न बोलना आप
प्रेयसि के नखरे बढ़ें, प्रेमी पाये शाप.

*
प्याज कुमारी से करे, युवा टमाटर प्यार
किसके ज्यादा भाव हैं?, हुई मुई तकरार
*


बुधवार, 23 जुलाई 2014

achchhe din: bhagwant maan

आम आदमी पार्टी के सांसद भगवंत मान की संसद में सुनाई गई कविता :
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पहले किराया बढ़ाया रेल का,
फिर नम्बर आया तेल का
खुद ही दस साल करते रहे नुक्ता-चीनी,
आते ही 2 रुपये किलो महंगी कर दी चीनी
हर कोई सपने दिखाकर 
आम आदमी को ठग रहा है,
आम लोगों को डर अब चीन से नहीं, 
चीनी से लग रहा है
दुनिया मून पर,
सरकार हनीमून पर
पूछ रहे पूरे देश के चाय वाले हैं,
महंगाई की वज़ह से 
खाली चाय के प्याले हैं
लोगों को तो बस 
दो वक्त की रोटी के लाले हैं
सरकार जी बता दीजिये - 
अच्छे दिन कब आने वाले हैं?

शायद पता नहीं है कि 
ईराक है किस इलाके में
भारतीय ईराक में फंसे हैं 
विदेश मंत्री सुषमा जी गईं थीं ढाके में
बंगला देश को ये विदेश मंत्रालय 
क्या दस दिन बाद नहीं जा सकता था ?
क्या कंधार की तर्ज़ पर  
विदेश मंत्री का जहाज बगदाद नहीं जा सकता था
हमारे देश के लोग बहुत हिम्मत वाले हैं
जिन्होंने इस महंगाई के दौर में भी बच्चे पाले हैं
लूटने वाले ज़्यादा, 
बस गिनती के रखवाले हैं
प्लीज़ सरकार जी बता दीजिये- 
अच्छे दिन कब आने वाले हैं ?

मेरे सपने में 
कल रात बुलेट ट्रेन आई,
मैंने कहा: 'जी बधाई हो बधाई !
सुना है तुम मेरे देश आ रही हो ?
मेरे देश की तरक्की की स्पीड बढ़ा रही हो ?
बुलेट ट्रेन बोली- 
मेरा शिकवा किसी गाय या भैंस से नहीं
अरे! मैं बिजली से चलती हूँ, 
गोबर गैस से नहीं.
प्रधानमंत्री मोदी जी के भाषण, 
लोगों को खूब जंचे हैं
एक ही राहत की बात है 
कि विदेशों से काला धन वापस आने में 
मात्र 50 दिन बचे हैं
हम तो आम आदमी पार्टी वाले हैं
हमने तो हर सरकार से डण्डॆ खाले हैं
हमने तो सड़कों पर और पार्लियामेंट में
ये पूछने के लिए ही मोर्चे सम्हाले हैं
कि अ..च्छे दि..न क..ब आ..ने वा..ले हैं?
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mahabharat kaal ka vimaan : sanjiv

५००० साल पुराना महाभारतकालीन विमान !अफगानिस्तान में 


रामायन और रामचरित मानस में पुष्पक विमान का उल्लेख है महाभारत का में अदृश्य होने और भस्म होने के कई प्रसंग हैं  हाल ही में एक सनसनीखेज जानकारी सामने आई है। इसके मुताबिक अफगानिस्तान में एक ५००० साल पुराना विमान मिला है, जिसके बारे में कहा जा रहा है कि यह महाभारतकालीन हो सकता है।
 
