स्तम्भ menu

Drop Down MenusCSS Drop Down MenuPure CSS Dropdown Menu

शनिवार, 29 अगस्त 2015

अंग्रेजी कविता

Poem:
VELUES
Sanjiv
*
I slept
I awakened
I entered my childhood
I smiled.
I slept
I awakened
I entered my young age
I quarreled.
I slept
I awakened
I entered my old age
I repented.
An angel came in dream
And asked
If I get a new life
How will I like to live?
I replied
My life and way of living
Are my own
I will live it in the same way.
I will do nothing better
I will do nothing worse
I will like to live in my own way
It's better to die than to live
According to other's values.
***

navgeet

नवगीत :
संजीव 
*















मैं बना लूँ मित्र 
तो क्या साथ 
डेटिंग पर चलोगी?
*
सखी हो तुम
साथ बगिया-गली में
हम खूब खेले
हाथ थामे
मंदिरों में गये
देखे झूम मेले
खाई अमिया तोड़ खट्टी
छीन इमली करी कट्टी
पढ़ी मानस, फाग गायी
शरारत माँ से छिपायी
मैं पकड़ लूँ कान
तो बन सपन
नयनों में प लोगी?
मैं बना लूँ मित्र
तो क्या साथ
डेटिंग पर चलोगी?
*
आस हो तुम
प्यास मटकी उठाकर
पनघट गये हम
हास समझे ज़िंदगी
तज रास, हो
बेबस वरे गम
साथ साया भी न आया
हुआ हर अपना पराया
श्वास सूली पर चढ़े चुप
किन्तु कब तुमसे सके छुप
आखिरी दम हे सुधा!
क्या कभी
चन्दर से मिलोगी?
मैं बना लूँ मित्र
तो क्या साथ
डेटिंग पर चलोगी?
*
बड़ों ने ही
बड़प्पन खोकर
डुबायी हाय नौका
नियति निष्ठुर
दे सकी कब
भूल सुधरे- एक मौक़ा?
कोशिशों का काग बोला
मुश्किलों ने ज़हर घोला
प्रथाओं ने सूर्य सुत तज
कन्हैया की ली शरण भज
पाँच पांडव इन्द्रियों
की मौत कृष्णा
बनोगी, अब ना छलोगी?
मैं बना लूँ मित्र
तो क्या साथ
डेटिंग पर चलोगी?
*

doha salila

दोहा सलिला:
धारण करने योग्य जो, शुभ सार्थक वह धर्म 
जाति कुशलता कर्म की, हैं जीवन का मर्म
*
सूर्य कान्त सब तिमिर हर, देता रहा प्रकाश
सलिल तभी ज्योतित हुआ, आशा का आकाश
*
भट नागर संघर्ष कर, रच दे मंजुल मूल्य 
चित्र गुप्त तब प्रगट हो, मिलता सत्य अमूल्य
*
निवेदिता निष्ठा रही, प्रार्थी था विश्वास
श्री वास्तव में पा सका, सत शिव जनित प्रयास.
*

doha salila

दोहा सलिला :

शक्ति रहित शिव शव बने, प्रकृति-पुरुष मिल ईश
बिना लक्ष्मी चाहता, कौन मिले जगदीश
*
अनिल अनल भू नभ सलिल, पंचतत्व मय देह
पंचतत्व में मिल मिले,इससे सदा विदेह
*
धारण करने योग्य जो, शुभ सार्थक वह धर्म 
जाति कुशलता कर्म की, हैं जीवन का मर्म
*
शक्ति न काया मात्र है, शक्ति अनश्वर तत्व 
काया बन-मिटती रहे, शक्ति ईश का सत्व
*

doha salila

दोहा सलिला:
संजीव 
*
कर न अपेक्षा मूढ़ मन, रख मन में संतोष 
कर न उपेक्षा किसी की, हो तो मत कर रोष
*
बुरा न इतना बुरा है, अधिक बुरा है अन्य
भला भले से भी अधिक, खोजे-मिले अनन्य
*
जो न भलाई देखता, उसका मन है हीन
जो न सराहे अन्य को, उस सा कोई न दीन
*
कभी न कल पर छोड़िए, आज कीजिए काज
कल क्या जाने क्या घटे, कहाँ और किस व्याज
*
अघट न घटता है कभी, घटित हुआ जो ठीक
मीन-मेख मत कर'सलिल', छोड़ पुरानी लीक
*
भीख याचना अपेक्षा, नाम तीन-हैं एक
साथ न उनके हो कभी, गौरव बुद्धि विवेक
*
खरे-खरे व्यवहार कर, तजकर खोटे काम
चाम चाहता काम पर, चाम न चाहे काम
*
ममता संता विषमता, जग-जीवन के रंग
होते हैं सबरंग भी, कभी-कभी बदरंग
*
देख कीर्ति-यश अन्य का, होता जो न प्रसन्न
उससे बढ़कर है नहीं, दूजा कोई विपन्न
*
सोच सकारात्मक रखें, जब भी करें विरोध
स्वस्थ्य विरोध करे वही, जो हो नहीं अबोध
*
शमशानी वैराग का, 'सलिल' न कोई अर्थ
दृढ़ विशवास किये बिना, कार्य सभी हो व्यर्थ
*
गरल-पान कर जो करे,सतत सुधा का दान
उसको सब जग पूजता, कह शंकर भगवान
*
सत-शिव-सुंदर का करें, मन में सदा विचार
सत-चित-आनंद दे 'सलिल', मन को विमल विचार 
*
सूर्य कान्त सब तिमिर हर, देता रहा प्रकाश 
सलिल तभी ज्योतित हुआ, आशा का आकाश
*
निवेदिता निष्ठा रही, प्रार्थी था विश्वास 
श्री वास्तव में पा सका, सत शिव जनित प्रयास
*

