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रविवार, 30 नवंबर 2014

नवगीत:
अनेक वर्णा पत्तियाँ हैं
शाख पर तो क्या हुआ?
अपर्णा तो है नहीं अमराई
सुख से सोइये

बज रहा चलभाष सुनिए
काम अपना छोड़कर
पत्र आते ही कहाँ जो रखें
उनको मोड़कर
किताबों में गुलाबों की
पंखुड़ी मिलती नहीं
याद की फसलें कहें, किस नदी
तट पर बोइये?

सैंकड़ों शुभकामनायें
मिल रही हैं चैट पर 
सिमट सब नाते गए हैं
आजकल अब नैट पर
ज़िंदगी के पृष्ठ पर कर
बंदगी जो मीत हैं 
पड़ गये यदि सामने तो
चीन्ह पहचाने नहीं  
चैन मन का, बचा रखिए
भीड़ में मत खोइए
***

navgeet:

नवगीत:


नयन झुकाये बैठे हैं तो
मत सोचो पथ हेर रहे हैं
*
चहचह करते पंछी गाते झूम तराना
पौ फटते ही, नहीं ठण्ड का करें बहाना
सलिल-लहरियों में ऊषा का बिम्ब निराला
देख तृप्त मन डूबा खुद में बन बेगाना
सुन पाती हूँ चूजे जगकर 
कहाँ चिरैया? टेर रहे हैं
*
मोरपंख को थाम हाथ में आँखें देखें  
दृश्य अदेखे या अतीत को फिर-फिर लेखें
रीती गगरी, सूना पनघट,सखी-सहेली  
पगडंडी पर कदम तुम्हारे जा अवरेखें
श्याम लटों में पवन देव बन  
श्याम उँगलियाँ फेर रहे हैं
*
नील-गुलाबी वसन या कि है झाँइ  तुम्हारी
जाकर भी तुम गए न मन से क्यों  बनवारी?
नेताओं जैसा आश्वासन दिया न झूठा-
दोषी कैसे कहें तुम्हें रणछोड़ मुरारी?
ज्ञानी ऊधौ कैसे समझें   
याद-मेघ मिल घेर रहे हैं?
*

शनिवार, 29 नवंबर 2014

muhavare / kahavat

आँखों आँखों में बात होना =

आँख का काँटा = 

आँख का तारा = अत्यधिक प्रिय। बेटे को आँख का तर बना कर रखा पर बुढ़ापे में काम न आया

आँख खोलना =

आँख चुराना = सत्य बताना। राय प्रवीण के दोहे ने अकबर की आँख खोल दी 

आँख झुकना =  शर्म आना 

आँख झुकाना = नीचा दिखाना 

आँख दिखाना = डराना 

आँख फेरना = 

आँख मारना = 

आँख मिलाना =
आँखें मूंदना =

आँख लड़ना = 



लोकोक्ति: 

अंधों में काना राजा = 

आँख का अंधा नाम नैन सुख: अर्थ - नाम के अनुसार गुण न होना 

अंधे आगे रोना, अपने नैना खोना = नासमझ को समझाना 

एक आँख से देखना = 

navgeet:

नवगीत:


क्या नाम है
इस खेल का?
.
तोल-तोल के बोल रहे हैं
इक-दूजे को तोल रहे हैं
कौन बताये पर्दे पीछे
किसके कितने मोल रहे हैं?
साध रहे संतुलन
मेल का
.
तुम इतने लो, हम इतने लें 
जनता भौचक कब कितने ले?
जैसी की तैसी है हालत
आश्वासन चाहे जितने ले
मेल नीर के  
साथ तेल का?
.
केर-बेर का साथ निराला
स्वार्थ साधने बदलें पाला
सत्ता खातिर खेल खेलते
सिद्धांतों पर डाला ताला
मौसम आया
धकापेल का
.
  




  

navgeet:

नवगीत:

कब रूठें
कब हाथ मिलायें?
नहीं, देव भी
कुछ कह पायें
.
ये जनगण-मन के नायक हैं
वे बमबारी के गायक हैं
इनकी चाह विकास कराना
उनकी राह विनाश बुलाना
लोकतंत्र ने
तोपतंत्र को
कब चाहा है
गले लगायें?
.
सारे कुनबाई बैठे हैं
ये अकड़े हैं, वे ऐंठे हैं
उनका जन आधार बड़ा पर
ये जन मन मंदिर पैठे हैं
आपस में
सहयोग बढ़ायें
इनको-उनको
सब समझायें
. . .
(सार्क सम्मलेन काठमांडू, २६.१.२०१४ ) 