वायर्ड डॉट कॉम की एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि प्राचीन भारत के पांच हजार वर्ष पुराने एक विमान को हाल ही में अफ‍गानिस्तान की एक गुफा में पाया गया है। कहा जाता है कि यह विमान एक 'टाइम वेल' में फंसा हुआ है अथवा इसके कारण सुरक्षित बना हुआ है। यहां इस बात का उल्लेख करना समुचित होगा कि 'टाइम वेल' इलेक्ट्रोमैग्नेटिक शॉकवेव्‍स से सुरक्षित क्षेत्र होता है और इस कारण से इस विमान के पास जाने की चेष्टा करने वाला कोई भी व्यक्ति इसके प्रभाव के कारण गायब या अदृश्य हो जाता है।
कहा जा रहा है कि यह विमान महाभारत काल का है और इसके आकार-प्रकार का विवरण महाभारत और अन्य प्राचीन ग्रंथों में‍ किया गया है। इस कारण से इसे गुफा से निकालने की कोशिश करने वाले कई सील कमांडो गायब हो गए हैं या फिर मारे गए हैं। रशियन फॉरेन इंटेलिजेंस सर्विज (एसवीआर) का कहना है कि यह महाभारत कालीन विमान है और जब इसका इंजन शुरू होता है तो इससे बहुत सारा प्रकाश ‍निकलता है। इस एजेंसी ने २१ दिसंबर २०१० को इस आशय की रिपोर्ट अपनी सरकार को पेश की थी।
घातक हथियार भी लगे हैं इस विमान में..
रूसी रिपोर्ट में यह भी कहा गया है कि इस विमान में चार मजबूत पहिए लगे हुए हैं और यह प्रज्जवलन हथियारों से सुसज्जित है। इसके द्वारा अन्य घातक हथियारों का भी इस्तेमाल किया जाता है और जब इन्हें किसी लक्ष्य पर केन्द्रित कर प्रक्षेपित किया जाता है तो ये अपनी शक्ति के साथ लक्ष्य को भस्म कर देते हैं।
ऐसा माना जा रहा है कि यह प्रागेतिहासिक मिसाइलों से संबंधित विवरण है। अमेरिकी सेना के वैज्ञानिकों का भी कहना है कि जब सेना के कमांडो इसे निकालने का प्रयास कर रहे थे तभी इसका टाइम वेल सक्रिय हो गया और इसके सक्रिय होते ही आठ सील कमांडो गायब हैं।
वैज्ञानिकों का कहना है कि यह टाइम वेल सर्पिलाकार में आकाशगंगा की तरह होता है और इसके सम्पर्क में आते ही सभी जीवित प्राणियों का अस्तित्व इस तरह समाप्त हो जाता है मानो कि वे मौके पर मौजूद ही नहीं रहे हों।
एसवीआर रिपोर्ट का कहना है कि यह क्षेत्र 5 अगस्त को पुन: एक बार सक्रिय हो गया था और इसके परिणामस्वरूप ४० सिपाही और प्रशिक्षित जर्मन शेफर्ड डॉग्स इसकी चपेट में आ गए थे। संस्कृत भाषा में विमान केवल उड़ने वाला वाहन ही नहीं होता है वरन इसके कई अर्थ हो सकते हैं, यह किसी मंदिर या महल के आकार में भी हो सकता है।
चीन को भी तलाश है भारत के प्राचीन ज्ञान की
ऐसा भी दावा किया जाता है कि कुछेक वर्ष पहले ही चीनियों ने ल्हासा, ति‍ब्बत में संस्कृत में लिखे कुछ दस्तावेजों का पता लगाया था और बाद में इन्हें ट्रांसलेशन के लिए चंडीगढ़ विश्वविद्यालय में भेजा गया था।
यूनिवर्सिटी की डॉ. रूथ रैना ने हाल ही इस बारे में जानकारी दी थी कि ये दस्तावेज ऐसे निर्देश थे जो कि अंतरातारकीय अंतरिक्ष विमानों (इंटरस्टेलर स्पेसशिप्स) को बनाने से संबंधित थे।
हालांकि इन बातों में कुछ बातें अतरंजित भी हो सकती हैं कि अगर यह वास्तविकता के धरातल पर सही ठहरती हैं तो प्राचीन भारतीय ज्ञान-विज्ञान और तकनीक के बारे में ऐसी जानकारी सामने आ सकती है जो कि आज के जमाने में कल्पनातीत भी हो सकती है।

द्विपदीः संजीव

एक द्विपदी

संजीव
*
तलियों की चाह में भटको न तुम
फूल बन महको तो खुद आयेंगी ये. 

Rashtreey Kayasth Mahaparishad: Cuttack sammelan 5-6 july 2014

​​
     ॐ               

राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद 
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओंमंदिरोंपत्रिकाओं व सज्जनों का परिसंघ,

पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवासपड़ाव पोखर लेनआमगोलामुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३०६२१-२२४३९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेन्टनेपियर टाउनजबलपुर४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ ०७६१ २४१११३१salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१ब्लोक ६मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५०६१२ २६८४४४४arbindsinha@yahoo.com 
  कायास्थित ईश काअंश हुआ कायस्थ ।
। सब सबके सहयोग सेहों उन्नत आत्मस्थ ।।
==============
 पत्र क्रमांक: ४७७ महा/राकाम/२०१४                                               जबलपुर, दिनाँक: १७.०७.२०१४
                                                 
                अर्धवार्षिक सम्मेलन, संचालन/कार्यकारिणी समिति बैठक ५-६ जुलाई २०१४ 
संक्षिप्त कार्यवाही विवरण  
संचालन/कार्यकारिणी समिति बैठक, अपरान्ह ४-६ बजे, स्थान अशोका होटल कटक, कक्ष क्र.३०५