chat charcha

चैट चर्चा :
आजकल चैट बातचीत का खूब चलन है. विविध पृष्ठ भूमियों के साथी मित्रता का आग्रह करते हैं. फिर वार्ता का दौर… आजकल दूरदर्शन, फिल्म और पत्रकारिता ने समाज को 'सादा जीवन उच्च विचार' पर 'मौज-मस्ती' मंत्र दे दिया है. खुली हवा ने त्याग-परिश्रम के सिक्कों को खोटा घोषित कर भोग का वातावरण बना दिया है. बहुधा फेसबुक मित्र इसी दिशा के आग्रही होते हैं. कुछ जिज्ञासु, कुछ लती. जिज्ञासा को उचित समाधान न मिले तो वह समाज के लिए घातक होती है. लती को सिर्फ कानून ही सुधार सकता है. चैट मित्रों में पुरुष-महिला और किशोर-वयस्क सभी हैं. बहुधा ये दैहिक सम्बन्ध की सम्भावना तलाशते संपर्क करते हैं. विस्मय है कि किशोरियों से लेकर प्रौढ़ायें तक सीधे आमंत्रण देने में संकोच नहीं करतीं. सच कहूँ तो आरम्भ में मुझे भय लगता था. फिर विचार आया कि भागना समाधान नहीं है. कुछ सकारात्मक प्रयास किया जाए.
आज एक महिला से हुई चैट चर्चा आपके समक्ष प्रस्तुत है. आप इस सम्बन्ध में क्या सोचते हैं?
संकेत: - मित्र, = मैं
- g m ji
= शुभ प्रभात.
- kis diparment me the aap?
= लोक निर्माण विभाग
- pwd ?
- जी
- fir acha paisa banaya hoga
= यही नहीं किया. कविता लिखता रहा और खुश होकर इज्जत से जीता रहा. सरस्वती पुत्र के पास लक्ष्मी नहीं आती.
- subah kitane baje uth jate hai?
= ६-६.३० बजे.
- us ke bad kaya2 karte hai?
= प्रात: भ्रमण, स्नान, पूजन और लेखन
- kitana bhamad karte hai?
= लगभग ३-४ किलोमीटर
- v good
= kitane salo se ye bharmad kar rahe hai?aur regular hai?
- कोशिश करता हूँ. कभी-कभी नहीं भी जा पता
= आपकी क्या दिनचर्या है?
- mai subah 6 se 7 baje tak uthti hoon, thoda yoga, aur kuch nahii
= योग तो शुभ ही शुभ है.
- haa
= गरल-पान कर जो करे,सतत सुधा का दान
उसको सब जग पूजता, कह शंकर भगवान
- app kaun se bhagwan ki pooja karte hai?
= सभी की.
- shankar bhagwan ka?
= शिव-शक्ति, राम-सीता, कृष्ण-राधा, गणेश, चित्रगुप्त जी, हनुमान जी आदि
- shiv shakti ji ke bare me kuch bataye
= शक्ति श्रद्धा है, और विश्वास शंकर. श्रद्धा औरों का शुभ करने की प्रेरणा देती है और विश्वास औरों से अपनी रक्षा करने की सामर्थ्य देता है. माँ के प्रति श्रृद्धा होती है और प्रति विश्वास इसलिए पारवती को जगजननि और शिव को है.
शिव को जगतपिता कहा गया है।
- ohhhh aur bataye
= खुद पर विश्वास हो तो मनुष्य टेढ़े-मेढ़े रस्ते से भी निकल आता है. शिव विश्वास हैं अत: वे योग और भोग, शुभ और अशुभ दोनों के साथ रहकर भी सदा प्रसन्न रहते हैं. हम अपने मन को ऐसा बना सकें तो कोई कुछ बिगाड़ नहीं सकता।
- bhog kaya hai?
= शरीर को स्वस्थ्य बनाये रखने के लिए जिन वस्तुओं को ग्रहण करना आवश्यक है वह भोग है. भोग को छोड़ कर जिया नहीं जा सकता और अत्यधिक भोग कर भी जिया नहीं जा सकता। स्वस्थ्य जीवन के लिए संयमित भोग आवश्यक है. जैसे बिना खाए भी नहीं जी सकते और अत्यधिक खाकर भी नहीं जी सकते. सीमित मात्रा में खाना जरूरी है.
- ji, mughe laga bhog means sex
= भोग कई तरह का होता है. देह की कई आवश्यकताएं हैं. यौन सम्बन्ध प्रजनन हेतु आवश्यक है.
- deh ki kaya2 awashaktaye hai?
= आप स्वयं देहधारी हैं. जिन वस्तुओं के बिना देह की सुरक्षा न हो सके वे प्राथमिक अनिवार्यताएं हैं. इन्हें सामान्य भाषा में रोटी, कपड़ा और मकान कह सकते हैं.
- ji ab bat bataye kya sahi hai? kya aacha sex se shiv ji prapti hoti hai?
= पूर्व में निवेदन किया है कि शिव विश्वास हैं. मनुष्य अपने जीवन में कोई भी कार्य श्रेष्ठता से करे तो उसका विश्वास बढ़ता है. जैसे कोई विद्यार्थी प्रथम आये, कोई खिलाड़ी बहुत अच्छा खेले, कोई गायक मधुरता से गाये. कोई अभिनेता जीवंत अभिनय करे तो उसका विश्वास बढ़ता है. यही शिवत्व की प्राप्ति है. ऐसा ही अन्य क्रियाओं के सम्बन्ध में है. शिव तत्व गुणवत्ता से सम्बंधित है मात्रा से नहीं
और कोई जिज्ञासा?
- bahut hi insperation bataya aap ne. bahut गyan hai aap me sabhi chij ka
maha dev aap ko swath n lambi aau de
= आप जैसे मित्रों से सीखता रहता हूँ और यथावसर बाँट लेता हूँ. तेरा तुझको अर्पण क्या लागे मेरा। आपकी सद्भावनाएँ मुझे संबल देंगी।
- sukriya ji