गुरुवार, 27 नवंबर 2014

muhavra / kahawat salila: naak

मुहावरे / कहावत सलिला: नाक 

नाक ऊँची होना = सम्मान बढ़ना। बिटिया के प्रथम आने से परिवार की नाक ऊँची हो गयी  
नाक ऊँची रखना = महत्व दिखाना। ब्राम्हणों को अपनी नाक ऊँची रखने की आदत है।  
नाक कटना = प्रतिष्ठा कम होना। गलत फैसलों से खाप पंचायतों की नाक कट गयी है 
नाक घुसेड़ना = हस्तक्षेप करना। बच्चों के बीच में नाक घुसते रहने से बड़ों का सम्मान घटता है  
नाक बचाना =  असामाजिक तत्वों से नाक बचाकर निकलना सही नीति है 
नाक रखना = मान रखना। प्रतियोगिता जीतकर बच्चों ने विद्यालय की नाक रख ली। 
नाक का बाल होना = खुशामदी कर्मचारी अधिकारी की नाक का बाल हो जाता है 
नाक का सवाल = प्रतिष्ठा का प्रश्न। नाक का सवाल हो तो गीदड़ भी शेर से भीड़ जाता है 
नाक पर मख्खी बैठना = प्रतिष्ठा नष्ट होना।  
नाक पर मक्खी न बैठने देना = सम्मान पर आंच न आने देना। 
नाक में दम करना = तंग करना। भारतीय सेना ने आतंकवादियों की नाक में दम कर दी  
नाक में नकेल डालना = नियंत्रित करना। उददण्डता रोकने के लिए नाक में नकेल डालना ही पड़ती है
नाक रगड़ना = दीनता दिखाना।कुकर्म करोगे तो नाक भी रगड़ना पड़ेगी। 
नाक के नीचे = बहुत निकट। नाक के नीचे चोरी हो गयी और पुलिस कुछ नहीं कर सकी
नाकों चने चबवाना = परेशान करना। अत्याधुनिका बहू ने सास-ससुर को नाकों चने चबवा दिये। 
छंद: नाक के बाल ने, नाक रगड़कर, नाक कटाने का काम किया है 
नाकों चने चबवाए, घुसेड़ के नाक, न नाक का मान रखा है 
नाक न ऊँची रखें अपनी, दम नाक में हो तो भी नाक दिखा लें 
नाक पे मक्खी न बैठन दें, है सवाल ये नाक का, नाक बचा लें  
नाक के नीचे अघट न घटे, जो घटे तो जुड़े कुछ राह निकालें 
नाक नकेल भी डाल सखे, न कटे जंजाल तो बाँह चढ़ा लें
*

doha salila;

दोहा सलिला:
'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए...
संजीव 'सलिल'
*


'मैं'-'मैं' मिल जब 'हम' हुए, 'तुम' जा बैठा दूर.
जो न देख पाया रहा, आँखें रहते सूर..
*
'मैं' में 'तुम' जब हो गया, अपने आप विलीन.
व्याप गयी घर में खुशी, हर पल 'सलिल' नवीन..
*
'तुम' से 'मैं' की गैरियत, है जी का जंजाल.
'सलिल' इसी में खैरियत, 'हम' बन हों खुशहाल..
*
'मैं' ने 'मैं' को कब दिया, याद नहीं उपहार?
'मैं' गुमसुम 'तुम' हो गयी, रूठीं 'सलिल' बहार..
*
'मैं' 'तुम' 'यह' 'वह' प्यार से, भू पर लाते स्वर्ग.
'सलिल' करें तकरार तो, दूर रहे अपवर्ग..
*
'मैं' की आँखों में बसा, 'तू' बनकर मधुमास.
जिस-तिस की क्यों फ़िक्र हो, आया सावन मास..
*
'तू' 'मैं' के दो चक्र पर, गृह-वाहन गतिशील.
'हम' ईधन गति-दिशा दे, बाधा सके न लील..
*
'तू' 'तू' है, 'मैं' 'मैं' रहा, हो न सके जब एक. 
तू-तू मैं-मैं न्योत कर, विपदा लाईं अनेक..
*
'मैं' 'तुम' हँस हमदम हुए, ह्रदय हर्ष से चूर.
गाल गुलाबी हो गये, नत नयनों में नूर..
*
'मैं' में 'मैं' का मिलन ही, 'मैं'-तम करे समाप्त.
'हम'-रवि की प्रेमिल किरण, हो घर भर में व्याप्त..
*
Acharya Sanjiv verma 'Salil'
http://divyanarmada.blogspot.com
http://hindihindi.in

abhinandan

अभिनंदन 

सलिल-धार लहरों में बिम्बित 'हर नर्मदे' ध्वनित राकेश 
शीश झुकाते शब्द्ब्रम्ह आराधक सादर कह गीतेश 

जहाँ रहें घन श्याम वहाँ रसवर्षण होता सदा अनूप 
कमल कुसुम सज शब्द-शीश गुंजित करता है प्रणव अरूप
  
गौतम-राम अहिंसा-हिंसा भव में भरते आप महेश
मानोशी शार्दुला नीरजा किरण दीप्ति चारुत्व अशेष 

ममता समता श्री प्रकाश पा मुदित सुरेन्द्र हुए अमिताभ 
प्रतिभा को कर नमन हुई है कविता कविता अब अजिताभ 

सीता राम सदा करते संतोष मंजु महिमा अद्भुत 
व्योम पूर्णिमा शशि लेखे अनुराग सहित होकर विस्मित 

ललित खलिश हृद पीर माधुरी राहुल मन परितृप्त करे 
कान्त-कामिनी काव्य भामिनि भव-बाधा को सुप्त करे

बुधवार, 26 नवंबर 2014

taanka:

ताँका 

अपना मन 
अपना अँगना है 
सच का दीप 
सतत जलना है 
सपना पलना है

navgeet

नवगीत :

नीले-नीले कैनवास पर
बादल-कलम पकड़ कर कोई
आकृति अगिन बना देता है

मोह रही मन द्युति की चमकन
डरा रहा मेघों का गर्जन
सांय-सांय-सन पवन प्रवाहित
जल बूँदों का मोहक नर्तन
लहर-लहर लहराता कोई
धूसर-धूसर कैनवास पर
प्रवहित भँवर बना देता है