        परात्पर परमब्रम्ह चराचर के कर्मदेवता प्रभु चित्रगुप्त के ध्यान पश्चात अध्यक्ष श्री त्रिलोकी प्रसाद वर्मा की अध्यक्षता में संचालन समिति की बैठक प्रारंभ हुई। संगठन सचिव श्री अरूण श्रीवास्तव ‘विनीत’ ने बिठूर, कानपुर में दिनांक 13.4.2014 को संपन्न बैठक की कार्यवाही का वाचन किया जिसे पारित किया गया।
        उपाध्यक्ष श्री के. के. वर्मा तथा संगठन सचिव श्री अरूण कुमार श्रीवास्तव ‘विनीत’ द्वारा प्रस्तुत मौखिक प्रतिवेदन अनुमोदित किये गये। कोषाध्यक्ष श्री अरविन्द कुमार सिन्हा द्वारा प्रेषित आय-व्यय लेखा अपूर्ण विवरण तथा तत्कालीन महामंत्री के हस्ताक्षर के अभाव में पारित नहीं किया जा सका। अध्यक्ष जी ने आदेशित किया कि लेखा पूर्णकर आगामी बैठक में प्रस्तुत किया जाए। वरिष्ठ उपाध्यक्ष तथा संयुक्त महसचिव के संदेशों का वाचन किया गया। कोषाध्यक्ष ने अपने प्रतिवेदन में मीटिंग, ईटिंग और सिटिंग से बचने तथा नियमित सदस्य तथा संरक्ष्क बनाकर कोष को मजबूत करने का अनुरोध किया
        संस्था की सदस्यता के प्रसार तथा अभिलेखों के नियमित संचारण हेतु निर्णय लिया गया कि हर सदस्य से निर्धारित सदस्यता प्रपत्र (प्रारूपसंलग्न) भराकर सदस्यता शुल्क सहित कोषाध्यक्ष को भेजा जाए। कोषाध्यक्ष पावती क्रमांक/दिनांक, लेखा पुस्तिका में प्रविष्टि कर पृष्ठ क्रमांक व दिनांक अंकित करेंगे, कार्यालय सचिव परिचय पत्र सहित सदस्यता आवेदन महामंत्री को भेजेंगे। महामंत्री द्वारा सदस्यता पंजी में प्रविष्टि की जाँचकर सदस्यता क्रमांक तथा परिचय पत्र आवंटित करेंगे। प्रत्येक त्रिमाही में नये सदस्यों की सूची कार्यालय मंत्री तैयार कर अध्यक्ष, महामंत्री, संगठन सचिव आदि को भेजेंगे। सूची में सरल क्रमांक, सदस्यता क्रमांक, सदस्यता अवधि, पावती क्रमांक व दिनांक, लेखा पुस्तिका पृष्ठ क्रमांक व दिनांक, नाम, जन्मतिथि, पूरा पता, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल पता, टिप्पणी आदि जानकारी होंगी। 
      संस्था की सदस्यता संबंधी विविध बिंदुओं पर चर्चा में महमंत्री ने सूचित किया कि वर्तमान संविधान निर्माण के कई वर्ष पूर्व से संस्था पुराने संविधान के अनुसार कार्यरत रही है। पुराने आजीवन तथा संरक्षक सदस्यों की सूची  प्राप्त न हो पाने के कारण उनको सूचना भेजना संभव नहीं हो पा रहा है। संविधान निर्माण के पहले से संस्था के ऐसे सदस्यों को दुबारा सदस्यता लेने के लिये विवश करना न्यायसंगत नहीं होगा। अध्यक्ष ने उपस्थित सदस्यों से परामर्श कर व्यवस्था दी कि यदि पूर्व सदस्य लिखित में सूचित करें कि वे किस समय से, किस श्रेणी के सदस्य हैं तो उनके प्रकरण पर विचारकर पूर्व सदस्यता बहालकर नया सदस्यता क्रमांक व परिचय पत्र दिया जा सकेगा। इस हेतु अंतिम तिथि ३१ दिसंबर २०१४ होगी। इन प्रकरणों पर संगठन सचिव से परामर्शकर महामंत्री निर्णय लेंगे। कोई विवाद होने पर सदस्य के निवास क्षेत्र से संबंधित उपाध्यक्ष से परामर्श कर वरिष्ठ उपाध्यक्ष अंतिम निर्णय लेंगे। उक्त निर्धारित तिथि के बाद ऐसे सदस्यों को वर्तमान संविधान के अनुसार नवीन सदस्यता लेना होगा तथा २५० रू. प्रवेश शुल्क के साथ २५० रू. वार्षिक, कुल ५००० रु. आजीवन सदस्यता हेतु शुल्क देना होगा।