book review

कृति चर्चा:
'थोड़ा लिखा समझना ज्यादा' : सामयिक विसंगतियों का दस्तावेज
चर्चाकार: संजीव
*
[कृति विवरण: थोड़ा लिखा समझना ज्यादा, नवगीत संग्रह, जय चक्रवर्ती, २०१५, आकार डिमाई, आवरण सजिल्द, बहुरंगी, जैकेट सहित, पृष्ठ ११९, ३००/-, उत्तरायण प्रकाशन लखनऊ, संपर्क: एम १/१४९ जवाहर विहार रायबरेली २२९०१० चलभाष ९८३९६६५६९१, ईमेल: jai.chakrawarti@gmail.com ]
*
'बचपन में अक्सर दिन भर के कामों से निवृत्त होकर शाम को पिता जी मुझे अपने पास बिठाते और कबीर, तुलसी, मीरा के भजन तथा उस समय की फिल्मों के चर्चित धार्मिक गीत सुनाते.… गीतों में घुले पिता जी के स्वर आज उनके निधन के पच्चीस वर्षों बाद भी मेरे कान में ज्यों के त्यों गूँजते हैं.' १५ नवंबर १९५८ को जन्मे यांत्रिकी अभियंत्रण तथा हिंदी साहित्य से सुशिक्षित जय चक्रवर्ती पितृ ऋण चुकाने का सारस्वत अनुष्ठान इन नवगीतों के माध्यम से कर रहे हैं. दोहा संग्रह 'संदर्भों की आग' के माध्यम से समकालिक रचनाकारों में अपनी पहचान बना चुके जय की यह दूसरी कृति उन्हें साहित्य क्षेत्र में चक्रवर्तित्व की प्रतिष्ठा दिलाने की दिशा में एक और कदम है. निस्संदेह अभी ऐसे कई कदम उन्हें उठाने हैं.
नवगीत समय के सफे पर धड़कते अक्षरों-शब्दों में जन-गण के हृदयों की धड़कनों को संवेदित कर पाठकों-श्रोताओं के मर्म को स्पर्श ही नहीं करता अपितु उनमें अन्तर्निहित सुप्त संवेदनाओं को जाग्रत-जीवंत कर चैतन्यता की प्रतीति भी कराता है. इन नवगीतों में पाठक-श्रोता अपनी अकही वेदना की अभिव्यक्ति पाकर चकित कम, अभिभूत अधिक होता है. नवगीत आम आदमी की अनुभूति को शब्द-शब्द, पंक्ति-पंक्ति में अभिव्यक्त करता है. इसलिए नवगीत को न तो क्लिष्ट-आभिजात्य संस्कार संपन्न भाषा की आवश्यकता होती है, न ही वह आम जन की समझ से परे परदेशी भाषा के व्याल जाल को खुद पर हावी होने देता है. नवगीत के लिये भाषा, भाव की अभिव्यक्ति का माध्यम मात्र है. भाव की प्रतीति करने के लिये नवगीत देशज-विदेशज, तत्सम,-तद्भव, नये-पुराने, प्रचलित-अल्प प्रचलित शब्दों को बिना किसी भेद-भाव के अंगीकार करता है. विद्वान लक्षण-व्यंजना के चक्रव्यूह रचते रहे किन्तु नवगीत जमीन से जुड़े कवि की कलम से निकलकर सीधे जन-मन में पैठ गया. गीत के निधन की घोषणा करनेवाले महामहिमों का निधन हो गया किन्तु गीत-नवगीत समय और परिवेश के अनुरूप चोला बदलकर जी गया. नवगीत के उद्भव-काल के समय की भंगिमा को अंतिम मानकर उसके दुहराव के प्रति अति आग्रही कठघरों की बाड़ तोड़कर नवगीत को जमीन से आकाश के मध्य विचरण करने में सहायक कलमों में से एक जय की भी है. ' पेशे से अभियंता अपना काम करे, क्या खाला का घर समझकर नवगीत में घुस आता है?' ऐसी धारणाओं की निस्सारता जय चक्रवर्ती के इन नवगीतों से प्रगट होती है.
अपनी अम्मा-पिताजी को समर्पित इन ५१ नवगीतों को अवधी-कन्नौजी अंचल की माटी की सौंधी महक से सुवासित कर जय ने जमीनी जड़ें होने का प्रमाण दिया है. जय जनानुभूतियों के नवगीतकार हैं.
'तुम्हारी दृष्टि को छूकर / फिरे दिन / फिर गुलाबों के
तुम्हारा स्पर्श पाकर / तन हवाओं का / हुआ चंदन
लगे फिर देखने सपने / कुँवारी / खुशबुओं के मन
फ़िज़ाओं में / छिड़े चर्चे / सवालों के-जवाबों के '
यौगिक जातीय छंद में रचित इस नवगीत में कवि हिंदी-उर्दू शब्दों के गंगो-जमुनी प्रवाह से अपनी बात कहता है.जीवन के मूल श्रृंगार रस से आप्लावित इस नवगीत में जय की भाषा का सौंदर्य किसी अंकुर और कली के निर्मल लगाव और आकांक्षा की कथा को सर्वग्राही बनाता है.
'लिखे खत तितलियों को / फूल ने / अपनी कहानी के
खनक कर पढ़ गये / कुछ छंद / कंगन रातरानी के
तुम्हारी आहटों से / पर खुले / मासूम ख्वाबों के'
जय के नवगीत माता-पिता को सुमिरकर माँ जैसा होना, पिता तथा खुद से हारे मगर पिता आदि नवगीतों में वात्सल्य रस की नेह-नर्मदा प्रवाहित करते हैं. इनमें कहीं भी लिजलिजी भावुकता या अतिरेकी महत्ता थोपने का प्रयास नहीं है. ये गीत बिम्बों और प्रतीकों का ऐसा ताना-बाना बुनते हैं जिसमें आत्मज की क्षणिक स्मृतियों की तात्विक अभिव्यक्ति सनातनता की प्रतीति कर पाती है:
'माँ होना ही / हो सकता है / माँ जैसा होना' में जय माँ की प्रशंसा में बिना कुछ कहे भी उसे सर्वोपरि कह देते हैं. यह बिना कहे कह दें की कला सहज साध्य नहीं होती.
धरती , नदिया, / धूप, चाँदनी, खुशबू, / शीतलता
धैर्य, क्षमा, करुणा, / ममता, / शुचि-स्नेहिल वत्सलता
किसके हिस्से है / उपमा का / यह अनुपम दोना