अमल विमल निर्मल तुहिना कण 
हरित-भरित नन्हे दूर्वा तृण 
खिल-खिल हँसते सुमन सुवासित
मधुकर का मादक प्रिय गुंजन  
अनहद नाद सुनाता कोई
ढाई आखर कैनवास पर
मन्नत कफ़न बना देता है

***

muhavra / kahavat salila: aankh

मुहावरा - कहावत सलिला 
मुहावरा = अनेक लोगों के मुँह पर चढ़ी बात। बातचीत, बोलचाल में लाक्षणिक व्यंग्यार्थ में प्रयुक्त वाक्य। सामान्य अर्थ से भिन्न लाक्षणिक अर्थ की अनुभूति करनेवाला वाक्यांश मुहावरा कहलाता है। मुहावरे छोटे-छोटे वाक्यांश हैं जिनके प्रयोग से भाषा में सजावट, प्रभाव, चमत्कार और विलक्षणता आती है। मुहावरा स्वतंत्र वाक्य नहीं वाक्य का हिस्सा होता है। मुहावरे के प्रयोग से कही गयी बात अधिक प्रभाव छोड़ती है। 'मुहावरा' शब्द अरबी भाषा से लिया गया है, जिसका अर्थ है- अभ्यास। मुहावरा अतिसंक्षिप्त रूप में होते हुए भी बड़े भाव या विचार को प्रकट करता है। मुहावरे प्रायः नीति, व्यंग्य, चेतावनी, उपालम्भ आदि से सम्बंधित होते हैं।
कहावत / लोकोक्ति = लोक + उक्ति = लोकोक्ति = कई लोगों द्वारा कही बात, लोक में प्रचलित उक्ति, बात जो कही जाती है, मसल, कथन। जीवन के अनुभवों का सार बार-बार तथा कई लोगों के द्वारा कहा जाने पर कहावत बन जाता है।  कुछ लोकोक्तियाँ अंतर्कथाओं से भी संबंध रखती हैं, जैसे 'भगीरथ प्रयास' अर्थात जितना परिश्रम राजा भगीरथ को गंगा के अवतरण के लिए करना पड़ा, उतना ही कठिन परिश्रम। लोकोक्ति लेखक या वक्त के कथन से निसृत होकर प्रचलित होती हैं। लोकोक्ति भाषा तथा साहित्य का गौरव है।
मुहावरे वाक्यांश होते हैं, जिनका प्रयोग क्रिया के रूप में वाक्य के बीच में किया जाता है, जबकि लोकोक्तियाँ स्वतंत्र वाक्य होती हैं, जिनमें एक पूरा भाव छिपा रहता है। लोकोक्ति मुहावरे की तुलना में अधिक विस्तृत होती है। लिंग, वचन तथा प्रसंग के अनुसार इनका रूप बदलता है। ये वाक्य रूप में अपने आपमें पूर्ण होती हैं।
कुछ मुहावरे आँख पर 
आँख का काँटा = 
आँखों आँखोंमें बात होना = 
आँख का तारा = 
आँख चुराना = 

आँख झुकना = 

आँख दिखाना = 

आँख फेरना = 

आँख मारना = 

आँख मिलाना =

आँख लड़ना = 

अंधों में काना राजा = 

आँख का अंधा नाम नैन सुख: अर्थ - नाम के अनुसार गुण न होना >>> उसका नाम तो वीर प्रताप

है पर डर छिपकली से भी जाते हैं, इसी को कहते हैं आँख का अँधा नाम नैन सुख

अंधे आगे रोना, अपने नैना खोना = 

एक आँख से देखना = 




muktak:

मुक्तक :
बात न करने को कुछ हो तो कहिये कैसे बात करें?
बिना बात के बात करें जो नाहक शह या मात करें
चोट न जो सह पाते देते पड़ती तो रो देते हैं-
दोष विधाता को दे कहते विधना क्यों आघात करे??

muktak:

मुक्तक:
मेरी तो अनुभूति यही है शब्द ब्रम्ह लिखवा लेता 
निराकार साकार प्रेरणा बनकर कुछ कहला लेता 
मात्र उपकरण मानव भ्रमवश खुद को रचनाकार कहे
दावानल में जैसे पत्ता खुद को करता मान दहे 
***


मंगलवार, 25 नवंबर 2014

doha salila

दोहा :

सबको हितकर सृजनकर, पायें-दें आनंद
नाद-ताल-रस-भाव-लय, बिम्बित परमानंद

माया-मायापति मिलें, पा-दें शांति तलाश
नेह नर्मदा नित नहा, जीवन बने पलाश 

सुमिर कबीर कबीर के, तोड़ें माया-पाश
सबद रमैनी साखियाँ, पंक्ति-पंक्ति आकाश

रूढ़ि ढोंग आडंबरों, का हो पर्दा फाश
ज्ञान सूर्य मिल दें उगा, आत्मा सकें तराश

राम आत्म परमात्म भी, राम अनादि-अनंत
चित्र गुप्त है राम का, राम सृष्टि के कंत

विधि-हरि-हर श्री राम हैं, राम अनाहद नाद
शब्दाक्षर लय-ताल हैं, राम भाव रस स्वाद

राम नाम गुणगान से, मन होता है शांत
राम-दास बन जा 'सलिल', माया करे न भ्रांत

श्याम भाव मद-मोह का, पल में करता अंत
श्याम विराजें हृदय में, जिसके वह हो संत

श्याम ज्ञान अज्ञान तम, भक्ति अनंत उजास
राग-विराग सुहाग है, श्याम श्वास-प्रश्वास

विश्व राष्ट्र इंसानियत, पर जिसको अभिमान
सबका हित साधे सदा,जो उसका हो मान

सद्विचार सद्गुण रहे, सदा सभी को इष्ट
'सलिल' करे सतकर्म जो, उसके मिटें अनिष्ट

***
   




kruti charcha:

पुस्तक चर्चा-
नवगीत २०१३:संग्रहणीय संकलन
चर्चाकार: संजीव
[कृति विवरण: नवगीत २०१३ (प्रतिनिधि नवगीत संकलन), संपादक डॉ. जगदीश व्योम, पूर्णिमा बर्मन, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द बहुरंगी, पृष्ठ १२ + ११२, मूल्य २४५ /,  प्रकाशक एस. कुमार एंड कं. दिल्ली] 
विश्व वाणी हिंदी के सरस साहित्य कोष की अनुपम निधि नवगीत के विकास हेतु संकल्पित-समर्पित अंतर्जालीय मंच नवगीत की पाठशाला ने नवगीतकारों को अभिव्यक्ति और मार्गदर्शन का अनूठा अवसर दिया है. इस मंच से जुड़े ८५ प्रतिनिधि नवगीतकारों के एक-एक प्रतिनिधि नवगीत का चयन नवगीत आंदोलन हेतु समर्पित डॉ. जगदीश व्योम तथा तथा पूर्णिमा बर्मन ने किया है. इन नवगीतकारों में डॉ. महेंद्र भटनागर, कुमार रवींद्र, डॉ. भारतेंदु मिश्र, बृजनाथ श्रीवास्तव, विद्यानन्दन राजीव, निर्मला जोशी,राजेंद्र वर्मा, यश मालवीय, गिरीशचन्द्र श्रीवास्तव, डॉ. हरीश निगम, डॉ. राजेंद्र गौतम, नचिकेता, राधेश्याम बंधु, प्रभुदयाल श्रीवास्तव, डॉ. जगदीश व्योम, गिरिमोहन गुरु, निर्मल जोशी, पूर्णिमा बर्मन, संजीव सलिल, शशि पाधा, कल्पना रामानी, श्रीकांत मिश्र 'कांत', नवीन चतुर्वेदी, श्यामबिहारी सक्सेना, शारदा मोंगा, वीनस केसरी, संगीता मनराल, कमलेश दीवान आदि बहुचर्चित हैं. 

वरिष्ठ तथा कनिष्ठ नवगीतकारों के ऐसे संकलन ३ पीढ़ियों के अवदान, गत ३ दशकों में नवगीत के कलेवर, भाषिक सामर्थ्य, बिम्ब-प्रतीकों में बदलाव, अलंकार चयन और सर्वाधिक महत्वपूर्ण नवगीत के कथ्य  में परिवर्तन के अध्ययन के लिए सामग्री मुहैया कराते हैं. संग्रह का मुद्रण, बँधाई आदि उत्तम है. नवगीतों में रूचि रखने वालों को इसे पढ़ना सुखद  करायेगा। 
***              

kruti charcha; jivan manovigyan

कृति चर्चा- 
जीवन मनोविज्ञान : एक वरदान 
[कृति विवरण: जीवन मनोविज्ञान, डॉ. कृष्ण दत्त, आकार क्राउन, पृष्ठ ७४,आवरण दुरंगा, पेपरबैक, त्र्यंबक प्रकाशन नेहरू नगर, कानपूर]

वर्तमान मानव जीवन जटिलताओं, महत्वाकांक्षाओं और समयाभाव के चक्रव्यूह में दम तोड़ते आनंद की त्रासदी न बन जाए इस हेतु चिंतित डॉ. कृष्ण दत्त ने इस लोकोपयीगी कृति का सृजन - प्रकाशन किया है. लेखन सेवानिवृत्त चिकित्सा मनोवैज्ञानिक हैं. 

असामान्यता क्या है?, मानव मन का वैज्ञानिक विश्लेषण, अहम सुरक्षा तकनीक, हम स्वप्न क्यों देखते हैं?, मन एक विवेचन एवं आत्म सुझाव, मां पेशीय तनावमुक्तता एवं मन: शांति, जीवन में तनाव- कारण एवं निवारण,समय प्रबंधन, समस्या समाधान, मनोवैज्ञानिक परामर्शदाता के शीलगुण, बुद्धि ही नहीं भावना भी महत्वपूर्ण, संवाद कौशल, संवादहीनता: एक समस्या, वाणी: एक अमोघ अस्त्र, बच्चे आपकी जागीर नहीं हैं, मांसक स्वास्थ्य के ३ प्रमुख अंग, मन स्वस्थ तो तन स्वस्थ, संसार में समायोजन का मनोविज्ञान,जीवन में त्याग नहीं विवेकपूर्ण चयन जरूरी, चेतना का विस्तार ही जीवन, जैसी दृष्टि वैसी सृष्टि, क्रोध क्यों होता है?, ईर्ष्या कहाँ से उपजती है?, संबंधों का मनोविज्ञान, संबंधों को कैसे संवारें?, सुखी दांपत्य जीवन का राज, अवांछित संस्कारों से कैसे उबरें?, अच्छे नागरिक कैसे बनें? तथा प्रेम: जीवन ऊर्जा का प्राण तत्व २९ अध्यायों में जीवनोपयोगी सूत्र लेखन ने पिरोये हैं. 