       गैर सदस्य पदाधिकारियों की वैधता पर व्यापक चर्चा के बाद सर्वसम्मति से निर्णय लिया गया कि अब तक नियुक्त सभी पदाधिकारी ३१ अगस्त २०१४ के पूर्व सदस्यता प्रपत्र भरकर तथा शुल्क जमाकर अपने पद पर बने रह सकेंगे। जो पदाधिकारी इस तिथि तक नियमित सदस्यता ग्रहण नहीं करेंगे उनका मनोनयन/निर्वाचन स्वयमेव निरस्त हो जाएगा। भिलाई बैठक में पारित तथा बिठूर बैठक में अनुमोदित अनुसार संविधान में वर्णित संचालन समिति केे निर्धारित पदों के अलावा संगठन हित में मनोनीत पदाधिकारी कार्यकारिणी/संगठन समिति के सदस्य होंगे। मनोनीत संरक्षक, परामर्शदाता तथा मानद सदस्यों के लिये नियमित सदस्य होना स्वैच्छिक होगा।
        सर्वसम्मति से तय किया गया कि संगठन सचिव, उपाध्यक्ष संगठन प्रांतीय/जिला प्रभारी आदि अपने-अपने प्रभार-क्षेत्रों में संगठन कार्य हेतु ,त्रैमासिक भ्रमण कार्यक्रम महामंत्री/संगठन सचिव से परामर्श कर बनायेंगे तथा भ्रमण के बाद प्रतिवेदन प्रस्तुत करेंगे जिन्हें महामंत्री/ संगठन सचिव के प्रतिवेदन में सम्मिलित किया जाएगा।
              बैठक का समापन करते हुए अध्यक्ष श्री त्रिलोकी प्रसाद वर्मा ने ब्रहमवत घाट ;ब्रहमा की खूंटी, बिठूर कानपुर में गंगा की जलधारा में नौका विहार करते हुए महावीर जयंती पर महत्वपूर्ण निर्णय लेने के पश्चात भगवान जगन्नाथ के लीला्क्षेत्र पुरी के समीप ऐतिहासिक नगरी कटक में आयोजित बैठक को आत्मानिरीक्षण और आत्म परीक्षण का अवसर निरूपित करते हुए, ठोस निर्णय लेने की प्रेरणा दी। श्री वर्मा ने चित्रगुप्त डायरी में प्रकाशन हेतु सभी पदाधिकारियों/सदस्यों से नाम जन्मतिथि पिता/पति का नाम, पत्राचार का पता, पिन कोड, दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल, दो पासपोर्ट चित्र, ब्लड ग्रुप, उप्लब्धियां आदि जानकारी डाॅ. यू.सी. श्रीवास्तव  वरिष्ठ उपाध्यक्ष २०९-२१० आयकर कालोनी, विनायकपुर कानपुर २०६०२६ के पते पर १५ अगस्त २०१४ तक भेजने का अनुरोध किया। लेखा संधारण हेतु पूर्व महामंत्री डाॅ. यू.सी. श्रीवास्तव ५ अगस्त २०१४ के पूर्व किसी रविवार को पटना में कोषाध्यक्ष के साथ लेखा पूर्णकर  आगामी बैठक में अवश्य प्रस्तुत करेंगे। उन्होंने अपने पत्र दि.१३ अप्रैल २०१४ में चाहे अनुसार माह जुलाई से सितंबर २०१४ हेतु प्रभारी उपाध्यक्षों को भ्रमण कार्यक्रम प्रस्तावित कर भेजने हेतु अनुरोध  किया। जिसके अनुसार आगामी वार्षिक सम्मेलन हेतु ३ तिथियाॅं २२-२३ नवंबर २०१४ ,(मार्गशीर्ष कॄष्ण ३०)  तथा २०-२१ दिसम्बर २०१४ (पौष क्र. १३-१४ )अथवा २७ -२८ दिसंबर १४ (पौश सु ६-७ ) सुझाते हुए अध्यक्ष जी ने आमंत्रण प्रस्ताव, १५ अगस्त २०१४ तक भेजने का अनुरोध किया। अपने-अपने क्षेत्र में स्थान चयन उपाध्यक्ष करेंगे। वार्षिक सम्मेलन में सभी पदाधिकारियों की उपस्थिति अनिवार्य होगी। अध्यक्ष की सहमति से महामंत्री द्वारा उपस्थित पदाधिकारियों तथा संयोजक डाॅ. नीलमणि दास उपाध्यक्ष व उनके सहयोगियों के प्रति आभार व्यक्त कर बैठक समाप्त की घोषणा की गयी।