माँ को विशेषणों से न नवाज़कर उससे प्राप्त विरासत का उल्लेख करते हुए जय महाभागवत छंद में रचित इस नवगीत के अंत में और किसे आता है / सपनों में / सपने बोना' कहकर बिना कहे ही जय माँ को सृष्टि में अद्वितीय कह देते हैं.
पिता को समर्पित नव गीत में जय 'दुनिया भर से जीते / खुद से- / हारे मगर पिता', 'घर की खातिर / बेघर भटके / सारी उमर पिता', 'किसे दिखाते / चिंदी-चिंदी / अपना जिगर पिता' आदि अभिव्यक्तियों में सिर्फ अंतर्विरोध के शब्द चित्र उपस्थित नहीं करते अपितु पिता से अपेक्षित भूमिका और उस भूमिका के निर्वहन में झेली गयी त्रासदियों के इंगित बिना विस्तार में गये, पाठक को समझने के लिये छोड़ देते हैं. 'चिंदी-चिंदी' शब्द का प्रयोग सामान्यत: कपड़े के साथ किया जाता है, 'जिगर' के साथ 'टुकड़े-टुकड़े' शब्द अधिक उपयुक्त होता।
सजावट, बनावट और दिखावट की त्रित्रासदियों से आहत इस युग की विडम्बनाओं और विसंगतियों से हम सबको प्राय: दिन दो-चार होना होता है. जय गीत के माध्यम से उन्हें चुनौती हैं:
मौत से मत डराओ मुझे / गीत हूँ मैं / मरूँगा नहीं
जन्म जब से हुआ / सृष्टि का
मैं सृजन में हूँ, विध्वंस में / वास मेरा है हर
सांस में / मैं पला दर्द के वंश में
आँखें दिखाओ मुझे / गीत हूँ मैं / डरूँगा नहीं
समय से सवाल करनेवाला गीतकार अपने आप को भी नहीं बख़्शता. वह गीतकार बिरादरी से भी सवाल करता है की जो वे लिख रहे हैं वह वास्तव में देखा है अथवा नहीं? स्पष्ट है की गीतकार कोरी लफ़्फ़ाज़ी को रचनाओं में नहीं चाहता।
आपने जितना लिखा, / दिखा? / सच-सच बताना
शब्द ही तो थे / गये ले आपको / जो व्योम की ऊँचाईयों पर
और धरती से / मिला आशीष चिर सम्मान का / अक्षय-अनश्वर
आपको जितना मिला / उतना दिया? / सच-सच बताना
विशव के पुरातनतम और श्रेष्ठतम संस्कृति का वाहक देश सिर्फ सबसे बड़ा बाजार बनकर इससे अधिक दुखद और क्या हो सकता है? सकल देश के सामाजिक वातावरण को उपभोक्तावाद की गिरफ्त में देखकर जय भी विक्षुब्ध हैं:
लगीं सजने कोक, पेप्सी / ब्रेड, बर्गर और पिज्जा की दुकानें
पसरे हुए हैं / स्वप्न मायावी प्रकृति के / छात्र ताने
आधुनिकता का बिछा है / जाल मेरे गाँव में
लोकतंत्र में लोक की सतत उपेक्षा और प्रतिनिधियों का मनमाना आचरण चिंतनीय है. जब माली और बाड़ ही फसल काटने-खाने लगें तो रक्षा कौन करे?
किसकी कौन सुने / लंका में / सब बावन गज के
राजा जी की / मसनद है / परजा छाती पर
रजधानी का / भाग बाँचते / चारण और किन्नर
ध्वज का विक्रय-पत्र / लिए है / रखवाले ध्वज के
पोर-पोर से बिंधी / हुयी हैं / दहशत की पर्तें
स्वीकृतियों का ताज / सम्हाले / साँपों की शर्तें
अँधियारों की / मुट्ठी में हैं / वंशज सूरज के
शासकों का 'मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में' वाला रवैया गीतकार को उद्वेलित करता है.
वृन्दावन / आग में दहे / कान्हा जी रास में मगन
चाँद ने / चुरा लीं रोटियाँ / पानी खुद पी गयी नदी
ध्वंस-बीज / लिये कोख में / झूमती है बदचलन नदी
वृन्दावन / भूख से मरे / कान्हा जी जीमते रतन
'कान्हा जी जयंती रातें जीमते रतन' में तथ्य-दोष है. रतन को जीमा (खाया) नहीं जा सकता, रत्न को सजाया या जोड़ा-छिपाया जाता है.
संविधान प्रदत्त मताधिकार के बेमानी होते जाने ने भी कवि को चिंतित किया है. वह नागनाथ-साँपनाथ उम्मीदवारी को प्रश्न के कटघरे में खड़ा करता है:
कहो रामफल / इस चुनाव में / किसे वोट दोगे?
इस टोपी को / उस कुर्ते को / इस-उड़ झंडे को
दिल्ली दुखिया / झेल रही है / हर हथकंडे को
सड़सठ बरसों तक / देखा है / कब तक कब तक देखोगे?
खंड-खंड होती / आशाएँ / धुआँ - धुआँ सपने
जलते पेट / ठिठुरते चूल्हे / खासम-खास बने
गणित लगाना / आज़ादी के / क्या-क्या सुख भोगे?
चलो रैली में, खतरा बहुत नज़दीक है, लोकतंत्र है यहाँ, राजाजी हैं धन्य, ज़ख्म जो परसाल थे, लोकतंत्र के कान्हा, सब के सब नंगे, वाह मालिक ,फिर आयी सरकार नयी आदि नवगीत तंत्र कार्यपद्धति पर कटाक्ष करते हैं.
डॉ. भारतेंदु मिश्र इन नवगीतों में नए तुकांत, नई संवेदना की पड़ताल, नए कथ्य और नयी संवेदना ठीक ही रेखांकित करते हैं. डॉ. ओमप्रकाश सिंह मुहावरों, नए , नए बिम्बों को सराहते हैं. स्वयं कवि 'ज़िंदगी की जद्दोजहद में रोजाना सुबह से शाम तक जो भोगा उसे कागज़ पर उतारते समय इन गीतों के अर्थ ज़ेहन में पहले आने और शब्द बाद में देने' ईमानदार अभिव्यक्ति कर अपनी रचना प्रक्रिया का संकेत करता है. यही कारण है कि जय चक्रवर्ती के ये नवगीत किसी व्याख्या के मोहताज़ नहीं हैं. जय अपने प्रथम नवगीत संग्रह के माध्यम से सफे पर निशान छोड़ने के कामयाब सफर पर गीत-दर-गीत आगे कदम बढ़ाते हुए उम्मीद जगाते हैं.
***