निस्संदेह गागर में सागर की तरह महत्वपूर्ण यह कृति न केवल पाठकों के समय का सदुपयोग करती है अपितु आजीवन साथ देनेवाले ऐसे सूत्र थमती है जिनसे पाठक, उसके परिवार और साथियों का जीवन दिशा प्राप्त कर सकता है. 

स्वायत्तशासी परोपकारी संगठन 'अस्मिता' मंदगति प्रशिक्षण एवं मानसिक स्वास्थ्य केंद्र, इंदिरानगर,लखनऊ १९९५ से मंदमति बच्चों को समाज की मुख्यधारा में संयोजित करने हेतु मानसोपचार (साइकोथोरैपी) शिविरों का आयोजन करती है. यह कृति इस दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है जिससे दूरस्थ जान भी लाभ ले सकते हैं. इस मानवोपयोगी कृति के लिए लेखक साधुवाद के पात्र हैं.           

लोकर्पण:

लोकार्पण:
तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय

हैदराबाद 15 नवंबर 2014। 'साहित्य मंथन' के तत्वावधान में दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा के सम्मेलन कक्ष में आयोजित एक समारोह में तेलुगु के प्रमुख कवि प्रो. एन. गोपि ने डॉ. ऋषभदेव शर्मा और डॉ. गुर्रमकोंडा नीरजा द्वारा लिखित पुस्तक 'तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय' का लोकार्पण किया इस अवसर पर प्रो. एम. वेंकटेश्वर अध्यक्ष, पद्मश्री जगदीश मित्तल उद्घाटनकर्ता, प्रो. देवराज मुख्य अतिथि,डॉ. जोराम यालाम नाबाम और विवेक नाबाम विशेष अतिथि के रूप में उपस्थित थे डॉ. बी. बालाजी द्वारा दिया गया परिचय वक्तव्य यहाँ अविकल रूप में प्रस्तुत है:
तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’ प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. जी नीरजा जी द्वारा रचित पुस्तक तेलुगु और हिंदी साहित्य के अध्येताओं, शोधार्थियों और प्रेमियों के लिए एक अभिनव भेंट है। भेंट इसलिए कह रहा हूँ कि एक पॉकेट डिक्शनरी की तरह मात्र 64 पृष्ठों की यह पुस्तक तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद के इतिहास को प्रस्तुत करती है। साथ ही अनुवाद के माध्यम से हिंदी साहित्य के पाठकों के समक्ष तेलुगु भाषी लोक की संस्कृति, लोकाचार और प्रथाएँ, तेलुगु प्रदेश की जीवन शैली, लोक विश्वास और लोकोक्तियाँ, नामकरण की शब्दावली का हिंदी में प्रवेश भी उद्घाटित करती है। यह समय कॉम्पैक्ट-डिजिटल का है। हमें सारी चीजें कॉम्पैक्ट में चाहिए ‘देखने में छोटे लगें, मगर प्रकट करें सारा संसार’। जी हाँ, यह पुस्तक इसी वाक्य को चरितार्थ करती है। प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी और डॉ. जी नीरजा जी ने बहुत परिश्रम किया होगा इसे कॉम्पैक्ट बनाने के लिए। 

इस पुस्तक की एक और विशेषता की ओर आप सब का ध्यान आकर्षित करना चाहूँगा। लेकिन इससे पहले यह बताना मैं अपना दायित्व समझता हूँ कि प्रो. ऋषभदेव शर्मा जी चाहे कोई साधारण लेख लिख रहे हों, किसी पुस्तक की भूमिका या समीक्षा लिख रहे हों या किसी विषय पर शोध करा रहे हों, एक वैज्ञानिक की तरह काम करते हैं। हर रचना की प्रक्रिया के समय वे वैज्ञानिक दृष्टि अपनाते हैं। विषय की सैद्धांतिकी को व्यावहारिक रूप देते हैं। डॉ. जी नीरजा जी भी इसी राह पर चल पड़ी हैं। यह पुस्तक इस बात का प्रमाण है। 

अब मैं, विशेषता की बात करूंगा। इस पुस्तक का प्रत्येक लेख अपने आप में एक स्वतंत्र लेख है। पाठक इसे कहीं से भी पढ़ना आरंभ कर सकता है। मान लीजिए पाठक पुस्तक का अंतिम लेख ‘नामकरण’ पढ़ना चाहता है तो उसे ‘ तेलुगु साहित्य के अनुवाद की परंपरा’ जो पहला लेख है, पढ़ने की मजबूरी महसूस नहीं करनी पड़ेगी। यही बात सभी लेखों पर लागू होती है। जैसे दूसरा लेख - अनुवाद की विकास यात्रा, तीसरा लेख - स्रोत भाषा की शब्दावली का प्रसार, चौथा लेख- सांस्कृतिक संदर्भ, पाँचवाँ लेख- लोकाचार और प्रथाएँ, छठा लेख- स्रोत भाषासमाज की जीवन शैली, सातवाँ लेख - उपपाठों की पहचान, आठवाँ लेख- सूचना संप्रेषण, नौवाँ लेख- लोकोक्तियाँ।इस अनुपम पुस्तक में कुल ग्यारह संक्षिप्त लेख सम्मिलित हैं।अंत में संदर्भ भी दिए गए हैं। यह तेलुगु से हिंदी अनुवाद पर तथा तुलनात्मक शोध की इच्छा रखने वाले शोधार्थी के लिए बहुत उपयोगी सामग्री है। यह पुस्तक अपने-आप में एक मार्गदर्शिका है। 