अर्धवार्षिक सम्मेलनः रविवार ६ जुलाई २०१४ 
स्थान- श्रीरामचंद्र भवन सभागार कटक, समय- प्रातः १०.३० बजे से

देवाधिदेव श्री चित्रगुप्त जी तथा सरस्वती जी के पूजन पश्चात अध्यक्ष श्री त्रिलोकीप्रसाद वर्मा की अध्यक्षता तथा डा. टाहिलीचरण मोहंती के मुख्यातिथ्य में अर्धवार्षिक सम्मेलन का श्री गणेश हुआ। 
अतिथियों के स्वागत पश्चात संयोजक तथा उपाध्यक्ष प्रो. डा. नीलमणी दास ने स्वागत भाषण में भगवान जगन्नाथ की लीलाभूमि में पहली बार कायस्थ समाज का राष्ट्रीय सम्मिलन होने को ऐतिहासिक पल निरूपित करते हुए उड़ीसा के शासन-प्रशासन, न्याय व्यवस्था तथा सामाजिक समरसता में कायस्थों के अवदान का संकेत किया
स्थानीय वक्ताओं श्री रणधीर दास 'जीवनरंगा', प्रो. डा. टी. मोहंती, डा. हेमंत कुमार दास के सारगर्भित संबोधनों के पश्चात महामन्त्री श्री संजीव वर्मा 'सलिल' ने वैदिक काल से मानव जाति के अभ्युदय में कायस्थों के अवदान, भगवान चित्रगुप्त के माहात्म्य, उड़ीसा में कायस्थों के प्रवेश, करण कायस्थों के नामकरण, ३६० अल्लों (कुलों) आदि पर प्रकाश डाला। 
श्री कमलकान्त वर्मा उपाध्यक्ष, श्री अरूण कुमार श्रीवास्तव ‘विनीत’ संगठन  सचिव, श्री दिलीप कुमार निजी सचिव अध्यक्ष आदि के व्याख्यानों के पश्चात डा. दास द्वारा जातिवाद पर आधारित आरक्षण समाप्त किये जाने, कायस्थो को जनसंख्या के अनुपात में शासकीय सेवा व चुनावों आदि में प्रतिनिधित्व देने तथा राज्यपाल, कुलपति आदि पदों पर साहित्य-कला आदि क्षेत्रों से गैर राजनैतिक व्यक्तित्वों को उनके योगदान के आधार पर अवसर देने संबंधी प्रस्ताव महामन्त्री ने सदन से सर्व सम्मति से पारित कराये. गुन्जन कला सदन द्वारा ओडिस्सी नॄत्य की मनोहर प्र्स्तुति के पश्चात बिरादरी भोज से सम्मेलन का समापन हुआ.    

संलग्नः सदस्यता/सम्बद्धता आवेदन पत्र

  
राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद
(मानव कल्याण हेतु समर्पित संस्थाओंमंदिरोंपत्रिकाओं व सज्जनों का परिसंघ,पंजीयन क्रमांक: ०८७४/२०१३)
अध्यक्ष: त्रिलोकीप्रसाद वर्मा रामसखी निवासपड़ाव पोखर लेनआमगोलामुजफ्फरपुर-८४२००१ बिहार ०९४३१२३८६२३०६२१-२२४३९९, trilokee.verma@gmail.com 
महामंत्री : इंजी. संजीव वर्मा 'सलिल', २०४ विजय अपार्टमेन्टनेपियर टाउनजबलपुर४८२००१ मध्य प्रदेश ९४२५१ ८३२४४ ०७६१ २४१११३१salil.sanjiv@gmail.com  
कोषाध्यक्ष सह प्रशासनिक सचिव: अरबिंद कुमार सिन्हा जे. ऍफ़. १/७१ब्लोक ६मार्ग १० राजेन्द्र नगर पटना ८०००१६ ०९४३१० ७७५५५०६१२ २६८४४४४arbindsinha@yahoo.com 
  कायास्थित ईश काअंश हुआ कायस्थ ।
। सब सबके सहयोग सेहों उन्नत आत्मस्थ ।।
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कार्यालय के उपयोग हेतु-    शुल्क रु. ............................
शुल्क रु. .............  पावती क्र............. दिनांक. .............                                       
लेखा पंजी प्रष्ठ क्र.............   दिनांक. ............................ 
परिचय पत्र क्रमांक ........... दिनांक. ............................                                     २ चित्र

सदस्यता / संबद्धता आवेदन पत्र
सदस्यता शुल्क- प्रवेश शुल्क सिर्फ पहली बार २५० रु., वार्षिक २५० रु., आजीवन ५००० रु. 
सबद्धता शुल्क- स्थानीय संस्था ५१ रु., प्रान्तीय संस्था २५१ रु., राष्ट्रीय संस्था ५०१ रु. 