doha salila

दोहा सलिला:
*
रक्षा किसकी कर सके, कहिये जग में कौन?
पशुपतिनाथ सदय रहें, रक्षक जग के मौन
*
अविचारित रचनाओं का, शब्दजाल दिन-रात
छीन रहा सुख चैन नित, बचा शारदा मात
*
अच्छे दिन मँहगे हुए, अब राखी-रूमाल
श्रीफल कैसे खरीदें, जेब करे हड़ताल 
*
कहीं मूसलाधार है, कहीं न्यून बरसात
दस दिश हाहाकार है, गहराती है रात
*
आ रक्षण कर निबल का, जो कहलाये पटेल
आरक्षण अब माँगते, अजब नियति का खेल
*
आरक्षण से कीजिए, रक्षा दीनानाथ
यथायोग्य हर को मिले, बढ़ें मिलकर हाथ
*
दीप्ति जगत उजियार दे, करे तिमिर का अंत
श्रेय नहीं लेती तनिक, ज्यों उपकारी संत.
*
तन का रक्षण मन करे, शांत लगाकर ध्यान 
नश्वर को भी तब दिखें अविनाशी भगवान
*
कहते हैं आज़ाद पर, रक्षाबंधन-चाह
रपटीली चुन रहे हैं, अपने सपने राह
*
सावन भावन ही रहे, पावन रखें विचार 
रक्षा हो हर बहिन की, बंधन तब त्यौहार 
*