विवेच्य पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’ के लेखन के पीछे (लिखने का कारण) हिंदी भाषा और साहित्य के लिए काम करते हुए दोनों लेखकों की कर्मभूमि ‘तेलुगु प्रदेश और उसके साहित्य’ के प्रति दायित्व का निर्वाह है। इस दायित्व को दोनों लेखकों ने पूरी ईमानदारी से निभाया है। यह बात इस लेखकीय टिप्पणी से पुष्ट हो जाएगी– “तेलुगु से भी हिंदी सहित अन्य भारतीय भाषाओं में अनेक रचनाओं का अनुवाद हुआ है परंतु खेद का विषय है कि तेलुगु या अन्य दक्षिण भारतीय भाषाओं से हिंदी में अनूदित साहित्य को गंभीरता से नहीं लिया गया। प्राय: यह कहकर इन अनुवादों की उपेक्षा की जाती रही है कि अनुवाद ठीक नहीं हो रहे हैं या अनुवाद में प्रयुक्त भाषा कहीं-कहीं त्रुटिपूर्ण होती है या व्याकरण सम्मत होते हुए भी अनुवाद की भाषा पाठकों को उबाऊ लगती है। ये तमाम आलोचनाएँ अपनी जगह हैं और अनुवादकों की निरंतर साधना अपनी जगह है। इसलिए तेलुगु से हिंदी में अब तक अनेक रचनाओं का अनुवाद हो चुका है तथा अब भी हो रहा है।“

तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद के प्रदेय को पुस्तक में उद्धृत उद्धरण से बताने का प्रयास करूंगा- इस पुस्तक के माध्यम से लेखकद्वय ने उद्घाटित किया है कि तेलुगु साहित्य का हिंदी में अनुवाद होने से भारत की अन्य भाषाओं के साहित्य को लाभ हुआ है। इस संदर्भ में लेखक द्वारा उद्धृत प्रो. देवराज के कथन का उल्लेख करना चाहूँगा – "तेलुगु के कालजयी रचनाकार सी. नारायण रेड्डी ने काव्य में पंचपदी शैली के कुछ अद्भुत प्रयोग किए थे। उनकी पंचपदियों का हिंदी में अनुवाद प्रो. भीमसेन निर्मल ने किया था। कोई बीस साल पहले मैंने ये अनुवाद मणिपुरी भाषा के कवियों की एक सभा में पढे थे। मूल पाठ हिंदी में और व्याख्या मणिपुरी में। आयोजन स्थल से बाहर आते समय निर्मल जी के अनुवादों की वह पुस्तक मुझसे कवि लनचेनबा मीतै ने मांग ली। लगभग एक साल के बाद एक दिन लनचेनबा वह पुस्तक लौटाने आए। उनके हाथ में कागजों का एक पुलिंदा भी था। बोले, ‘सर, मेरी कुछ कविताएं सुनिए’। उन्होंने काफी देर तक जिन कविताओं का पाठ किया, वे सब पंचपदी शैली में थीं। इनमें जीवन के असंख्य अनुभव प्रभावशाली बिंबों में आकार ग्रहण करते प्रतीत हो रहे थे। मणिपुरी कविता में यह एक नवीन रचना शैली थी, जिसे तेलुगु के सी. नारायण रेड्डी की पंचपदियों से ग्रहण किया गया था। कवि लनचेनबा को इस बात का गर्व भी था कि उन्होंने अपनी मातृभाषा की काव्य परंपरा में एक नवीन वैशिष्ट्य जोड़ा। स्मरणीय है कि ‘येंङ्लु येंङ्लुबदा’ नाम से इन कविताओं का एक संग्रह छपा, जिसने मणिपुरी युवा कविता आंदोलन की महत्वपूर्ण कृति होने का गौरव प्राप्त किया और इसका हिंदी में अनुवाद सिद्धनाथ प्रसाद द्वारा किया गया, जो ‘जित देखूँ’ नाम से 1998 में प्रकाश में आया। इस घटना से तेलुगु, मणिपुरी और हिंदी के संबंध भी सामने आते हैं तथा भारतीय साहित्य के निर्माण की प्रक्रिया पर भी प्रकाश पड़ता है।"

तेलुगु साहित्यकारों की रचनाधर्मिता और सामाजिक यथार्थ के प्रति जागरूकता भी इस पुस्तक के माध्यम से हिंदी पाठकों के समक्ष प्रकट होती है। इस संदर्भ में पुस्तक में ‘ऋषभ उवाच’ से उद्धृत कथन दृष्टव्य है– “निखिलेश्वर का मत है कि तेलुगु साहित्यकार सामाजिक यथार्थ के प्रति अत्यंत सजग रहे हैं तथा पश्चिमी साहित्य में जो परिवर्तन 300 वर्षों में हुए, तेलुगु में वे 100 वर्ष में संपन्न हो गए।“ 

