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मंगलवार, 17 नवंबर 2015

dipak alankar

अलंकार सलिला: ३१  
दीपक अलंकार
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    दीपक वर्ण्य-अवर्ण्य में, देखे धर्म समान 
    धारण करता हो जिसे, उपमा संग उपमान 

जहाँ वर्ण्य (प्रस्तुत) और अवर्ण्य (अप्रस्तुत) का एक ही धर्म स्थापित किया जाये, वहाँ दीपक अलंकार होता है। 

अप्रस्तुत एक से अधिक भी हो सकते हैं

तुल्ययोगिता और दीपक में अंतर यह है कि प्रथम में प्रस्तुत और प्रस्तुत तथा अप्रस्तुत और अप्रस्तुत का धर्म 

समान होता है जबकि द्वितीय में प्रस्तुत और अप्रस्तुत दोनों का समान  धर्म बताया जाता है

    जब प्रस्तुत औ' अप्रस्तुत, में समान हो धर्म

    तब दीपक जानो 'सलिल', समझ काव्य का मर्म

    यदि प्रस्तुत वा अप्रस्तुत, गहते धर्म समान

    अलंकार दीपक कहे, वहाँ सभी मतिमान

    दीपक वर्ण्य-अवर्ण्य के, देखे धर्म समान

    कारक माला आवृत्ति, तीन भेद लें जान

उदाहरण:

१. सोहत मुख कल हास सौं, अम्ल चंद्रिका चंद्र

   प्रस्तुत मुख और अप्रस्तुत चन्द्र को एक धर्म 'सोहत' से अन्वित किया गया है

२. भूपति सोहत दान सौं, फल-फूलन-उद्यान
    
    भूपति और उद्यान का सामान धर्म 'सोहत' दृष्टव्य है

३. काहू के कहूँ घटाये घटे नहिं, सागर औ' गन-सागर प्रानी

   प्रस्तुत हिंदवान और अप्रस्तुत कामिनी, यामिनी व दामिनी का एक ही धर्म 'लसै' कहा गया है

४. डूँगर केरा वाहला, ओछाँ केरा नेह
    वहता वहै उतावला, छिटक दिखावै छेह 

    अप्रस्तुत पहाड़ी नाले, और प्रस्तुत ओछों के प्रेम का एक ही धर्म 'तेजी से आरम्भ तथा शीघ्र अंत' कहा है 

५. कामिनी कंत सों, जामिनी चंद सोन, दामिनी पावस मेघ घटा सों 

    जाहिर चारहुँ ओर जहाँ लसै, हिंदवान खुमान सिवा सों

६. चंचल निशि उदवस रहैं, करत प्रात वसिराज

    अरविंदन में इंदिरा, सुन्दरि नैनन लाज

७. नृप मधु सों गजदान सों, शोभा लहत विशेष  

अ. कारक दीपक:

जहाँ अनेक क्रियाओं में एक ही कारक का योग होता है वहाँ कारक दीपक अलंकार होता है

उदाहरण:

१. हेम पुंज हेमंत काल के इस आतप पर वारूँ

    प्रियस्पर्श की पुलकावली मैं, कैसे आज बिसारूँ?

    किन्तु शिशिर में ठंडी साँसें, हाय! कहाँ तक धारूँ?

    तन जारूँ, मन मारूँ पर क्या मैं जीवन भी हारूँ

२. इंदु की छवि में, तिमिर के गर्भ में,

    अनिल की ध्वनि में, सलिल की बीचि में

    एक उत्सुकता विचरती थी सरल,

    सुमन की स्मृति में, लता के अधर में

३. सुर नर वानर असुर में, व्यापे माया-मोह

    ऋषि मुनि संत न बच सके, करें-सहें विद्रोह  

४. जननी भाषा / धरती गौ नदी माँ / पाँच पालतीं  

५. रवि-शशि किरणों से हरें 
    तम, उजियारा ही वरें 
    भू-नभ को ज्योतित करें   

आ. माला दीपक:

जहाँ पूर्वोक्त वस्तुओं से उत्तरोक्त वस्तुओं का एकधर्मत्व स्थापित होता है वहाँ माला दीपक अलंकार होता है

उदाहरण:

१. घन में सुंदर बिजली सी, बिजली में चपल चमक सी

    आँखों में काली पुतली, पुतली में श्याम झलक सी

    प्रतिमा में सजीवता सी, बस गर्भ सुछवि आँखों में

    थी एक लकीर ह्रदय में, जो अलग रही आँखों में

२. रवि से शशि, शशि से धरा, पहुँचे चंद्र किरण 
    कदम-कदम चलकर करें, पग मंज़िल का वरण

३. ध्वनि-लिपि, अक्षर-शब्द मिल करें भाव अभिव्यक्त
    काव्य कामिनी को नहीं, अलंकार -रस त्यक्त  

४. कूल बीच नदिया रे / नदिया में पानी रे 
    पानी में नाव रे / नाव में मुसाफिर रे  
    नाविक पतवार ले / कर नदिया पार रे

५. माथा-बिंदिया / गगन-सूर्य सम / मन को मोहें


इ. आवृत्ति दीपक:

जहाँ अर्थ तथा पदार्थ की आवृत्ति हो वहाँ पर आवृत्ति दीपक अलंकार होता हैइसके तीन प्रकार पदावृत्ति दीपक, 

अर्थावृत्ति दीपक तथा पदार्थावृत्ति दीपक हैं

क. पदावृत्ति दीपक:

जहाँ भिन्न अर्थोंवाले क्रिया-पदों की आवृत्ति होती है वहाँ पदावृत्ति दीपक अलंकार होता है

उदाहरण:

१. तब इस घर में था तम छाया,

    था मातम छाया, गम छाया,

                          -भ्रम छाया

२. दीन जान सब दीन, नहिं कछु राख्यो बीरबर

३. आये सनम, ले नयन नम, मन में अमन, 

                        तन ले वतन, कह जो गए, आये नहीं, फिर लौटकर

ख. अर्थावृत्ति दीपक:

जहाँ एक ही अर्थवाले भिन्न क्रियापदों की आवृत्ति होती है, वहाँ अर्थावृत्ति दीपक अलंकार होता है

उदाहरण:

१. सर सरजा तब दान को, को कर सकत बखान?

    बढ़त नदी गन दान जल उमड़त नद गजदान

२. तोंहि बसंत के आवत ही मिलिहै इतनी कहि राखी हितू जे

    सो अब बूझति हौं तुमसों कछू बूझे ते मेरे उदास न हूजे

    काहे ते आई नहीं रघुनाथ ये आई कै औधि के वासर पूजे

    देखि मधुव्रत गूँजे चहुँ दिशि, कोयल बोली कपोतऊ कूजे

३. तरु पेड़ झाड़ न टिक सके, झुक रूख-वृक्ष न रुक सके, 
    
    तूफान में हो नष्ट शाखा-डाल पर्ण बिखर गये 

ग. पदार्थावृत्ति दीपक:

जहाँ पद और अर्थ दोनों की आवृत्ति हो वहाँ,पदार्थावृत्ति दीपक अलंकार होता है

उदाहरण

१. संपत्ति के आखर तै पाइ में लिखे हैं, लिखे भुव भार थाम्भिबे के भुजन बिसाल में

    हिय में लिखे हैं हरि मूरति बसाइबे के, हरि नाम आखर सों रसना रसाल में

    आँखिन में आखर लिखे हैं कहै रघुनाथ, राखिबे को द्रष्टि सबही के प्रतिपाल में

    सकल दिशान बस करिबे के आखर ते, भूप बरिबंड के विधाता लिखे भाल में

२. 

    दीपक अलंकार का प्रयोग कविता में चमत्कार उत्पन्न कर उसे अधिक हृद्ग्राही बनाता है

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