आवेदक व्यक्ति / संस्था का नामः  ............................................................................
(दूरभाष/चलभाष क्रमांक, ईमेल)   ............................................................................
                                                     ............................................................................  
व्यक्ति के पिता/स्ंस्था अध्यक्ष का नामः ...................................................................
व्यक्ति कि माता/स्ंस्था सचिव का नामः....................................................................
मतदाता / पन्जीकरण क्रमांकः     ............................................................................. 
परिवार के सदस्य / संस्था पदाधिकारीः .................................................................................................................................
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स्थान  ..................                                                                                                  
दिनांक                                                                                                      हस्ताक्षर

टीप- आवेदन प्रपत्र पूरी तरह भरकर शुल्क तथा २ चित्रों सहित उक्त में से किसी को भेजें।

parasaeenama


परसाईनामा :

हरिशंकर परसाई अपनी मिसाल आप, न भूतो न भविष्यति  …

ताली पीटना 

महावीर और बुद्ध ऐसे संत हुए, जिन्होने कहा - ''सोचो। शंका करो। प्रश्न करो। तब सत्य को पहचानो। जरूरी नहीं कि वही शाश्वत सत्य है, जो कभी किसीने लिख दिया था।''

ये संत वैज्ञानिक दृष्टि संपन्न थे और जब तक इन संतोंके विचारों का प्रभाव रहा तब तक विज्ञान की उन्नति भारतमें हुई। भौतिक और रासायनिक विज्ञान की शोध हुई। चिकित्सा विज्ञान की शोध हुई। नागार्जुन हुए, बाणभट्ट हुए। 

इसके बाद लगभग डेढ़ शताब्दी में भारतके बड़े से बड़े दिमागने यही काम किया कि सोचते रहे - ईश्वर एक हैं या दो हैं, या अनेक हैं। हैं तो सूक्ष्म हैं या स्थूल। आत्मा क्या है, परमात्मा क्या है। इसके साथ ही केवल काव्य रचना। विज्ञान नदारद। 

गल्ला कम तौलेंगे, मगर द्वैतवाद, अद्वैतवाद, विशिष्टाद्वैतवाद, मुक्ति और पुनर्जन्म के बारे में बड़े परेशान रहेंगे। कपड़ा कम नापेंगे, दाम ज्यादा लेंगे, पर पंच आभूषण के बारे में बड़े जाग्रत रहेंगे।

झूठे आध्यात्म ने इस देश को दुनिया में तारीफ दिलवाई, पर मनुष्य को मारा और हर डाला..


***

सूक्ति सलिलाः -संजीव

सूक्ति सलिलाः 

संजीव
*
सत्य से आघात कर दो, है भला 
झूठ से सुविधा नहीं देना मुझे.. 

शुक्रवार, 18 जुलाई 2014

smaran: jagmohan prasad saxena 'chanchareek' -sanjiv

स्मरणांजलि:
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक'
संजीव
*
महाकवि जगमोहन प्रसाद सक्सेना 'चंचरीक' साधु प्रवृत्ति के ऐसे शब्दब्रम्होपासक हैं जिनकी पहचान समय नहीं कर सका। उनका सरल स्वभाव, सनातन मूल्यों के प्रति लगाव, मौन एकाकी सारस्वत साधना, अछूते और अनूठे आयामों का चिंतन, शिल्प पर कथ्य को वरीयता देता सृजन,  मौलिक उद्भावनाएँ, छांदस प्रतिबद्धता, सादा रहन-सहन, खांटी राजस्थानी बोली, छरफरी-गौर काया, मन को सहलाती सी प्रेमिल दृष्टि और 'स्व' पर 'सर्व' को वरीयता देती आत्मगोपन की प्रवृत्ति उन्हें चिरस्मरणीय बनाती है। मणिकांचनी सद्गुणों का ऐसा समुच्चय देह में बस कर देहवासी होते हुए भी देह समाप्त होने पर विदेही होकर लुप्त नहीं होता अपितु देहातीत होकर भी स्मृतियों में प्रेरणापुंज बनकर चिरजीवित रहता है. वह एक से अनेक में चर्चित होकर नव कायाओं में अंकुरित, पल्लवित, पुष्पित और फलित होता है।