कहने का अभिप्राय यह है कि तेलुगु साहित्यकारों ने जिन विधाओं और विषयों पर अपनी लेखनी चलाई है, उन विधाओं और विषयों का अनुवाद के माध्यम से हिंदी में तथा भारत की अन्य भाषाओं में आदान-प्रदान होता है तो उन भाषाओं के साहित्य को समृद्ध होने के अवसर मिलने लगते हैं। इस कार्य में आलोचनाओं की परवाह न करते हुए साधना कर रहे सारे अनुवादक बधाई के पात्र हैं और इस महत्तर कार्य की जानकारी हिंदी पाठक तक पहुंचाने में यह कृति सफल हुई है। 

लेखकद्वय ने तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद संबंधी अनेक आलेखों तथा कतिपय अन्य स्रोतों से प्राप्त जानकारी के आधार पर तेलुगु से हिंदी में अनूदित साहित्य को विधावार सूची बद्ध किया है। और 1954 से अब तक काव्य के 100, उपन्यास के 49, कहानी संग्रहों के 49 तथा विविध विधाओं जिनके अंतर्गत निबंध, एकांकी, नाटक, जीवनी, इतिहास, भाषाविज्ञान, काव्यशास्त्र, व्याख्या-टीका, दर्शनशास्त्र, आत्मकथा, समीक्षा, अनुवादशास्त्र आदि शामिल हैं के 65 अनुवादों की सूची उपलब्ध कराई गई है। 

भारत की बहुभाषिकता अनुवाद के माध्यम से ही सम भाषिकता के रूप में हमारे सामने उपस्थित होती है। भारत का हर नागरिक कम से कम तीन भाषाओं का ज्ञाता होता है और बहुभाषिकता को ग्रहण कर समभाषिक होने के प्रमाण देता रहता है। अनुवाद के माध्यम से राष्ट्रीय एकता प्रकट होती है। इसे बहुत ही सटीक रूप में रेखांकित करती है यह पुस्तक ‘तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय’। 

अंत में मैं इतना अवश्य कहना चाहूँगा कि यह पुस्तक हिंदी पाठक के समक्ष तेलुगु साहित्य के हिंदी अनुवाद और उसके प्रदेय को बड़ी शालीनता से, बिना किसी शोर और आडंबर के उद्घाटित करती है। लेखकद्वय ने बड़े परिश्रम से विवेच्य कृति की रचना की है। दोनों को बहुत-बहुत शुभकामनाएँ। साथ ही, प्रकाशक परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद को भी धन्यवाद.

पुस्तक विवर: तेलुगु साहित्य का हिंदी अनुवाद : परंपरा और प्रदेय, ऋषभदेव शर्मा और गुर्रमकोंडा नीरजा, 2015, परिलेख प्रकाशन, नजीबाबाद, 50 रु., 64 पृष्ठ, ISBN - 978-93-84068-11-0  

सोमवार, 24 नवंबर 2014

pustak charcha:


    


 

पुस्तक सलिला: हिन्दी महिमा सागर

[पुस्तक विवरण: हिन्दी महिमा सागर, संपादक डॉ. किरण पाल सिंह, आकार डिमाई, आवरण बहुरंगी पेपरबैक, पृष्ठ २०४, प्रकाशक भारतीय राजभाषा विकास संस्थान, १००/२ कृष्ण नगर, देहरादून २४८००१]

हिंदी दिवस पर औपचारिक कार्यक्रमों की भीड़ में लीक से हटकर एक महत्वपूर्ण प्रकाशन हिंदी महिमा सागर का प्रकाशन है. इस सारस्वत अनुष्ठान के लिए संपादक डॉ. किरण पाल सिंह तथा प्रकाशक प्रकाशक भारतीय राजभाषा विकास संस्थान देहरादून साधुवाद के पात्र हैं. शताधिक कवियों की हिंदी पर केंद्रित रचनाओं का यह सारगर्भित संकलन हिंदी प्रेमियों तथा शोध छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है. पुस्तक का आवरण तथा मुद्रण नयनाभिराम है. भारतेंदु हरिश्चंद्र जी, मैथिलीशरण जी, सेठ गोविन्ददास जी, गया प्रसाद शुक्ल सनेही, गोपाल सिंह नेपाली, प्रताप नारायण मिश्र, गिरिजा कुमार माथुर, डॉ. गिरिजा शंकर त्रिवेदी डॉ. लक्ष्मीमल्ल सिंघवी, आदि के साथ समकालिक वरिष्ठों अटल जी, बालकवि बैरागी, डॉ. दाऊ दयाल गुप्ता, डॉ. गार्गी शरण मिश्र 'मराल' , संजीव वर्मा 'सलिल', आचार्य भगवत दुबे, डॉ. राजेंद्र मिलन, शंकर सक्सेना, डॉ. ब्रम्हजित गौतम, परमानन्द जड़िया, यश मालवीय आदि १०८ कवियों की हिंदी विषयक रचनाओं को पढ़ पाना अपने आपमें एक दुर्लभ अवसर तथा अनुभव है. मुख्यतः गीत, ग़ज़ल, दोहा, कुण्डलिया तथा छंद मुक्त कवितायेँ पाठक को बाँधने में समर्थ हैं.
***



muktika:

चित्र पर रचना: मुक्तिका



देख जंगल
कहाँ मंगल?