सोमवार, 24 अगस्त 2015

मंदिर अलंकार

हिंदी पिंगल ग्रंथों में चित्र अलंकार की चर्चा है. जिसमें ध्वज, धनुष, पिरामिड आदि के शब्द चित्र की चर्चा है. वर्तमान में इस अलंकार में लिखनेवाले अत्यल्प हैं. मेरा प्रयास मंदिर अलंकार : 
                                           हिंदी 
                                  जन-मन में बसी 
                                जन प्रतिनिधि हैं दूर.
                       परदेशी भाषा रुचे जिनको वे जन सूर.
                    जन आकांक्षा गीत है,जनगण-हित  संतूर
                        ज                                         कै 
                        ग                                         सा  
                        वा                                         अ                                      
                       णी                                         द    
                        प                                          भु  
                        र                                          त 
                        छा                                         नू 
                        रहा                                        र।  
                     ---------------------------------------------------
     ========================================= 

शनिवार, 22 अगस्त 2015

navgeet

नवगीत:
संजीव
*
मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
कलम नहीं
पेडों की रहती
कभी पेड़ के साथ.
झाड़ न लेकिन
झुके-झुकाता
रोकर अपना माथ.
आजीवन फल-
फूल लुटाता
कभी न रोके हाथ
गम न करे
न कभी भटकता
थामे प्याला-साकी
मानव! क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
तिनके चुन-चुन
नीड बनाते
लाकर चुग्गा-दाना।
जिन्हें खिलाते
वे उड़ जाते 
पंछी तजें न गाना।
आह न भरते
नहीं जानते
दुःख कर अश्रु बहाना
दोष नहीं
विधना को देते,
जियें ज़िंदगी बाकी
मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
जैसा बोये 
वैसा काटे
नादां मनुज अकेला
सुख दे, दुःख ले 
जिया न जीवन  
कह सम्बन्ध झमेला.
सीखा, नहीं सिखाया 
पाया, नहीं
लुटाना जाना।
जोड़ा, काम न आया
आखिर छोड़ी   
ताका-ताकी

मानव !क्यों हो जाते
जीवन संध्या में
एकाकी?
*
 

kavita

एक रचना :
संजीव 
*
मात्र कर्म अधिकार है' 
बता गये हैं ईश। 
मर्म कर्म का चाहकर
बूझ न सके मनीष।
'जब आये संतोष धन
सब धन धूरि समान'
अगर सत्य तो कर्म क्यों
करे कहें इंसान?
कर्म करें तो मिलेगा
निश्चय ही परिणाम।
निष्फल कर्म न वरेगा
कोई भी प्रतिमान।
धर्म कर्म है अगर तो
जो न कर रहे कर्म
जीभर भरते पेट नित
आजीवन बेशर्म
क्यों न उन्हें दंडित करे
धर्म, समाज, विधान?
पूजक, अफसर, सेठ या
नेता दुर्गुणवान।
श्रम उत्पादक हो तभी
देश बने संपन्न।
अनुत्पादक श्रम अगर
होगा देश विपन्न।
जो जितना पैदा करे
खर्च करे कम मीत
तभी जुड़े कुछ, विपद में
उपयोगी हो, रीत।
हर जन हो निष्काम तो
निकल जाएगी जान
रहे सकाम बढ़े तभी
जीवन ले सच मान।
***

muktika

मुक्तिका:
*
तन माटी सा, मन सोना हो
नभ चादर, धरा बिछौना हो
साँसों की बहू नवेली का
आसों के वर सँग गौना हो
पछुआ लय, रस पुरवैया हो
मलयानिल छंद सलोना हो
खुशियाँ सरसों फूलें बरसों
मृग गीत, मुक्तिका छौना हो
मधुबन में कवि मन झूम उठे
करतल ध्वनि जादू-टोना हो
*

muktak

एक मुक्तक:
संजीव 
*
अहमियत न बात को जहाँ मिले 
भेंट गले दिल-कली नहीं खिले 
'सलिल' वहां व्यर्थ नहीं जाइए
बंद हों जहाँ ह्रदय-नज़र किले
*

geet

एक रचना : 
मानव और लहर 
संजीव 
*
लहरें आतीं लेकर ममता, 
मानव करता मोह
क्षुब्ध लौट जाती झट तट से,
डुबा करें विद्रोह
*
मानव मन ही मन में माने,
खुद को सबका भूप
लहर बने दर्पण कह देती,
भिक्षुक! लख निज रूप
*
मानव लहर-लहर को करता,
छूकर सिर्फ मलीन
लहर मलिनता मिटा बजाती
कलकल-ध्वनि की बीन
*
मानव संचय करे, लहर ने
नहीं जोड़ना जाना
मानव देता गँवा, लहर ने
सीखा नहीं गँवाना
*
मानव बहुत सयाना कौआ
छीन-झपट में ख्यात
लहर लुटती खुद को हँसकर
माने पाँत न जात
*
मानव डूबे या उतराये
रहता खाली हाथ
लहर किनारे-पार लगाती
उठा-गिराकर माथ
*
मानव घाट-बाट पर पण्डे-
झंडे रखता खूब
लहर बहांती पल में लेकिन
बच जाती है दूब
*
'नानक नन्हे यूँ रहो'
मानव कह, जा भूल
लहर कहे चन्दन सम धर ले
मातृभूमि की धूल
*
'माटी कहे कुम्हार से'
मनुज भुलाये सत्य
अनहद नाद करे लहर
मिथ्या जगत अनित्य
*
';कर्म प्रधान बिस्व' कहता
पर बिसराता है मर्म
मानव, लहर न भूले पल भर
करे निरंतर कर्म
*
'हुईहै वही जो राम' कह रहा
खुद को कर्ता मान
मानव, लहर न तनिक कर रही
है मन में अभिमान
*
'कर्म करो फल की चिंता तज'
कहता मनुज सदैव
लेकिन फल की आस न तजता
त्यागे लहर कुटैव
*
'पानी केरा बुदबुदा'
कह लेता धन जोड़
मानव, छीने लहर तो
डूबे, सके न छोड़
*
आतीं-जातीं हो निर्मोही,
सम कह मिलन-विछोह
लहर, न मानव बिछुड़े हँसकर
पाले विभ्रम -विमोह
*