लीलाविहारी आनंदकंद गोबर्धनधारी श्रीकृष्ण की भक्ति विरासत में प्राप्त कर चंचरीक ने शैशव से ही सन १८९८ में पूर्वजों द्वारा स्थापित उत्तरमुखी श्री मथुरेश राधा-कृष्ण मंदिर में कृष्ण-भक्ति का अमृत पिया। साँझ-सकारे आरती-पूजन, ज्येष्ठ शिकल २ को पाटोत्सव, भाद्र कृष्ण १३ को श्रीकृष्ण छठी तथा भाद्र शुक्ल १३ को श्री राधा छठी आदि पर्वों ने शिशु जगमोहन को भगवत-भक्ति के रंग में रंग दिया। सात्विक प्रवृत्ति के दम्पति श्रीमती वासुदेवी तथा श्री सूर्यनारायण ने कार्तिक कृष्ण १४ संवत् १९८० विक्रम (७ नवंबर १९२३ ई.) की पुनीत तिथि में मनमोहन की कृपा से प्राप्त पुत्र का नामकरण जगमोहन कर प्रभु को नित्य पुकारने का साधन उत्पन्न कर लिया। जन्म चक्र के चतुर्थ भाव में विराजित सूर्य-चन्द्र-बुध-शनि की युति नवजात को असाधारण भागवत्भक्ति और अखंड सारस्वत साधना का वर दे रहे थे जो २८ दिसंबर २०१३ ई. को देहपात तक चंचरीक को निरंतर मिलता रहा।    

बालक जगमोहन को शिक्षागुरु स्व. मथुराप्रसाद सक्सेना 'मथुरेश', विद्यागुरु स्व. भवदत्त ओझा तथा दीक्षागुरु सोहनलाल पाठक ने सांसारिकता के पंक में शतदल कमल की तरह निर्लिप्त रहकर न केवल कहलाना अपितु सुरभि बिखराना भी सिखाया। १९४१ में हाईस्कूल, १९४३ में इंटर, १९४५ में बी.ए. तथा १९५२ में एलएल. बी. परीक्षाएँ उत्तीर्ण कर इष्ट श्रीकृष्ण के पथ पर चलकर अन्याय से लड़कर न्याय की प्रतिष्ठा  पर चल पड़े जगमोहन। जीवनसंगिनी शकुंतला देवी के साहचर्य ने उनमें अदालती दाँव-पेंचों के प्रति वितृष्णा तथा भागवत ग्रंथों  और मनन-चिंतन की प्रवृत्ति को गहरा कर निवृत्ति मार्ग पर चलाने के लिये सृजन-पथ का ऐसा पथिक बना दिया जिसके कदमों ने रुकना नहीं सीखा। पतिपरायणा पत्नी और प्रभु परायण पति की गोद में आकर गायत्री स्वयं विराजमान हो गयीं और सुता की किलकारियाँ देखते-सुनते जगमोहन की कलम ने उन्हें 'चंचरीक' बना दिया, वे अपने इष्ट पद्मों के 'चंचरीक' (भ्रमर) हो गये। 

महाकाव्य त्रयी का सृजन:

चंचरीककृत प्रथम महाकाव्य 'ॐ श्री कृष्णलीला चरित' में २१५२ दोहों में कृष्णजन्म से लेकर रुक्मिणी मंगल तक सभी प्रसंग सरसता, सरलता तथा रोचकता से वर्णित हैं। ओम श्री पुरुषोत्तम श्रीरामचरित वाल्मीकि रामायण के आधार पर १०५३  दोहों में रामकथा का गायन है। तृतीय तथा अंतिम महाकाव्य 'ओम पुरुषोत्तम श्री विष्णुकलकीचरित' में अल्पज्ञात तथा प्रायः अविदित कल्कि अवतार की दिव्य कथा का उद्घाटन ५ भागों में प्रकाशित १०६७ दोहों में किया गया है। प्रथम कृति में कथा विकास  सहायक पदों  तृतीय कृति में तनया डॉ. सावित्री रायजादा कृत दोहों की टीका को सम्मिलित कर चंचरीक जी ने शोधछात्रों का कार्य आसान कर दिया है। राजस्थान की मरुभूमि में चराचर के कर्मदेवता परात्पर परब्रम्ह चित्रगुप्त (ॐ)  के  आराधक कायस्थ कुल में जन्में चंचरीक का शब्दाक्षरों से अभिन्न नाता होना और हर कृति का आरम्भ 'ॐ' से करना सहज स्वाभाविक है। कायस्थ [कायास्थितः सः कायस्थः अर्थात वह (परमात्मा)  में स्थित (अंश रूप आत्मा) होता है तो कायस्थ कहा जाता है] चंचरीक ने कायस्थ राम-कृष्ण पर महाकाव्य साथ-साथ अकायस्थ कल्कि (अभी क्लक्की अवतार हुआ नहीं है) से मानस मिलन कर उनपर भी महाकाव्य रच दिया, यह उनके सामर्थ्य का शिखर है।    