हर तरफ है
सिर्फ दंगल

याद आते
बहुत हंगल

स्नेह पर हो
बाँध नंगल

भू मिटाकर
चलो मंगल

***


navgeet:

चित्र पर नवगीत:


दादी को ही नहीं
गाय को भी भाती हो धूप

तुम बिन नहीं सवेरा होता
गली उनींदी ही रहती है
सूरज फसल नेह की बोता
ठंडी मन ही मन दहती है
ओसारे पर बैठी
अम्मा फटक रहीं है सूप

हित-अनहित के बीच खड़ी
बँटवारे की दीवार
शाख प्यार की हरियाए झाँके
दीवाल के पार
भौजी  चलीं मटकती, तसला
लेकर दृश्य अनूप

तेल मला दादी के, बैठी
देखूं किसकी राह?
कहाँ छबीला जिसने पाली
मन में मेरी चाह
पहना गया मुँदरिया बनकर
प्रेमनगर का भूप
*** 

navgeet:

नवगीत:  

अड़े खड़े हो 
न राह रोको 


यहाँ न झाँको 
वहाँ न ताको 
न उसको घूरो 
न इसको देखो 
परे हटो भी 
न व्यर्थ टोको 

इसे बुलाओ 
उसे बताओ 
न राज अपना 
कभी बताओ
न फ़िक्र पालो 
न भाड़ झोंको 

***


muktak:

मुक्तक : 

लालच बढ़ी?, बुढ़ाये हो तुम 
अब भी व्यर्थ चढ़ाये हो तुम 
फॉल चढ़ाने आये दुनिया 
निज तस्वीर मढ़ाये हो तुम??
*

रविवार, 23 नवंबर 2014

नवगीत महोत्सव लखनऊ : १५-१६ नवंबर २०१४ 
लखनऊ : गोमतो नगर विभूति खण्ड स्थित
 कालिन्दी विला में दो दिवसीय नवगीत 
महोत्सव 2014 का शुभारम्भ 15 नवम्बर 
की सुबह 8 बजे हुआ। अनुभूति, अभिव्यक्ति 
व नवगीत की पाठशाला के माध्यम से वेब
 पर नवगीत के व्यापक प्रसार हेतु प्रतिबद्ध 
अभिव्यक्ति विश्वम द्वारा आयोजित यह 
कार्यक्रम न केवल अपनी रचनात्मकता एवं  
मौलिकता हेतु जाना जाता है, बल्कि नवगीत के शिल्प और कथ्य के 
विविध पहलुओं से परिचय भी कराता है। यह कार्यक्रम पिछले  चार वर्षों 
से लखनऊ में सम्पन्न हो रहा है। 
 
संयोजक: पूर्णिमा वर्मन, प्रवीण सक्सैना, सहयोग: श्रीकांत मिश्र-रोहित रुसिआ  
कार्यक्रम का शुभारम्भ देश-विदेश से पधारे नए-पुराने साहित्यकारों की 
उपस्थिति में वरिष्ठ नवगीतकार सर्वश्री कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, धनन्जय 
सिंह, बुद्धिनाथ मिश्र, निर्मल शुक्ल, राम नारायण रमण,शीलेन्द्र सिंह चौहान, 
बृजेश श्रीवास्तव, डॉ. अनिल मिश्र एवं जगदीश व्योम के द्वारा माँ सरस्वती के 
समक्ष दीप-प्रज्ज्वलन से हुआ।
 
  डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र,       कुमार रवीन्द्र,  ब्रजेश श्रीवास्तव,     राम सेंगर,  धनञ्जय सिंह 
प्रथम सत्र में चर्चित चित्रकार-प्राध्यापक डॉ राजीव नयन जी ने शब्द-रंग पोस्टर प्रदर्शनी का उद्घाटन किया। नए-पुराने नवगीतकारों के गीतों पर आधारित यह पोस्टर प्रदर्शनी आगंतुकों के लिए आकर्षण का केंद्र रही। ये पोस्टर पूर्णिमा वर्मन, रोहित रूसिया, विजेंद्र विज एवं अमित कल्ला द्वारा तैयार किये गए थे।\
कार्यक्रम के दूसरे सत्र में लब्धप्रतिष्ठित गीतकार डॉ. बुद्धिनाथ मिश्र का 'गीत और नवगीत में अंतर' शीर्षक पर व्याख्यान हुआ। आपका कहना था कि नवगीत का प्रादुर्भाव हुआ ही इसलिये था कि एक ओर हिन्दी कविता लगातार दूरूह होती जा रही थी, और दूसरी ओर हिन्दी साहित्य में शब्द-प्रवाह को तिरोहित किया जाना बहुत कठिन था। अतः नवगीत नव-लय-ताल-छंद और कथ्य के साथ सामने आया।
कार्यक्रम के तीसरे सत्र में देश भर से आये वरिष्ठ नवगीतकारों द्वारा नवगीतों का पाठ हुआ। इस सत्र के प्रमुख आकर्षण रहे - श्रद्धेय कुमार रवीन्द्र, राम सेंगर, अवध बिहारी श्रीवास्तव, राम नारायण रमण, श्याम श्रीवास्तव, ब्रजेश श्रीवास्तव, शीलेन्द्र सिंह चौहान, डॉ मृदुल, राकेश चक्र, जगदीश पंकज एवं अनिल मिश्रा। कार्यक्रम के अध्यक्ष कुमार रवीन्द्र जी  एवं मुख्य अतिथि राम सेंगर जी रहे। मंच संचालन अवनीश सिंह चौहान ने किया।
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