parody

एक पैरोडी :
संजीव 
*
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों 
जो भी बोलें सुनों होके चुप साथियों 
*
सांसदों ज़िद करो मुख न खोलेंगे हम
चाहे कितना कहो कुछ न बोलेंगे हम
काम हो या न हो कोई अंतर नहीं
जैसा चाहें जिसे वैसा तौलेंगे हम
पद न छोड़ेगा कोई कभी साथियों
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों
*
हम सभाओं में गरजेंगे, बरसेंगे हम
चोट तुम पे करें, तुमको वरजेंगे हम
गोलियाँ सरहदों पे चलें गम नहीं
ईंट-पत्थर की नीति ही बरतेंगे हम
केजरी को न दम लेने दो साथियों
उड़ चले हम विदेशों को हँस साथियों
*
सब पे कीचड़ उछालेंगे हम रोज ही
दिन हैं अच्छे कहाँ, मत करें खोज भी
मन की बातें करें हम, न तुम बोलना
जन उपासे रहो, हम करें भोज भी
कोई सुविधा न छोड़ें कभी साथियों
***

geeta 4

अध्याय १ 
कुरुक्षेत्र और अर्जुन 
कड़ी ४. 

कुरुक्षेत्र की तपोभूमि में 
योद्धाओं का विपुल समूह 
तप्त खून के प्यासे वे सब
बना रहे थे रच-रच व्यूह 
*
उनमें थे वीर धनुर्धर अर्जुन 
ले मन में भीषण अवसाद 
भरा ह्रदय ले खड़े हुए थे 
आँखों में था अतुल विषाद 
*
जहाँ-जहाँ वह दृष्टि डालता
परिचित ही उसको दिखते
कहीं स्वजन थे, कहीं मित्र थे 
कहीं पूज्य उसको मिलते 
*
कौरव दल था खड़ा सामने 
पीछे पाण्डव पक्ष सघन 
रक्त एक ही था दोनों में 
एक वंश -कुल था चेतन 
*
वीर विरक्त समान खड़ा था 
दोनों दल के मध्य विचित्र
रह-रह जिनकी युद्ध-पिपासा 
खींच रही विपदा के चित्र 
*
माँस-पेशियाँ फड़क रही थीं 
उफ़न रहा था क्रोध सशक्त 
संग्रहीत साहस जीवन का 
बना रहा था युद्धासक्त 
*
लड़ने की प्रवृत्ति अंतस की 
अनुभावों में सिमट रही
झूल विचारों के संग प्रतिपल 
रौद्र रूप धर लिपट रही 
*
रथ पर जो अनुरक्त युद्ध में 
उतर धरातल पर आया 
युद्ध-गीत के तेज स्वरों में
ज्यों अवरोह उतर आया 
*
जो गाण्डीव हाथ की शोभा 
टिका हुआ हुआ था अब रथ में 
न्योता महानाश का देकर-
योद्धा था चुप विस्मय में 
*
बाण चूमकर प्रत्यञ्चा को 
शत्रु-दलन को थे उद्यत 
पर तुरीण में ही व्याकुल हो 
पीड़ा से थे अब अवनत 
*
और आत्मा से अर्जुन की 
निकल रही थी आर्त पुकार 
सकल शिराएँ रण-लालायित 
करती क्यों विरक्ति संचार?
*
यौवन का उन्माद, शांति की 
अंगुलि थाम कर थका-चुका 
कुरुक्षेत्र से हट जाने का 
बोध किलकता छिपा-लुका 
*
दुविधा की इस मन: भूमि पर 
नहीं युद्ध की थी राई 
उधर कूप था गहरा अतिशय 
इधर भयानक थी खाई 
*
अरे! विचार युद्ध के आश्रय
जग झुलसा देने वाले 
स्वयं पंगु बन गये देखकर 
महानाश के मतवाले 
*
तुम्हीं क्रोध के प्रथम जनक हो 
तुम में वह पलता-हँसता 
वही क्रिया का लेकर संबल 
जग को त्रस्त सदा करता 
*
तुम्हीं व्यक्ति को शत्रु मानते 
तुम्हीं किसी को मित्र महान 
तुमने अर्थ दिया है जग को 
जग का तुम्हीं लिखो अवसान 
*
अरे! कहो क्यों मूल वृत्ति पर 
आधारित विष खोल रहे 
तुम्हीं जघन्य पाप के प्रेरक 
क्यों विपत्तियाँ तौल रहे? 
*
अरे! दृश्य दुश्मन का तुममें 
विप्लव गहन मचा देता 
सुदृढ़ सूत्र देकर विनाश का 
सोया क्रोध जगा देता
*
तुम्हीं व्यक्ति को खल में परिणित 
करते-युद्ध रचा देते 
तुम्हीं धरा के सब मनुजों को 
मिटा उसे निर्जन करते 
*
तुम मानस में प्रथम उपल बन 
लिखते महानाश का काव्य 
नस-नस को देकर नव ऊर्जा 
करते युद्ध सतत संभाव्य 
*
अमर मरण हो जाता तुमसे 
मृत्यु गरल बनती
तुम्हीं पतन के अंक सँजोकर 
भाग्य विचित्र यहाँ लिखतीं 
*
तुम्हीं पाप की ओर व्यक्ति को 
ले जाकर ढकेल देते 
तुम्हीं जुटा उत्थान व्यक्ति का 
जग को विस्मित कर देते 
*
तुम निर्णायक शक्ति विकट हो 
तुम्हीं करो संहार यहाँ 
तुम्हीं सृजन की प्रथम किरण बन 
रच सकती हो स्वर्ग यहाँ 
*
विजय-पराजय, जीत-हार का 
बोध व्यक्ति को तुमसे है 
आच्छादित अनवरत लालसा- 
आसक्तियाँ तुम्हीं से हैं 
*
तुम्हीं प्रेरणा हो तृष्णा की 
सुख पर उपल-वृष्टि बनते 
जीवन मृग-मरीचिका सम बन 
व्यक्ति सृष्टि अपनी वरते 
*
अरे! शून्य में भी चंचल तुम 
गतिमय अंतर्मन करते 
शांत न पल भर मन रह पाता 
तुम सदैव नर्तन करते 
*
दौड़-धूप करते पल-पल तुम 
तुम्हीं सुप्त मन के श्रृंगार 
तुम्हीं स्वप्न को जीवन देते 
तुम्हीं धरा पर हो भंगार 
*
भू पर तेरी ही हलचल है 
शब्द-शब्द बस शब्द यहाँ 
भाषण. संभाषण, गायन में 
मुखर मात्र हैं शब्द जहाँ 
*
अवसरवादी अरे! बदलते 
क्षण न लगे तुमको मन में 
जो विनाश का शंख फूँकता 
वही शांति भरता मन में 
*
खाल ओढ़कर तुम्हीं धरा पर 
नित्य नवीन रूप धरते 
नये कलेवर से तुम जग की 
पल-पल समरसता हरते 
*
तुम्हीं कुंडली मारे विषधर 
दंश न अपना तुम मारो 
वंश समूल नष्ट करने का 
रक्त अब तुम संचारो 
*
जिस कक्षा में घूम रहे तुम 
वहीँ शांति के बीज छिपे 
अंधकार के हट जाने पर 
दिखते जलते दिये दिपे 
*
दावानल तुम ध्वस्त कर रहे
जग-अरण्य की सुषमा को 
तुम्हीं शांति का चीर-हरण कर 
नग्न बनाते मानव को 