देश के विविध प्रांतों की अनेक संस्थाएं चंचरीक  सम्मानित कर गौरवान्वित हुई हैं। सनातन सलिला नर्मदा तट पर स्थित संस्कारधानी जबलपुर में साहित्यिक संस्था अभियान के तत्वावधान में समपन्न अखिल भारतीय दिव्य नर्मदा अलंकरण में अध्यक्ष होने के नाते मुझे श्री चंचरीक की द्वितीय कृति 'ॐ पुरुषोत्तम श्रीरामचरित' को नागपुर महाराष्ट्र निवासी जगन्नाथप्रसाद वर्मा-लीलादेवी वर्मा स्मृति जगलीला अलंकरण' से तथा अखिल भारतीय कायस्थ महासभा व चित्राशीष के संयुक्त तत्वावधान में  शांतिदेवी-राजबहादुर वर्मा स्मृति 'शान्तिराज हिंदी रत्न' अलंकरण से समादृत करने का सौभाग्य मिला। राष्ट्रीय कायस्थ महापरिषद के जयपुर सम्मेलन में चंचरीक जी से भेंट, अंतरंग चर्चा तथा शकुंतला जी व् डॉ. सावित्री रायजादा से नैकट्य  सौभाग्य मिला। 

चंचरीक जी के महत्वपूर्ण अवदान क देखते हुए राजस्थान साहित्य अकादमी को ऊपर समग्र ग्रन्थ का प्रकाशन कर, उन्हें सर्वोच्च पुरस्कार से सम्मानित करना चाहिए।  को उन पर डाक टिकिट निकालना चाहिए। जयपुर स्थित विश्व विद्यालय में उन पर पीठ स्थापित  की जाना चाहिए। वैष्णव मंदिरों में संतों को चंचरीक साहित्य क्रय कर पठन-पाठन तथा शोध हेतु मार्ग दर्शन की व्यवस्था बनानी चाहिए। 

दोहांजलि: 

ॐ परात्पर ब्रम्ह ही, रचते हैं सब सृष्टि 
हर काया में व्याप्त हों, कायथ सम्यक दृष्टि 

कर्मयोग की साधना, उपदेशें कर्मेश 
कर्म-धर्म ही वर्ण है, बतलाएं मथुरेश 

सूर्य-वासुदेवी हँसे, लख जगमोहन रूप 
शाकुन्तल-सौभाग्य से, मिला भक्ति का भूप 

चंचरीक प्रभु-कृपा से, रचें नित्य नव काव्य 
न्यायदेव से सत्य की, जय पायें संभाव्य 

राम-कृष्ण-श्रीकल्कि पर, महाकाव्य रच तीन 
दोहा दुनिया में हुए, भक्ति-भाव तल्लीन 

सावित्री ही सुता बन, प्रगटीं, ले आशीष 
जयपुर में जय-जय हुई, वंदन करें मनीष 

कायथ कुल गौरव! हुए, हिंदी गौरव-नाज़ 
गर्वित सकल समाज है, तुमको पाकर आज 

सतत सृजन अभियान यह, चले कीर्ति दे खूब 
चित्रगुप्त आशीष दें, हर्ष मिलेगा खूब 

चंचरीक से प्रेरणा, लें हिंदी के पूत 
बना विश्ववाणी इसे, घूमें बनकर दूत 

दोहा के दरबार में, सबसे ऊंचा नाम
चंचरीक ने कर लिया, करता 'सलिल' प्रणाम 

चित्रगुप्त के धाम में, महाकाव्य रच नव्य 
चंचरीक नवकीर्ति पा, गीत गुँजाएँ दिव्य 

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गुरुवार, 17 जुलाई 2014

naam anaam: sanjiv

नाम अनाम 

संजीव 

*
पूर्वाग्रह पाले बहुत, जब रखते हम नाम 
सबको यद्यपि ज्ञात है, आये-गये अनाम 

कैकेयी वीरांगना, विदुषी रखा न नाम 
मंदोदरी पतिव्रता, नाम न आया काम 

रास रचाती रही जो, राधा रखते नाम 
रास रचाये सुता तो, घर भर होता वाम 

काली की पूजा करें, डरें- न रखते नाम 
अंगूरी रख नाम दें, कहें न थामो जाम 

अपनी अपनी सोच है, छिपी सोच में लोच 
निज दुर्गुण देखें नहीं, पर गुण लखें न पोच 

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