रोदन जन की है निरीहता 
अगर न कुछ सुन सके यहाँ 
तुम विक्षिप्त , क्रूर, पागल से 
जीवन भर फिर चले यहाँ 
*
अरे! तिक्त, कड़वे, हठवादी 
मृत्यु समीप बुलाते क्यों?
मानवहीन सृष्टि करने को 
स्वयं मौत सहलाते क्यों?
*
गीत 'काम' के गाकर तुमने 
मानव शिशु को बहलाया 
और भूख की बातचीत की 
बाढ़ बहाकर नहलाया 
*
सदा युद्ध की विकट प्यास ने 
छला, पतिततम हमें किया 
संचय की उद्दाम वासना, से 
हमने जग लूट लिया 
*
क्रूर विकट घातकतम भय ने 
विगत शोक में सिक्त किया 
वर्तमान कर जड़ चिंता में 
आगत कंपन लिप्त किया 
*
लूट!लूट! तुम्हारा नाम 'राज्य' है 
औ' अनीति का धन-संचय 
निम्न कर्म ही करते आये 
धन-बल-वैभव का संचय 
*
रावण की सोने की लंका 
वैभव हँसता था जिसमें 
अट्हास आश्रित था बल पर 
रोम-रोम तामस उसमें 
*
सात्विक वृत्ति लिये निर्मल 
साकेत धाम अति सरल यहाँ 
ऋद्धि-सिद्धि संयुक्त सतत वह 
अमृतमय था गरल कहाँ?
*
स्वेच्छाचारी अभय विचरते 
मानव रहते हैं निर्द्वंद 
दैव मनुज दानव का मन में 
सदा छिड़ा रहता है द्वंद 
*
सुनो, अपहरण में ही तुमने 
अपना शौर्य सँवारा है 
शोषण के वीभत्स जाल को 
बुना, सतत विस्तारा है 
*
बंद करो मिथ्या नारा 
जग के उद्धारक मात्र तुम्हीं 
उद्घोषित कर मीठी बातें 
मूर्ख बनाते हमें तुम्हीं 
*
व्यक्ति स्वयं है अपना नेता 
अन्य कोई बन सकता 
अपना भाग्य बनाना खुद को 
अन्य कहाँ कुछ दे सकता?
*
अंतर्मन की शत शंकाएँ 
अर्जुन सम करतीं विचलित 
धर्मभूमि के कर्मयुद्ध का 
प्रेरक होता है विगलित 
*
फिर निराश होता थक जाता 
हार सहज शुभ सुखद लगे 
उच्च लक्ष्य परित्याग, सरलतम 
जीवन खुद को सफल लगे 
*
दुविधाओं के भंवरजाल में 
डूब-डूब वह जाता है 
क्या करना है सोच न पाता 
खड़ा, ठगा पछताता है 
*